Friday, 31 January 2025

आम बजट पर रह सकती दिल्ली के चुनाव की छाया


कल लोकसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय बजट प्रस्तुत करेंगी।  मई  2024 में तीसरी बार सत्ता में आने  के बाद मोदी सरकार का यह बजट कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण होगा। पिछला बजट आधे वर्ष के लिए ही था जबकि  इस  बजट का प्रभाव पूरे कारोबारी वर्ष पर होने से यह पूर्ण  माना जाएगा।  हमारे देश में हर वर्ष कहीं न कहीं चूंकि चुनाव होते रहते हैं इसलिए केंद्र में सत्तासीन दल पर  अनेक तरह के दबाव होते हैं। विभिन्न राज्यों में विरोधी विचारधारा की सरकारें होने से भी  बजट में  राजनीतिक संतुलन बनाने पड़ते हैं। लिहाजा उस पर सियासत पूरी तरह हावी होती है। ये देखते हुए नये  बजट में भी वित्त मंत्री  पर राजनीतिक दबाव रहेगा क्योंकि मात्र 4 दिन बाद ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव हेतु मतदान  है। वहाँ ढाई दशक से  भाजपा सत्ता से बाहर है इसलिए केंद्र सरकार ऐसा कुछ जरूर करेगी जिससे उन मतदाताओं को प्रभावित कर सके जो लोकसभा में तो कमल का बटन दबाने में नहीं झिझकते किंतु विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को  समर्थन देते हैं क्योंकि उसने  मुफ्त बिजली, पानी जैसी सुविधाएं दे रखी हैं। यद्यपि ये वर्ग हिंदुत्व सहित अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा के साथ है किंतु  मुफ्त सुविधाओं का लालच भी नहीं छोड़ पाता। इस बार हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत से भाजपा का हौसला काफी बुलंद  है। इसलिए प्रधानमंत्री  बजट में जितना संभव होगा ऐसा  प्रयास करेंगे जिससे कि  दिल्ली के मध्यमवर्गीय शासकीय कर्मचारियों और व्यवसायियों को  भाजपा के पक्ष में ला सकें। आर्थिक  विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि  आयकर में छूट के साथ ही महिलाओं और गरीबों के कल्याण के लिए कुछ ऐसे प्रावधान होंगे जिनका असर दिल्ली चुनाव पर पड़े। उस दृष्टि से आयकर  छूट की सीमा 10 लाख तक बढाए जाने के साथ ही पेट्रोल - डीजल सस्ता करने जैसे  उठाए जा सकते हैं। ऐसा करने से  मध्यम वर्ग के साथ ही अन्य तबके भी लाभान्वित होंगे जो महंगाई से परेशान हैं। उल्लेखनीय है भाजपा के परंपरागत समर्थक वर्ग में इस बात को लेकर काफी नाराजगी है कि केंद्र सरकार गरीबों को तो दिल खोलकर बाँट रही है किंतु उसका भार करदाताओं पर पड़ता है। पेट्रोल - डीजल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में घटने के बाद भी भारत में उस अनुपात में कम नहीं किये गए। लोकसभा चुनाव में भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे हो जाने के पीछे मध्यमवर्गीय मतदाताओं की उदासीनता भी एक बड़ा कारण थी। प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी तक में इस वर्ग ने मतदान के प्रति अपेक्षित उत्साह नहीं दिखाया जिससे उनकी जीत का अंतर बहुत ही साधारण रह गया। यद्यपि  हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में भाजपा को धमाकेदार जीत हासिल हुई किंतु जम्मू कश्मीर और झारखंड में स्थानीय समीकरण  खिलाफ होने से उसे पराजय झेलनी पड़ी। दिल्ली में उन्हीं आधारों पर आम आदमी पार्टी की मजबूती है जिसे तोड़ने के लिए भाजपा को उसके द्वारा खींची लकीर से बड़ी खींचनी होगी। केंद्रीय बजट में ही वह इसकी कोशिश करेगी ऐसी उम्मीद है। यद्यपि मुफ्त उपहारों की राजनीति के प्रधानमंत्री खुद भी विरोधी  हैं किंतु भाजपा भी राज्य स्तर पर वही कर रही है। जहाँ तक विकास की बात है  तो मोदी सरकार की उपलब्धियों से लोगों में खुशी है किंतु आम जनता के सामने अपनी जरूरतें पूरी करने की जो समस्या है उसका हल  किये जाने की जरूरत है। रक्षा और ग्रामीण विकास पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। इन्फ्रा स्ट्रक्चर पर भी इस सरकार ने भारी निवेश किया जिसका सकारात्मक परिणाम देखने मिल भी रहा है ।  लेकिन शिक्षा और चिकित्सा का बढ़ता खर्च आम जनता को हलाकान किये हुए है। इसमें दो राय नहीं हैं कि  श्री मोदी के कार्यकाल में देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रति माह होने वाला जीएसटी संग्रह है। आयकर सहित अन्य प्रत्यक्ष करों की वसूली भी उम्मीद से ज्यादा बढ़ी है।  वाहनों की बिक्री के अलावा घर बनाने या खरीदने वालों की संख्या में भी जबरदस्त वृद्धि हो रही है। कोरोना काल में  80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन और खातों में सीधे राशि जमा किए जाने से देश अराजकता से बच गया। केंद्र सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण के लिए जो योजनाएं शुरू की गईं उनका लाभ उन्हें बिना बिचौलियों को घूस दिए मिला। यद्यपि प्रधानमंत्री आवास योजना में ज़रूर घूसखोरी की शिकायतें विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से मिलती हैं किंतु जिन योजनाओं में सहायता राशि सीधे हितग्राही के बैंक खाते में जमा होती है उनमें सरकारी अमले की लूट - खसोट पर विराम लग गया। विख्यात चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर का ये कहना अर्थपूर्ण है कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के प्रमुख कारणों में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के अलावा लाभार्थी भी हैं।   लेकिन वित्तमंत्री को ध्यान रखना होगा कि  आर्थिक नीतियों से उद्योगपति और गरीब तो संतुष्ट हैं किंतु नौकरपेशा और मध्यमवर्गीय व्यवसायी महसूस करते हैं कि सरकार उसके हितों के बारे में उतनी संवेदनशील नहीं है। ऐसे में अपेक्षा है कि वे  बजट के साथ जुड़ी मर्यादाओं का पालन करते हुए भी मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों और व्यवसायियों के प्रति उदारता बरतें। कम से कम इस बात का संकेत तो दिया ही जा सकता है कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद यह सरकार उनके हितों के संरक्षण हेतु क्या - क्या करेगी ? पेट्रोल - डीजल के दामों के अलावा जीएसटी की दरों को युक्तियुक्त बनाने के बारे में भी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं।  मोदी सरकार की आयुष्मान योजना ने गरीबों और बुजुर्गों को तो जबरदस्त राहत दी किंतु मध्यम आय वाले इलाज के महंगे होने से हलाकान हैं। इसलिए इस बारे में किसी क्रांतिकारी ऐलान की उम्मीद भी है और जरूरत भी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 January 2025

दिल्ली चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन के दो फाड़ होने की आशंका


