मल्लिकार्जुन खरगे देश के वरिष्ट राजनेताओं में से हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के साथ ही वे राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। । मूलतः कर्नाटक के खरगे जी दलित समुदाय से आते हैं। अपने गृह राज्य के मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने काफी हाथ - पैर मारे किंतु पार्टी हायकमान ने उन्हें उपकृत न करते हुए उनके पुत्र प्रियांक को राज्य में मंत्री बनवा दिया जिन्होंने तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे उदयनिधि द्वारा सनातन की तुलना डेंगू और मलेरिया से करते हुए उसे समाप्त करने जैसी बात का खुलकर समर्थन किया था। समय - समय पर मल्लिकार्जुन जी भी अपने दलित होने का एहसास करवाना नहीं भूलते। ताजा प्रमाण राज्यसभा में उनके द्वारा मनु स्मृति का उल्लेख करते हुए लगाये गए आरोप हैं। जब सत्ता पक्ष के साथ ही सदन के सभापति ने उनसे आरोपों को प्रमाणित करने कहा तब वे शांत हो गए। दरअसल मनु स्मृति और मनुवाद ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर दलित समुदाय के मन में सवर्णों के प्रति विद्वेष भरा जाता है। मायावती और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता भी इन्हें बतौर औजार उपयोग करते रहते हैं। इनके अलावा जे.एन.यू की ढपलीबाज टुकड़े - टुकड़े गैंग भी मनुवाद से आजादी के नारे लगाया करती है। दिल्ली के जंतर मंतर पर संपन्न काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में भी मनुवाद के साथ ही ब्राह्मण वाद के विरोध में नारेबाजी सुनाई दी। पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके भी अपने दलित होने का उल्लेख करते हुए डाॅ. अंबेडकर का पोस्टर लहराते देखे गए। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आरक्षण की श्रेणी में आने वाले राजनेताओं द्वारा अपने समुदाय का भयादोहन करने के लिए मनु स्मृति और मनुवाद के विरोध का ढोल पीटा जाता है। जबकि 21 वीं सदी के भारतीय समाज में 10 फीसदी सवर्ण हिंदुओं को भी मनु स्मृति के बारे में लेशमात्र जानकारी नहीं होगी। यदि दलित नेता और दलित समुदाय से जुड़े साहित्यकार मनु स्मृति का जिक्र न करें तब कुछ वर्षों बाद शायद यह लोगों की स्मृति से ही वह विलुप्त हो जाएगी। और फिर जिस मनु स्मृति के आधार पर दलित राजनीति के पुरोधा ब्राह्मण वाद को कोसते हैं उसका जो अनुवाद वर्तमान में प्रचलित है उसकी प्रामाणिकता ही संदिग्ध है। सवर्ण वर्ग कभी भी अपने बचाव हेतु मनु स्मृति का उपयोग नहीं करता । भारत की सामाजिक व्यवस्था संबंधी किसी भी कानूनी विवाद में मनु स्मृति को आधार अथवा संदर्भ ग्रंथ नहीं माना जाता। ऐसे में खरगे जी और उन जैसे अन्य दलित नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मनु स्मृति के बहाने जो जातिगत विद्वेष फैलाते हैं उससे दलितों का कोई लाभ नहीं होता। दलितों के कल्याण के प्रति उनकी चिंता वाजिब है लेकिन मनु स्मृति के बहाने गैर दलित जातियों के बारे में अनावश्यक प्रलाप करने वाले कांग्रेस अध्यक्ष उस समय क्यों शांत रहे जब कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गाँधी ने सवर्ण समुदाय को कांग्रेस के पक्ष में लाने के लिए खुद को जनेऊ धारी सारस्वत ब्राह्मण प्रचारित करवाया। इसके बाद वे अनेक मंदिर और मठों में कर्मकांड करते दिखाये गए। मानसरोवर की यात्रा कर शिव भक्त होने का दावा भी किया। यद्यपि उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने के बाद श्री गाँधी को ब्राह्मण साबित करने की मुहिम ठंडी पड़ गई और बीते कुछ सालों से वे जातिगत जन गणना और जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का मुद्दा पकड़कर बैठ गए। खरगे जी ने मनु स्मृति के नाम पर दलितों को शिक्षा से रोके जाने का जो आरोप लगाया उसका कोई प्रमाण वे नहीं दे सके। सही बात ये है कि आज आरक्षण के विरोध में जो आवाजें उठ रही हैं उनका कारण श्री खरगे और उन जैसे कुछ दलित नेता ही हैं जिनकी अनावश्यक और अप्रासंगिक टिप्पणियों से सामाजिक समरसता को क्षति पहुंचती है। आजादी के आठ दशक बाद भी यदि दलित समुदाय आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर दौड़ में पीछे है तो फिर आरक्षण की उपयोगिता और सार्थकता पर दलितों के बीच ही विमर्श होना चाहिए। सवाल ये भी है कि दलित नेताओं की संतानें तो आगे बढ़ जाती हैं तो आम दलित क्यों नहींं? कर्नाटक में कांग्रेस के और भी दलित विधायक होंगे किंतु मंत्री पद पर खरगे जी के बेटे को ही बिठाया गया। सरकारी नौकरियों और राजनीति में जितने भी दलित नेता हैं उनके परिजन हर तरह से सुविधाजनक स्थिति में हैं। ऐसे में इन नेताओं द्वारा मनु स्मृति की आड़ लेकर जो रोना - धोना किया जाता है वह पूरी तरह पाखंड है और उसी का प्रदर्शन श्री खरगे द्वारा किया गया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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