चूंकि ज्यादातर नेता गण चाटुकारों से घिरे होते हैं इसलिए आम जनता उनके बारे में क्या सोचती है इसका पता उनको नहीं चल पाता। यदि ऐसा होता तो देश की संसद में जिम्मेदार पदों पर आसीन अनुभवी राजनेताओं द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली शब्दावली का स्तर इतना मामूली नहीं होता। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पहले तो हिंदुओं को हिंसक बोल गए किन्तु जब स्वयं प्रधानमंत्री ने खड़े होकर उस पर आपत्ति जताई तो उन्होंने बात को घुमा फिराकर अपनी चमड़ी बचाने का प्रयास किया । जबकि अभिभाषण से उस टिप्पणी का कोई संबंध न था। दो दिन पहले बजट पर बोलते हुए श्री गाँधी ने महाभारत में चक्रव्यूह के प्रसंग को पेश करते हुए प्रधानमंत्री पर तंज कसा कि जनता को सरकार ने चक्रव्यूह में फंसा लिया है। और जिस तरह अभिमन्यु को 6 कौरव योद्धाओं द्वारा घेरकर मार दिया गया उसी तरह नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत, अजीत डोभाल, अंबानी और अडानी हैं। इसके अलावा उन्होंने बजट तैयार करते समय होने वाली हलवा सेरेमनी के अवसर पर एकत्र अधिकारियों का चित्र दिखाते हुए कहा उनमें एक भी दलित या पिछड़ा नहीं है। और फिर जातीय जनगणना पर आते हुए बोल गए कि वे उसे पारित करवाकर रहेंगे। नेता प्रतिपक्ष का उक्त भाषण उनके प्रशंसकों को निश्चित रूप से रास आया होगा किन्तु विभिन्न चैनलों पर हुई चर्चा में ये सवाल उठा कि श्री गाँधी ने बजट पर तो खास बोला ही नहीं। उनके भाषण के उत्तर में गत दिवस वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदन में बताया कि नेहरू जी और राजीव गाँधी ने किस प्रकार आरक्षण का विरोध किया था। उन्होंने हलवा सेरेमनी के चित्र को लेकर स्पष्ट किया कि इसकी परिपाटी यूपीए सरकार ने शुरू की और तब बजट बनाने वाले अधिकारियों की जाति नहीं पूछी गई। श्रीमती सीतारमण ने नेता प्रतिपक्ष पर तीखा हमला करते हुए पूछा कि राजीव गाँधी फाउंडेशन और राजीव गाँधी ट्रस्ट में कितने दलित और पिछड़े हैं? लेकिन पूर्व मंत्री अनुराग ठाकुर ने श्री गाँधी पर जो हमला किया उससे वे तिलमिला उठे। उन्होंने पहले तो नेता प्रतिपक्ष के आध्यात्मिक ज्ञान का मखौल उड़ाते हुए कहा चक्रव्यूह में अभिमन्यु को घेरने वाले कौरव योद्धा 6 नहीं 7 थे। लेकिन उनकी इस बात ने राहुल को उत्तेजित कर दिया कि जिनकी जाति का पता नहीं वे जातिगत जनगणना की बात कर रहे हैं। इतना सुनते ही श्री गाँधी ने उनकी बात को गाली बताते हुए कहा कि वे माफी माँगने के लिए नहीं कहेंगे । दोनों तरफ से हुए इस आक्रमण और प्रत्याक्रमण के बाद सवाल ये उठ रहा है कि बजट जैसे गंभीर विषय पर चर्चा की बजाय जाति, चक्रव्यूह आदि के उल्लेख से नेता प्रतिपक्ष कौन सा संदेश देना चाहते थे। अनुराग ठाकुर ने श्री गाँधी पर जो हमले किये उसमें उनकी बातों का जवाब ज्यादा था बजट की बात कम। लेकिन वित्त मंत्री ने राहुल के भाषण का तीखा जवाब देने के साथ ही बजट के पक्ष में विस्तृत चर्चा की। उनका कल का भाषण अच्छी तरह तैयार किया लग रहा था। नई लोकसभा में अब तक नेता प्रतिपक्ष के जो भी भाषण हुए वे चुनावी रैलियों का एहसास करवाने वाले रहे। जातिगत जनगणना निश्चित रूप से ज्वलंत विषय है जिससे राष्ट्रीय राजनीति भी प्रभावित हो रही है। लेकिन उस मुद्दे को कहाँ और कैसे उठाना है ये नेता प्रतिपक्ष को सीखना होगा। जिस प्रकार उन्होंने सदन में संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का नाम लिया उसकी प्रासंगिकता समझ से परे थी। इसी प्रकार अंबानी और अडानी का नाम रोज लेने से उनकी खिसियाहट ही सामने आती है। उल्लेखनीय है मुकेश अंबानी के बेटे के विवाह का गाँधी परिवार ने भले बहिष्कार किया किन्तु न केवल कांग्रेस अपितु इंडिया गठबंधन के घटक दलों के लगभग सभी प्रमुख नेताओं ने उस आयोजन में शिरकत की। ये देखते हुए उन औद्योगिक घरानों के प्रति श्री गाँधी की टिप्पणियां उनकी निजी खुन्नस प्रतीत होने लगी है। दूसरी बात ये भी है कि कांग्रेस में जो अनुभवी और प्रतिभाशाली युवा सांसद लोकसभा में हैं उनको भी पर्याप्त अवसर देना चाहिए। हालांकि उन्हें लोकसभा में आये हुए 20 वर्ष बीत गए किन्तु बतौर सांसद वे प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं। केवल तेज तर्रार शैली में बोलने का असर कुछ देर तक ही रहता है। श्री गाँधी के भाषण के जवाब में श्री ठाकुर और वित्त मंत्री ने जो कहा उसमें से आधी बातों का भी वे उत्तर नहीं दे सकेंगे। बेहतर हो वे संसद के पुस्तकालय में विपक्ष के पुराने नेताओं द्वारा बजट एवं अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर दिये संसद में दिये भाषण पढ़कर उनसे सीखें। उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि विपक्ष के नेता को सत्ता पक्ष पर हमला करने के लिए समुचित तैयारी करनी चाहिए। हर बात में अंबानी, अडानी का जिक्र करना ये साबित करता है कि आप रट्टू तोते जैसे हैं। रही बात जातिगत मुद्दों की तो श्री गाँधी को ये नहीं भूलना चाहिए कि उनको उठाकर वे अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव को ताकत दे रहे हैं जबकि कांग्रेस तो जात पर न पांत पर का नारा लगाती आई है।
- रवीन्द्र वाजपेयी