दिल्ली विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल के बीच चल रहे शब्द बाणों ने  विपक्ष के दो ध्रुवों में बंट जाने की स्थिति उत्पन्न कर दी है। हालांकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भले ही एक दूसरे के विरुद्ध लड़ रही हैं किंतु दोनों  इंडिया गठबंधन में हैं। ये भी रोचक है कि गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस, सपा और शिवसेना ने जहाँ खुलकर आम आदमी पार्टी को समर्थन देने का ऐलान कर रखा है वहीं अन्य घटक तटस्थ  हैं। वैसे तो जम्मू कश्मीर और हरियाणा में भी आम आदमी पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे थे किंतु तब उसके और कांग्रेस के बीच उतनी कड़वाहट नजर नहीं आई जितनी दिल्ली में देखने मिल रही है।  अब तक  स्थानीय नेता ही केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहे लेकिन अब तो श्री गाँधी भी खुलकर हमले कर रहे हैं। उन्होंने श्री केजरीवाल द्वारा सादगी का दिखावा करने  के बाद सभी सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने, मुख्यमंत्री निवास को करोड़ों रुपये खर्च कर महल का स्वरूप देने, यमुना की सफाई न करवाने और गंदे पेयजल की आपूर्ति जैसे मुद्दे उठाकर उनकी तीख़ी आलोचना कर डाली। दूसरे खेमे ने भी जवाब देने में कोई लिहाज नहीं किया  और  नेशनल हेराल्ड मामले में गाँधी परिवार परिवार पर लगे आरोपों को उछालने के साथ ही ये सवाल भी दागा कि रॉबर्ट वाड्रा अब तक कैसे बचे हुए हैं?  सबसे मजेदार बात ये है कि  दोनों एक दूसरे पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि श्री गाँधी अपनी तरफ से आम आदमी पार्टी के प्रति नर्म रवैया अपनाने के पक्षधर थे। इसीलिए  कुछ समय तक प्रचार से दूर भी रहे । इससे ये धारणा बनने लगी कि किसी को बहुमत नहीं मिला तो कांग्रेस 2013 की तरह से ही श्री केजरीवाल की ताजपोशी में सहायक बनेगी। ये प्रचार आम आदमी पार्टी को नुकसानदेह लगा , इसीलिए उसने  गाँधी परिवार पर सीधा हमला बोल दिया। यहाँ तक कि सबसे भ्रष्ट नेताओं का जो पोस्टर प्रकाशित किया उसमें राहुल को तीसरे स्थान पर बता दिया जिससे उनका तिलमिलाना स्वाभाविक था। चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा ये तो अच्छे - अच्छे नहीं बता पा रहे क्योंकि भाजपा ने तो श्री केजरीवाल के विरुद्ध तगड़ी मोर्चेबंदी की ही किंतु  कांग्रेस भी पूरे उत्साह के साथ लड़ती दिखाई दे रही है। शुरुआती हिचक के बाद श्री गाँधी ने आम आदमी पार्टी पर आरोपों की जो बौछार की उसके पीछे  विपक्षी राजनीति के भावी समीकरण ही हैं। उनके मन में ये भय बैठ गया है कि यदि आम आदमी पार्टी  बहुमत ले गई और श्री केजरीवाल फिर  मुख्यमंत्री बने तो विपक्षी  गठबंधन में वे बड़े नेता के तौर पर स्थापित हो जाएंगे।  हरियाणा और महाराष्ट्र की  पराजय के बाद इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी  के विरुद्ध आवाजें उठने का परिणाम ही है कि ममता बेनर्जी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के पक्ष में खड़े हो गए। उन सबका मानना है कि कांग्रेस इस चुनाव में भी बुरी तरह हारेगी जिसके बाद राहुल का बचा - खुचा आभा मंडल भी फीका पड़ जाएगा। वहीं  श्री केजरीवाल सरकार बनाने में सफल हो गए तब वे विपक्ष के ऐसे चेहरे के तौर पर उभरेंगे जिसने प्रधानमंत्री से लगातार तीसरा मुकाबला जीता। ये स्थिति श्री गाँधी को किसी भी तरह स्वीकार नहीं होगी। उनके मन में ये बात भी गहराई तक बैठ गई है कि महाराष्ट्र की हार के लिए तो शरद पवार और उद्धव ठाकरे भी जिम्मेदार माने गए किंतु हरियाणा में यदि श्री केजरीवाल ने अपने प्रत्याशी नहीं उतारे होते तो भाजपा विरोधी मतों में विभाजन की नौबत नहीं आती। इसीलिए  वे आम आदमी पार्टी से हरियाणा का बदला लेने पर उतारू हैं। वे इस बात को समझ गए हैं कि दिल्ली में भाजपा की जीत श्री केजरीवाल की शिकस्त मानी जाएगी जिसके बाद कांग्रेस को अपने पाँव दोबारा जमाने में सहूलियत होगी। स्मरणीय है 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस अकेले लड़ी तब उसका मत प्रतिशत आम आदमी पार्टी से काफी ज्यादा था । 2013 में वह श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने में मदद न करती तो आम आदमी पार्टी इतनी बुलंदियों पर न पहुंच पाती। गाँधी परिवार इस बात को भी भांप गया है कि श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं केवल दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने तक सीमित नहीं रहने वालीं। और इस बार भी वे जीते तब  उनका कद काफी ऊँचा हो जाएगा जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस और श्री गाँधी को होगा। यही सब सोचकर कांग्रेस दिल्ली चुनाव को त्रिकोणीय बनाने में जुट गई है। भाजपा को रोकने के लिए आम आदमी पार्टी को अपनी पीठ पर लादने की गलती वह नहीं दोहराना चाह रही। इसका कितना लाभ उसे मिलेगा ये तो 8 फरवरी की दोपहर को पता चलेगा किंतु  राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल के बीच की जुबानी जंग ने इंडिया गठबंधन के दो फाड़ होने की शुरुआत कर दी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 29 January 2025

ताकि आगे ऐसी दुर्घटना न हो


प्रयागराज  महाकुंभ में मौनी अमावस्या पर स्नान करने पहुंचे श्रद्धालुओं की संख्या अनियंत्रित हो जाने से हुई धक्का - मुक्की में बीती रात  लगभग डेढ़ - दो बजे  20 लोगों के मारे जाने की खबर आने के बाद लोगों के प्रयागराज  आगमन पर  रोक लगा दी गई।  प्रारंभिक कारणों में अफवाह फैलना माना जा  रहा है।   गत दिवस  लगभग 5 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। आज 10 करोड़ लोगों का अनुमान था जो उक्त हादसे के बाद  कुछ कम हो सकता है किंतु अभी बसंत पंचमी का अमृत स्नान शेष है और उस दिन भी  जनसैलाब उमड़ेगा। 144 साल बाद बने ग्रह - नक्षत्रों के योग के कारण यह  महाकुंभ माना गया जिसकी वजह से पूरे विश्व भर से न सिर्फ सनातन धर्मी अपितु अन्य धर्मों में आस्था रखने वाले भी प्रयागराज पहुँच रहे हैं। आज की संख्या मिलाकर 20 करोड़ लोग स्नान कर चुके होंगे। महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस आयोजन में 40 करोड़ श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान है। उ.प्र सरकार ने इस महाकुंभ के लिए जबरदस्त व्यवस्थाएं कर रखी हैं। मकर संक्रांति के प्रथम अमृत स्नान पर ही जो जनसैलाब उमड़ पड़ा उसने आगे का  संकेत दे दिया था। समाचार माध्यमों के जरिये हो रहे प्रचार के कारण महाकुंभ वैश्विक आयोजन बन गया। जिस प्रकार की विस्तृत जानकारी प्रसारित की जा रही है उसने प्रयागराज आने के प्रति लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया । परिणामस्वरूप भीड़ उम्मीद से अधिक होती गई। इसीलिए  दो - तीन दिन  पहले से ही प्रयागराज में आने वाले वाहनों को रोक दिया गया जिसकी वजह से चारों तरफ से आने वाले रास्तों पर 10 - 15 कि.मी तक जाम की स्थिति है। महाकुंभ में इस बार अब तक की जो सबसे बड़ी और अत्याधुनिक व्यवस्था की गई है उसकी सराहना भी हो रही है  किंतु आस्था के अतिरेक से देश में हर वर्ष सैकड़ों लोग अपनी जान गँवा बैठते हैं। प्रयागराज में तो करोड़ों लोग जमा हैं किंतु अनेक मंदिरों में किसी बड़े त्यौहार के अवसर पर दर्शनार्थ उमड़ी भीड़ में धक्का - मुक्की से दर्जनों लोग मौत का शिकार बन जाते हैं। वैसे  कुंभ मेले में पहले भी  हादसे हुए हैं । 1954 में प्रयागराज कुंभ में तत्कालीन  प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद के आगमन पर हुई धक्का - मुक्की में भी 1 हजार से ज्यादा मौतें हुई थीं। हरिद्वार के कुंभ में भी एक बार ऐसा हो चुका है। इन दुर्घटनाओं से सबक लेकर आगामी आयोजनों में सुव्यवस्था और सुरक्षा पर काफी ध्यान दिया जाने लगा। वर्तमान महाकुंभ तो अपने विराट स्वरूप की वजह से वैश्विक आकर्षण उत्पन्न करने में सफल रहा। संचार और आवागमन के सीमित साधनों में वृद्धि की वजह से लोगों का आगमन बढ़ता ही जा रहा है। विशेष रेलगाड़ियों और हवाई सेवा के साथ ही निजी वाहनों से लोग आते हैं। पिछले कुछ दिनों से ही ये लगने लगा था कि मौनी अमावस्या पर भीड़ पिछले रिकार्ड तोड़ देगी। इसीलिए लोगों को रोका जाने लगा किंतु हमारे देश में आस्था के उत्साह में  व्यवस्था को भंग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। प्रयागराज में  जमा  लोग  इंतजाम पर भारी पड़ने लगे और बीती रात वही हुआ। यदि मृतकों की जो संख्या बताई गई वह सही है तब तो गनीमत है क्योंकि इतने विशाल जनसागर के कारण ऐसी घटना कहीं भी हो सकती है किंतु ऐसे आयोजनों में शामिल होने वालों से भी अपेक्षा होती है कि वे व्यवस्था का पालन करते हुए आत्मानुशासन का परिचय दें क्योंकि धक्का - मुक्की जैसी घटनाओं का दुष्परिणाम उन्हीं को भोगना पड़ता है। जिन श्रद्धालुओं की इस हादसे में मौत हुई उनके परिजनों के लिए ये महाकुंभ कड़वी यादें छोड़ गया। अभी महाकुंभ आधा ही संपन्न हुआ है। आने वाले दिनों में आयोजकों द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं में हर श्रद्धालु को ईमानदारी से सहयोग करना चाहिए क्योंकि यह महाकुंभ केवल उ.प्र सरकार और प्रशासन के प्रबंधन कौशल ही नहीं अपितु सनातन में आस्था रखने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की अनुशासनप्रियता का परिचय भी समूचे विश्व को देगा। इस हादसे से सबक लेते हुए  श्रद्धालुओं को सभी प्रकार की सावधनियाँ रखते हुए  ही वहाँ जाने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। छोटे बच्चों और अति वृद्धजनों को भी इस महाकुंभ में ले जाने से परहेज करें। सुनी - सुनाई जानकारी के आधार पर प्रयागराज पहुँच जाना और फिर वहाँ जाकर भोजन - आवास की शिकायत करने की प्रवृत्ति उचित नहीं लगती। सुरक्षा ,सफाई , चिकित्सा, यातायात आदि की व्यवस्था देख रहे अमले को कटघरे में खड़ा करना आसान है।  लेकिन श्रद्धालुओं को अपना दोष भी देखना चाहिए। किसी भी बड़े आयोजन में विघ्नकर्ता अपनी कारस्तानी से बाज नहीं आते। इस हादसे का प्रारंभिक कारण अफवाह ही बताया गया। हो सकता है और कोई वजह हो किंतु अब बचे हुए समय में महाकुंभ निर्विघ्न संपन्न हो इसके लिए श्रद्धालुओं को पूर्ण अनुशासन का परिचय देना होगा। जिन श्रद्धालुओं को गत रात्रि अपने प्राण गँवाना पड़े उन्हें ईश्वर सद्गति प्रदान करे और महाकुंभ का शेष आयोजन योजनानुसार संपन्न हो यही प्रभु से प्रार्थना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 January 2025

