Wednesday, 31 July 2024

तेज तर्रार शैली के भाषणों का असर कुछ देर ही रहता है

चूंकि ज्यादातर नेता गण चाटुकारों से घिरे होते हैं इसलिए आम जनता उनके बारे में क्या सोचती है इसका पता उनको नहीं चल पाता। यदि ऐसा होता तो देश की संसद में जिम्मेदार पदों पर आसीन अनुभवी राजनेताओं द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली शब्दावली का स्तर इतना मामूली नहीं होता। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पहले तो हिंदुओं को हिंसक बोल गए किन्तु जब स्वयं प्रधानमंत्री ने खड़े होकर उस पर आपत्ति जताई तो उन्होंने बात को घुमा फिराकर अपनी चमड़ी बचाने का प्रयास किया । जबकि अभिभाषण से उस टिप्पणी का कोई संबंध न था।   दो दिन पहले बजट पर बोलते हुए श्री गाँधी ने महाभारत में चक्रव्यूह के प्रसंग को पेश करते हुए प्रधानमंत्री पर तंज कसा कि जनता को सरकार ने चक्रव्यूह में फंसा लिया है। और जिस तरह अभिमन्यु को 6 कौरव योद्धाओं द्वारा घेरकर मार दिया गया उसी तरह नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत, अजीत डोभाल, अंबानी और अडानी हैं। इसके अलावा उन्होंने  बजट तैयार करते समय होने वाली हलवा सेरेमनी के अवसर पर  एकत्र अधिकारियों का चित्र दिखाते हुए कहा उनमें एक भी दलित या पिछड़ा नहीं है। और फिर जातीय जनगणना पर आते हुए बोल गए कि वे उसे पारित करवाकर रहेंगे। नेता प्रतिपक्ष का उक्त भाषण उनके प्रशंसकों को निश्चित रूप से रास आया होगा किन्तु  विभिन्न चैनलों पर हुई चर्चा में ये सवाल उठा कि श्री गाँधी ने बजट पर तो खास बोला ही नहीं। उनके भाषण के उत्तर में गत दिवस वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदन में  बताया कि  नेहरू जी और राजीव गाँधी ने किस प्रकार आरक्षण का विरोध किया था। उन्होंने हलवा सेरेमनी के चित्र को लेकर स्पष्ट किया कि इसकी परिपाटी यूपीए सरकार ने शुरू की और तब बजट बनाने वाले अधिकारियों की जाति नहीं पूछी गई। श्रीमती सीतारमण ने नेता प्रतिपक्ष पर तीखा हमला करते हुए पूछा कि राजीव गाँधी फाउंडेशन और राजीव गाँधी ट्रस्ट में कितने दलित और पिछड़े हैं? लेकिन पूर्व मंत्री अनुराग ठाकुर ने श्री गाँधी पर जो हमला किया उससे वे तिलमिला उठे। उन्होंने पहले तो नेता प्रतिपक्ष के आध्यात्मिक ज्ञान का मखौल उड़ाते हुए कहा चक्रव्यूह में अभिमन्यु को घेरने वाले कौरव योद्धा 6 नहीं 7 थे। लेकिन उनकी इस बात ने राहुल को उत्तेजित कर दिया कि जिनकी जाति का पता नहीं वे जातिगत जनगणना की बात कर रहे हैं। इतना सुनते ही श्री गाँधी ने उनकी बात को गाली बताते हुए कहा कि वे माफी माँगने के लिए नहीं कहेंगे । दोनों तरफ से हुए इस आक्रमण और प्रत्याक्रमण के बाद सवाल ये उठ रहा है कि बजट जैसे गंभीर विषय पर चर्चा की बजाय जाति, चक्रव्यूह आदि के उल्लेख से नेता प्रतिपक्ष कौन सा संदेश देना चाहते थे। अनुराग ठाकुर ने श्री गाँधी पर जो हमले किये उसमें उनकी बातों का जवाब ज्यादा था बजट की बात कम। लेकिन वित्त मंत्री ने राहुल के भाषण का तीखा जवाब देने के साथ ही  बजट के पक्ष में विस्तृत चर्चा की। उनका कल का भाषण अच्छी  तरह तैयार किया लग रहा था। नई लोकसभा में अब तक नेता प्रतिपक्ष के जो भी भाषण हुए वे चुनावी रैलियों का एहसास करवाने वाले रहे। जातिगत जनगणना निश्चित रूप से ज्वलंत विषय है जिससे राष्ट्रीय राजनीति भी प्रभावित हो रही है। लेकिन उस मुद्दे को कहाँ और कैसे उठाना है ये नेता प्रतिपक्ष को सीखना होगा। जिस प्रकार उन्होंने सदन में संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत और राष्ट्रीय सुरक्षा  सलाहकार अजीत डोभाल का  नाम लिया उसकी प्रासंगिकता समझ से परे थी। इसी प्रकार अंबानी और अडानी का नाम रोज लेने से उनकी खिसियाहट ही सामने आती है। उल्लेखनीय है मुकेश अंबानी के बेटे के विवाह का गाँधी परिवार ने भले बहिष्कार किया किन्तु न केवल कांग्रेस अपितु इंडिया गठबंधन के घटक दलों के लगभग सभी प्रमुख नेताओं ने उस आयोजन में शिरकत की।  ये देखते हुए उन औद्योगिक घरानों के प्रति श्री गाँधी की टिप्पणियां उनकी निजी खुन्नस प्रतीत होने लगी है। दूसरी बात ये भी है कि कांग्रेस में जो अनुभवी और प्रतिभाशाली युवा सांसद लोकसभा में हैं उनको भी पर्याप्त अवसर  देना चाहिए। हालांकि उन्हें लोकसभा में आये हुए 20 वर्ष बीत गए किन्तु बतौर सांसद वे प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं। केवल तेज तर्रार शैली में बोलने का असर कुछ देर तक ही रहता है। श्री गाँधी के भाषण के जवाब में श्री ठाकुर और वित्त मंत्री ने जो कहा उसमें से आधी बातों का भी वे उत्तर नहीं दे सकेंगे। बेहतर हो वे संसद के पुस्तकालय में विपक्ष के पुराने नेताओं द्वारा बजट एवं अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर दिये संसद में दिये भाषण पढ़कर उनसे सीखें। उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि विपक्ष के नेता को सत्ता पक्ष पर हमला करने के लिए समुचित तैयारी करनी चाहिए। हर बात में अंबानी, अडानी का जिक्र करना ये साबित करता है कि आप रट्टू तोते जैसे हैं। रही बात जातिगत मुद्दों की तो श्री गाँधी को ये नहीं भूलना चाहिए कि उनको उठाकर वे  अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव को ताकत दे रहे हैं जबकि कांग्रेस तो जात पर न पांत पर का नारा लगाती आई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 30 July 2024

रेलवे : इसके पहले कि समूची व्यवस्था पटरी से उतर जाए


आज एक और रेल दुर्घटना की खबर आ गई। पटरी से उतरी मालगाड़ी के एक डिब्बे से एक यात्री गाड़ी आकर टकरा गई। प्रारंभिक तौर पर  दो लोगों के मारे जाने की जानकारी आई है । 120 कि.मी की रफ्तार से आ रहे मुंबई - हावड़ा मेल ( 12810) के भी कई डिब्बे पटरी से उतर गए। राहत और बचाव का काम शुरू हो गया है  किंतु जल्दी - जल्दी हो रहे हादसों से रेलवे की छवि खराब हो  रही है। रेल मंत्री अश्विन वैष्णव की प्रशासनिक और पेशेवर योग्यता तथा अनुभव पर किसी को संदेह नहीं है। कुछ समय पूर्व उड़ीसा में हुई भीषण रेल  दुर्घटना के समय घटनास्थल पर रहकर राहत, बचाव और मरम्मत के कार्य का निर्देशन करने पर उनकी प्रशंसा भी हुई थी किंतु हर दुर्घटना के समय रेल मंत्री के लिए ऐसा करना  न तो संभव है और न ही व्यवहारिक। और फिर श्री वैष्णव के पास सूचना प्रसारण तथा इलेक्ट्रानिक एवं सूचना तकनीक जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का भी दायित्व है।  संसद का बजट सत्र चलने के कारण विपक्ष का उन पर हमलावर होना भी तय है। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तो इसकी शुरुआत कर भी दी है। संसद में भी रेलमंत्री से इस्तीफा देने की मांग भी की जायेगी और इसके लिए स्व. लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण दिया जायेगा जिन्होंने रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए मंत्रीपद से त्यागपत्र दे दिया था। लेकिन आज  और तब  में बहुत फर्क है। तब न इतनी गाडियाँ होती थीं और न ही दुर्घटनाएं। लेकिन कुछ साल पहले मोदी सरकार के रेलमंत्री सुरेश प्रभु को लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं के कारण पद से हटना पड़ा था जबकि उनकी गिनती बेहद ईमानदार और कुशल मंत्रियों में की जाती थी। श्री वैष्णव को लेकर प्रधानमंत्री क्या फैसला लेंगे ये तो वही जानें किंतु इसमें दो मत नहीं हो सकते कि भारतीय रेल तमाम विसंगतियों और कमियों के बाद भी करोड़ों देशवासियों की जीवन रेखा है। आम जनता के लिए आज भी आवागमन का यह सबसे सस्ता और सुलभ साधन है। विश्व की सबसे बड़ी रेलवे होने का गौरव इसके साथ जुड़ा हुआ है। इसमें देश के सबसे अच्छे इंजीनियर कार्यरत हैं। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बीते दो दशकों में रेलवे में गुणवत्ता का स्तर उसकी प्रतिष्ठा को देखते हुए गिरा है। यात्री गाड़ियों के विलंब से चलने का न तो समुचित कारण बताया जाता है और न ही जानकारी।  इस बारे में इंटरनेट पर जानकारी की  व्यवस्था  भी बेहद गैर जिम्मेदार है।  आरक्षण की व्यवस्था में जरूर सुधार हुआ है तथा कुछ हद तक भ्रष्टाचार में भी कमी आई है। करेंट रिजर्वेशन की सुविधा भी काफी लाभदायक है किंतु तत्काल कोटे की कमाई के फेर में सीटें खाली होने पर भी प्रतीक्षा सूची बताई जाती है। इसी तरह आरक्षित डिब्बों में साफ - सफाई जबसे निजी हाथों में दी गई है तभी से उसकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। यात्री शिकायत करते हैं तो कभी  फ़ौरन कारवाई होती है लेकिन अधिकांश मामलों में जवाब भी नहीं मिलता। वातानुकूलित डिब्बों में गंदे चादर मिलना बेहद आम है। सुरक्षा भी भगवान भरोसे है। एक टिकिट चैकर को चार - चार डिब्बों की जिम्मेदारी दिये जाने से भी यात्री परेशान होते हैं। इसका कारण रेलवे में स्टाफ की कमी है। न केवल अधिकारी अपितु तृतीय - चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी भी जरूरत से कम होने के बाद भी उनकी भर्ती क्यों नहीं होती , ये समझ से परे है। जो कर्मचारी हैं भी उनके मन में निजीकरण का भय व्याप्त है। आये दिन ये खबरें उड़ा करती हैं कि जल्द ही निजी क्षेत्र को यात्री गाड़ियां चलाने का काम भी दिया जावेगा। रेलवे उनसे अपनी पटरियों का किराया और स्टेशन पर दी जाने वाली सुविधाओं का शुल्क वसूल करेगा।  ऐसा जब होगा तब होगा किंतु  लेकिन अभी तक जितना भी कार्य निजी क्षेत्रों में दिया गया उनका अनुभव बेहद खराब है। ये देखते हुए रेलवे को अपने मौजूदा ढांचे में ही सुधार करते हुए सेवाओं को पेशेवर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। आज की स्थिति में  उस पर ये आरोप आम है कि वह मुनाफाखोरी में लिप्त है। कोरोना काल में बंद की गई रियायतें दोबारा शुरू नहीं होने से महिलाओं और  बुजुर्गों में नाराजगी है। यात्री गाड़ियों में साधारण डिब्बे घटते जा रहे हैं जबकि आरक्षित बोगियों की भरमार है। हमसफर और वंदे भारत जैसी गाडियाँ बढ़ाई जा रही हैं जिनके किराए ज्यादा हैं। कुल मिलाकर देश की जीवन रेखा कही जाने वाली रेलवे में पहले जैसी बात नहीं रही। इसके पहले कि उसकी पूरी व्यवस्था ही पटरी से उतर जाए तत्काल इस तरफ ध्यान दिया जाना जरूरी है। रेल मंत्री कोई भी रहे इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे तो सस्ती, सुविधाजनक और सुरक्षित यात्रा चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 29 July 2024

दिल्ली में 3 मौतें : व्यवस्था या तो लापरवाह है या भ्रष्ट


140 करोड़ के देश में दो - चार तो क्या सौ - दो सौ लोग भी मर जाएं तो  फर्क नहीं पड़ता। बीमारी, दुर्घटना , तनाव जैसे कारणों से प्रतिदिन न जाने कितने भारतीय जान से हाथ धो बैठते हैं। इन दिनों सर्वत्र बाढ़ का प्रकोप  होने से अनेक लोग डूबकर मौत के मुँह में चले गए। दूषित जल के कारण संक्रामक रोगों से होने वाली मौतें भी खबरों का हिस्सा बनती हैं। देश के सुदूर गाँवों  और कस्बों में होने वाली मौतें तो चर्चाओं में आती ही नहीं हैं। वहाँ रहने वाले लोग यदि मतदाता न हों तब शायद उनके हालचाल पूछने वाला भी कोई नहीं होगा। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि हमारे देश में विकास की शुरुआत अति पिछड़े इलाकों की बजाय राजधानियों या अन्य बड़े शहरों से होती है। लेकिन वह भी महज दिखावे तक सीमित रह गया है। जिन क्षेत्रों में सत्ता प्रतिष्ठान का ठिकाना होता है वहाँ तो सब चाक चौबन्द नजर आता है लेकिन उसी राजधानी में कुछ दूर जहाँ आम लोग रहते हैं वहाँ  व्यवस्था की हालत बद से बदतर दिखाई देती है। इसका सबसे ताजा उदाहरण है देश की राजधानी दिल्ली जहाँ  तलघर (बेसमेंट) में चल रहे एक आईएएस कोचिंग सेंटर में अचानक पानी भर जाने से तीन छात्र जान से हाथ धो बैठे। पानी इतनी तेजी से भरा कि उन छात्रों को बाहर निकलने का अवसर नहीं मिला। बचाव टीमों को उनके शव निकालने तक के लिए मशक्कत करनी पड़ी। उक्त घटना से छात्र आक्रोशित हैं। भाजपा  दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को इस हादसे के लिए जिम्मेदार मान रही है। प्रशासन हरकत में आ गया है। ज्यादा दूर न होने से सर्वोच्च न्यायालय भी अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकेगा। कोचिंग चलाने वाले गिरफ्तार हो चुके हैं। सरकारी अमले का कर्तव्यबोध अचानक जागृत हो उठा है। अवैध रूप से संचालित दर्जन भर कोचिंग संस्थान बंद करवा दिये गए। जिस कोचिंग सेंटर में उक्त हादसा हुआ उसके बेसमेंट को भंडारण हेतु उपयोग किये जाने की अनुमति थी किंतु उसमें शायद पुस्तकालय बनाकर  रखा गया था। जहाँ तक प्रश्न उस उस क्षेत्र में जल भराव का है तो दिल्ली क्या समूचे देश में यही आलम है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की हालत तो और भी खराब है। कुछ वर्ष पूर्व एक प्रसिद्ध चिकित्सक  ऐसी ही परिस्थितियों में मैन होल में गिरकर मौत के शिकार हो गए। उसके बाद भी किसी के कान में जूं रेंगी हो ये एहसास नहीं हुआ। दिल्ली में कई दशक पहले उपहार सिनेमा अग्निकांड हुआ था। उसके बाद भी जन सुरक्षा के प्रति प्रशासन की जवाबदेही का खूब हल्ला मचा । सिनेमा, अस्पताल , स्कूल - कालेज आदि में अग्नि शमन के पुख्ता प्रबंध रखे जाने की सख्त हिदायतें दी गईं। लेकिन ये देखने में आया है कि किसी जानलेवा दुर्घटना के बाद कुछ दिन तक तो सरकारी अमला अभूतपूर्व मुस्तैदी दिखाता है लेकिन जैसे ही जनता का गुस्सा ठंडा होता है पूरी व्यवस्था ढर्रे पर लौट आती है। दिल्ली प्रशासन ने संदर्भित हादसे के फ़ौरन बाद दर्जन भर जिन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दिया यदि वे अवैध थे तो  अभी तक चलते कैसे रहे? उनके विरुद्ध अचानक प्रशासनिक कारवाई होने से ये स्पष्ट हो गया कि जिम्मेदार अधिकारी उनके नियम विरुद्ध संचालन से अवगत थे और उनकी अनदेखी करने के लिए सौजन्य राशि ली जाती रही होगी। हालांकि हमारे देश में ऐसा होना  अत्यंत स्वाभाविक है किंतु राष्ट्रीय राजधानी में इस तरह की दुर्घटना राष्ट्रीय शर्म का विषय है। जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार किसी वाहन की  टक्कर से कोचिंग सेंटर का फाटक टूटने से तलघर में पानी भरने की घटना हुई। सीसी कैमरे के सहारे उस वाहन की तलाश की जा रही है किंतु बेसेमेंट में कोचिंग क्लास या पुस्तकालय नियम विरुद्ध था तब संचालक आपराधिक उदासीनता के लिए तो दोषी है ही। इस हादसे के बाद यदि दिल्ली के अनेक कोचिंग संस्थान प्रशासनिक सख्ती के चलते बंद कर दिये जाते हैं तब उनमें पढ़ रहे हजारों छात्रों का क्या होगा जिनका भविष्य और उनके अभिभावकों का लाखों रुपया खतरे में पड़ गया। ऐसे हादसे रोकने के प्रति चूंकि शासन, प्रशासन और जनता तीनों उदासीन हैं इसलिए इनकी पुनरावृत्ति रोकना असंभव है। म.प्र. के जबलपुर नगर में कुछ साल पहले एक निजी अस्पताल में आग लगने से अनेक लोगों की मौत हो गई। अस्पताल में एक ही निकासी द्वार था और अग्निशमन की व्यवस्था भी अपर्याप्त थी। उसके बाद सभी निजी अस्पतालों की जांच हुई। निश्चित समय सीमा में सभी को अग्निशमन सम्बन्धी व्यवस्थाएं दुरस्त करते हुए नगर निगम फायर ब्रिगेड से अनापत्ति प्राप्त करने कहा गया किंतु अभी तक अनेक अस्पतालों ने उक्त औपचारिकता पूरी नहीं की। जनप्रतिनिधि भी चूंकि निजी अस्पताल वालों से उपकृत होते हैं इसलिए उनके मुँह भी बंद हैं। कुल मिलाकर समूची व्यवस्था या तो लापरवाह है या भ्रष्ट। ऐसे में इस तरह के हादसों को रोक पाना कैसे संभव होगा ये बड़ा सवाल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 27 July 2024