अपने बनाये संसार से बाहर नहीं निकल पा रहे राहुल

म.प्र के महू नगर में गत दिवस कांग्रेस की रैली हुई जिसमें राहुल गाँधी अपने भाषण में  जातिगत जनगणना, आरक्षण की सीमा , अंबानी और अदाणी जैसे  मुद्दों में ही उलझे रहे। संविधान पर खतरे के साथ ही  नौकरशाहों में दलित और पिछड़ी जातियों के अधिकारियों की कम संख्या का रोना भी उन्होंने रोया। इन बातों का जनता पर  कितना प्रभाव हुआ ये तो हालिया चुनाव परिणाम बता ही चुके हैं। आजकल  दिल्ली में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ  हैं। सभी पार्टियां पूरा जोर लगा रही हैं किंतु राहुल एक - दो सभाएं कर सुस्त हो गए। चर्चा है कि वरिष्ट नेता अजय माकन को पत्रकार वार्ता करने से रोक रखा गया है क्योंकि वे केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने वाले थे।  केजरीवाल सरकार को सबसे बड़ा झटका जिस शराब घोटाले से लगा उसकी जांच भी कांग्रेस की शिकायत पर ही शुरू हुई थी।  इसीलिए इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी का शामिल होना भी स्थानीय कांग्रेस जनों को रास नहीं आया। लोकसभा चुनाव  मिलकर लड़ने के बाद भी राजधानी की सातों सीटें हार जाने पर दोनों के बीच खटास फिर बढ़ी और विधानसभा चुनाव में दोनों एक - दूसरे के विरुद्ध डटे हुए हैं। हाल ही में आम आदमी पार्टी ने सबसे भ्रष्ट नेताओं का जो पोस्टर जारी किया उसमें तीसरे स्थान पर श्री गाँधी हैं । अब तक उन्होंने उस पर टिप्पणी का साहस नहीं दिखाया। दिल्ली चुनाव के बारे में कहा जा रहा था कि कांग्रेस इस बार दलितों तथा मुसलमानों के बीच अपना  जनाधार हासिल करने के लिए पूरा जोर लगायेगी किंतु ऐसा लगता है शीर्ष नेतृत्व एक बार फिर  आम आदमी पार्टी को छोड़ भाजपा को रोकने की रणनीति पर चल पड़ा है।  संदीप दीक्षित और अजय  माकन तो न जाने कितनी बार आम आदमी पार्टी के प्रति सख्त होने की मांग कर चुके हैं किंतु ऐसा लगता है गाँधी परिवार आज तक श्री केजरीवाल की उस धमकी से घबराया हुआ है कि उनके हाथ ईडी आ जाए तो सोनिया गाँधी को जेल में डाल देंगे। ये भी स्मरणीय है कि उन्होंने इटली से अगस्ता  वेस्टलैंड हेलीकाप्टरों के सौदे में हुए भ्रष्टाचार के  विरुद्ध कारवाई करने की चुनौती मोदी सरकार को दी थी। रॉबर्ट वाड्रा पर शिकंजा कसने की मांग भी श्री केजरीवाल लम्बे समय तक करते रहे।  ऐसे में जितनी मशक्कत राहुल ने अदाणी और अंबानी के विरुद्ध मोर्चा खोलने में की उसकी आधी भी  केजरीवाल सरकार  की घेराबंदी में करते तो  इस बार मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ होता। महू की रैली में श्री गाँधी ने समाचार माध्यमों पर  अंबानी परिवार के विवाह के प्रसारण का तंज तो कसा किंतु वे इस बात को भूल गए कि कांग्रेस के तमाम नेता भी उसमें शिरकत करने पहुंचे थे। कुल मिलाकर श्री गाँधी अपने बनाये संसार से बाहर निकलने तैयार नहीं हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के संदर्भ में जब उन्हें आगे आकर मोर्चा संभालना था तब वे विदेश चले गए। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद वे जरूरत से ज्यादा आत्ममुग्ध हो उठे थे । हालांकि हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों ने उस खुशफहमी की हवा निकाल दी। दिल्ली चुनाव की शुरुआत में ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस को ये बात समझ में आ चुकी है कि उसके असली दुश्मन क्षेत्रीय दल हैं जिन्होंने उसी के वोट बैंक में सेंध लगाकर अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली कि कांग्रेस को उनका पिछलग्गू बनने मजबूर होना पड़ा। आम आदमी पार्टी के कारण तो कांग्रेस राष्ट्रीय राजधानी में चारों खाने चित्त होने जैसी शर्मनाक स्थिति में आ पहुंची। ऐसे में श्री गाँधी को चाहिए था कि वे अपना पूरा समय दिल्ली चुनाव में लगाते हुए कांग्रेस को पुरानी गौरवशाली स्थिति तक ले जाने के प्रयास करते। कांग्रेस के विरोधी भी ये कहते मिल जायेंगे कि दिल्ली का जितना विकास स्व. शीला दीक्षित ने किया वह अतुलनीय है। लेकिन कांग्रेस इसका लाभ नहीं ले पा रही। मत प्रतिशत में वृद्धि की संभावना के बावजूद उसकी सीटों को लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है। वहीं भाजपा 2015 और 2020 की हार से सबक लेते सरकार बनाने के हौसले के साथ उतरी क्योंकि उसका शीर्ष नेतृत्व भी मैदान में है। पाँच फरवरी को दिल्ली में मतदान होना है। मौजूदा सरकार के प्रति नाराजगी सतह पर नजर भी आने लगी है किंतु कांग्रेस अभी तक गंभीर नजर नहीं आ रही जिससे मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच सिमटकर रह गया है। ताजा सर्वे बता रहे हैं कि दोनों पार्टियों के बीच बेहद नजदीकी टक्कर है जिसमें बाजी किसी के भी हाथ लग सकती है। वहीं कांग्रेस शून्य के आंकड़े से कुछ ऊपर आ जाए तो भी आश्चर्य से कम नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 26 January 2025

गणतंत्र विरोधी षडयंत्र का पर्दाफाश जरूरी


      आजकल कुछ लोग यह कहते फिरते हैं कि भारत में लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा। लोकसभा चुनाव के पहले ये दुष्प्रचार भी किया गया कि नरेंद्र मोदी सत्ता में लौटे तो आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा। वहीं मुसलमानों को ये कहकर भयभीत किया गया कि  भारत  हिन्दू राष्ट्र बन जावेगा। राम मंदिर में हुई प्राण - प्रतिष्ठा से भी समाज के उस वर्ग का रक्तचाप बढ़ा हुआ था जिसने कभी देश का हित नहीं चाहा।  नेताजी सुभाष चंद्र बोस को हिटलर का दलाल प्रचारित करने वाला यह वर्ग आजादी के बाद से ही आयातित  विचारधारा को जनमानस पर थोपने में जुटा रहा लेकिन  जब जनसमर्थन नहीं मिला तब मुख्य धारा की राजनीति से जुड़कर उसने अपनी कार्ययोजना लागू करने की चाल चली। सर्वविदित है भारत का अस्तित्व उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर आधारित है जिसे कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास किया गया । विदेशी ताकतों के इशारे पर  कतिपय बुद्धिजीवी देश का मनोबल तोड़ने में जुट गए और वह भी सरकारी संरक्षण में। धर्म , संस्कृति ,कला - साहित्य जैसे क्षेत्रों में भारतीयता के भाव को कमजोर करने का प्रयास पूरी ताकत से चलता रहा। लेकिन जैसे हर रात के बाद सुबह होती है , ठीक वैसे ही 2014 में जनता ने राष्ट्रवादी विचार के नेतृत्व को  सत्ता सौंप दी।  जिसके सुपरिणाम स्वरूप देश नए उत्साह के साथ आगे बढ़ने लगा।  राजनीतिक नेतृत्व से प्राप्त प्रोत्साहन से  पश्चिमी चकाचौंध से मुक्त युवा पीढी़ भारत को  विकसित देशों की कतार में खड़ा करने में जुट गई।  और देखते - देखते  भारत एक  संभावनाओं से भरे देश के तौर पर उभरने लगा। विश्व की सबसे सक्षम युवा शक्ति हमारी ताकत  है। बीते एक दशक में  भारतीयता के प्रति हर वर्ग में आकर्षण बढ़ा है। विश्व शक्ति कहे जाने वाले देशों के पिछलग्गू होने वाला जमाना इतिहास बन गया। जिसका श्रेय राष्ट्रवादी नेतृत्व को ही है । और यही बात उन शक्तियों  को नागवार गुजर रही है जिनका ध्येय  भारतीयता के भाव को नष्ट करना था । 2014 के बाद से केंद्र सरकार ने  जो साहसिक निर्णय लिए उनके कारण उक्त ताकतें हाशिए पर खिसकती जा रही हैं। इसीलिए वे समय - समय पर जनता को भड़काकर अपनी कुंठा निकालती हैं किंतु अब जनता इनके दुष्प्रचार में नहीं फंसती। राम मंदिर में हुई प्राण - प्रतिष्ठा के अवसर पर भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रमाण पूरे विश्व को मिल गया। उसके कुछ  महीनों बाद हुए आम चुनाव पर  पूरे विश्व की नजरें टिकी थीं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को कमजोर करने में जुटी  ताकतों ने उस  दौरान राष्ट्रवादी विचारधारा वाली मोदी सरकार को अपदस्थ करने का हरसंभव प्रयास किया किंतु  उनका दुष्प्रचार कारगर नहीं हो सका। दरअसल लोगों को ये भरोसा हो चुका था कि  देश और लोकतंत्र  भारतीयता के प्रति समर्पित नेतृत्व के हाथों में ही सुरक्षित रह सकता है। विगत एक दशक में  देश ने अनेक ऊंची छलांगें लगाई हैं किंतु अभी बहुत कुछ करना बाकी है। सबसे बड़ी जरूरत उन तत्वों से सावधान रहने की है जो  भारत को भीतर से कमजोर करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। यहाँ तक कि प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ की जहाँ पूरे विश्व में प्रशंसा हो रही है वहीं कुंठित लोगों की जमात उसमें खामियां निकालकर लोगों को भ्रमित करने में लगी है जिससे वे उसमें शामिल न हों। देश में निराशावादी माहौल बनाकर व्यवस्था के विरुद्ध भावनाएं भड़काने का जो षडयंत्र एक वर्ग रच रहा है उसका पर्दाफाश भारत के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए नितांत जरूरी है।