नीति आयोग के बहिष्कार का निर्णय विपक्ष के लिए हानिकारक


विपक्ष का काम है सरकार की गलत नीतियों का विरोध करते हुए जनता के हित के लिए आवाज उठाते रहना। भारत में आज़ादी के कई दशक बाद तक संसद से ग्राम पंचायत तक में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। राज्यों में कहीं - कहीं गैर कांग्रेसी सरकार बनीं भी तो चल नहीं सकीं। लेकिन 1977 के बाद से स्थितियाँ बदलने लगीं। केंद्र के साथ ही विभिन्न राज्यों में विभिन्न दलों या गठबंधन की सरकारें सत्ता में आईं। आश्चर्य की बात ये है कि जो कांग्रेस कभी अन्य दलों का ये  कहते हुए मज़ाक उड़ाया करती थी कि उनको सरकार चलाना नहीं आता वही उनमें से अनेक के साथ गठबंधन सरकार में शामिल हुई या उसे बाहर से समर्थन दिया। हालांकि इसका कारण भाजपा का तेजी से बढ़ता ग्राफ था जिसके कारण कांग्रेस को अपना दबदबा कम होने का भय सताने लगा। इस प्रकार  गैर कांग्रेसवाद की सियासत, गैर भाजपावाद में बदल गई। 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले बनाया गया इंडिया नामक गठबंधन इसी कारण से अस्तित्व में आया जिसमें कांग्रेस के अलावा तृणमूल, जनता दल (यू ), राजद, सपा, द्रमुक, आम आदमी पार्टी,  एनसीपी, शिवसेना (उद्धव गुट) , झामुमो, वामपंथी दल आदि शामिल थे। यद्यपि प. बंगाल में तृणमूल ने अकेले लड़ने का फैसला किया वहीं  केरल में कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतरे। गठबंधन को आकार देने  वाले नीतीश कुमार ने तो चुनाव के पहले ही भाजपा से गठजोड़ कर लिया था। वहीं चुनाव बाद आम आदमी पार्टी ने भी उससे किनारा कर लिया। हाल ही में  विभिन्न राज्यों की 10 विधानसभा सीटों के जो उपचुनाव हुए उनमें भी प. बंगाल और पंजाब में गठबंधन के सदस्य एक - दूसरे के विरुध्द लड़े। आम आदमी पार्टी ने तो हरियाणा की सभी विधानसभा सीटों पर अकेले लड़ने का ऐलान करते हुए दिल्ली में भी कांग्रेस के  साथ रहने से इंकार कर दिया। इससे विपक्ष में दिशाहीनता या एकरूपता का अभाव प्रमाणित हो रहा है। इसका ताजा उदाहरण तब मिला जब आज प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की बैठक का इंडिया गठबंधन से जुड़े  राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक , तेलंगाना, झारखंड, हिमाचल आदि ने बहिष्कार कर दिया किंतु ममता बैनर्जी ने उसमें  शिरकत कर सबको चौंका दिया। यद्यपि ममता  नहीं बोलने देने का आरोप लगाते हुए बाहर आ गईं। लेकिन उन्होंने गठबंधन के निर्णय के विरुद्ध बैठक आकर उन्होंने एकला चलो की नीति का प्रदर्शन कर दिया। इंडिया गठबंधन  ने नीति आयोग की महत्वपूर्ण बैठक में अपने मुख्यमंत्रियों को न भेजकर क्या संदेश देना चाहा , यह स्पष्ट नहीं है। ममता ने उसमें  हिस्सा लेकर अपनी बात रखी और  समुचित समय न दिये जाने का बहाना बनाकर बाहर आ गईं। यही काम इंडिया गठबंधन के शेष मुख्यमंत्री भी करते तो सत्ता पक्ष पर कुछ दबाव तो बनता किंतु ऐसा लगता है विपक्ष में दूरंदेशी का अभाव है। नीति आयोग एक महत्वपूर्ण संस्था है। विपक्ष के मुख्यमंत्रियों  को चाहिए इसकी बैठकों एवं अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेकर अपने सुझाव रखें और उनका प्रचार करें। आज की बैठक 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने पर केंद्रित थी। ऐसे में विपक्ष ने इसका बहिष्कार कर अपना ही नुकसान किया। संसद में भी उसका आचरण बेहद गैर जिम्मेदाराना है। उसे ये गुमान हो चला है कि लोकसभा चुनाव में संख्या बल बढ़ जाने का मतलब सदन में हल्ला मचाना मात्र है। जबकि होना तो ये  चाहिए कि विपक्ष के ज्यादा से ज्यादा सदस्य बहस में हिस्सा लें जिससे उनका भी अभिमत देश के समक्ष प्रस्तुत हो सके। गत दिवस राज्यसभा में कृषि मंत्री शिवराज सिंह जब एम.एस.पी पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को  मनमोहन सरकार द्वारा नामंजूर किये जाने के दस्तावेजी प्रमाण पेश कर रहे थे तब विपक्षी खेमा शोर - शराबे में लगा रहा। उस वजह से आज समाचार पत्रों में मंत्री जी की बात ही प्रकाशित हुई। श्री चौहान सदन में गलत तथ्य रख रहे थे तब विपक्ष के वरिष्ट सदस्यों को प्रतिवाद करना था। विपक्ष यदि वाकई सरकार को घेरना चाहता है तो उसे होहल्ले और बहिर्गमन जैसे कदमों से बचना होगा। वरना वह निर्णय प्रक्रिया से बाहर हो जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 July 2024

कारगिल विजय : भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ


आज कारगिल विजय की रजत जयंती है। हालांकि युद्ध में विजय भारत के लिए वह पहला अवसर नहीं था। 1962 में चीन ने हमारी पीठ में छुरा भोंककर दोस्ती और कूटनीति दोनों को कलंकित किया। उस पराजय ने जो ठेस पहुंचाई उसकी कसक आज भी दिल में है। यद्यपि उस युद्ध के महज तीन वर्ष बाद ही 1965 में पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठ का दुस्साहस किया । वह युद्ध राजस्थान तक फैल गया किंतु भारत ने  उसको जबरदस्त शिकस्त दी। अमेरिका से खैरात में मिले पैटन टैंक और सैबर जेट नामक लड़ाकू विमानों के बल पर जनरल अयूब खान ने  कश्मीर हड़पने का सपना देखा किंतु उल्टे भारतीय सेना लाहौर तक जा पहुंची। उस जंग में केवल पाकिस्तान ही नहीं अपितु अमेरिका को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ी क्योंकि  भारतीय सेना ने सीमित संसाधनों के बावजूद उसके अत्याधुनिक टैकों और लड़ाकू विमानों के परखच्चे उड़ाकर रख दिये। 1962 में मिली पराजय के बाद  सेना के पास साधनों की कमी के साथ - साथ सीमावर्ती क्षेत्रों तक  पहुँचने के लिए सड़कों का अभाव भी देखने मिला। यद्यपि 1965 तक बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ किंतु  वह जंग ज्यादातर मैदानी क्षेत्रों में हुई इसलिए सेना को पराक्रम दिखाने का समुचित अवसर मिला। लेकिन सबसे बड़ी बात रही राजनीतिक नेतृत्व की  दृढ़ता । प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को उसी की शैली में जवाब दिया। हालांकि बाद में ताशकंद में हुई वार्ता के दौरान भारत ने युद्ध में कब्जा की पाकिस्तान की भूमि खाली करने के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये। उसकी विपरीत प्रतिक्रिया देश में हो पाती उसके पूर्व ही खबर आ गई कि शास्त्री जी की मृत्यु हो गई। आज भी उस पर रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है। उस युद्ध के बाद चीन से अनेक बार झड़पें हुईं किंतु भारतीय सैनिक भारी पड़े। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान  की आंतरिक परिस्थितियाँ बिगड़ने से भारत में शरणार्थियों का तांता लग गया। अंततः दिसंबर में भारत ने सैन्य कारवाई की जिसके बाद पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। लेकिन  शर्मनाक पराजय से बड़ा धक्का पाकिस्तान को ये लगा कि उसका पूर्वी हिस्सा टूटकर बांग्ला देश नामक नया राष्ट्र बन गया। उस युद्ध ने भारतीय सैन्य शक्ति और रणनीतिक कुशलता की धाक पूरे विश्व में जमा दी। लेकिन पाकिस्तान ने इसके बाद आतंकवाद रूपी छद्म युद्ध शुरू कर दिया जिसमें पहले पंजाब जला और उसके बाद जम्मू कश्मीर में उसने अशांति फैलाने का कुचक्र रचा  जिससे वह राज्य आज तक जूझ रहा है। इसी बीच 1999 में पाकिस्तान के फौजी जनरल परवेज मुशर्रफ ने श्रीनगर से लेह जाने वाले मार्ग में कारगिल  क्षेत्र की पहाड़ियों मैं घुसपैठ की योजना को अंजाम दिया। दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि सर्दियों में बर्फबारी होने पर उनके सैनिक निचले इलाकों में चले आयेंगे। लेकिन पाकिस्तान ने अपनी आदतानुसार भारतीय सैनिकों की गैर मौजूदगी का लाभ लेकर सर्दियों में टाइगर हिल के साथ और कुछ चोटियों पर बंकर बना लिए। गर्मियां आने पर इसका खुलासा होते ही भारत ने सैन्य कारवाई की। शत्रु के ऊंचाई पर जमे होने से उन तक पहुंचना बेहद खतरनाक था किंतु अदम्य साहस और वीरता की नई दास्ताँ उस युद्ध में भारतीय  सेना ने लिख डाली। दूसरी तरफ पाकिस्तानी सैनिकों ने एक बार फिर हैवानियत का परिचय दिया। युद्धबंदी बने भारतीय सैनिकों और लड़ाकू पायलटों के साथ उन्होंने जिस नृशंसता का परिचय दिया उसने जिनेवा संधि से ज्यादा इंसानियत के कायदों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। उस युद्ध में पाकिस्तान कूटनीतिक मोर्चे पर भी बुरी तरह परास्त हुआ। अमेरिका और चीन जैसे परंपरागत मित्रों ने भी उसका साथ नहीं दिया। जिसके कारण उसे पीछे हटना पड़ा। कारगिल युद्ध कई मायनों में उल्लेखनीय बन गया। जिन हालातों में भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर तिरंगा लहराया उन्होंने सैन्य दृष्टि से नया इतिहास बना दिया। उसके बाद से भारतीय सेना ने कारगिल के साथ ही  समूचे लद्दाख़ और अरुणाचल क्षेत्र में जबरदस्त इंफ्रा स्ट्रक्चर तैयार कर दिया जिसमें सड़कें और पुल के अलावा हवाई पट्टी तक शामिल हैं। इसीलिए कारगिल का वह युद्ध भारत के आत्मविश्वास में वृद्धि के साथ ही वैश्विक स्तर पर उसे एक महाशक्ति के रूप में मान्यता दिलवाने में मददगार साबित हुआ। आज उस विजय की रजत जयंती निश्चित रूप से आत्म गौरव की अनुभूति के साथ ही उन वीर जवानों के सर्वोच्च बलिदान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का पावन अवसर है जिन्होंने अपने जीवन को भारत माँ के चरणों में हँसते - हँसते निछावर कर दिया था। कारगिल की उस ऐतिहासिक लड़ाई का नेतृत्व करने वाले सेना के समस्त अधिकारी और जवान भी अभिनंदन के पात्र हैं जिन्होंने भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ और जोड़ दिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 25 July 2024

पूरे देश के किसानों के शामिल हुए बिना आंदोलन अधूरा ही रहेगा


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पंजाब - हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें हरियाणा सरकार को एक सप्ताह में शंभु बॉर्डर खोलने कहा था ताकि वहाँ फंसे किसान अपने ट्रैक्टरों से दिल्ली जा सकें।  न्यायालय में हरियाणा सरकार ने तर्क रखा कि किसानों के दिल्ली जाने पर उसे आपत्ति नहीं है किंतु उन्होंने अपने जिन ट्रैक्टरों को बख्तरबंद गाड़ी और टैंक जैसा बना दिया उनको लेकर दिल्ली आने में कानून - व्यवस्था बिगड़ सकती है। अदालत का अभिमत इस बारे में ये था कि पिछली बार  किसानों और  मंत्रियों की वार्ताएं बेनतीजा रहीं क्योंकि मंत्री गण उनकी समस्याओं से अनभिज्ञ थे। ऐसे में स्वतन्त्र वार्ताकार नियुक्त किये जाएं जो एक अच्छी पहल हो सकती है। न्यायालय का ये कहना पूरी तरह सही है कि दोनों पक्षों में आपसी विश्वास का अभाव होने से गतिरोध बना हुआ है।  प्रश्न ये है कि ये अविश्वास क्यों उत्पन्न हुआ? और इसका जवाब ये है कि दिल्ली में साल भर चला किसान आंदोलन शुरू तो तीन कृषि कानूनों के विरोध से हुआ था किंतु धीरे - धीरे  नई -  नई मांगें जुड़ जाने से  वार्ता निष्फल रही । दरअसल पंजाब के किसानों को तत्कालीन काँग्रेस सरकार ने योजनापूर्वक दिल्ली की ओर जाने बाध्य किया जिससे उसका सिरदर्द दूर हो सके। सही बात ये है कि भले ही तीन कृषि कानूनों के विरोध के अलावा एम.एस.पी ( न्यूनतम समर्थन मूल्य) सहित अन्य मुद्दों पर देश भर में किसानों के कुछ संगठन नाराज चल रहे थे लेकिन दिल्ली जाकर लम्बा धरना देने से वे पीछे हट रहे थे। इसीलिए जब दिल्ली में किसान सड़क घेरकर बैठे तब उनके साथ ज्यादा हुजूम नहीं था किंतु दूसरे की सजाई दुकान पर अपना बोर्ड टांगने में सिद्धहस्त मंडली ने उसमें घुसपैठ की जिससे आंदोलन का कुछ - कुछ असर  उ.प्र  के पश्चिमी इलाकों के अलावा तराई क्षेत्र, हरियाणा और राजस्थान में भी दिखने लगा। देश के अन्य हिस्सों से भी गिनती के किसान उसमें शामिल हुए लेकिन मुख्य रूप से वह धरना पंजाब के सिखों के साथ ही  हरियाणा, उ.प्र और राजस्थान के जाटों के प्रभाव में चला गया। उसके साथ चिंताजनक बात ये जुड़ गई कि कैनेडा और ब्रिटेन में बसे खालिस्तानी संगठनों ने उसमें दखल देना शुरू कर दिया और देखते - देखते किसानों के बीच में भिंडरावाले के चित्र युक्त टी शर्ट पहने सिख युवा नजर आने लगे। गुरुद्वारों ने लंगर लगा दिये। जिसके कारण आंदोलन का स्वरूप ही बिगड़ गया। रही - सही कसर पूरी कर दी योगेंद्र यादव जैसे लोगों ने जिनका उक्त आंदोलन से दूर - दूर तक सम्बन्ध न था। कुछ विघ्नसंतोषी पत्रकारों ने  आंदोलन को भाजपा विरोधी बनाने का खेल खेला। और जब भी किसी समझौते की संभावना दिखी तो राकेश टिकैत  और उनकी मंडली ने दूध में नींबू निचोड़ने की शरारत कर डाली। केंद्र सरकार भी समझ चुकी थी कि वह आंदोलन उसके विरोधी खेमे के हाथ चला गया है जो किसानों के कन्धों पर बंदूक रखकर अपना उल्लू सीधा करना चाह रहा था। उ.प्र , पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव सिर पर होने से प्रधानमंत्री ने सबको चौंकाते हुए तीनों कृषि कानून वापस ले लिए।  उ.प्र और उत्तराखण्ड तो  भाजपा के पास ही रहे। लेकिन पंजाब में भाजपा और अकालियों के अलग- अलग होने से दोनों कमजोर हो चले थे ऐसे में टक्कर आम आदमी पार्टी और काँग्रेस में थी जिसमें काँग्रेस का सफाया हो गया। किसान आंदोलन से जुड़े किसान आम आदमी पार्टी  के मुफ्त बिजली और एम. एस.पी की गारंटी के वायदे से आकर्षित हो गए। उसके बाद से कई बार कोशिशें हुईं आंदोलन को पुनर्जीवित करने की किंतु सफलता हाथ न लगी। इसका कारण यही है कि किसानों का न तो कोई सर्व मान्य नेता है और न ही संगठन। इसलिए वह पंजाब के चन्द समृद्ध किसानों  की स्वार्थ पूर्ति का जरिया बन गया। जिस आम आदमी पार्टी ने उनको आसमानी ख्वाब दिखाये थे उसे लोकसभा चुनाव में पंजाब में कुल 3 सीटें मिल सकीं। कल किसान नेता दिल्ली आकर राहुल गाँधी से मिले किंतु जिनकी अपनी पार्टी  किसानों की गुनाहगार है जिसने सत्ता में रहते हुए कभी भी एम.एस.पी को कानूनी गारंटी में शामिल करने का प्रयास नहीं  किया। इसका कारण उसका आर्थिक दृष्टि से अव्यवहारिक होना है। लेकिन आज श्री गाँधी उसका ढोल बजा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस किसानों के मुद्दों को समझने वाले निष्पक्ष वार्ताकार  नियुक्त करने का सुझाव देकर जो दिशा तय की उसे देखते हुए ही किसानों को भी उन लोगों के सामने समर्थन की भीख नहीं माँगना चाहिए जो कृषि के बारे में शून्य हैं। और ये भी कि किसान केवल पंजाब और हरियाणा के अलावा भी पूरे देश में पाए जाते हैं। जब तक पूरे देश का किसान इस आंदोलन से नहीं जुड़ता  उसकी प्रामाणिकता पर संदेह बना रहेगा। हरियाणा विधानसभा के चुनाव जल्द होने वाले हैं। आंदोलन के पीछे एक कारण ये भी है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी




Wednesday, 24 July 2024

बजट पर राजनीतिक हालात की छाया साफ दिख रही


मौजूदा वित्तीय वर्ष का एक तिहाई समय बीत जाने के बाद आखिरकार केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गत दिवस 2024 - 25 के लिए अपना  बजट  प्रस्तुत कर दिया। प्रधानमंत्री ने जहाँ बजट को गांवों, गरीबों और किसानों को समृद्धि के रास्ते पर ले जाने वाला बताया वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के अनुसार यह सहयोगियों को खुश करने वाला कुर्सी बचाओ बजट है । लेकिन इसी के साथ वे यह भी बोल गए कि बजट काँग्रेस घोषणापत्र की नकल है। उनका आशय वित्त मंत्री द्वारा बेरोजगारों के लिए इंटर्नशिप शुरू किये जाने से है जिससे मिलता जुलता वायदा काँग्रेस के घोषणापत्र में किया गया था। उनकी बात  सही भी है क्योंकि लोकसभा चुनाव  परिणामों के बाद सरकार द्वारा बेरोजगारों के लिए तत्काल कुछ करना आवश्यक हो गया था। आगामी कुछ महीनों में  हरियाणा,  महाराष्ट्र , जम्मू कश्मीर तथा अगले साल दिल्ली और  बिहार में चुनाव होने हैं। उसके बाद 2026 में प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल में रणभूमि सजेगी। इसीलिए वित्त मंत्री ने बजट को इतना संतुलित बनाया जिससे   लोग खुश भले कम हों किंतु उनको नाराज होने का भी अवसर ज्यादा नहीं मिलेगा। युवाओं और गाँवों पर केंद्रित होने से बजट बेरोजारों और किसानों को राहत देने वाला होने की उम्मीद सत्ता पक्ष के साथ ही आर्थिक विशेषज्ञ भी जता रहे हैं। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि श्रीमती सीतारमण ने नौकरपेशा मध्यमवर्ग की अपेक्षाओं पर आधी  - अधूरी नजर ही डाली । मोबाइल फोन सस्ता करने के बजाय वित्त मंत्री आयकर छूट की सीमा में समय की मांग के मुताबिक वृद्धि करतीं तब उससे होने वाली बचत अर्थव्यवस्था  के लिए ज्यादा मददगार हो सकती थी। इसी तरह 70 वर्ष से अधिक आयु के  उन बुजुर्गों को भी बजट ने निराश किया जिन्हें आयुष्मान योजना के अंतर्गत सालाना 5 लाख के निःशुल्क इलाज की सुविधा मिलने का सपना काफी दिनों से दिखाया जा रहा था। रेल यात्रा में रियायत की उम्मीद भी धरी की धरी रह गई। बहरहाल एक बात के लिए केंद्र सरकार की प्रशंसा करनी होगी कि उसने बिहार और आंध्र प्रदेश  को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को नामंजूर करने का साहस दिखाया। यद्यपि वित्त मंत्री ने उनको अधो संरचना के कार्यों हेतु भरपूर राशि प्रदान दिये जाने का प्रावधान करते हुए जनता दल ( यू) और तेलुगू देशम पार्टी द्वारा केंद्र सरकार को दिये समर्थन के प्रति आभार व्यक्त कर दिया। राहुल ने इसी पर इसे कुर्सी बचाओ  बजट कहकर उसका मजाक उड़ाया। लेकिन नेता प्रतिपक्ष का न्यौता स्वीकार करते हुए  यदि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू इंडिया गठबंधन के साथ गठजोड़ करते हुए  श्री गाँधी को प्रधानमंत्री बनवा देते तब उन्हें बिहार और आंध्र प्रदेश को कहीं ज्यादा पैसा देना पड़ता क्योंकि काँग्रेस केवल 99 सांसदों के बल पर नीतीश और नायडू जैसे घाघ नेताओं की बात टालती  तो  वे  सरकार गिराने पर आमादा हो जाते। भाजपा उस मामले में ज्यादा मजबूत है जिसके पास 240 लोकसभा सदस्य होने से प्रधानमंत्री की वजनदारी ज्यादा है और ये भी कि वे दोनों अचानक समर्थन वापस ले लें तो भी सरकार को तुरंत खतरा नहीं होगा क्योंकि सत्ता  सुख  की चाहत रखने वाले एक - दो सांसद वाले कुछ दलों और निर्दलीय साथ देने सामने आ जायेंगे। उस दृष्टि से देखें तो बजट लोकसभा चुनाव के परिणाम से उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया गया है। जहाँ तक बात विपक्ष द्वारा की जा रही आलोचनात्मक टिप्पणियों की है तो इस बारे में भी यही कहा जा सकता है कि ये बजट इंडिया गठबंधन की  सरकार का होता तब जो सत्ता में बैठे हैं वे भी इन्हीं शब्दों में आलोचना कर रहे होते । और जब श्री गाँधी ने उसे काँग्रेस के घोषणापत्र की नकल कह दिया तब वे उसकी आलोचना कैसे करेंगे ये बड़ा सवाल है। लेकिन राजनीति से अलग हटकर देखें तो केंद्र सरकार के सामने परेशानी ये आयेगी कि वह बजट के प्रावधानों को इतनी जल्दी जमीन पर कैसे उतारेगी , क्योंकि बजट राशि का विभिन्न मंत्रालयों  और राज्यों को आवंटन किये जाने में अगस्त का महीना बीत जायेगा। ऐसे में इस कारोबारी वर्ष के महज सात महीने शेष रहेंगे। और फिर नितिन गडकरी जैसे मंत्री के विभाग को छोड़कर केंद्र और राज्य दोनों जगह सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन इतना सुस्त होता है कि उनसे जो प्रशंसा  सरकार के हिस्से में आनी चाहिए वह लोगों की नाराजगी में बदल जाती है। युवाओं के लिए बजट में किये गये इंटर्नशिप के प्रावधान के साथ भी यही खतरा है। ये देखते हुए प्रधानमंत्री को यह सतर्कता बरतनी होगी कि बजट में जो कहा गया है उस पर जल्द अमल हो जिससे उसके साथ जुड़े फायदे जनता को महसूस हो सकें। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 July 2024

नाम छिपाना या गलत बताना तो पहले से ही अपराध है

सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी तो कुछ कहने को रह ही नहीं जाता किंतु मुद्दा केवल नाम उजागर करने का नहीं अपितु ये है कि आजादी के बाद भी मुस्लिम समुदाय देश के बहुसंख्यक हिंदुओं का विश्वास अर्जित क्यों नहीं कर सका ? हालाँकि दोनों के बीच खाई तो अंग्रेज यहाँ से जाते समय ही पैदा कर गए थे जिसका दुष्परिणाम विभाजन के तौर पर देखने मिला और मुसलमानों ने पाकिस्तान के रूप में अपना अलग देश हासिल कर लिया। बंटवारे के उस दर्दनाक  दौर में लाखों लोगों की नृशंस हत्या की गई। संपत्ति की लूटपाट और महिलाओं की अस्मत लूटे जाने जैसी अनगिनत घटनाओं के कारण समूचा वातावरण इस तरह का बन गया  जिसके कारण दोनों कौमों के बीच नफरत और अलगाव की भावना  गहराई तक बैठ गई। बावजूद इसके लाखों मुसलमान भारत में रह गए वहीं पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में हिंदुओं ने रहने का निर्णय किया।इसके पीछे सोच ये रही कि देर सवेर हालात सामान्य हो जाएंगे।  लेकिन वोटों के सौदागरों ने बजाय सौहार्द्र कायम करने के खाई और चौड़ी कर दी।  भारत में तो मुसलमान राजनीतिक संरक्षण मिलने से फलते - फूलते गए किंतु पाकिस्तान से जो खबरें आती रहीं उनके अनुसार वहाँ के हिंदुओं को मुस्लिम कट्टरता का शिकार होना पड़ा। उन पर धर्म परिवर्तन का दबाव आज तक बनाया जाता है। उनकी लड़कियाँ जबरन उठाकर उनकी शादी मुस्लिम लड़कों से करवाने की शिकायतें आम हैं। भारत में मुस्लिम समुदाय के हितों पर आँच आने पर  सड़क से संसद तक में चर्चा होने लगती है। इसके उलट पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार के विरुद्ध पत्ता भी नहीं खड़कता । उल्लेखनीय है धर्म निरपेक्षता को भारत के साथ - साथ मो. अली जिन्ना ने भी स्वीकार किया था किंतु आजादी के 77 साल बाद आज दोनों मुल्कों में उसकी क्या स्थिति है ये दुनिया जानती है। ये सच्चाई है कि भारत का मुस्लिम समुदाय आज तक मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सका। महानगरों से लेकर छोटे - छोटे कस्बों तक में हिन्दू - मुस्लिम रिहायशी इलाके एक दूसरे से अलग होते हैं। दोनों समुदायों के बीच चंद अपवाद छोड़कर पारिवारिक तो छोड़िये सामाजिक संबंध भी दिखावे के ज्यादा होते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुस्लिम समुदाय में सहिष्णुता का अभाव  है। देश आजाद होने के बाद पंडित नेहरू की सरकार द्वारा हिंदुओं के विवाह और उत्तराधिकार प्रावधानों में तो परिवर्तन कर दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को हाथ लगाने की हिम्मत उनकी नहीं पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय तक समान नागरिक संहिता की जरूरत पर बल दे चुका है किंतु मुस्लिम समुदाय के वोट बैंक की ताकत के सामने किसी राजनीतिक दल में इतना साहस नहीं होता कि वह उसके पर्सनल लॉ को बदलने की बात तक करे। मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में इस दिशा में आगे बढ़ना चाहती थी किंतु लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने पूरी योजना बनाकर भाजपा को बहुमत से वंचित कर दिया जिसके कारण प्रधानमंत्री जिन कड़े और बड़े निर्णयों की बात करते थे वे अधर में लटक गए। भले ही राहुल गाँधी और अखिलेश यादव इसका श्रेय लूटना चाहें किंतु उ.प्र में मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा के विरोध में ध्रुवीकरण ही भाजपा को 240 पर रोकने का कारण बना। जबकि पाकिस्तान में ऐसा नामुमकिन है। हाल ही के कुछ वर्षों में देश के कुछ हिस्सों में जिस तरह की घटनाएं हुईं उनकी वजह से मुस्लिम समुदाय के प्रति हिंदुओं में अविश्वास और बढ़ा है। धोख़ा देकर हिन्दू लड़कियों के साथ विवाह करना और फिर उन पर धर्म बदलने के दबाव के अनेकानेक प्रकरण चर्चा में आये। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम समाज के धर्मगुरु यहाँ तक कि बुद्धिजीवी तक इन घटनाओं के विरोध में मुँह नहीं खोलते। इसके ठीक उलट हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति सहानुभूति रखने वालों की कमी नहीं है। उ.प्र के मुज़फ़्फ़रनगर में काँवड़ यात्रा के मार्ग पर खाद्य सामग्री बेचने वालों को अपना नाम साइन बोर्ड पर लिखने के निर्देश का मुसलमानों से ज्यादा विरोध हिंदुओं ने कर डाला। लेकिन किसी ने उन वजहों को जानने का प्रयास नहीं किया जो उ.प्र सरकार के उक्त निर्णय के पीछे थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगाकर भाजपा विरोधी ताकतों को खुश होने का अवसर दे दिया किंतु जब कानून की नजर में अपना नाम छिपाना या गलत नाम बताना अपराध है तब किसी दुकानदार को उसका नाम उजागर न करने की छूट का मकसद समझ से परे है। कोई न माने या न माने किंतु ज्यादातर हिंदुओं के मन में मुस्लिम समुदाय के प्रति अविश्वास के लिए वह समुदाय ही दोषी है जो इसे कम करने की बजाय इसे बढ़ाने की हिमाकत करता रहता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 22 July 2024

बजट : वित्त मंत्री पर विपक्ष, बाजार और जनता तीनों का दबाव

सद का बजट सत्र आज से प्रारंभ हो गया। कल वित्त मंत्री  निर्मला सीतारमण इस वित्तीय वर्ष का पूर्ण बजट पेश करेंगी। यद्यपि लगभग एक तिहाई साल तो बीत ही चुका है। फिर भी देश के उद्योगपति, व्यवसायी, नौकरपेशा इसका बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं क्योंकि इस पर न सिर्फ सरकार अपितु समाज के सभी वर्गों का आर्थिक नियोजन निर्भर होगा। देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार रिकॉर्ड मात्रा में है। इसके कारण आवश्यक वस्तुओं का आयात करने में कोई बाधा नहीं है। रक्षा सामग्री और कच्चे तेल के आयात में कोई कमी नहीं आने का कारण विदेशी मुद्रा की पर्याप्त मात्रा होना भी है। दुनिया की पांचवी अर्थव्यवस्था बन जाने के कारण भारत की स्थिति वैश्विक स्तर पर सम्मानजनक बनी है किंतु हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी और मंहगाई ने मतदाताओं के बड़े हिस्से को प्रभावित किया जिससे सत्तारूढ़ भाजपा को काफी नुकसान हुआ और वह स्पष्ट बहुमत से वंचित रह गई। इसका परिणाम यह हुआ कि 2014 और 2919 के चुनावों में बुरी तरह हारने वाला विपक्ष इस बार काफी बड़ी संख्या में नजर आ रहा है। लोकसभा के पहले सत्र में ही उसकी आक्रामकता से ये  एहसास होने लगा कि अगले पाँच वर्ष संसद में शांति की उम्मीद करना व्यर्थ है। विशेष रूप से नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने जिस तरह सरकार पर हमला किया उसकी वजह से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तालमेल होने की गुंजाइश की भ्रूण हत्या हो गई। श्री गाँधी द्वारा हिंदुओं को हिंसक कहे जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक खड़े हो गए। उसके बाद जब तक प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण पर उत्तर देते  रहे थे तब  तक समूचा विपक्ष शोर - शराबा करता रहा। इससे दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य की उम्मीद पूरी तरह डूब गई। इसका प्रमाण गत दिवस हुई सर्वदलीय बैठक से मिला जिसमें कांग्रेस ने लोकसभा के उपाध्यक्ष का पद मांगने के साथ ही मणिपुर आदि पर चर्चा की मांग कर डाली। इसके साथ ही उ.प्र के मुज़फ़्फ़रनगर  जिले में काँवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित खाद्य सामग्री की दुकानों और हाथ ठेले वालों के लिए अपना नाम लिखने का जो आदेश प्रसारित हुआ उसके विरोध में भी आवाज उठी। इसके बाद ही राजनीतिक विश्लेषकों ने निष्कर्ष निकाला कि इस सत्र में भी वही सब देखने मिलेगा जिसकी बानगी उद्घाटन सत्र में मिल चुकी है ।  हालांकि प्रधानमंत्री द्वारा चुनाव के दौरान ही पहले 100 दिन के लिए जिस कार्य योजना का संकेत दिया था उसकी कोई झलक अब तक तो नहीं महसूस हुई क्योंकि किसी बड़े और कड़े निर्णय लेने की कोई पहल  उनकी तरफ से नहीं दिखाई दी। इसका कारण सदन का बदला हुआ रूप ही है। वैसे सरकार के लिए विपक्ष जितनी समस्या है उतनी ही उसके वे सहयोगी हैं जिनके साथ भाजपा के काफी वैचारिक मतभेद हैं। वित्त मंत्री के बजट पर भी इसका असर रहेगा क्योंकि बिहार और आंध्र प्रदेश दोनों ने सर्वदलीय बैठक में भी उन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग उठा दी ।ऐसे में अब सरकार के लिए विपक्ष को शांत करने के साथ जनता की नाराजगी दूर करने का सबसे आसान और प्रभावशाली तरीका बजट ही है। यदि इसके जरिये वह आम जनता को  टैक्सों के बोझ के साथ ही मंहगाई से तत्काल राहत दिलवाने का इंतजाम करे तो इससे  विपक्ष की आक्रामकता पर रोक लग सकेगी। आगामी कुछ महीनों में कुछ राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। इसीलिए ये कयास लगाए जा रहे हैं कि वित्त मंत्री इन राज्यों पर मेहरबानियों की बरसात करेंगी। हालांकि उन पर विपक्ष, जनता और बाजार तीनों का जो जबरदस्त दबाव है उससे अपना बचाव वे किस प्रकार कर पाएंगी उसी से उनकी प्रतिभा का पता चलेगा। अन्यथा अभी तक तो वे विशाल बहुमत वाली सरकार की वित्तमंत्री थीं। हालांकि दबाव विपक्ष पर भी कम नहीं है क्योंकि वह भी जनता को ढेर सारे सब्जबाग दिखा चुका है। ऐसे में उसे भी सत्ता पक्ष के साथ सामंजस्य बनाकर चलना होगा। कुल मिलाकर कह सकते हैं इस बार का जनादेश सत्ता और विपक्ष दोनों को हद में रहने का संदेश देता है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 20 July 2024