      गणतंत्र हमारी संवैधानिक व्यवस्था के प्रति विश्वास का पर्व है।  इस अवसर पर देश पर मंडरा रहे भीतरी और बाहरी संकटों के बारे में भी सोचा जाना चाहिए ताकि उन गलतियों को दोहराने से बचा जा सके जिनके कारण हमें सदियों तक गुलाम रहना पड़ा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 January 2025

मुस्लिम तुष्टीकरण के हर प्रयास से हिंदुओं का ध्रुवीकरण बढ़ेगा


वक्फ संशोधन विधेयक पर  गठित जेपीसी ( संयुक्त संसदीय समिति) की बैठक में गत दिवस हुए हंगामे के बाद 10 विपक्षी सदस्यों को  निलंबित कर दिया गया। अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने आरोप लगाया कि विपक्षी सदस्यों ने उन्हें गालियाँ दीं। उल्लेखनीय है  पिछली बैठक में भी तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बेनर्जी ने गुस्से में काँच की बोतल  तोड़ डाली थी जिस पर उन्हें निलम्बित किया गया।असदुद्दीन ओवैसी भी हर बैठक में गर्मी दिखाते हैं। समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को शीतकालीन सत्र में ही सौंपने वाली थी किंतु  समय सीमा बजट सत्र तक बढ़ा दी गई । लगता है विपक्षी सदस्यों का उद्देश्य रिपोर्ट को संसद में पेश होने से रोकना है। समिति द्वारा मांगे जाने पर  देश भर से लाखों लोगों ने  वक़्फ़ विधेयक पर  अपनी राय भेजी जिन पर  समिति की रिपोर्ट मिलने पर संसद अपना निर्णय करेगी। ये  सही है कि जेपीसी में बहुमत सत्ता पक्ष का ही रहता है क्योंकि उसका गठन  सदन में पार्टियों की सदस्य संख्या के आधार पर होता है। यही कारण था कि जब राहुल गाँधी हिंडनबर्ग द्वारा किये गए खुलासे के बाद अदाणी समूह की जाँच हेतु जेपीसी  की जिद पकड़कर बैठ गए तब विपक्षी दलों की बैठक में अविभाजित एनसीपी के नेता शरद पवार ने भी ये कहकर जेपीसी  की मांग को अर्थहीन बताया  कि सत्ता पक्ष के बहुमत की वजह से विपक्ष को कुछ हासिल नहीं होगा। बावजूद उसके श्री गाँधी ने पिछले संसद सत्र में गौतम अदाणी के विरुद्ध अमेरिका में दर्ज आपराधिक प्रकरण की जांच हेतु जेपीसी की मांग दोहराई । लेकिन अन्य  विपक्षी इस मांग से कन्नी काट गए । शरद पवार और ममता बेनर्जी तो शुरू से ही  अदाणी की जांच के लिए जेपीसी  का विरोध कर रहे थे किंतु पिछले सत्र में सपा और शिवसेना ने भी उससे दूरी बना ली। दूसरी तरफ सरकार ने पहले वक्फ संशोधन और फिर एक देश एक चुनाव सम्बन्धी विधेयक विपक्ष की मांग के बिना ही जेपीसी के हवाले कर दिये। यदि दोनों विधेयकों पर संसद में बहस होती तब भी उनका  पारित होना तय था किंतु वक़्फ़ विधेयक  मुस्लिम समुदाय से जुड़े होने से  जेपीसी के जरिये जनता की राय लेने का रास्ता चुना गया । इसका लाभ ये हुआ कि वक़्फ़ बोर्ड को मिले असीमित अधिकार और उसकी संपत्तियों में हो रही हेराफेरी की जानकारी आम जनता के संज्ञान में आने लगी। बोर्ड  द्वारा अवैध रूप से कब्जाई अनेक संपत्तियों का ब्यौरा भी सार्वजनिक हुआ। जेपीसी में शामिल श्री ओवैसी ने तो उ.प्र की एक आमसभा में स्वीकारा भी कि राज्य में वक़्फ़ की अधिकांश संपत्तियों के स्वामित्व संबंधी वैध दस्तावेज ही नहीं हैं। ऐसा ही शपथ पत्र उ.प्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में भी पेश किया गया । वक़्फ़ संशोधन विधेयक पेश होते ही देश भर से वक़्फ़  की दादागिरी के विरुद्ध  शिकायतें आने लगीं। उधर वक़्फ़ बोर्ड  वाले भी देश की अनेक ऐतिहासिक और सरकारी इमारतों के उनकी जमीन पर होने का दावा करने लगे। हद तो तब हो गई जब प्रयागराज में महाकुंभ के स्थल को भी वक़्फ़ संपत्ति बताने का दुस्साहस किया गया।  प्रतिक्रिया स्वरूप लोग खुलकर वक़्फ़ बोर्ड के अवैध कब्जों के विरुद्ध  सामने आने लगे जिससे  मुस्लिम मतों के ठेकेदार राजनीतिक दलों में घबराहट व्याप्त हो गई। दरअसल  लोकसभा चुनाव के बाद आम मुसलमान के मन में ये धारणा बिठाई गई कि उसी ने भाजपा को 240 सीटों पर रोक दिया। इसकी प्रतिक्रिया हिंदुओं के बीच भी हुई और  देश भर के साधु - महात्मा हिन्दू हितों को लेकर मुखर हो उठे। महाकुंभ से आ रहे समाचार इसकी पुष्टि कर रहे हैं। इन सब बातों से उपजी घबराहट ही वक़्फ़ पर बनी जेपीसी में विपक्षी सदस्यों के हंगामे का कारण है किंतु वे भूल रहे हैं कि आखिरकार  अध्यक्ष श्री पाल अपनी रिपोर्ट संसद को प्रेषित कर ही देंगे जहाँ उसका पारित होना भी सुनिश्चित है। विपक्ष को ये भी समझ लेना चाहिए कि  मुस्लिम तुष्टीकरण के हर प्रयास से हिंदुओं का ध्रुवीकरण बढ़ेगा।  ऐसे में उसके लिए यही हितकर होगा कि वह वक़्फ़ बोर्ड  के  असीमित अधिकारों में कटौती के लिए लाये  विधेयक का समर्थन  कर बुद्धिमत्ता दिखाये।अल्पसंख्यकों की संपत्ति की सुरक्षा होनी चाहिए किंतु वक़्फ़ बोर्ड जहाँ चाहे कब्जा कर ले इसकी छूट धर्मनिर्पेक्षता नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 January 2025

आयकर छूट बढ़ी तो दिल्ली में भी हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे नतीजे होंगे


दिल्ली विधानसभा चुनाव दिन ब दिन जटिल होता जा रहा है। भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच तो सांप और नेवले जैसा रिश्ता शुरू से रहा है किंतु इस बार कांग्रेस जिस तरह  केजरीवाल एंड कं. पर चढ़ बैठ रही है  , वह अभूतपूर्व है क्योंकि ज्यादा वक्त नहीं बीता जब  कांग्रेस की शिकायत पर उजागर हुए शराब घोटाले में गिरफ्तार  मनीष सिसौदिया और अरविंद केजरीवाल के बचाव में कांग्रेस से जुड़े वरिष्ट अधिवक्ता अदालत में पैरवी करते देखे जा सकते थे। इसी तरह जो अरविंद  केजरीवाल कभी सोनिया गाँधी और राहुल को जेल पहुंचाने का दंभ भरते थे , वे नेशनल हेराल्ड प्रकरण में उनको पूछताछ हेतु बुलाये जाने पर केंद्र सरकार को घेरने में लगे रहे। जब श्री केजरीवाल जेल में बंद हुए तब राजधानी में आयोजित विपक्ष की साझा रैली में सोनिया जी के साथ मंच पर उनकी पत्नी सुनीता बैठी नजर आईं। इसीलिए  इस चुनाव में कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी पर आरोपों की जो बौछार हो रही है उससे भाजपा के खेमे में जबरदस्त राहत का माहौल है। आम आदमी पार्टी के तीन बड़े नेता श्री केजरीवाल, श्री सिसौदिया और मुख्यमंत्री आतिशी अपने - अपने निर्वाचन क्षेत्र में फंसे होने से अन्य सीटों पर ज्यादा प्रचार नहीं कर पा रहे। दलित और मुस्लिम मतों में  जहाँ कांग्रेस सेंध लगाने में जुटी है वहीं भाजपा अपने परंपरागत मध्यमवर्गीय समर्थकों को अपने साथ खींचने के लिए रणनीति बना रही है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि केजरीवाल सरकार की योजनाओं से उपकृत लाभार्थी  वर्ग भी इस बार उनसे दूर खिसकता दिखाई दे रहा है। वहीं भाजपा  हिंदुत्व की भावना समाज के निचले तबके में फैलाने में कामयाब होती लग रही है।  मुल्ला - मौलवियों को प्रति माह वित्तीय सहायता दिये जाने से हिन्दू  मंदिरों के पुजारी केजरीवाल सरकार से नाराज थे। उनको खुश करने के लिए आम आदमी पार्टी ने 18 हजार रु.हर माह देने का वायदा कर दिया। गुरुद्वारों के ग्रंथी भी इस योजना में शामिल होंगे। लेकिन  दिल्ली के हजारों पुजारी  उनके संपर्क में आने वाले श्रद्धालुओं को सनातन का वास्ता देकर भाजपा का समर्थन करने हेतु प्रेरित कर रहे हैं। इस सबसे आम आदमी पार्टी परेशान है। ईमानदारी का उसका दावा असर खो चुका है। यमुना की गंदगी और खराब सड़कें  बड़ा मुद्दा बन गया है। हाल ही में श्री केजरीवाल ने करों के बोझ (टैक्स टैररिज्म ) पर भाजपा को घेरने का दाँव चला । राजधानी में रहने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए आयकर बड़ी समस्या है। श्री केजरीवाल की नई दिल्ली सीट में बड़ी संख्या मतदाता केंद्रीय कर्मचारियों की होने से यह निश्चित रूप से बड़ा मुद्दा है। खबर है भाजपा ने इससे निपटने की पूरी तैयारी कर ली है। आगामी 1 फरवरी को केंद्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 10 लाख रु. किये जाने की अटकलें उच्च स्तरीय राजनीतिक क्षेत्रों में तेजी से लगाई जा रही हैं। यदि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वाकई ऐसा कर दिया तब उसका असर 5 फरवरी को होने वाले मतदान पर पड़ना अवश्यंभावी है।  आम आदमी पार्टी इस खबर से भयभीत है क्योंकि आयकर छूट की सीमा में वृद्धि से नौकरपेशा के साथ मध्यम वर्गीय व्यवसायी भी फायदे में होंगे और चुनाव भाजपा के पक्ष में काफी हद तक घूम जायेगा। काँग्रेस के लिए तो और बड़ी समस्या  खड़ी हो जाएगी। यद्यपि पुख्ता भविष्यवाणी करना तो किसी के लिए संभव नहीं रहा किंतु इतना जरूर कहा जा सकता है कि अगर ताजा स्थिति  कायम रही तब तो आम आदमी पार्टी के हाथ से सत्ता खिसकने पर आश्चर्य नहीं होगा। कांग्रेस का लक्ष्य तो हरियाणा के चुनाव में आम आदमी पार्टी द्वारा अपने प्रत्याशी उतारे जाने से हुए नुकसान का बदला लेना है किंतु भाजपा इस चुनाव में सत्ता हासिल करने के लिए राजनीति के सभी अस्त्र - शस्त्र उपयोग कर रही है। यदि केंद्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा 10 लाख रु. सालाना हो गई तब  दिल्ली में भी हरियाणा और महाराष्ट्र सरीखे  नतीजे आ जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 January 2025

एक साथ सारे मोर्चे खोलना ट्रम्प के लिए नुकसानदेह


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पदभार ग्रहण करते ही ताबड़तोड़ फैसले लेना शुरू कर दिया। चूंकि वे पूर्व में भी राष्ट्रपति रह चुके हैं अतः उन्हें अपने देश और दुनिया के मामलों की पर्याप्त जानकारी है। यही कारण है कि उन्होंने चुनाव जीतने के तत्काल बाद अपने इरादे स्पष्ट कर दिये थे। ट्रम्प की चिंताओं में अवैध रूप से आकर बस गए विदेशी नागरिक प्रमुख है। उनकी जो संतानें अमेरिका में पैदा हुईं उन्हें नागरिकता देने पर रोक लगाने की उनकी घोषणा से वहाँ हड़कंप मचा है। गर्भवती महिलाएं 20 फरवरी के पहले ही  समय पूर्व प्रसव के लिए अस्पतालों में जुटी हैं। ट्रम्प इस बात से भी परेशान हैं कि कैनेडा और  मेक्सिको आदि से बड़ी मात्रा में ड्रग्स तस्करी के जरिये लाये जाते हैं। उल्लेखनीय है दक्षिण अमेरिका के अनेक देश ड्रग्स के कारोबार के लिए कुख्यात हैं।  अमेरिका आकर काम करने वाले प्रतिभाशाली व्यक्तियों को H1b वीजा देने के संबंध में उनके द्वारा पूर्व में दिये गए संकेतों से भारत सहित तमाम उन देशों में चिंता थी जिनके लाखों लोग अमेरिका में कार्यरत हैं  वहीं बड़ी संख्या में नये लोग भी  वीजा प्राप्त करने प्रयासरत हैं। लेकिन कल उन्होंने स्पष्ट किया कि  अमेरिका की प्रगति के लिए प्रतिभाओं के आने की मौजूदा व्यवस्था यथावत रहेगी। कुछ और मामलों में भी उन्होंने कड़े कदम उठाने में जल्दबाजी से परहेज किया है किंतु जलवायु संरक्षण हेतु किये गए पेरिस समझौते से अलग होने का उनका निर्णय बेहद गैर जिम्मेदारना है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि दुनिया भर में पर्यावरण को क्षति पहुंचाने में सबसे बड़ा हाथ विकसित देशों का ही है किंतु ये विकासशील देशों पर तो कार्बन उत्सर्जन घटाने हेतु दबाव डालते हैं किंतु खुद उस पर अमल करने से बचते हैं। उस दृष्टि से ट्रम्प का उक्त निर्णय विश्व जनमत की अवहेलना करने जैसा है और इस मुद्दे पर अमेरिका पूरी दुनिया के निशाने पर आ जाएगा। इसी तरह पनामा नहर का नियंत्रण वापस लेने के उनके इरादे ने भी तनाव की आशंका बढ़ा दी है। 1999 में अमेरिका ने इस समुद्री मार्ग का नियंत्रण पनामा नामक देश को ही सौंप दिया था किंतु ट्रम्प का कहना है कि इसकी वजह से अमेरिकी हित प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि इसके पीछे असली कारण इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियां हैं। लेकिन यदि ट्रम्प ने पनामा नहर पर कब्जे की जिद नहीं छोड़ी तो यह यूक्रेन और रूस जैसी जंग का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। स्मरणीय है नहर का संचालन मिलने के बाद से पनामा और अमेरिका के रिश्ते बड़े ही मधुर हो चले थे। लेकिन चीन जिस तरह से इस अंचल में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है उससे अमेरिका सशंकित है। पनामा नहर सामरिक और आर्थिक दृष्टि से स्वेज नहर जैसी ही महत्वपूर्ण है। वैसे भी ज्यादातर दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ उसके रिश्ते अच्छे नहीं हैं। ऐसे में ट्रम्प का सख्त रवैया विश्व शान्ति के लिए खतरा बन सकता है। इसी तरह उनका ब्रिक्स देशों के सामान पर ड्यूटी बढ़ाने का फैसला अमेरिका के लिए भी उतनी ही समस्या बनेगा क्योंकि उसके उत्पाद भी इन देशों में निर्यात होते हैं। ध्यान देने वाली बात है कि जिस तरह अमेरिका द्वारा  चीन और रूस के प्रभाव के विरुद्ध मोर्चेबंदी की जाती है वैसी ही ये दोनों भी करते हैं। रूस के साथ तो ट्रम्प भले ही अच्छे रिश्ते बना लें किंतु चीन को दबाना उतना आसान नहीं होगा। l अमेरिका अपने हितों के बारे में सोचे ये उसका अधिकार है किंतु आज के विश्व में आत्मकेंद्रित होकर रहना किसी के लिए संभव नहीं रहा। चीन ने भी जब माओ युग के लौह आवरण को हटाकर दुनिया से रिश्ते बनाये तभी उसे विश्व शक्ति के रूप में मान्यता मिली। और ये भी कि अब यूरोप के देशों में भी अमेरिकी प्रभुत्व से मुक्ति की भावना तेजी से बढ़ रही है। ट्रम्प की आक्रामक नीतियों ने नव अमेरिकी राष्ट्रवाद को बढ़ावा तो दे दिया किंतु चुनाव के दौरान पैदा किया गया उन्माद सत्ता में आने के बाद ठंडा पड़ना स्वाभाविक है। ट्रम्प ने नागरिकता संबंधी जो बंदिश लगाई उसका अमेरिका के 20 राज्यों में ही विरोध शुरू हो गया। असल में अब उनके सामने अगला चुनाव हारने का भय नहीं है क्योंकि अमेरिका में दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं बना जा सकता। लेकिन वे ज्यादा उड़ेंगे तो जल्द ही उनकी पार्टी में ही विरोध के स्वर उठे बिना नहीं रहेंगे। ट्रम्प को पड़ोसी कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के अंजाम से सबक लेना चाहिए जो अपने अड़ियलपन की वजह से अपनी ही पार्टी द्वारा तिरस्कृत कर दिये गए। ट्रम्प को ये नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका में पूरी दुनिया के लोग आकर नागरिक बन चुके हैं जिनका राजनीति और अर्थव्यवस्था पर जबरदस्त नियंत्रण है। इसीलिए उनकी प्रारंभिक अकड़ ज्यादा दिनों तक जारी रहेगी इसमें संदेह है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 January 2025