उ.प्र सरकार के आदेश का विरोध 10 उपचुनावों के कारण है


पता  नहीं इतनी सी बात पर बखेड़ा खड़ा करने की क्या जरूरत है? यदि उ.प्र सरकार ने काँवड़ यात्रा मार्ग पर  खाद्य सामग्री विक्रेताओं को अपने प्रतिष्ठान के साइन बोर्ड पर मालिक का नाम अंकित करने का आदेश जारी किया तो इससे धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव किस प्रकार खतरे में आ गए ये बड़ा सवाल है। इसका उद्देश्य महज इतना है कि शिव भक्त काँवड़िये  किसी मुस्लिम प्रतिष्ठान से खाने का सामान न खरीद लें और बाद में विवाद हो। उक्त आदेश हाथ ठेला और खोमचे वालों तक पर लागू होगा। ऐसा इसलिए जरूरी समझा गया क्योंकि मुस्लिम समुदाय के अनेक लोगों द्वारा संचालित प्रतिष्ठानों के नाम भ्रामक होने से ये स्पष्ट नहीं हो पाता कि मालिक कौन है ? चूंकि मुसलमान और मांसाहार समानार्थी हैं इसलिए जो लोग पूरी तरह शाकाहारी हैं वे उनमें खाना खाने या खाद्य सामग्री खरीदने से बचते हैं।धार्मिक कर्मकांड में ज्यादा विश्वास करने वाले लोग तो उन हिंदुओं के यहाँ कुछ खाने से भी कतराते हैं जो माँस भक्षी  हैं। मुस्लिम समुदाय में गोमाँस खाने का चलन रहा है वह भी बड़ा कारण है। वैसे काफी बड़ी आबादी मांसाहारियों की होने के बावजूद शाकाहार का चलन बढ़ रहा है। जहाँ तक बात योगी सरकार के  आदेश की है तो उसकी सोच स्पष्ट है। जो हिन्दू नियमित मांसाहार करते हैं उनमें से भी बहुत से सप्ताह के कुछ दिनों मसलन मंगल और गुरुवार को मांसाहार नहीं करते। यह वर्ग सभी तीज - त्योहारों पर पूरी तरह शाकाहारी या फलाहारी हो जाता है। नवरात्रि और पितृ पक्ष में भी ऐसा देखने में आता है। काँवड़ यात्री भी यात्रा के दौरान शाकाहारी होते हैं अतः उनके अनुष्ठान की पवित्रता बनाये रखने के लिए  दुकानदार का नाम प्रदर्शित करने के लिए योगी सरकार ने आदेश जारी किया तो उसे सामान्य तौर पर लेना चाहिए।  मुस्लिम खाद्य प्रतिष्ठानों में हलाल का उल्लेख अलग से किये जाने के पीछे भी उस वर्ग के धार्मिक विश्वास की रक्षा करना ही है। अनेक ढाबे वाले अपने नाम के साथ वैष्णव या हिन्दू शब्द जोड़ लेते हैं। आजकल शाकाहारी भोजन को वैश्विक स्तर पर जैन फूड कहा जाने लगा है। इस सबका उद्देश्य शाकाहारी लोगों की  आहार सम्बन्धी शुद्धता की रक्षा करना है। जिस तरह मुस्लिम समाज  खाद्य संबंधी अपने नियमों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है वैसी ही भावना अन्य धर्मों के साथ भी जुड़ी हुई है। भारत बहुधर्मी देश है जहाँ सभी के अपने आराध्य और पूजा पद्धति अलग - अलग हैं। कुछ धर्मों के भीतर भी अनेक मत हैं। इस्लाम भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके बीच झगड़े भी होते आये हैं। संविधान सबको अपने विश्वास का पालन करने हेतु अवसर भी देता है और संरक्षण भी। मुस्लिम समाज के  कतिपय तत्व अपनी पहिचान छिपाकर हिंदुओं में घुल - मिलकर आपत्तिजनक करतूतें करते पकड़े गए इसलिए  उ.प्र सरकार को उक्त आदेश जारी करने पड़े। उल्लेखनीय है म.प्र सरकार ने एक वर्ष पहले उज्जैन के लिए ऐसे ही निर्देश जारी किये थे किंतु वहाँ के मुस्लिम समाज या विपक्षी दलों द्वारा उसका विरोध नहीं किया गया। सही बात तो ये है कि उ.प्र विधानसभा की 10 सीटों के लिए जल्द ही उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें से कुछ  उसी अंचल में हैं जहाँ काँवड़ यात्रा निकलती है। चूँकि वहाँ मुस्लिम मतदाता भी खासी संख्या में हैं लिहाजा तुष्टीकरण का  खेल शुरू हो गया।   प्रशासन का काम ऐसे आयोजनों में अशांति को रोकना है।  जिन लोगों को  ये लगता है कि ऐसा मुस्लिम दुकानदारों का बहिष्कार करने हेतु किया गया। तो ये मुस्लिम समाज के लिए भी विचारणीय है कि ऐसा क्यों हुआ? और ये भी कि जब उसने लोकसभा चुनाव में किसी दल का सामूहिक बहिष्कार वोट जिहाद के नाम पर किया तब उससे किस मुँह से सद्भाव की उम्मीद की जाती है? जैसा  बोओगे , वैसा ही काटोगे वाली उक्ति इस मामले में पूरी तरह सटीक बैठती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 19 July 2024

रद्द परीक्षा दोबारा होने की समय सीमा तय हो

 परीक्षा का मामला पूरे देश में चर्चित है क्योंकि इसमें सभी राज्यों के अभ्यर्थी शामिल होते हैं। लेकिन  विभिन्न राज्यों में होने वाली प्रवेश या नौकरी हेतु चयन परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ी का प्रचार उसकी सीमाओं में सिमटकर रह जाता है। कुछ के प्रकरण जरूर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने से चर्चित हो जाते हैं। इनको लेकर राजनीति भी बहुत होती है किंतु सरकारें बदलने के बाद भी इनमें होने वाली धांधली यदि रुकने का नाम नहीं ले रही तो ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि सत्ता में परिवर्तन होने से व्यवस्था बदलने की उम्मीद व्यर्थ है। लेकिन सूचना तकनीक के इस दौर में परीक्षा के पूर्व  प्रश्नपत्र उजागर हो जाना और उसके लिए मोटा लेन - देन होना इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकार की अपनी व्यवस्था या उसके द्वारा अधिकृत अन्य किसी एजेन्सी में कहीं न कहीं ऐसे बेईमान लोग बैठे हैं जो अपनी जेब भरने के फेर में लाखों नौजवानों के भविष्य के साथ खेलने का पाप करते हैं। नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी की जाँच कर रही सीबीआई  द्वारा देश के अनेक शहरों में कुछ लोगों की गिरफ्तारियां की गईं हैं। इस बात के प्रमाण भी मिल रहे हैं कि परीक्षा के पहले प्रश्नपत्र प्राप्त करने के लिए बड़े सौदे हुए। प्रश्नपत्र परीक्षा के कुछ देर पहले लीक होने के स्पष्टीकरण पर गत दिवस  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई यह टिप्पणी काफी मायने रखती है कि  कुछ मिनिटों पहले प्रश्नपत्र की जानकारी प्राप्त करने के लिए कोई 75 लाख जितनी बड़ी राशि भला क्यों देगा? इससे स्पष्ट है कि सब कुछ बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है जो संबंधित सरकारी विभागों के लोगों की मदद से ही संभव है। ऐसा ही खेल राज्यों में होने वाली सरकारी परीक्षाओं का है। प्रश्नपत्र के लीक हो जाने का प्रत्यक्ष प्रभाव हजारों - लाखों उन लड़के - लड़कियों पर पड़ता है जो दिन रात परीक्षा की तैयारी करते हुए अपना भविष्य संवारना चाहते हैं। परीक्षा टल जाने से  बच्चों का परिश्रम और समय के अलावा उनके  माता - पिता के पैसे और उम्मीदों पर भी अनिश्चितता के काले बादल मंडराने लगते हैं। प्रश्नपत्र लीक हो जाने की घटना कभी - कभार होती तब समझ में भी आती थी किंतु अब तो आये दिन ऐसी खबरें आने से लगता है पूरी व्यवस्था शिक्षा माफिया के हाथों बिक चुकी है। मामूली किस्म के दलाल पकड़े भी जाते हैं किंतु जो असली सरगना हैं उनकी गर्दन तक या तो जाँच एजेंसियों के हाथ नहीं पहुँच पाते या फिर उनको सत्ता प्रतिष्ठान रूपी रक्षा कवच हासिल है। सच्चाई जो भी हो लेकिन बेरोजगारी के भयावह आंकड़ों के बीच जब बड़ी संख्या में सरकारी पद रिक्त पड़े हैं तब किसी चयन परीक्षा के रद्द होने से उनको भरना संभव नहीं हो पाता। इसी तरह नीट सरीखी प्रवेश परीक्षा के पर्चे लीक होने जैसी घटना के कारण देश को समय पर आवश्यक चिकित्सकों की आपूर्ति विलंबित होती है। देश के समक्ष छोटी - बड़ी अनगिनत समस्याएं हैं। लेकिन प्रश्नपत्र लीक होने और उसकी वजह से परीक्षा रद्द होने की जो समस्या उत्पन्न हुई उससे देश का भविष्य जुड़ा होने से चिंता काफी बड़ी है। दुख इस बात का है कि इसके लिए शीर्ष पद पर बैठे जो मठाधीश सही मायने में जिम्मेदार हैं  वे तो सत्ता के संरक्षण में बच जाते हैं जबकि सबसे पहला फंदा उनके गले में ही पड़ना चाहिए। सबसे बड़ी बात ये है कि एक बार रद्द होने के बाद अगली परीक्षा कब होगी इसकी कोई गारंटी नहीं होने से अभ्यर्थी मानसिक तौर पर परेशान होते हैं। इस बारे में जरूरत इस बात की है कि जिस तरह विधायक और सांसद का स्थान रिक्त होने पर उसकी पूर्ति एक निश्चित समय के भीतर करने की संवैधानिक व्यवस्था है उसी तरह से इस तरह की परीक्षा रद्द होने पर उसे दोबारा आयोजित करने की भी समय सीमा निश्चित होनी चाहिए। देश के भविष्य का भाग्य चौपट करना एक गंभीर अपराध है जिसके दोषियों को कड़े से कड़ा दंड मिलना अत्यावश्यक है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 July 2024

सिद्धारमैया भूल गए कि कर्नाटक के लोग भी अन्य राज्यों में कार्यरत हैं


कर्नाटक सरकार द्वारा नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण दिये जाने के फैसले को एक दिन में ही वापस ले लिया गया। चूंकि उक्त निर्णय निजी क्षेत्र पर भी लागू होने वाला था लिहाजा राज्य का व्यवसायिक और औद्योगिक जगत खुलकर विरोध में उतर पड़ा। सिद्धारमैया सरकार इस फैसले के जरिये अपना जनाधार मज़बूत करना चाहती थी। यदि उक्त प्रावधान अमल में आ जाता तो  बेरोजगारों में ये संदेश जाता कि मुख्यमंत्री उनके प्रति बेहद संवेदशनशील  और  लीक से हटकर उनकी मदद हेतु प्रयासरत हैं। लेकिन वे भूल गए कि ऐसा ही निर्णय अन्य कुछ राज्यों द्वारा किये जाने के बावजूद वे उस पर अमल नहीं कर सके। हरियाणा में तो वह अदालत में उड़ गया। वैधानिक पक्ष छोड़ भी दें तो यह पूरी तरह अव्यवहारिक है। भले ही संविधान प्रदत्त संघीय  व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों को अपना कामकाज चलाने का अधिकार दिया गया है किन्तु कोई भी राज्य इस तरह से व्यवहार नहीं कर सकता जिससे राष्ट्रीय एकता की भावना को नुकसान हो। उस दृष्टि से देखें तो चाहे हरियाणा  हो या कर्नाटक , स्थानीय लोगों को नौकरियों में आरक्षण हेतु निजी क्षेत्र को  बाध्य करना संघीय ढांचे की व्यवस्था को चोट पहुंचाने के साथ ही व्यवसाय की स्वतन्त्रता पर भी बन्दिश लगाने जैसा है। इस बारे में  सबसे महत्वपूर्ण ये है कि कर्नाटक में अनेक उद्योग ऐसे हैं जो दूसरे राज्यों के लोगों द्वारा स्थापित किये गए। राज्य सरकारों  द्वारा आयोजित निवेशक सम्मेलन के दौरान देश भर के उद्योगपतियों के लिए लाल कालीन बिछाये जाते हैं। उनको अपने राज्य में निवेश हेतु सस्ती जमीन और बिजली - पानी सहित अनेक सुविधाएं और रियायतें देने का लालच दिया जाता है। श्री सिद्धारमैया पूर्व में भी मुख्यमंत्री रहे हैं। इसलिए इतना जरूर जानते होंगे कि शुरुआत में किसी उद्योगपति पर स्थानीय लोगों को रोजगार देने हेतु आरक्षण की शर्त रख दी जाए तो वह बिदक जायेगा। दूसरी बात ये भी है कि यदि स्थानीय स्तर पर सुयोग्य व्यक्ति उपलब्ध होंगे तो कोई भी निवेशक उसे काम पर रखना चाहेगा । मुख्यमंत्री जी ये तो मानेंगे ही कि कर्नाटक के उद्योगों में लाखों श्रमिक उ.प्र, बिहार  और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से आकर कार्यरत हैं। निर्माण कार्यों में तो इनकी उपस्थिति बड़ी संख्या में देखी जा सकती है। इसके अलावा सूचना तकनीक से जुड़ी जो बड़ी कंपनियां बेंगुलुरु में स्थित हैं उनमें देश भर की प्रतिभाएं कार्यरत हैं। यदि कर्नाटक में इतने सुयोग्य लोग होते तो वे  उनको ही काम पर रखतीं। और फिर श्री सिद्धारमैया  ये कैसे भूल गए कि उनके राज्य के हजारों युवक - युवतियाँ देश के दूसरे हिस्सों में भी कार्यरत हैं। ऐसे में उक्त  निर्णय लागू किया जाता तो उनके साथ उन राज्यों में भेदभाव शुरू हो जाता। स्मरणीय है गत वर्ष तमिलनाडु के वस्त्र उद्योगों में काम करने वाले बिहारी श्रमिकों के साथ मारपीट की घटना के बाद जब वे अपने गृहराज्य लौट गए तब उन उद्योगों का काम ठप्प पड़ गया। अंततः राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा के आश्वासन के बाद ही श्रमिकों की वापसी हो सकी। कल जैसे ही कर्नाटक सरकार का उक्त फैसला सामने आया वैसे ही केरल और आंध्र प्रदेश की सरकार ने वहाँ के उद्यमियों को अपने यहाँ आने का न्यौता दे डाला। चौतरफा विरोध के बाद आखिरकार श्री सिद्धारमैया ने उक्त निर्णय वापस ले लिया किंतु इससे उनकी अपरिपक्वता जाहिर हो गई। अनुभवी मुख्यमंत्री होने के नाते उनको इतना तो पता होना चाहिए था कि इस तरह का निर्णय जिन भी राज्यों द्वारा लिया गया वह विफल हो गया। लिहाजा उस गलती को दोहराने से उनको बचना चाहिए था। लेकिन वे सब कुछ जानते हुए भी मक्खी निगलने की हिमाकत कर  बैठे जिससे उनकी जोरदार फजीहत हुई। अच्छा होगा अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री इस तरह के मूर्खतापूर्ण निर्णयों से बचकर रहेंगे जिनका फ़ायदा कम नुकसान ज्यादा होता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 17 July 2024

म.प्र में कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है



म.प्र देश के उन राज्यों में है जहाँ कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर  है।  1977   तक समाजवादी और वामपंथी कुछ सीटों पर काबिज रहते थे किंतु जनता पार्टी बिखरने के बाद जनसंघ जब भाजपा के रूप में पुनर्जीवित हुआ तबसे प्रदेश की राजनीति दो ध्रुवों में सीमित होती गई।  बीच - बीच में सपा, बसपा और गोंगपा जैसी पार्टियों ने  अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई किंतु वह ज्यादा समय नहीं चल सकी। परिणामस्वरूप कांग्रेस और भाजपा ही मुख्य खिलाड़ी बच रहे। बाकी की पार्टियां इक्का दुक्का सीटों पर भले ही सफल हो जाएं लेकिन शेष में  यदि वे लड़ती भी हैं तो वोट कटवा की भूमिका में सिमट जाती हैं। बसपा और गोंगपा का नाम इस बारे में प्रमुखता से लिया जा सकता है। वैसे कुछ निर्दलीय भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं। पूरे देश की तरह म.प्र में भी कांग्रेस ने 1967 तक निर्बाध सत्ता चलाई। 1968 में संविद सरकार बनी जो अल्पजीवी रही। उसके बाद 1977 में जनता पार्टी का शासन आया किंतु ढाई साल भी नहीं चला। अगला सत्ता परिवर्तन 1990 में हुआ किंतु 1992 में बाबरी ढांचे के धराशायी होने के बाद कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी और 10 वर्ष काबिज रही। लेकिन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कुशासन की वजह से  2003 के चुनाव में हत्थे से उखड़ गई और तबसे यह प्रदेश भाजपा का स्थायी गढ़ बन गया। शुरू में तेजी से मुख्यमंत्री बदलने से उसकी क्षमता पर संदेह किया गया किंतु शिवराज सिंह चौहान के आने के बाद कांग्रेस की स्थिति बिगड़ती चली गई। यद्यपि 2018 में  भाजपा कुछ सीटों से बहुमत हासिल करने से चूक गई लेकिन कांग्रेस को भी सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों की बैसाखी थामनी पड़ी। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने की हसरत तो पूरी कर ली किंतु उनकी और दिग्विजय सिंह की जुगलबन्दी से मात खाए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 15 महीने बाद ही सत्ता पलट करवा दिया। शिवराज फिर आ गए। उनको लेकर तमाम खबरें उड़ती रहीं लेकिन 2023 का चुनाव उनके नेतृत्व में हुआ जिसमें भाजपा ने समस्त अनुमानों को ध्वस्त करते हुए कांग्रेस को पूरी तरह चित्त कर दिया। लेकिन पार्टी आलाकमान ने उनकी जगह मोहन यादव को कमान सौंपी तो उस निर्णय पर सवाल उठे क्योंकि लोकसभा चुनाव सामने था। हालांकि श्री यादव को बतौर मंत्री अनुभव था जबकि चुनाव लड़वाने में श्री चौहान को  महारत है। लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा ने वो करिश्मा कर दिखाया जो 1977 में भी नहीं हो सका। उसने इस बार छिंदवाड़ा सहित सभी सीटें जीतकर मुख्यमंत्री के चयन को सही साबित कर दिया। श्री सिंधिया और श्री चौहान के केंद्र में मंत्री बन जाने से श्री यादव के सामने खुला मैदान है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अ.भा. विद्यार्थी परिषद से आये विष्णुदत्त शर्मा ने भी संगठन का दायित्व कुशलता पूर्वक संभाल रखा है।सत्ता और संगठन में तालमेल भी बेहतर है। लेकिन दूसरे ध्रुव पर खड़ी कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। लगातार दो  चुनावों में  उसका प्रदर्शन शर्मनाक रहा। हालांकि विधानसभा की करारी पराजय के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष  पद से कमलनाथ को हटाकर अपेक्षाकृत युवा जीतू पटवारी को कमान सौंप दी।  नेता प्रतिपक्ष पद पर भी उमंग सिंगार के रूप में नये खून को अवसर दे दिया। बावजूद इसके लोकसभा चुनाव के नतीजों ने  साबित कर दिया कि म.प्र में मोदी मैजिक कायम है। कमलनाथ के बेटे 2023 में मामूली अंतर से जीते थे किंतु इस बार डेढ़ लाख से हार गए। दूसरी बड़ी हार हुई दिग्विजय सिंह की जो राजगढ़ की अपनी घरेलू सीट पर बुरी तरह हारे। हाल ही में छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा की जीत से स्पष्ट हो गया कि श्री नाथ अब अपना किले की रक्षा करने में भी असमर्थ हैं। उक्त उपचुनाव कांग्रेस विधायक के भाजपा में आने के कारण हुआ। यही हाल दिग्विजय सिंह का है। 1985 में अर्जुन सिंह के केंद्रीय राजनीति में जाने के बाद म.प्र में कमलनाथ और दिग्विजय के हाथ में सत्ता और संगठन की कमान आती गई जो , अब जाकर छूटी है। लेकिन जिन लोगों को पार्टी हाईकमान ने प्रदेश में  कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने का दायित्व सौंपा है वे भी उतने सक्षम नहीं दिखते । ऐसे में निकट भविष्य में पार्टी तब तक कोई उम्मीद नहीं कर सकती जब तक कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के समर्थकों से मुक्त नहीं हो जाती। हो सकता है कमलनाथ प्रदेश में अपनी रुचि कम करते हुए अपने व्यवसाय पर ज्यादा ध्यान दें । उनके पुत्र तो वैसे भी जमने के पहले ही उखड़ गए परंतु दिग्विजय और उनके पुत्र प्रदेश की सियासत में दखल देने से बाज नहीं आयेंगे और यही पार्टी में अंतर्कलह का कारण बनेगा। पार्टी हाईकमान के साथ दिक्कत ये है कि राष्ट्रीय राजनीति में उलझे रहने के कारण उसे प्रदेशों की ज्यादा चिंता नहीं रहती। यही वजह है कि इतना बड़ा गठबंधन बनाने के बाद भी लोकसभा में वह 100 का आंकड़ा नहीं छू सकी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 16 July 2024