राममंदिर जनमानस में नव विश्वास की प्राण - प्रतिष्ठा का प्रतीक बना


गत वर्ष आज ही के दिन जब अयोध्या स्थित राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई तब समूचे विश्व में फैले सनातनियों  के मन में विजयोल्लास हिलोरें मार रहा था। सदियों तक चले संघर्ष के बाद बन सका यह मंदिर केवल ईंट - गारे से बना भवन  ही नहीं बल्कि  सैकड़ों वर्षों की मानसिक गुलामी से हासिल मुक्ति का प्रतीक है। हालांकि 15 अगस्त 1947 को   विदेशी सत्ता से भारत  को आजादी मिल गई थी किंतु देश के विभाजन से उत्पन्न पीड़ा के कारण आत्मगौरव का वह भाव उत्पन्न नहीं किया जा सका जो भारत के अस्तित्व का आधार रहा है। सच्चाई  तो ये है कि राम मंदिर के जरिये  पूरे विश्व को ये संदेश दिया गया  कि भारत ने मानसिक स्वाधीनता के लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग अब जाकर खोजा है। इसीलिए उसको मात्र सनातन  धर्म से जोड़ना उचित नहीं है क्योंकि जिस तरह से दिल्ली के राजघाट में बापू की समाधि पर लिखा  हे राम , पूरे  देश के मनोभावों  का प्रतिनिधित्व करता है उसी तरह अयोध्या में निर्मित राम मंदिर  भारत की  सनातन संस्कृति का उद्घोष है । समूचे विश्व में बसे भारतीय  समुदाय द्वारा उक्त अवसर पर व्यक्त हर्षोल्लास के पीछे  इस देश की मिट्टी के प्रति उनकी अखंड  आस्था है जो मातृभूमि से हजारों मील की दूरी के बाद भी जीवंत है तो उसका आधार श्री राम ही हैं , जो आदर्शमय जीवन के ऐसे मापदंड हैं जिसका कोई विकल्प आज तक न उत्पन्न हुआ  और न ही होगा।  राम जन्मभूमि पर आततायी विधर्मी शासकों  के आधिपत्य के विरुद्ध सैकड़ों वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। यद्यपि जयचंद की मानसिकता से ग्रसित लोग यह भ्रम फैलाने से बाज नहीं आये कि राम  एक कल्पना मात्र हैं जिनके अस्तित्व की प्रामाणिकता नहीं है । दरअसल इसी तरह के कुतर्कों ने उस विकृत मानसिकता को जन्म दिया जिसके कारण हमें सदियों  तक सनातन विरोधियों की गुलामी झेलनी पड़ी । उस दौरान हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने के षडयंत्र लगातार चले परंतु श्री राम में अटूट विश्वास ने  भारतवासियों का मनोबल ऊंचा रखा। 15 अगस्त 1947 के  बाद  उम्मीद थी कि महात्मा गांधी की इच्छानुसार रामराज आयेगा किंतु अंग्रेजी संस्कृति से प्रभावित राजनीतिक नेतृत्व ने बापू की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए उस बुनियादी भाव को उपेक्षित और अपमानित करने का कुचक्र रचा जो हमारी एकता का आधार है । लेकिन समय ने करवट ली और भारत का लुप्त होता स्वाभिमान लौटने लगा जिसकी झलक पिछली शताब्दि के अंतिम दशक में ही दिखाई देने लगी थी।  यद्यपि राम जन्मभूमि की मुक्ति का  संघर्ष तो कई  पीढ़ियों से चला आ रहा था किंतु सफलता तभी मिली जब वह जनांदोलन बना । ये एक तरह से आसुरी शक्तियों को परास्त करने के लिए वानर सेना का गठन किये जाने जैसा था। राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा संघर्ष जब चरमोत्कर्ष पर पहुंचा तो फिर विधर्मी दासता के प्रतीक को धूल - धूसरित होते देर न लगी। जो इस बात का प्रमाण था कि अभेद्य राक्षसी दुर्ग को  राम भक्ति की साधारण  शक्ति भी तहस - नहस  करने में सक्षम है। उस दृष्टि से  6 दिसंबर 1992 की तारीख एक नए अध्याय की शुरुआत थी । राम मंदिर के निर्माण से अयोध्या को उसकी प्राचीन भव्यता मिलने के साथ ही देश को अपनी दिव्यता का जो अनुभव हुआ वह सही मायने में सनातन परंपरा से जुड़े करोड़ों भारतीयों के मन में नव विश्वास की प्राण - प्रतिष्ठा है। इसके माध्यम से भारत ने पूरे विश्व को ये आभास करवा दिया  कि उसने अपने आधारभूत आदर्शों को पुनर्स्थापित करने का संकल्प ले लिया है। राम मंदिर में गत वर्ष संपन्न  प्राण प्रतिष्ठा से महर्षि अरविंद और  स्वामी विवेकानंद के उस विश्वास की पुष्टि हुई है कि 21 वीं सदी भारत के नाम होगी। बीते एक वर्ष में अयोध्या  आये लाखों श्रद्धालुओं ने इस मंदिर निर्माण के औचित्य को साबित कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 January 2025

चुनावी रेवड़ियां अकर्मण्यता को बढ़ावा दे रहीं


दिल्ली विधानसभा चुनाव में बाकी मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए और पूरा चुनाव  मुफ्त रेवड़ियों पर केंद्रित हो गया। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता हासिल ही मुफ्त बिजली और पानी का लालच देकर की थी। यद्यपि सरकारी शालाओं का स्तर सुधारने और मोहल्ला क्लीनिक जैसे उसकी सरकार के कार्यों को हर किसी ने सराहा किंतु अरविंद केजरीवाल को 2015 और 2020 के चुनाव में जो ऐतिहासिक बहुमत मिला उसका मुख्य श्रेय मुफ्त बिजली और पानी को ही दिया जाता है। इन दोनों का लाभ समाज के उस वर्ग ने भी उठाया जो शासकीय शालाओं और मोहल्ला क्लीनिक की सेवाएं नहीं लेता। बाद में अन्य राज्यों के चुनावों में भी ऐसे ही वायदों की शुरुआत हुई। किसी राजनीतिक दल ने इसे गारंटी का नाम दिया तो किसी ने कुछ और। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस ने मुफ्त सुविधाओं की जो गारंटियाँ  घोषणापत्र के जरिये दीं उनके कारण ही उसे वहाँ सफलता मिली। बाद में म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना प्रारंभ कर अंतिम छह माह में भाजपा के पक्ष में जबरदस्त लहर पैदा कर दी। लेकिन शोध का विषय है कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की राज्य सरकार द्वारा अंधाधुंध रेवड़ियां बांटे जाने के बाद भी भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को  मुफ्त राशन, रसोई गैस कनेक्शन और प्रधानमंत्री आवास योजना का भरपूर लाभ मिला वरना वह सत्ता से सत्ता से बाहर हो सकती थी। उसके बाद चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। उनमें झारखंड में हेमंत सोरेन और महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति सरकार की वापसी के लिए महिलाओं के लिए चुनाव के कुछ महीने पहले शुरू की गई लाड़ली बहना जैसी योजना को श्रेय मिला। उससे प्रभावित होकर श्री केजरीवाल ने दिल्ली में महिलाओं को 2100  रु प्रतिमाह देने का वायदा करने के साथ ही वृद्धों को भी हर माह निश्चित राशि देने और 25 लाख तक का मुफ्त इलाज निजी अस्पताल में करवाने जैसी रेवड़ियों की घोषणा कर दी। इसके अलावा मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों के लिए भी 18 हजार प्रतिमाह सम्मान निधि का वायदा कर दिया गया। जवाब में भाजपा और कांग्रेस ने भी महिलाओं को  2500 रु. हर माह देने के अलावा और भी बढ़ - चढ़कर वायदे कर डाले। हालांकि चुनाव में आम आदमी पार्टी सरकार  की शराब नीति, शीश महल   और  अधूरे वायदे भी मुद्दे हैं , जिनको लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों श्री केजरीवाल को घेर रही हैं । वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी इस बात का रोना रोते नहीं थक रही कि केंद्र सरकार ने उसे काम नहीं करने दिया। और भी बातें हो रही हैं किंतु चुनाव विश्लेषक ये मान रहे हैं कि फैसला रेवड़ियों से ही प्रभावित होगा। मसलन मुफ्त बिजली और पानी जैसी सुविधाओं का गरीब वर्ग में असर है। हालांकि नये वायदों को लेकर आम आदमी पार्टी पर ये आरोप भी लग रहे हैं कि पंजाब में उसने जिन रेवड़ियों का वायदा किया था वह पूरा नहीं किया। इसलिये उस पर भरोसा न किया जाए। इसी के साथ मतदाताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो मुफ्त खोरी को बढ़ावा देने वाली इन नीतियों को नापसंद करता है किंतु अब जबकि आम आदमी पार्टी के अलावा भाजपा और कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चल रही हैं तब किसे दोष दिया जाए ये समझ से परे है। सबसे बड़ी बात ये है कि अपनी नीतियों और कार्यक्रमों से मतदाताओं को आकर्षित करने की जगह मुफ्त उपहार बाँटकर चुनाव जीतने के इन तरीकों पर न तो चुनाव आयोग रोक लगा रहा है और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लेने की तकलीफ की। ऐसे में अब पूरा चुनाव इस बात पर आकर टिक गया है कि कौन सी पार्टी कितनी ज्यादा खैरात देगी। केजरीवाल सरकार ने यदि 10 सालों में बहुत अच्छा काम किया तब उस नई रेवड़ियां बांटने की जरूरत नहीं पड़ती। इसी तरह अपनी विफलताओं के लिए केंद्र सरकार को कसूरवार ठहराना भी बेमानी है क्योंकि  श्री केजरीवाल फिर सत्ता में आये तब भी उनका इसी  केंद्र सरकार से पाला पड़ेगा। ऐसा लगता है राजनीतिक दलों का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा चुका है। चूंकि वे पुराने वायदे पूरे नहीं कर पाते इसलिये वे रेवड़ियों के जरिये मतदाताओं को लुभाने के लिये नगद राशि का प्रलोभन देते हैं जो अनुचित भी है और अनैतिक भी।  चूंकि सभी राजनीतिक दलों का उद्देश्य किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना है इसलिये वे इसके विरोध में बोलने का साहस नहीं दिखा पाते। लेकिन इनके कारण सरकार का खजाना जिस तरह  खाली होता जा रहा है वह बड़े खतरे का कारण बन रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि रेवड़ियों का चलन समाज में वर्ग भेद उत्पन्न करने का कारण बन रहा है। जरूरतमंद लोगों की सहायता और संरक्षण सरकारों का दायित्व है किंतु इसकी आड़ में लोगों, विशेष रूप से युवाओं को अकर्मण्य बनाना किसी अपराध से कम नहीं। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 January 2025

ट्रम्प की दूसरी पारी में भारतीय हित सुरक्षित रहने की उम्मीद

आज रात  डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। यह उनका दूसरा कार्यकाल होगा।  गत वर्ष  उनके राष्ट्रपति चुने जाते ही पूरे विश्व में  जबरदस्त उत्सुकता देखने मिली क्योंकि  निवर्तमान राष्ट्रपति  बाइडेन का कार्यकाल अमेरिका सहित शेष विश्व के लिए भी निराशाजनक रहा। उन्होंने समस्याएं तो खूब पैदा कीं किंतु  समाधान नहीं निकाल पाए जिससे पूरी दुनिया हलाकान हुई। 2021 में जब वे राष्ट्रपति बने तब कोरोना की पहली लहर के दर्दनाक अनुभवों से विश्व के तमाम देश उबर ही रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आवागमन चौपट हो जाने से अनेक धन संपन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं चौपट हो चुकी थीं। ऐसे राष्ट्र  जिनकी अत्याधुनिक  चिकित्सा सुविधाओं के आकर्षण में विदेशी  इलाज करवाने आते थे, वे अपने नागरिकों की कोरोना से रक्षा करने में ही अक्षम साबित हुए। अमेरिका भी अपवाद नहीं रहा। 2021 में आई कोरोना की दूसरी लहर तो पहले से भी अधिक खतरनाक साबित हुई। लेकिन बतौर राष्ट्रपति बाइडेन कोरोना से बचाव का ऐसा कोई मॉडल दुनिया के समक्ष नहीं रख सके जो अपेक्षित था। कोरोना के कारण चीन के प्रति अविश्वास उत्पन्न होने से अमेरिका का महत्व बढ़ा। लेकिन बाइडेन ने बजाय बड़े भाई के तौर पर पेश आने के दुनिया भर में तनाव पैदा करने का कुचक्र रचा। यदि अमेरिका नहीं चाहता तो यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध इतना लंबा नहीं चलता। हमास और इजराइल के बीच भड़की लड़ाई में भी उसकी भूमिका भड़काऊ रही। यहाँ तक कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के भीतर  राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का हरसंभव प्रयास किया गया। जॉर्ज सोरोस नामक षडयंत्रकारी को संरक्षण देकर बाइडेन ने पूरी दुनिया में चुनी हुई सरकारों को गिराने या कमजोर करने का चक्रव्यूह रचा। यही वजह है कि जिन ट्रम्प को अमेरिका की जनता ने चार साल पहले राष्ट्रपति पद से हटा दिया इस बार उन्हीं को बागडोर सौंप दी। दरअसल ट्रम्प को मिले ऐतिहासिक बहुमत के पीछे बाइडेन के प्रति उपजा गुस्सा ही था जिसका खामियाजा कमला हैरिस ने भुगता। बाइडेन  न सिर्फ एक कमजोर राष्ट्रपति साबित हुए बल्कि उन्होंने अमेरिका को भी अंदर से बेहद कमजोर कर दिया। यूक्रेन संकट में उनकी अदूरदर्शितापूर्ण नीति ने अमेरिका समर्थक यूरोपियन देशों तक को खून के आँसू रुला दिये। भारत विरोधी खालिस्तानियों को प्रश्रय देकर बाइडेन ने आतंकवाद  को संरक्षण देने की हिमाकत तो की ही , उनके कार्यकाल में अमेरिकी संस्था हिँडनबर्ग ने भारत के प्रमुख उद्योगपति गौतम अदाणी के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बारे में भ्रामक रिपोर्ट सार्वजनिक कर  भारत में पूंजी लगाने वाले विदेशी निवेशकों को बिदकाने का दांव भी चला। पिछले लोकसभा चुनाव में भी बाइडेन पालित जॉर्ज सोरोस ने मोदी सरकार की वापसी रोकने के लिए विदेशी माध्यमों से दुष्प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके कार्यकाल में अमेरिकी एजेंसियों द्वारा अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का खेल रचा गया। लेकिन जिस चीन से अमेरिका को सबसे अधिक खतरा है, उसका वे कुछ न बिगाड़ सके। यूक्रेन को बेवजह रूस से भिड़वाकर उन्होंने इस देश को तो बरबादी की गहरी खाई में धकेला ही लेकिन उसका दुष्परिणाम भोगा यूरोप के देशों ने जो गैस के अभाव में मुसीबत में फंस गए। रूस पर लगाए गए प्रतिबंध भी पुतिन को रोकने में असमर्थ साबित हुए। कुल मिलाकर बाइडेन का जिक्र अमेरिका के बेहद कमजोर राष्ट्रपति के तौर पर होगा। लाॅस एंजिलिस में लगी आग को नियंत्रित करने में मिली विफलता ने उनकी विदाई को और भी फीका कर दिया। जहाँ तक बात ट्रम्प की है तो उनके प्रारंभिक तेवर देखकर ये आशंका जताई जा रही है कि भारतीय  वस्तुओं पर अधिक कर लगाने और वीज़ा नियमों को कड़ा करने की उनकी घोषणा का विपरीत असर  भारत पर पड़ेगा। लेकिन उनकी जीत में निर्णायक भूमिका निभाने वाले भारतीय समुदाय के दबाव के चलते भारत के प्रति नर्म रुख रखना उनकी मजबूरी होगी। चुनाव के दौरान भारत और हिंदुत्व के बारे में उनकी टिप्पणियां काफी कुछ कह गईं। हालांकि ट्रम्प थोड़े सनकी भी हैं लेकिन भारत के साथ उनके रिश्ते पहले भी प्रगाढ़ रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यक्तिगत तालमेल भी बेहतर है।  सबसे बड़ी बात ये है कि भारत के बड़े बाजार की उपेक्षा करना अमेरिका सहित किसी भी आर्थिक शक्ति के लिए संभव नहीं है। ट्रम्प  तो निजी तौर पर भारत में व्यवसाय भी करते रहे हैं। इस आधार पर ये उम्मीद  गलत नहीं है कि अमेरिका में  सत्ता परिवर्तन भारतीय हितों के अनुकूल माहौल बनाने में सहायक होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 January 2025