मुस्लिम समाज विवाद को बढ़ाने के बजाय विवेक से काम ले


म.प्र के धार जिले में स्थित भोजशाला हिंदुओं का पुजा स्थल है या मस्जिद , इसका फैसला करने के लिए उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को जिम्मा सौंपा था। इस विभाग ने खुदाई करने के बाद अपनी रिपोर्ट न्यायालय के साथ ही पक्षकारों के सुपुर्द कर दी। हालांकि न्यायालय की अनुमति के बिना रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना किया गया है किंतु हिंदू पक्ष की ओर से किये जा रहे दावों के अनुसार खुदाई के दौरान जो वस्तुएँ एवं आकृतियाँ प्राप्त हुई वे सब भोजशाला के हिन्दू धार्मिक स्थल होने का प्रमाण देती हैं। इसे वाराणसी की ज्ञानवापी मस्ज़िद  से जोड़कर देखा जा सकता है जहाँ हुई खुदाई में भी हिन्दू आस्था से जुड़े अनेक प्रमाण मिले हैं जिनके बारे में अंतिम फैसला अदालत को करना है। भोजशाला को लेकर हिन्दू पक्ष जहाँ उत्साह से भरपूर है वहीं मुस्लिम खेमे ने खुदाई में मिले सबूतों पर टिप्पणी करने के बजाय दो टूक कह दिया कि मामले का अंतिम हल तो सर्वोच्च न्यायालय में ही होगा। इससे स्पष्ट है कि वह पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर हिन्दुओं के दावे या उच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार न करते हुए विवाद को सर्वोच्च अदालत में ले जायेगा। इसके पीछे उसका उद्देश्य फैसले को टालते रहना है जबकि बुद्धिमत्ता इसी में होगी कि जो वस्तुएँ और आकृतियाँ भोजशाला में की गई खुदाई में प्राप्त हुईं यदि वे उस स्थान को हिंदुओं की आस्था के केंद्र के तौर पर प्रमाणित करती हैं तो बजाय विवाद को लम्बा खींचने के मिल - बैठकर सुलझा लेना चाहिए।  मुस्लिम समाज के धार्मिक गुरुओं , पर्सनल लॉ बोर्ड के अलावा और जिन सगठनों के नेता हैं उनको राम जन्म भूमि पर दशकों चले विवाद से सबक लेना चाहिए। अयोध्या में जिस स्थान पर राम मन्दिर बना है उस पर भी तो बाबरी ढांचा खड़ा था जिसे मुस्लिम समाज मस्जिद का नाम देता रहा। उस विवाद का समाधान भी पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खुदाई से ही हुआ। जिसमें मिले चीजों से ये स्पष्ट हो गया कि बाबरी ढांचा हिन्दू मन्दिर पर खड़ा किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के 5 सदस्यों की जिस पीठ ने राम मन्दिर के पक्ष में निर्णय सुनाया उसमें एक मुस्लिम न्यायाधीश भी थे। सर्वसम्मत उस फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष के पास कोई और रास्ता बचा ही नहीं था। आज विवादित स्थल पर भव्य राम मन्दिर का निर्माण हो चुका है । ज्ञानवापी के अलावा मथुरा स्थित श्री कृष्ण जन्म भूमि से सटी शाही मस्ज़िद का विवाद भी न्यायालय के पास विचाराधीन है। वहाँ भी खुदाई को रोकने के लिए मुस्लिम पक्ष एड़ी चोटी का जोर लगाए पड़ा है। ये सारे विवाद लंबे समय से दोनों समुदायों के बीच कटुता को बढ़ाने का आधार बने हुए हैं। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में इन्हें लेकर मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण इतना जबरदस्त हुआ कि वाराणसी में अरबों - खरबों का विकास कार्य करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डेढ़ लाख के मामूली अंतर से जीत सके। अधिकतर  मुस्लिम बहुल मतदान केंद्रों पर उन्हें 10 से कम मत मिले। जाहिर है इसके पीछे ज्ञानवापी विवाद में हिंदुओं का पक्ष प्रबल होने की संभावना ही है। पूरे देश में मुस्लिम समुदाय ने भाजपा को हराने वाले प्रत्याशी के पक्ष में थोक मतदान किया। इसे अयोध्या में राम मन्दिर के निर्माण के प्रति नाराजगी के तौर पर देखा गया। लेकिन मुस्लिम समुदाय द्वारा भाजपा को हराने हेतु  रणनीतिक मतदान के बाद भी अंततः श्री मोदी तो तीसरी बार प्रधानमंत्री बन ही गए और भाजपा भी अकेले ही समूचे विपक्ष से अधिक सीटें ले गई। इसके बाद मुस्लिम समाज मोदी  विरोध के फेर में  ऐलानिया  तौर पर मुख्य धारा से पूरी तरह अलग - थलग होकर रह गया। वहीं राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और ममता बैनर्जी खुद को भाजपा से ज्यादा हिन्दू समर्थक साबित करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में अब उसको अपने हितों की रक्षा के लिए बजाय राजनीतिक दलों के बहकावे में आने के बहुसंख्यक समुदाय के साथ सामंजस्य बनाकर चलने की नीति अपनानी चाहिए। ज्ञानवापी और भोजशाला में की गई  खुदाई में मिली वस्तुएँ यदि हिन्दू धार्मिक आस्था को प्रमाणित कर रही हैं तो मुस्लिम समाज को बजाय अड़ंगेबाजी के उसे स्वीकार कर लेना चाहिए । अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ते - लड़ते हार जाने के बाद वे हिन्दुओं की सहानुभूति पूरी तरह खो बैठेंगे।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 July 2024

दलबदल के विरुद्ध जनादेश : भाजपा के लिए प. बंगाल कठिन चुनौती

बीते शनिवार विभिन्न राज्यों में विधानसभा के 13 उपचुनावों के परिणाम घोषित हुए। इनमें तृणमूल और कांग्रेस को चार - चार, भाजपा को दो, द्रमुक और आम आदमी पार्टी को एक - एक तथा एक सीट  निर्दलीय को मिली। ये परिणाम इसलिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव संपन्न हुए सवा महीना ही बीता। हालांकि उपचुनाव स्थानीय मुद्दों और प्रत्याशी की छवि पर केन्द्रित होते हैं। इसीलिए उनका राष्ट्रीय राजनीति पर बहुत असर नहीं होता। राष्ट्रीय नेता भी आम तौर पर इनमें प्रचार करने नहीं जाते। लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मुख्यमंत्री पर पार्टी प्रत्याशी को जिताने की जिम्मेदारी होती है। उस लिहाज से देखें तो ममता बैनर्जी सबसे सफल रहीं जिन्होंने चारों उपचुनाव भारी बहुमत से जितवा दिये। उनमें से तीन सीटों पर 2021 में भाजपा जीती थी। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने तीन में से दो उपचुनाव जीतकर लोकसभा चुनाव में हुए सफाये से उबरने में कामयाबी हासिल की जबकि एक सीट भाजपा ने जीती। इससे ये साफ हो गया कि यहाँ की जनता केंद्र में भाजपा को जी खोलकर समर्थन देती है किंतु राज्य  स्तर पर वह उससे खुश नहीं है। पड़ोसी राज्य पंजाब में आम आदमी पार्टी ने जालंधर वेस्ट सीट धमाकेदार अंदाज में जीत ली। इसमें भाजपा दूसरे स्थान पर रही जो उसके भविष्य के लिए शुभ संकेत कहा जा सकता है।  इस उपचुनाव ने राज्य के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की पकड़ साबित कर दी। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अलग - अलग लड़े थे । इसका लाभ कांग्रेस को मिला जो 11 में से 7 सीटें जीत गई जबकि आम आदमी पार्टी को महज 3 मिल सकीं । लोकसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन से किनारा कर लिया। जालंधर में भी कांग्रेस मैदान में थी। मुख्यमंत्री श्री मान ने अरविंद केजरीवाल के जेल में रहते ये उपचुनाव जीतकर अपनी वजनदारी दिखा दी। बिहार में हुए अकेले उपचुनाव में बाजी निर्दलीय ने मारी। इससे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को धक्का लगा। हालांकि तेजस्वी की पार्टी राजद के हाथ भी निराशा लगी। भाजपा को म.प्र के एक उपचुनाव में जबरदस्त सफलता मिली। छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा सीट के कांग्रेस विधायक इस्तीफा देकर  भाजपाई बन गए थे। 2023 में कांग्रेस ने कमलनाथ के इस गढ़ की सभी 8 विधानसभा सीटें जीत लीं थीं। लोकसभा में अपने बेटे की बड़ी हार के बाद इस सीट पर कांग्रेस की शिकस्त  से श्री नाथ की राजनीति के अंत की शुरुआत हो चुकी है। वहीं मुख्यमंत्री मोहन यादव काफी मजबूत हुए जिनके राज में भाजपा को  सभी 29 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस तरह भाजपा का यह किला अभेद्य बना रहा किंतु उत्तराखंड में उसे शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा जहाँ की दोनों सीटें उसके हाथ से निकल गई। हालांकि 2021 में भी वे उसको  नहीं मिलीं थीं । बद्रीनाथ में जीते कांग्रेस  विधायक को उसने तोड़ा किंतु उसे उपचुनाव नहीं जिता सकी वहीं मंगलौर की सीट बसपा विधायक के निधन से रिक्त हुई जिसे कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार ने मामूली अंतर से जीतकर भाजपा को निराश किया। इस बार बसपा यहाँ तीसरे स्थान पर रही। जहाँ तक बात तमिलनाडु के एक उपचुनाव की है तो वहाँ सत्तारूढ़ द्रमुक की जीत पर किसी को हैरानी नहीं हुई। इन परिणामों को इंडिया गठबंधन की जीत के तौर पर प्रचारित किया गया। लेकिन ये उपचुनाव पूरी तरह स्थानीय स्तर पर लड़े गए । प. बंगाल की रायगंज और बागदा में कांग्रेस तथा राणाघाट दक्षिण और मानिकतला में सीपीएम मैदान में थी। ये दोनों विपक्षी गठबंधन में होने के बावजूद तृणमूल के विरुद्ध लोकसभा चुनाव भी लड़ी थीं। सही मायनों में इन उपचुनावों ने मुख्यमंत्रियों की ताकत स्पष्ट साबित की।  भाजपा के लिए चिंता का विषय एक तो उत्तराखण्ड की दोनों  सीटों पर मिली हार है वहीं बिहार में जनता दल (यू) प्रत्याशी का हारना एनडीए के लिए धक्का है। दूसरी बात ये कि जनता ने दलबदलुओं को हराकर राजनीतिक दलों को संकेत दे दिया है। विशेष रूप से भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी होगी वरना उसकी असफलताओं का सिलसिला यूँ ही जारी रह सकता है। उसके लिए प. बंगाल बड़ी चुनौती बनता जा रहा है । वहाँ तृणमूल में घुस आये असमाजिक तत्व सत्ता के संरक्षण  सरकार विरोधी मतदाताओं को आतंकित करने में जुटे हुए हैं। हिंसा की राजनीति में तृणमूल ने वामपंथी सरकार को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा चुनाव के बाद अपने समर्थकों की हिफाजत नहीं कर  पाती तो उसकी स्थिति राज्य में एक कदम आगे दो कदम पीछे की होकर रह जायेगी। वैसे राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से असली मुकाबला उ.प्र में होने वाले 10 विधानसभा उपचुनावों में होगा जहाँ मजबूत मुख्यमंत्री होने के बाद भी भाजपा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस - सपा गठबंधन के आगे कमजोर पड़ गई थी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 July 2024

गुजारा भत्ते पर विपक्ष की ठंडी प्रतिक्रिया से मुस्लिम समाज में हैरानी


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तलाकशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के प्रावधान में मुस्लिम महिलाओं को शामिल किये जाने सम्बन्धी फैसले के बाद मुस्लिम संगठनों में हलचल तेज हो गई है। उच्चस्तरीय बैठकों में इस बात पर ऐतराज जताया गया कि शाहबानो प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये फैसले को 1986 में संसद द्वारा रद्द कर दिये जाने के बाद तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं  को गुजारा भत्ता दिये जाने का मसला हमेशा के लिए समाप्त हो गया था। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के  ताजे फैसले में गुजारा भत्ते की  प्रचलित व्यवस्था को तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होने की जो बात कही गई है उसकी वजह से 1986 में संसद द्वारा जिस कानून पर मोहर लगाई थी वह  बेअसर हो जाता है। इसीलिए मुस्लिम उलेमाओं सहित पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों ने ताजा फैसले को चुनौती देने पर विचार किया। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस फैसले पर नाराजगी दिखाई। लेकिन इस मामले में जैसी  राजनीतिक प्रतिक्रियाएं मुस्लिम समुदाय द्वारा अपेक्षित थीं वैसी नहीं आने से उसमें चिंता है। जनता दल (यू) महासचिव के. सी. त्यागी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में बताकर कट्टरपंथियों को बड़ा झटका दे दिया। चूंकि सीआरपीसी की धारा 125 इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट है और उसमें धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं है , लिहाजा सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताजा फैसले में साफ कहा कि तलाक़शुदा महिला को चाहे किसी धर्म की हो उसे अपने पूर्व पति से भरण पोषण के लिए राशि मांगने का कानूनी अधिकार है। यहाँ तक तो ठीक था किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव  में मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन हासिल करने वाले विपक्षी दलों विशेष रूप से कांग्रेस ने इस फैसले पर टिप्पणी करने से जिस प्रकार अपने को दूर रखा वह चौंकाने वाला है। लोकसभा चुनाव में मुसलमानों के पर्सनल लॉ को सुरक्षित रखने का आश्वासन देने वाले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की खामोशी तो चौंकाने वाली है। अखिलेश यादव ,लालू प्रसाद और ममता बैनर्जी की चुप्पी से भी मुस्लिम समाज स्तब्ध है। उसे डर है कि मोदी सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नजीर बनाकर  पर्सनल लॉ के कुछ अन्य प्रावधानों में भी प्रचलित कानूनों के मुताबिक दखलंदाजी कर सकती है। सही बात तो ये है कि लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस अब मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप से मुक्त होना चाहती है। उसके साथ इंडिया गठबंधन के अन्य दलों ने भी इस मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के समर्थन से  जिस तरह हाथ खींचे उससे वह हतप्रभ है। राजनीतिक गलियारों में व्याप्त चर्चाओं के अनुसार श्री गाँधी की रणनीति हिंदुओं पर भाजपा की पकड़ को कम करना है। उनका ध्यान मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, म.प्र , हिमाचल , उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों पर है जहाँ उनकी भाजपा से सीधी टक्कर है। लोकसभा चुनाव में भाजपा उक्त राज्यों के बल पर ही सबसे बड़ी पार्टी बन सकी। इन राज्यों की कुछ सीटों को छोड़कर मुस्लिम मतदाता उतने निर्णायक नहीं हैं। राहुल ये समझ चुके हैं कि उ.प्र और बिहार में वे कितने भी हाथ पाँव मारें किंतु जो सफलता मिलेगी वह अखिलेश और तेजस्वी के खाते में जायेगी। उनको ये भी लगने लगा है कि मुसलमान किसी भी स्थिति में भाजपा की तरफ नहीं झुकेंगे। इसलिए अब वे नर्म हिंदुत्व की नीति अपना रहे हैं। इसमें उन्हें कितनी सफलता मिलेगी ये आगामी कुछ महीनों में होने वाले कुछ विधानसभा चुनावों में स्पष्ट हो जायेगा। गुजारा भत्ते संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर इंडिया गठबंधन के घटक दलों की खामोशी को लेकर ओवैसी मुस्लिम संगठनों के नेताओं को ये उलाहना दे रहे हैं कि उन्होंने मुस्लिम समाज का अपना नेतृत्व विकसित करने का अवसर गँवा दिया। उल्लेखनीय है ओवैसी ने उत्तर भारत में कुछ छोटे दलों से गठजोड़ करते हुए उम्मीदवार खड़े किये किंतु उनके ऊपर भाजपा की बी टीम होने का आरोप चस्पा हो जाने से उनकी मुहिम फुस्स हो गई। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से मुस्लिम पर्सनल लॉ का जिन्न फिर बोतल से बाहर आ गया है। जनता दल (यू) द्वारा न्यायालय के फैसले का समर्थन किये जाने से भाजपा का हौसला बुलंद हुआ है। संसद के आगामी सत्र में ओवैसी यदि इस मुद्दे को उठाते हैं तब भाजपा विरोधी अन्य दलों की  प्रतिक्रिया देखने लायक होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 July 2024

पहाड़ धसकने की बढ़ती घटनाएं चिंता का विषय



उत्तराखंड के कुछ वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर छाए हैं। इनमें पहाड़ को धसकते हुए दिखाया गया है। कुछ में मलबे के साथ पानी की तेज धार भी आती दिख रही है जो नीचे बह रही नदी  में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देती है। बद्रीनाथ जाने का मार्ग अवरुद्ध है। हजारों यात्री  फंसे हैं जिन्हें होटल, गेस्ट हॉउस आदि के दोगुने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। ये स्थिति समूचे उत्तराखंड में देखी जा सकती है। जो लोग मोबाइल पर रील बनाकर प्रसारित कर रहे हैं उनका उद्देश्य महज मनोरंजन है या वे  सूचना के तौर पर लोगों को आगाह कर रहे हैं ये तो उनको ही पता होगा किंतु जो चित्र देखने मिल रहे है वे  डरावने हैं क्योंकि जिस आसानी से कहीं भी पहाड़ धसक रहा है उससे लगता है हिमालय की भू संरचना को जबरदस्त नुकसान पहुंचा है। भुरभुरी मिट्टी से खड़ी यह पर्वत माला जब तक वृक्षों से आच्छादित रही तब तक ऊपरी इलाकों में होने वाले हिमपात या बरसात का बोझ पहाड़ सह जाता था क्योंकि वृक्षों की जड़ें  बर्फ और पानी के बोझ को सहने की शक्ति मिट्टी को देती रहती थीं किन्तु धनपिपासु ठेकेदारों, भ्रष्ट सरकारी अमले और उनके सिर पर हाथ रखे राजनेताओं की तिकड़ी ने पहाड़ों पर छाई रहने वाली हरियाली छीन ली जिससे वे काले और कुरूप नजर आने लगे। बीते अनेक वर्षों से हिमस्खलन, भूस्खलन और बादल फटने से तबाही के दृश्य देखने मिलने लगे  हैं। दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। हजारों तीर्थ यात्री बीच रास्ते फंसे रहते हैं। कुछ अस्वस्थ होकर दम तोड़ देते हैं। राज्य और केंद्र सरकार के अलावा सेना तथा सीमा सड़क संगठन दुर्घटना स्थल पर पहुंचकर लोगों को राहत देने में पीछे नहीं रहते किंतु अब इस तरह की दुर्घटनाएं जिस तेजी से होने लगी हैं उसकी वजह से समस्या विकराल हो रही है। यद्यपि उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा में सबसे अधिक भीड़ वाला मौसम निकल चुका है किंतु अभी भी हजारों श्रद्धालु पहुँच रहे हैं। वर्षाकाल में पहाड़  धसकने के साथ बादल फटने की घटनाएं ज्यादा होती हैं लिहाजा इन दिनों सावधानी की ज्यादा आवश्यकता है। ऐसे में इस मौसम में यात्रा को रोक देने अथवा यात्रियों की संख्या नियंत्रित करने जैसे उपाय किये जाने चाहिए। इसमें दो मत नहीं है कि वाहनों की बेहिसाब आवाजाही से जो शोर और कंपन होता है वह भी कहीं न कहीं पहाड़ों के लिए कष्टदायी  है। सड़कों को बारहमासी के साथ फोर लेन बना देने से इस पर्वतीय क्षेत्र का सुख चैन छिनने लगा है। पहले तो चारधाम यात्रा अधिकतम दीपावली तक चलती थी किंतु सड़कों का स्तर और चौड़ाई बढ़ जाने से अनेक सैलानी उसके बाद भी वहाँ जाने का दुस्साहस करते हैं जिनका उद्देश्य तीर्थाटन कम और मौज - मस्ती ज्यादा होता है। इसलिए वे यहाँ की पवित्रता और पर्यावरण दोनों को क्षति पहुंचाते हैं। आशय ये है कि जिसे देवभूमि कहा  जाता है वह पर्यटन केंद्र का रूप लेती जा रही है। इस बारे में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में आबादी का पलायन मैदानी इलाकों की ओर होने से गाँव के गाँव खाली हो गए। इनमें रहने वाले लोगों को प्रकृति और पहाड़ की तासीर पता थी। इसलिए वे जल, जंगल और जमीन तीनों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता रखते थे। लेकिन जो लोग बाहर से आकर यहाँ निवेश कर रहे हैं उनका एकमात्र उद्देश्य येन केन प्रकारेण पैसा बटोरना है और उसी के फेर में समूचे यात्रा मार्ग पर कांक्रीट के ढांचे खड़े किये जा रहे हैं और सारी गंदगी पहाड़ और नदियों में  फैल रही है। ये देखते हुए अब उत्तराखंड सरकार को चार धाम यात्रा में आने वाले यात्रियों की संख्या पर नियंत्रण लगाना पड़ेगा। इसके अलावा वाहनों की बेहिसाब आवाजाही पर भी लगाम लगानी होगी जिनसे निकलने वाला धुंआ वृक्षों को क्षति पहुंचाता है। कांक्रीट के बढ़ते निर्माण भी रोके जाने चाहिए। कुल मिलाकर बात ये है कि चार धाम की यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को ये एहसास करवाया जाना जरूरी है कि यह देवभूमि है तो इसकी पवित्रता बनाये रखना उनका कर्तव्य है। तीर्थयात्रियों को भी थोड़ा संयम रखना चाहिए। चार धाम की यात्रा में आ रहे व्यवधानों के बाद भी लोगों का वहाँ जाकर भीड़ लगाना गैर जिम्मेदाराना रवैया है। उनको ये ध्यान रखना चाहिए कि जिसमें अनुशासन न हो वह धर्म नहीं ढकोसला है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 July 2024

सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता के मुद्दे को फिर जिंदा कर दिया


लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने मुसलमानों के निजी कानूनों के संरक्षण का वायदा किया था।  पार्टी के घोषणापत्र के अलावा  अन्य नेताओं ने प्रचार के दौरान मुस्लिम समुदाय को आश्वस्त किया कि वे शरीयत में वर्णित प्रावधानों से छेड़छाड़ नहीं होने देंगे । दरअसल उसे ऐसा करने की जरूरत इसलिए पड़ गई क्योंकि  भाजपा समान नागरिक संहिता लाने की बात कह चुकी थी। 400 पार के उसके नारे को कांग्रेस ने दलितों और मुसलमानों के बीच ये कहकर प्रचारित किया कि भाजपा तीन चौथाई बहुमत इसलिए हासिल करना चाहती थी ताकि संविधान में बदलाव करते हुए आरक्षण खत्म करे और मुसलमानों के पर्सनल लॉ समाप्त करते हुए समान नागरिक संहिता लागू कर दे। कांग्रेस का यह दाँव कारगर साबित हुआ। यद्यपि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो गए किंतु ये भी सच है कि जनता दल (यू). और तेलुगु देशम जैसे दलों से समर्थन लेने के कारण अब वे समान नागरिक संहिता सदृश मुद्दों पर नीतिगत फैसले लेने का खतरा नहीं उठाना चाहेंगे। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने परोक्ष  तौर पर ही सही किंतु  समान नागरिक संहिता का मुद्दा फिर से जीवित कर दिया। तेलंगाना की एक मुस्लिम महिला ने तलाक़ के बाद परिवार न्यायालय में सी.आर.पी.सी की धारा 125 के अंतर्गत  गुजारा भत्ता हेतु आवेदन दिया। उस पर विचार करने के बाद न्यायालय ने उसके पति को  20 हजार रु. प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। उसके विरुद्ध पति ने उच्च न्यायालय में अपील की जिसने तलाक़शुदा पत्नी को  गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकारी तो माना किंतु राशि घटाकर 10 हजार कर दी। पति महोदय ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में ये कहते हुए चुनौती दी कि शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे ही फैसले को संसद ने 1986 में पलट दिया था जिसके अनुसार मुस्लिम महिला द्वारा गुजारा भत्ता प्राप्त करने के अधिकार को खत्म कर दिया था। बताने की जरूरत नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के उक्त निर्णय को संसद में उलटवा देने की कितनी बड़ी कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ी। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना के मुस्लिम याचिकाकर्ता की अपील ठुकराते हुए अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा कि 1986 में संसद द्वारा पारित कानून सी. आर.पी.सी की धारा 125 के आड़े नहीं आता जिसके अंतर्गत हर विवाहित महिला चाहे वह मुस्लिम ही क्यों न हो, गुजारा भत्ते की पात्र और हकदार है। हालांकि न्यायालय ने ये निर्णय मुस्लिम महिला पर छोड़ दिया कि वह 1986 में  पारित कानून को माने या फिर सी.आर.पी.सी की धारा 125 के अंतर्गत गुजारा भत्ता हासिल करने का विकल्प चुने। इस ताजा फैसले का मुस्लिम समाज निःसंदेह विरोध करेगा क्योंकि इसके कारण तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं द्वारा गुजारा भत्ता लेने का रास्ता खुल गया। देखने वाली बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में रत्ती भर बदलाव भी सहन न करने वाले मुस्लिम धर्मगुरु इस फैसले को किस प्रकार स्वीकार कर सकेंगे जिसमें साफ लिखा है कि  मुस्लिम  सहित हर विवाहित महिला तलाक़ के बाद गुजारा भत्ते की अधिकारी है।  दूसरे शब्दों में कहें तो गत दिवस आये फैसले ने संसद और शरीयत दोनों को एक तरह से चुनौती दे डाली। स्व. राजीव गाँधी ने शाहबानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को तो संसद में अपने विशाल बहुमत के बल पर रद्द करवा दिया किंतु गत दिवस आये फैसले ने उनके बेटे राहुल और कांग्रेस दोनों  को अजीबोगरीब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। क्योंकि जिस मुस्लिम पर्सनल लॉ को सुरक्षित रखने का आश्वासन देकर उन्होंने इस समुदाय का थोक समर्थन हासिल किया उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने सेंध लगा दी। संविधान की किताब लेकर घूमने वाले श्री गाँधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की आलोचना करने से भी बचेंगे। अन्य विपक्षी दलों की स्थिति भी सांप छछूंदर जैसी होकर रह गई जो इस फैसले का स्वागत करेंगे तो मुसलमान नाराज हो जायेंगे और विरोध करेंगे तो हिंदुओं में उसकी विपरीत प्रतिक्रिया होगी। रही बात संसद के जरिये इस कानून को उलटने की तो समान नागरिक संहिता की पैरोकार भाजपा के रहते ये नामुमकिन है। ऐसे में कुछ राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों में ये फैसला विपक्षी दलों के लिए मुसीबत बने बिना नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 July 2024

आगामी विधानसभा चुनावों की छाया होगी केंद्र के बजट पर


18 वीं लोकसभा के  दूसरे सत्र में 23 जुलाई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण मौजूदा वित्तीय वर्ष का बजट लोकसभा में प्रस्तुत करेंगी।  लोकसभा चुनाव के कारण फरवरी में अंतरिम बजट पेश किया गया था।यद्यपि भाजपा इस बार बहुमत से पीछे रह गई किंतु उसने सहयोगी दलों के साथ जिस आसानी से सरकार बनाई उससे लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी पूरे 5 साल सत्ता में रहेंगे। सबसे बड़ा संकेत मिला शेयर बाजार में उछाल से जिसका सूचकांक  4 जून को आये चुनाव परिणामों के बाद से तकरीबन 10 फीसदी बढ़ चुका है।  एग्जिट पोल के बाद चढ़े शेयर बाजार ने  नतीजों में भाजपा का बहुमत न आते देख जबरदस्त गोता लगाया। इस पर एग्जिट पोल करने वालों  पर  आरोप लगा कि उन्होंने कुछ लोगों के इशारे पर गलत आकलन पेश किया जिससे आम निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। राहुल गाँधी ने तो इसकी जाँच हेतु संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग तक कर डाली। लेकिन जैसे ही सरकार अस्तित्व में आई शेयर बाजार ने तेजी पकड़ी और वह 80 हजार के इर्द- गिर्द बना हुआ है। आगे उसमें वृद्धि होगी या भाव गिरेंगे ये बजट पर निर्भर करेगा। मोदी सरकार के पिछले सभी बजट हालांकि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायक साबित हुए किंतु छोटा और मध्यम व्यापारी तथा कम आय वाले नौकरपेशा को ये महसूस होता रहा कि सरकार या तो बड़े उद्योगपतियों की हितचिंतक है या फिर उन लाभार्थियों की जिनका वोट उसे सत्ता तक पहुंचाता है। यदि इस बार भाजपा को बहुमत मिला होता तब  उम्मीद की जा सकती थी आगामी बजट भी पिछले बजटों जैसा होगा। लेकिन चुनाव परिणामों ने  प्रधानमंत्री को  दबाव में तो ला ही दिया। मध्यमवर्गीय मतदाताओं द्वारा कम मतदान और गरीब तबके में आरक्षण हटने के भय के साथ ही जाति की तरफ झुकने से भाजपा  को कम से कम 75 सीटों का नुकसान हुआ। वैसे तो हर सरकार इंफ्रा स्ट्रकचर, विकास दर और आर्थिक सुधारों की बात करती है। लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए उसे उस जनता को भी खुश करना होता है जो  उसकी ताजपोशी करवाती है। बीते दस सालों में नरेंद्र मोदी ने बड़े - बड़े काम किये। पर्याप्त बहुमत और अपार लोकप्रियता से उत्पन्न आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने जोखिम भी  उठाये। चूंकि नीयत साफ थी इसलिए जनता ने उन्हें सिर - आँखों पर बिठाया। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों के कारण उनका नाम  जीत की गारंटी माना जाने लगा किंतु इस लोकसभा चुनाव ने  कई सबक दे डाले। ऐसे में उनकी सरकार के  आगामी बजट में वह सब होना संभावित है जो चुनावी राजनीति को सीधे प्रभावित करे। अगले कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखण्ड और संभवतः जम्मू और कश्मीर तथा  अगले साल दिल्ली और बिहार में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में श्री मोदी के सामने दूध से जला छाछ भी फूंक - फूंककर पीने वाली स्थिति है। जिन राज्यों में इसी साल चुनाव होने वाले हैं उन सभी में लोकसभा चुनाव में भाजपा को कहीं कम तो कहीं ज्यादा नुकसान हुआ है। वह भी तब जब अधिकांश  अनुमान भाजपा को कम से कम 300 और एनडीए को 350 सीटें दे रहे थे । लेकिन अब विपक्ष का हौसला सातवें आसमान पर है। उसको एकता की ताकत समझ में आ गई है। जिन राज्यों में भाजपा की काँग्रेस से सीधी लड़ाई है वहाँ वह भारी पड़ जाती है किंतु जहाँ अनेक दल मैदान में हैं वहाँ उनके एकजुट हो जाने पर उसको नुकसान हो जाता है। ये देखते हुए आगामी बजट में केंद्र सरकार को आर्थिक तुष्टीकरण करना पड़ेगा। अर्थात आम जनता को तत्काल लाभ पहुंचाने वाले ऐसे प्रावधान करना होंगे जो आसानी से समझ में आ सकें। पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने के अलावा आयकर छूट की सीमा में अच्छी खासी वृद्धि , चिकित्सा बीमा की प्रीमियम में कमी जैसे कुछ ऐसी बातें बजट में होना समय की मांग है। किसानों को साल में मिलने वाली 6 हजार की राशि दोगुनी करना भी जरूरी है। बुजुर्गों को रेल टिकिट में रियायत फिर शुरू होनी चाहिए। 2024 के लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। पार्टी इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। वह गलती इस बजट में सुधारी जा सकती है। इसलिये बेहतर हो प्रधानमंत्री कुछ आर्थिक विशेषज्ञों के साथ ही चुनावी राजनीति में माहिर लोगों से सुझाव लेकर ऐसा बजट बनवाएं जिसे देखकर आम आदमी महसूस कर सके कि ये उसके लिए बना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 July 2024

घाटी के बाद जम्मू को निशाना बना रहे आतंकवादी


जम्मू के कठुआ इलाके में सेना के वाहन पर आतंकवादी हमले में 5 फौजी शहीद हो गए। हाल ही में ऐसी ही एक और वारदात में 2 जवान जान से हाथ धो बैठे। सैन्य वाहन पर हमले की घटना बीते मई माह में भी हुई थी। लेकिन हालिया हमलों से ये बात निकलकर आ रही है कि आतंकवादी कश्मीर घाटी के साथ - साथ जम्मू अंचल को भी अपना कार्यक्षेत्र बना रहे हैं। हालांकि हिन्दू बहुल जम्मू क्षेत्र में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने पहले भी हमले किये किंतु राज्य विधानसभा चुनाव के पहले इस तरह की घटनाएं लगातार होना किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा प्रतीत होती है। उल्लेखनीय है लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे राज्य में दशकों बाद रिकार्ड तोड़ मतदान हुआ। लेकिन उससे बड़ी बात ये रही कि राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला क्रमशः अनंतनाग और बारामूला की अपनी परंपरागत सीट पर बुरी तरह से हार गए। मेहबूबा को नेशनल  काँफ्रेंस के प्रत्याशी ने  शिकस्त दी वहीं उमर को जेल में बंद एक आतंकवादी ने चित्त कर दिया। अलगाववाद से जूझते आ रहे इस राज्य में ये बहुत बड़ा बदलाव कहा जा सकता है। निकट भविष्य में जम्मू कश्मीर राज्य में विधानसभा चुनाव करवाने की तैयारियां चल रही हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू क्षेत्र की दोनों सीटें जम्मू और ऊधमपुर बरकरार रखीं वहीं नेशनल काँफ्रेंस श्रीनगर और अनंतनाग पर काबिज हुई । बारामूला से जीते निर्दलीय राशिद ने जेल से आकर लोकसभा की शपथ तो ले ली किंतु उनकी रिहाई आसान नहीं है। इस प्रकार सदन में नेशनल काँफ्रेंस और भाजपा के दो - दो सदस्य ही मौजूद रहेंगे। लेकिन अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार संभवतः पहली मर्तबा लोकसभा में नजर नहीं आयेगा। इससे आगामी विधानसभा चुनाव के समीकरणों का पूर्वाभास होता है क्योंकि अब तक ये माना जाता था उक्त दोनों खानदानों के बिना कश्मीर घाटी की राजनीति की कल्पना तक नहीं की जा सकती। लेकिन राशिद नामक आतंकवादी द्वारा उमर अब्दुल्ला को हरा देने से ये संकेत मिला है कि घाटी के युवा परिवार की सियासत से ऊबकर  अपने नये नायक तलाश रहे हैं। पंजाब से भी ऐसा ही परिणाम देखने मिला जहाँ जेल में बन्द अमृतपाल सिंह लोकसभा चुनाव जीत गया। ये एक खतरनाक संकेत है। मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटों का परिसीमन इस प्रकार करवाया  जिससे क्षेत्रीय असंतुलन दूर हुआ। अभी तक घाटी पूरी तरह हावी रहा करती थी। लेकिन अब जम्मू अंचल में भी सीटें बढ़ गई हैं। इससे अलगाववादी चिंतित हैं। इसलिए आतंकवादी घटनाओं का केंद्र जम्मू के सीमावर्ती इलाकों को बनाया जा रहा है। कांग्रेस घाटी में नेशनल काँफ्रेंस के साथ गठबंधन करने के कारण चुनाव जीता करती थी। अब चूंकि अब्दुल्ला परिवार का प्रभाव सिमट रहा है तब घाटी में उसके लिए कोई गुंजाइश नहीं बची। यही स्थिति भाजपा की है जो जम्मू में तो बेहद ताकतवर है किंतु घाटी में तमाम दावों के बाद भी घुटनों के बल चलने की स्थिति में है। ये देखते हुए विधानसभा की असली लड़ाई जम्मू की सीटों पर देखने मिलेगी जिनके सहारे भाजपा श्रीनगर की गद्दी हासिल करना चाह रही है। रही बात घाटी की तो वहाँ की राजनीति भटकाव की शिकार होकर रह गई है। ऐसे में राशिद जैसे कुछ प्रयोग और भी होने की आशंका है । जम्मू क्षेत्र में अचानक सेना की टुकड़ियों पर हमले बढ़ने से लग रहा है अलगाववादी ताकतें अब हिंदू बहुल इलाकों को निशाना बनाकर मतदान का प्रतिशत घटाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार को इस बारे में सतर्क हो जाना चाहिए। जम्मू के कुछ सीमावर्ती इलाकों में रोहिंग्या घुसपैठियों को फारुख सरकार ने बसा दिया था जो आतंकवादियों के सहायक की भूमिका निभा सकते हैं । धारा 370 हटने के बाद घाटी में शांति का अनुभव होने लगा है। ऐसे में आतंकवादी अब जम्मू में नया ठिकाना बनाने में जुटे हैं। उनकी जड़ें जमने से पहले ही उनमें मठा डालना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 July 2024

बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच मोदी की मॉस्को यात्रा पर सबकी निगाहें



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत - रूस सम्मेलन में भाग लेने मॉस्को जा रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद उनकी यह पहली रूस यात्रा है जो रूसी राष्ट्रपति पुतिन के निमंत्रण पर हो रही है।  यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि श्री मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद रूस जा रहे  हैं। इस बार उनकी सरकार सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर हैं। इसे उनके प्रभाव में कमी के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रपति पुतिन उनके प्रति किस प्रकार पेश आते हैं उससे दोनों देशों के संबंधों का भविष्य तय होगा। यूक्रेन युद्द के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण रूस , अमेरिका सहित समूचे पश्चिमी देशों से कट गया। ऐसे में केवल भारत और चीन ही हैं जिन्होंने उसके साथ व्यापारिक और सैन्य रिश्ते पहले से ज्यादा मजबूत किये। कच्चे तेल और गैस के अलावा अन्य तकनीकी चीजों की खरीदी बड़ी मात्रा में दोनों के द्वारा की गई। इससे अमेरिका थोड़ा नाराज जरूर हुआ किंतु वैश्विक स्तर पर भारत की जो मजबूत स्थिति है उसकी वजह से वह ज्यादा कुछ न कर सका। वैसे उसके साथ भी भारत के व्यापारिक और कूटनीतिक  संबंध अब तक के सबसे अच्छे दौर से गुजर रहे हैं।  इसका बड़ा कारण पाकिस्तान का लगातार कमजोर और अस्थिर होते जाना है। वहीं अमेरिका इस बात को भली - भाँति समझ चुका है कि भारत अब एक ऐसी शक्ति बन चुका है जो दक्षिण एशिया में चीन के विस्तारवाद को रोकने में सक्षम है। बीजिंग के साथ चले आ रहे सीमा विवाद पर नई दिल्ली के कड़े रुख और सीमावर्ती क्षेत्रों में आवागमन के बेहतरीन प्रबन्ध के साथ ही सैनिकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि से अमेरिका भी प्रभावित है। भारत द्वारा अग्रिम मोर्चे तक लड़ाकू विमान और लम्बी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें तैनात करने से चीन दबाव में आया है। उसकी वन बेल्ट वन रोड परियोजना भी खटाई में पड़  चुकी है।  पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में  पाकिस्तान और चीन के विरोध में जो आवाजें बुलंद हो रही हैं उससे अमेरिका भारत की उपेक्षा करने की जुर्रत नहीं कर सकता। लेकिन  यूक्रेन संकट के बाद  रूस और  चीन के बीच निकटता बढ़ने से भारत की चिंताएं बढ़ चली हैं। यद्यपि दोनों के बीच लम्बे समय तक तनावपूर्ण सम्बन्ध रहे।  साम्यवादी विचारधारा के बावजूद सोवियत संघ की सर्वोच्चता चीन ने कभी स्वीकार नहीं की। लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तब चीन को रूस के साथ रिश्ते सुधारने के फायदे नजर आने लगे। रूस द्वारा बेचे जाने वाले कच्चे तेल का चीन सबसे बड़ा खरीददार  बन गया। सैन्य तकनीक भी उसने वहाँ से ली। बदले में रूस ने भी चीन को कूटनीतिक समर्थन देने में कोई कंजूसी नहीं की। ताईवान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दोनों देश सुरक्षा परिषद के सदस्य हैं जहाँ कश्मीर विवाद में रूस सदैव भारत के साथ खड़ा रहा जबकि चीन विरोध में। इसलिए पुतिन और जिनपिंग के बीच बढ़ती नजदीकी नई दिल्ली की चिंता बढ़ाने वाली है।  उस परिप्रेक्ष्य में श्री मोदी की मॉस्को यात्रा का रणनीतिक महत्व है। उल्लेखनीय है यूक्रेन पर हमले का भारत ने न तो समर्थन किया और न ही विरोध।  ये बात भी सही है कि इस युद्ध से वैश्विक स्तर पर जो उथल - पुथल हुई उसका प्रत्यक्ष न सही किंतु अप्रत्यक्ष असर तो हम पर भी पड़ा है। कोरोना के बाद आये इस संकट ने दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। भारतीय प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के समय ही अमेरिका में नाटो देशों का शिखर सम्मेलन हो रहा है। यूक्रेन युद्ध के एक कारणों में यूक्रेन का नाटो की तरफ झुकना भी था। पुतिन को भय था कि इस बहाने अमेरिका उसके दरवाजे पर आकर बैठ जाएगा। सोवियत संघ के हिस्से रहे पूर्वी यूरोप के कुछ देशों के नाटो से जुड़ने के कारण भी रूस काफी चिंतित था। ऐसे समय में भारत ने युद्ध रोकने की अपील तो की परंतु अमेरिकी अपेक्षाओं के विरुद्ध रूस की निंदा से परहेज किया। इसलिए राष्ट्रपति पुतिन भी भारत को महत्व देते आये हैं किंतु कुछ समय से चीन की तरफ उनका झुकाव शंका उत्पन्न करने वाला है। तीसरी बार सरकार बनाने के बाद श्री मोदी की मॉस्को यात्रा का बहुआयामी महत्व है। रूसी राष्ट्रपति से आमने - सामने की बातचीत में वे आपसी सम्बन्धों की मजबूती के बारे में उनका रुख जानने का प्रयास करेंगे और भारत - चीन के बीच विवाद के बारे में जानकारी देकर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करेंगे। अमेरिका में इसी साल राष्ट्रपति चुनाव होंगे। मौजूदा राष्ट्रपति बाईडेन की गद्दी खतरे में है। लेकिन यदि डोनाल्ड ट्रंप वापस व्हाइट हाउस पर काबिज हुए तब यूक्रेन संकट और गहरा जायेगा। फ्रांस में भी सत्ता परिवर्तन के आसार हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बन गई ।  वहीं ईरान में हिज़ाब विरोधी उदारवादी राष्ट्रपति चुनकर आ गए जो अमेरिका और यूरोपीय देशों से रिश्ते सुधारने इच्छुक हैं। इस प्रकार दुनिया के बदलते परिदृश्य के बीच हो रही श्री मोदी की मॉस्को यात्रा पर चीन सहित पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 6 July 2024

ईरान में सुधारवादी राष्ट्रपति भारत के लिए शुभ संकेत



  ब्रिटेन के साथ ही ईरान में भी राष्ट्रपति का चुनाव हुआ जिसमें सुधारवादी उम्मीदवार मसूद पेजेशकियान ने  जीत हासिल करते हुए  कट्टरवादी सईद जलीली को बड़े अंतर से हराया। कुरान के शिक्षक और पेशे से चिकित्सक श्री पेजेशकियान की छवि एक ऐसे नेता के तौर पर  है, जो सुधारों में यकीन रखता है। वे अमेरिका के घोर विरोधी होने के बाद भी  वे पश्चिमी मुल्कों के साथ संबंधों को सुधारने पर यकीन रखने वाले नेता हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि वे हिजाब का ऐलनिया विरोध कर चुके हैं तथा शरीया लागू करने के लिए लागू की गई मॉरल पुलुसिंग से भी सहमत नहीं हैं। यही वजह है उन्हें युवाओं का भरपूर समर्थन मिला।  श्री पेजेशकियान ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को शिथिल करवाने के लिए परमाणु अप्रसार संधि मानने के  लिए भी राजी हैं। यद्यपि देश के सत्ता संचालन पर हावी कट्टरपंथी उनकी सुधारवादी नीतियों को किस हद तक लागू होने देंगे ये कह पाना अभी कठिन है किंतु यदि वे युवा शक्ति को संगठित कर उनमें सफल हो सके तब वह  भारत के लिए काफी अनुकूल होगा। उदाहरण के लिए पश्चिमी मुल्कों के साथ ईरान के रिश्ते सुधर जाते हैं तब भारत और ईरान के  बीच सस्ते कच्चे तेल सम्बन्धी समझौता पूरी तरह से अमल में आ जायेगा जिसके चलते हमारी अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिलेगा। ईरान के रिश्ते पाकिस्तान से चूँकि बेहद खराब हैं इसलिए भी यह देश हमारे लिए उपयोगी है। देखने वाली बात ये होगी कि हमारा विदेश मंत्रालय ब्रिटेन और ईरान के नये शासकों को भारतीय हितों के अनुकूल किस तरह ढाल पाता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


     

ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि करने पर जोर दिया जाए


गत दिवस ब्रिटेन के आम चुनाव में 14 साल बाद कंजरवेटिव पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और लेबर पार्टी भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। इसके कूटनीतिक फलितार्थ तो भविष्य में देखने मिलेंगे किंतु भावनात्मक तौर पर भारतीय मूल के  ऋषि सुनक चूँकि प्रधानमंत्री थे इसलिए भारत को ऐसा लगता था कि उनकी सरकार हमारे लिए हितकर रहेगी। यद्यपि इस दौरान दोनों देशों के रिश्ते तो काफी मधुर रहे किंतु प्रधानमंत्री रहते श्री सुनक ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे प्रतीत होता कि अपने पूर्वजों के देश के प्रति उनके मन में कुछ कर गुजरने का भाव हो। उल्लेखनीय है ब्रिटेन उनकी मातृभूमि है किंतु परिवार हिन्दू धर्म का पालन करता है। और तो और पत्नी अक्षता , भारत की प्रख्यात सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की बेटी हैं। उनकी माँ सुधा मूर्ति भी राज्यसभा में मनोनीत सांसद हैं। जी - 20 सम्मेलन में जब श्री सुनक और अक्षता दिल्ली आये तब वे अक्षरधाम मंदिर भी गए थे। उनकी पराजय से निश्चित तौर पर भारत को भावनात्मक तौर पर धक्का लगा किंतु नये प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चूंकि कश्मीर विवाद को भारत - पाकिस्तान के बीच का मामला मानने की बात कह चुके हैं इसलिए उनकी जीत से दोनों देशों के रिश्ते और अच्छे होने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन चिंता की एक बात ये है कि इस चुनाव में भारतीय मूल के जो 28 सांसद जीते उनमें से 12 सिख हैं। 28 में अधिकांश कंजरवेटिव पार्टी के हैं। जो सिख सांसद जीतकर आये  उनमें से कुछ खालिस्तानी मानसिकता के भी हैं । वे भारतीय हितों के विरुद्ध काम करने प्रधानमंत्री को बाध्य कर सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये है कि श्री स्टार्मर के पास चूँकि भारी बहुमत है इसलिए वे बिना दबाव में आये काम  करते रहेंगे। सबसे बड़ा मसला है दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार संधि । सिद्धांत रूप में तो इस पर सहमति बन चुकी है किंतु कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिसके चलते उस पर हस्ताक्षर न हो सके। ब्रिटेन इन दिनों  भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है। सुनक सरकार की करारी पराजय के पीछे भी यही वजह बना। जबकि प्रधानमंत्री बनने के पूर्व वे वित्त मंत्री रह चुके थे। कोरोना और उसके बाद यूक्रेन - रूस युद्ध शुरू होने से पूरा यूरोप चपेट में आ गया किंतु ब्रिटेन  सर्वाधिक प्रभावित हुआ। ऐसे में भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि उसके लिए भी फायदेमंद रहेगी। नये प्रधानमंत्री पर इसके लिए दबाव डालने के लिए भारतीय मूल के सांसदों और बड़े उद्योगपतियों को मध्यस्थ बनाने से  बात बन सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 July 2024

अवैध कालोनियां बनवाने वाले नौकरशाहों और नेताओं पर भी लगाम कसी जाए

म.प्र के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गत दिवस विधानसभा में स्पष्ट किया कि अवैध कालोनियों को वैध नहीं किया जाएगा । उल्टे उनको बसाने वालों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कारवाई की जाएगी। दूसरी तरफ उन्होंने ये घोषणा भी कर दी कि सस्ते प्लाटों के लालच में जिन लोगों ने वहाँ मकान बनवा लिए हैं उनके नक्शे स्वीकृत कर अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रबंध किया जाएगा। भविष्य में अवैध कालोनियों को बनने से रोकने के लिए कड़ा कानून बनाये जाने की बात भी मंत्री जी ने कही। वैसे ये समस्या राष्ट्रव्यापी है। महानगर तक इससे अछूते नहीं रहे। प्रश्न ये है  कि अवैध कालोनी बिना स्थानीय निकाय के अमले की जानकारी के कैसे बन सकती है ? एक - दो घरों का निर्माण हो तो उसकी अनदेखी होना भी स्वीकार किया जा सकता है किंतु जहाँ दर्जनों मकानों का  निर्माण हो रहा हो और संबंधित सरकारी विभाग को कानों कान खबर न हो इससे बड़ा असत्य कोई  हो नहीं सकता। विधानसभा में ये बात भी उठी कि अवैध कालोनी में रहने वाले मतदाता चुनाव प्रचार हेतु आने वाले प्रत्याशियों को घेरकर वहाँ बिजली, पानी और सड़क की मांग करते हैं, लिहाजा उनको वैध घोषित किया जाए। श्री विजयवर्गीय का ये कहना तो उचित  है कि अवैध कालोनी को वैध नहीं किया जाएगा किंतु जब उनमें बने मकानों के नक्शे स्वीकृत कर अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाएंगी तब उन्हें वैध स्वरूप अपने आप हासिल हो जाएगा। इस बारे में नया कानून जब बनेगा तब की तब देखी जाएगी किंतु जिन इलाकों में अवैध कालोनियाँ बन चुकी हैं वहाँ  स्थानीय निकायों के उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी तो कारवाई होनी चाहिए जिनकी लापरवाही कहें या मिलीभगत से हर शहर और कस्बे  में  धड़ाधड़ गैर कानूनी कालोनियों बन गईं। ये भी गौरतलब है कि  जनप्रतिनिधि मतों के लालच में अवैध कालोनियों में बिजली, सड़क और पानी का इंतजाम करवा देते हैं। यही हाल झुग्गी- झोपड़ियों का है जो कुकुरमुत्तों की तरह सरकारी भूमि पर फैलती जाती हैं किंतु शुरुआत में उन्हें रोकने के बजाय शासकीय अमला और नेता बिरादरी उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। अनेक झुग्गियों को कोई माफिया बसाकर वहाँ रहने वालों से वसूली करता है। जो पार्षद, विधायक और सांसद इन बस्तियों में पक्की सड़कें, बिजली के खम्बे और पेय जल की व्यवस्था करते हैं उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि ये जानते हुए कि संबंधित बस्ती सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर बसाई गई , उन्होंने वहाँ विकास कार्य क्यों करवाए? ये वोट बैंक का ही खेल है कि जब ऐसी बस्ती को अतिक्रमण विरोधी अभियान के अंतर्गत हटाने का प्रयास होता है तब नेताओं की फौज गरीबों की हितैषी बनकर आ जाती है । और जब इन्हें हटाया जाता है तब उसके वॅाशिंदों को गरीबी का हवाला देकर वैकल्पिक स्थान या मकान देने की व्यवस्था की जाती है। यही स्थिति अवैध मानी जाने वाली कालोनियों की है। उनमें बने मकानों का निर्माण बिना नक्शा स्वीकृत करवाए किये जाने  के बाद भी मानवीयता के आधार पर तोड़े जाने से परहेज किया जाता है । चूँकि उनके निवासी मतदाता हैं इसलिए उनको सभी सुविधाएं दिलवाना नेताओं के राजनीतिक स्वार्थों से जुड़ा होता है। कुल मिलाकर ये पूरा मामला नौकरशाही और नेताओं के अपवित्र गठजोड़ से जुड़ा हुआ है। श्री विजयवर्गीय पहले भी इस विभाग के मंत्री रह चुके हैं। उसके अलावा इंदौर के महापौर का दायित्व भी वे संभाल चुके हैं। इसलिए उन्हें समस्या का मूल कारण पता होगा। बेहतर हो वे अपने घर अर्थात नगरीय निकायों के उस अमले को कठघरे में खड़ा करते हुए दंडित करें जिसके कार्यक्षेत्र में अवैध कालोनी अथवा अवैध बस्तियाँ बेरोकटोक आबाद होती चली गईं। इसी के साथ ही उन जनप्रतिनिधियों  से भी ये पूछताछ की जानी चाहिए कि उन्होंने गैरकानूनी आवासीय क्षेत्र में विकास कार्य क्यों करवाया? मंत्री महोदय यदि कानून बनाने से पहले कारवाई की शुरुआत उन नौकरशाह और नेताओं से करें जो अवैध कालोनियों और झोपड़पट्टी को बसाने के सूत्रधार हैं तो उससे सरकार की ईमानदारी  प्रमाणित होने के साथ उस भूमाफिया पर भी शिकंजा कस सकेगा जो अफसरों और राजनेताओं के संरक्षण में बेखौफ अवैध निर्माण करवाता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 July 2024

म.प्र का बजट : मौजूदा परिस्थितियों में इससे ज्यादा करना संभव नहीं था


म.प्र की मोहन यादव सरकार का पहला बजट गत दिवस पेश हुआ। चूँकि सरकार ने कोई नया करारोपण नहीं किया इसलिए आम जनता की नजर में वह अच्छा है। हालांकि बजट में लोक लुभावन घोषणाओं से भी परहेज किया गया है। यहाँ तक कि  पिछली शिवराज सरकार द्वारा प्रारंभ की गई लाड़ली बहना योजना की मौजूदा राशि 1250 रु. प्रतिमाह को भी यथावत रखा गया है जबकि 1000 रु. से शुरू की गई इस योजना में शिवराज सरकार ने 250 रु. बढ़ा दिये थे और इसे 3 हजार तक ले जाने का वायदा किया था। विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबरदस्त जीत में यही योजना तुरुप का पत्ता साबित हुई थी। हालांकि शिवराज यदि प्रदेश की सत्ता में वापस आते तब शायद वे बजट में इस योजना की राशि में उत्तरोत्तर वृद्धि का प्रावधान अवश्य करते किंतु मोहन यादव के सामने खजाने के खाली होने की भी समस्या है। इसीलिए उन्होंने लोक लुभावन घोषणाओं और कार्यक्रमों  से परहेज किया। फिलहाल चुनाव रूपी कोई चुनौती भी सामने नहीं है।  वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने बजट में अधो संरचना, महिलाओं और आदिवासियों पर काफी ध्यान दिया गया है। तीन नये मेडिकल कालेज खोलने का प्रावधान भी किया गया  है। इसी तरह बड़े शहरों में ई बसें चलाने की योजना भी घोषित की गई है। धार्मिक पर्यटन पर भी मोहन सरकार शुरू से काफी जोर दे रही है। इसके लाभ भी मिलने लगे हैं। उज्जैन में महाकाल लोक और ओंकारेश्वर में आद्य शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा खड़ी हो जाने के बाद इन स्थानों पर पर्यटकों की रिकार्ड संख्या आने लगी है। इसीलिए नर्मदा पथ के निर्माण को भी प्राथमिकता सूची में रखा गया है। प्रदेश में संरक्षित वन भी बहुत हैं जो बड़ी संख्या में देशी - विदेशी वन्य प्रेमी सैलानियों को आकर्षित करते हैं। शेरों के मामले में तो म.प्र सबसे अग्रणी है। 2014 के बाद से पूरे देश में राजमार्गों का जो विकास हुआ उससे म.प्र को जबरदस्त लाभ हुआ क्योंकि हृदय प्रदेश होने से सभी दिशाओं को जोड़ने वाले राजमार्गों का कुछ हिस्सा प्रदेश से होकर गुजरता है। इससे सड़क परिवहन में भी काफी वृद्धि हुई है। वहीं प्रदेश में हवाई सेवाओं का जिस तरह विस्तार हुआ वह विकास को प्रमाणित करता है। यद्यपि उद्योगों को लेकर अभी भी बहुत कुछ करना शेष है किंतु ये कहना गलत नहीं होगा कि प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं। बीते वर्षों में हुए निवेशक सम्मेलनों से अच्छा प्रतिसाद मिला। यदि सरकार नियोजित ढंग से प्रयास करे तो आने वाले वर्षो में औद्योगिक दृष्टि से प्रदेश विकसित राज्य की श्रेणी में आ खड़ा होगा। म.प्र को बीमारू राज्य की शर्मनाक स्थिति से निकालने में कृषि क्षेत्र  ने भी शानदार योगदान दिया है। गेंहूँ की पैदावार में तो प्रदेश पंजाब और हरियाणा से आगे आ चुका है। वन संपदा प्रदेश की बड़ी दौलत है जिसकी वजह से यहाँ का पर्यावरण संतुलन बना हुआ है। नर्मदा जैसी सदानीरा नदी यहाँ की जीवन रेखा है। लोक लुभावन घोषणाओं से बचने के बावजूद शवों को घर पहुंचाने के लिए वाहन व्यवस्था इस बजट के मानवीय पक्ष को उजागर करती है। शिक्षकों और पुलिस में भर्ती की घोषणा भी बेरोजगारों के चेहरे पर मुस्कान लाने का काम करेगी। किसानों को शून्य ब्याज दर पर ऋण अच्छी सोच का परिचायक है। प्रदेश में चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने के लिए 3 नये मेडिकल कालेज खोलने का फैसला स्वागत योग्य है किंतु इनमें पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की कमी कैसे दूर होगी ये बड़ा सवाल है। राज्य सरकार को ये तो पता ही होगा कि जो मेडिकल कालेज पहले से चले आ रहे हैं जब वे ही बीमार हों तब नये खोलने का क्या औचित्य है? लड़कियों की शिक्षा हेतु सरकार काफी कोशिशें कर रही है किंतु निजी क्षेत्र की तुलना में शासकीय शिक्षण संस्थानों की दशा बेहद खराब हैं। मोहन सरकार की कार्ययोजनाओं के लिए चूँकि काफी आर्थिक संसाधन चाहिए इसलिए उनमें से बहुत सी बजट का हिस्सा नहीं बन सकीं। विधानसभा चुनाव के पहले पिछली सरकार ने जो दरियादिली दिखाई उसके कारण मौजूदा मुख्यमंत्री के हाथ काफी बंधे हुए थे जिसका असर बजट पर दिख रहा है। लोकसभा चुनाव बीच में आने से संसाधनों का समुचित प्रबंध भी नहीं हो सका। ये देखते हुए श्री देवड़ा ने जो बजट पेश किया वह प्रशंसनीय है। अगले साल जो बजट आयेगा उसमें इस सरकार का आर्थिक दर्शन और स्पष्ट होगा ये उम्मीद की जा सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 July 2024

सत्संग में मौत : आस्था के अतिरेक का दुष्परिणाम


पश्चिमी  उ.प्र के हाथरस जिले के एक गाँव में किसी बाबा के सत्संग में हजारों लोग जमा थे । कार्यक्रम के बाद जब बाबा जाने लगे तब उनके चरण छूने श्रद्धालुओं में होड़ मची। बाबा के निजी सेवादारों ने श्रद्धालुओं को रोकने धक्का - मुक्की  शुरू कर दी। बाबा तो किसी तरह वहाँ से निकल लिए किंतु 122 लोग कुचलकर मारे गए। बड़ी संख्या घायलों की भी है। घटनास्थल से आये चित्र दिल दहला देने वाले हैं। इतने बड़े आयोजन हेतु पुलिस की जो अनुमति ली गई उसमें लोगों के आने की अनुमानित संख्या वाला स्थान रिक्त छोड़ दिया गया। बताया जाता है हजारों की भीड़ के लिए  मात्र 50 पुलिस वाले तैनात किये गए थे। सत्संग में आने वालों की अनुमानित संख्या आयोजकों द्वारा छिपाई गई या उन्हें खुद अंदाज नहीं  था , ये जाँच का विषय है। पुलिस ने गैर  इरादतन ह्त्या का प्रकरण दर्ज कर लिया जो स्वाभाविक है। इस हादसे में गलती किसकी थी ये फ़िलहाल कहना मुश्किल है। बाबा जी तो ये कहकर बच जायेंगे कि सत्संग तो शांति पूर्वक संपन्न हो गया था जो कुछ घटा वह उनके वहाँ से जाते समय हुआ। लेकिन 100 से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौत जिन हालातों में हुई वह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि धार्मिक आयोजनों या किसी देवस्थान के दर्शनों हेतु उमड़ने वाली भीड़ के कारण इस तरह की जानलेवा घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। उनकी जाँच करने के बाद  भविष्य में ऐसा न हो इसकी कार्य योजना  भी बनी किंतु सभी जगह एक जैसा इंतजाम संभव नहीं है। ऐसे में ये स्थानीय प्रशासन का दायित्व है कि  कार्यक्रम की अनुमति देने के पहले सभी सावधानियां बरते। इस हादसे के बारे में जो जानकारी आई उससे स्पष्ट है कि पुलिस का प्रबंध भीड़ को देखते हुए  बहुत कम था। खुफिया विभाग भी अपनी जिम्मेदारी से चूक गया। लेकिन असली दोषी तो इस तरह का आयोजन में आने वाले बाबा हैं जो श्रद्धा का व्यवसायीकरण करते हैं। देश में अनेक प्रवचन करने वाले महानुभाव हैं जो फिल्मी सितारों जैसे नखरे दिखाते हैं। उनका रहन  - सहन रईसी होता है। महँगी गाड़ियों में चलना उनका शौक है। राजनेता इनके आयोजनों में हाजिरी देकर इनका भाव बढ़ा देते हैं। इस वजह से इन पर भी नेतागिरी का भूत सवार हो जाता है। विवादास्पद बयान देकर सुर्खियां बटोरने का शौक भी ये पाल लेते हैं जिसके कारण फजीहत भी झेलनी पड़ जाती है। ताजा उदाहरण म.प्र के एक नामी कथा वाचक का है जिन्हें  हाल ही में नाक रगड़कर माफी मांगनी पड़ी। हालांकि सारे बाबा या कथावाचक एक जैसे हैं ये कहना तो अन्याय होगा किंतु जिस तरह  अर्थशास्त्र में कहावत है कि खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है , वैसे ही कुकुरमुत्तों जैसे बढ़ते जा रहे कतिपय बाबाओं ने आध्यात्मिक जगत में प्रदूषण फैला दिया है। हालांकि जनता भी कम कसूरवार नहीं है जो इनकी अंधभक्त हो जाती है। हाथरस की घटना भी इसी का नतीजा है। बाबा की चरण रज प्राप्त करने के लिए हुई धक्का - मुक्की में 122 लोग अपने प्राण गँवा बैठे। पुलिस द्वारा दर्ज प्रकरण में बाबा का नाम नहीं है लेकिन घटना के बाद उनका  गायब हो जाना संवेदनहीनता नहीं तो और क्या है?  आस्था के अतिरेक और पेशेवर बाबाओं की बढ़ती जमात के चलते इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकना कठिन होता जा रहा है। धार्मिक आयोजनों की  भव्यता के कारण इनका आकर्षण बढ़ता जा रहा है। राजनेता भी बाबाओं का उपयोग अपना जनाधार बढ़ाने में करने लगे हैं । इसके चलते चुनाव के मौसम में प्रवचनों के बड़े - बड़े आयोजन होते हैं। राजनेताओं से निकटता की वजह से अनेक बाबाओं को प्रशासन और पुलिस विशेष महत्व देती है। इस तरह के बाबा ट्रांसफर और पोस्टिंग जैसे कार्य नेताओं से करवाने के कारण काफी प्रभावशाली हो जाते हैं। यही वजह है कि इन पर कोई रोक - टोक नहीं रहती। लेकिन हाथरस हादसा बहुत बड़ी त्रासदी है। कुम्भ जैसे विराट आयोजन तक में इतनी बड़ी दुर्घटना हाल के वर्षों में सुनने नहीं मिली। इसके पीछे किसकी गलती थी ये पता लगाने के लिए ईमानदारी से जाँच करवाई जाना जरूरी है ताकि इसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 July 2024

मुस्लिमों की खुशामद में करोड़ों हिंदुओं को आहत कर गए राहुल



संसद के भीतर कुछ भी बोलने पर चूंकि मानहानि का मुकदमा नहीं लग सकता इसलिए अनेक सांसद वहाँ बहुत कुछ ऐसा बोल जाते हैं जो  बाहर आकर बोलने का साहस नहीं करते। गत दिवस लोकसभा में बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने भी कुछ बातें ऐसी कहीं जो बाहर बोलने पर उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज हो सकता है। श्री गाँधी के उक्त भाषण की काफी चर्चा हो रही है जिसमें उन्होंने  कहा कि जो लोग अपने को हिन्दू कहते हैं वे हिंसक हैं और असत्य का सहारा लेते हैं। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समूचे हिन्दू समाज को हिंसक कहे जाने पर आपत्ति की तब वे पलटी मारते हुए बोले उन्होंने तो भाजपा को लेकर कहा था। उसके बाद उन्होंने भाजपा और रास्वसंघ पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ हिंदुओं के ठेकेदार नहीं है । प्रधानमंत्री से मुखातिब होकर वे यहाँ तक बोल गए कि आप लोग हिन्दू हो ही नहीं। वैसे श्री गाँधी ने अन्य विषयों पर भी सरकार को घेरने का प्रयास किया किंतु सबसे ज्यादा विवाद हिंदुओं को हिंसक कहने वाली बात पर हुआ। ऐसा लगता है जोश -- जोश में वे होश खो बैठे। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर अपने प्रथम भाषण से उन्होंने पप्पू की छवि से निकलने की जो कोशिश की वह फुस्स हो गई । हिंदुओं को हिंसक कहने के बाद भले ही उन्होंने बात को संभालने का भरपूर प्रयास किया किंतु उनकी जुबान से निकले ये शब्द वापस नहीं आ सकते थे कि अपने को हिन्दू कहने वाले हिंसक होते हैं और असत्य का सहारा लेते हैं। प्रधानमंत्री से ये कहना भी कि आप हिन्दू हो ही नहीं इस बात का परिचायक है कि 54 साल के हो जाने के बाद भी उनमें न गंभीरता है और न ही परिपक्वता। अन्यथा श्री मोदी को हिन्दू न बताना सिवाय मूर्खता के और क्या हो सकता है? और वह भी उन जैसे व्यक्ति द्वारा जिसके अपने धर्म की कोई प्रामाणिकता ही नहीं है। भाजपा और संघ को हिंसक बताना भी उस नेता को शोभा नहीं देता जिसकी पार्टी पर हजारों सिखों के नरसंहार का आरोप हो और  उसके कई नेता और पूर्व मंत्री अदालत द्वारा दंडित हो चुके हैं। कुछ पर अब तक मुकदमा चल रहा है। उस नरसंहार के औचित्य को सिद्ध करने संबंधी उनके स्वर्गीय पिता राजीव गाँधी की वह टिप्पणी  शायद वे भूल गए कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। असल में उनके भाषण का निहित उद्देश्य भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीनना था किंतु रामभक्तों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश और सनातन की तुलना डेंगू और कोरोना से करने वाली द्रमुक के साथ बैठने वाले राहुल यदि हिंदुओं को हिंसक बताएं तो वह  संगत का असर है या गठबंधन की मजबूरी ये वही बेहतर जानते होंगे ।  लेकिन उनमें हिम्मत है तो  उन लोगों  को हिंसक बताने की जुर्रत करें जो सिर तन से जुदा के नारे लगाते हैं। नेता प्रतिपक्ष के मुँह से  प. बंगाल और केरल में आये दिन होने वाली राजनीतिक हत्याओं के बारे में शायद ही एक शब्द किसी ने सुना हो। इसका कारण वहाँ की सत्ता में बैठी तृणमूल काँग्रेस और वामपंथियों का इंडिया गठबंधन का सदस्य होना है। इसी तरह क्या वे उद्धव ठाकरे को हिंसक कह सकते हैं जो हिंदुत्व को लेकर भाजपा से कहीं अधिक आक्रामक और मुखर रहे हैं।   श्री गाँधी के पास इस बात का क्या उत्तर है कि अचानक उन्होंने सावरकर का नाम लेना क्यों बंद कर दिया? सही बात ये है कि जबसे शरद पवार ने सावरकर की आलोचना से महाराष्ट्र में राजनीतिक  नुकसान होने का भय दिखाया, श्री गाँधी ने डर के कारण उनका नाम लेना बंद कर दिया । द्रमुक तो खैर , अलग पार्टी है लेकिन काँग्रेस पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी जब सनातन विरोधी बयान का समर्थन किया तब भी श्री गाँधी शांत रहे। कभी खुद को जनेऊधारी सारस्वत ब्राह्मण प्रचारित करने वाले राहुल ने हिंदुओं को हिंसक बताकर उस मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टीकरण का दांव चला है जो श्री मोदी को तीसरी बार सत्ता में आने से रोकने के लिए इंडिया गठबंधन के पक्ष में पूरी तरह  गोलबंद हो गया था। लेकिन इस कोशिश में उन्होंने करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर दिया। आश्चर्य की बात है उद्धव ठाकरे और उनके बड़बोले प्रवक्ता संजय राउत ने अब तक अपने को हिन्दू कहने वालों के हिंसक होने वाले श्री गाँधी के विचार पर प्रतिक्रिया  नहीं दी।


- रवीन्द्र वाजपेयी