बाकी वर्गों की बेहतरी भी सरकार का दायित्व

  

केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा कर सरकारी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों और अधिकारियों को नये साल में खुश होने का अवसर प्रदान कर दिया। यदि सब कुछ ठीक - ठाक रहा तब 1 जनवरी 2026 से नया वेतनमान लागू हो जाएगा। 10 वर्ष बाद वेतन - भत्तों में समयानुकूल वृद्धि पूरी तरह न्यायोचित है। समाचार माध्यमों में नये वेतनमान को लेकर जो अनुमानित आंकड़े प्रकाशित हो रहे हैं उनके अनुसार  उसके लागू होते ही उपभोक्ता बाजार में रौनक बढ़ने से  अर्थव्यवस्था में गतिशीलता आयेगी। ये जानकारी भी मिल रही है कि सरकार का कर संग्रह भी बढ़ेगा क्योंकि कुछ नये लोग आयकर के दायरे में आयेंगे वहीं कुछ को उच्च स्लैब में आने के कारण पहले से अधिक आयकर चुकाना होगा। मोटे अनुमान के अनुसार नये वेतनमान से लाभान्वित होने वाले औसत कर्मचारियों की बढ़ी हुई  कमाई का एक चौथाई हिस्सा तो आयकर में चला जायेगा जिसे प्रत्यक्ष कर कहा जाता है । वहीं उसे परोक्ष तौर पर  जीएसटी जैसा कर भी चुकाना होगा। जिसकी दरों को लेकर मध्यम वर्ग पर पहले से ही काफी दबाव है।  दूसरा पहलू ये भी है कि शासकीय कर्मचारियों के वेतन - भत्ते बढ़ने की खबर आते ही बाजार को नियन्त्रित कर रही ताकतें अभी से कीमतों में वृद्धि की तैयारी करने लगी हैं। अर्थशास्त्र में मांग और पूर्ति  का जो सिद्धांत है उसका असर वेतनमान लागू होते ही नजर आने लगेगा। सीधे तौर पर कहें तो महंगाई भी छलांग मारे बिना नहीं रहेगी। ज़ाहिर है उद्योग - व्यापार जगत वेतन आयोग गठित होने की खबर से उतना ही प्रसन्न है जितना कि सरकारी कर्मचारी और अधिकारी क्योंकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से बाजार में पैसे की आवक बढ़ेगी।  लेकिन देश में सरकारी क्षेत्र के अलावा जो नौकरपेशा वर्ग है उसे महंगाई में वृद्धि का सामना करना पड़ेगा । दरअसल निजी क्षेत्र में कार्यरत बहुत बड़ा वर्ग है जिसके पास अपने अधिकारों के लिए वैसा दबाव बनाने की ताकत नहीं है जैसी सरकारी कर्मचारियों के श्रमिक संगठनों में। उदारीकरण के बाद श्रमिक कानूनों का प्रभाव भी पहले जैसा नहीं रहा।  निजी क्षेत्र में तो श्रमिक आंदोलन अतीत की बात हो चुकी है। अब तो  संविदा नियुक्ति की व्यवस्था को सरकारी क्षेत्र ने भी पूरे तौर पर अंगीकार कर लिया है । परिणामस्वरूप उसमें स्थायी कर्मचारियों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। रिक्त पड़े पदों को नहीं भरा जा रहा क्योंकि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्यों की उनके पास स्थापना  व्यय बढ़ाने की क्षमता नहीं है। पुरानी पेंशन बंद करने के पीछे भी यही कारण रहा। कुछ राज्यों ने चुनावी लाभ के लिए पुरानी पेंशन शुरू भी की किंतु उसके बोझ से उनकी कमर टूट रही है। सरकार ने अपना काम चलाने के लिए निजी क्षेत्र की सेवाएं लेने का तरीका भी खोज लिया है। ये बात पूरी तरह सही है कि  नया वेतन आयोग गठित करना सरकार की बाध्यता है लेकिन विरोधाभासी स्थिति ये है कि मौजूदा वेतन - भत्तों का बोझ ही उसके लिए असहनीय होता जा रहा है। ऐसे में स्थापना व्यय में होने वाली  वृद्धि के लिए संसाधन जुटाना बड़ी समस्या बनेगी। और ये भी कि सबका साथ, सबका विकास के नारे का तकाजा है कि सरकार  केवल अपने अमले की बेहतरी तक सीमित न रहते हुए ये भी सोचे कि  जो अन्य मध्यमवर्गीय तबका है उसकी आय बढ़ाने के लिए क्या किया जा सकता है? सरकार का कर  संग्रह लगातार जिस मात्रा मात्रा में  बढ़ रहा है उसे देखते हुए आगामी केंद्रीय बजट में  जीएसटी की दरें घटाने और आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 10 लाख किये जाने की नितांत आवश्यकता है। ऐसा किये बिना गैर सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों और  लघु तथा मध्यम वर्गीय कारोबारियों को राहत की बजाय महंगाई का बोझ सहना पड़ेगा। सरकार को ये बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि उसके अपने अमले के अतिरिक्त जो जनता है उसकी बेहतरी के उपाय करना भी उसकी जिम्मेदारी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 17 January 2025

इजराइल और हमास में युद्धविराम की सफलता संदेह के घेरे में



अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा   शपथ लेने के पहले इजराइल और हमास के बीच युद्ध विराम होने की खबर पूरी दुनिया के लिए राहत लेकर आई है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजराइल पर सैकड़ों मिसाइलें छोड़े जाने के साथ ही जमीनी हमला किया गया। इसमें बड़ी संख्या में इजराइली मारे गए वहीं सैकड़ों बंधक बना लिए गए।  जवाब में इजराइल ने हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिये। देखते - देखते  समूचा गाजा क्षेत्र मलबे  में परिवर्तित होता गया। बच्चों सहित  हजारों लोग मारे जा चुके हैं । गाजा को बिजली सहित अन्य चीजों की आपूर्ति भी चूंकि इजराइल के जरिये ही होती थी जिसके रुक जाने से लोग अभूतपूर्व संकट में फंस गए। संरासंघ के अलावा अनेक देशों ने वहाँ राहत सामग्री पहुंचाई किंतु उसका वितरण भी बड़ी समस्या बन गई। स्वास्थ्य सेवाएं भी चरमरा गईं। इजराइल की रणनीति गाजा को पूरी तरह बरबाद करने की थी जिसमें वह काफी हद तक सफल भी हुआ। हमास के ढांचे को भी उसने बुरी तरह तहस - नहस कर दिया। इसका जो दुष्परिणाम गाजा वासियों ने भोगा वह  दिल दहलाने वाला है। यद्यपि इसके लिए हमास ही जिम्मेदार है जिसने अकारण हमला किया।  उसके दस्तों ने इजराइल में घुसकर जिस  हैवानियत का प्रदर्शन किया उसका भी कोई  औचित्य नहीं  था।  चूंकि हमास द्वारा  इजराइल  की अभेद्य सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगाए जाने से नेतन्याहू की जबरदस्त किरकिरी हुई इसीलिए वे आर - पार  की जिद पकड़कर बैठ गए। गाजा से बड़ी संख्या में पलायन शुरू हुआ किंतु  पड़ोसी देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं। उधर लेबनान में सक्रिय हिजबुल्ला नामक आतंकवादी संगठन  ने भी हमास के समर्थन में इजराइल पर हमले का दुस्साहस किया जिसके बाद  एक और मोर्चा खुल गया। आशंका ये थी कि अमेरिका का घोर विरोधी ईरान भी इजराइल से भिड़ेगा किंतु उसके इरादों को नेतन्याहू के आक्रामक अंदाज ने ठंडा कर दिया। यद्यपि सवा साल तक लड़ाई चलने के बाद भी हमास ने घुटने नहीं टेके जो इजराइल के लिए भी चिंता का कारण बनता जा रहा था। दूसरी तरफ यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के कारण परेशान दुनिया के तमाम देश पश्चिम एशिया में लगातार खराब हो रहे हालातों से पस्त हो चुके थे। सही बात ये है कि  अवकाश लेने जा रहे अमेरिका के  राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ही उक्त दोनों युद्धों की पटकथा लिखी थी। यूक्रेन और रूस की जंग रुकवाने की कुव्वत तो उनकी थी नहीं क्योंकि रूसी राष्ट्रपति पुतिन झुकने को तैयार नहीं हैं। लेकिन इजराइल पर दबाव डालने में वे सक्षम थे। और फिर डोनाल्ड ट्रम्प  जिस तरह दोनों लड़ाईयां रुकवाने की बात कर रहे हैं उसके बाद बाइडेन ने श्रेय लेने के फेर में जाते - जाते युद्ध विराम करवाने की पहल की जिसके लिए हमास तो राजी था ही किंतु नेतन्याहू  भी अमेरिका के दबाव में न चाहते हुए भी रजामंद हो गए। सही बात ये है कि ज्यादातर इस्लामिक देश इजराइल से दोस्ताना कायम करने लालायित हो रहे हैं। सं.अरब अमीरात के बाद सऊदी अरब भी उससे बड़ा समझौता करने जा ही रहा था किंतु उसी बीच ईरान के उकसावे में हमास ने हमला कर तनाव पैदा कर दिया। अब जबकि युद्धविराम होने जा रहा है तब ये सवाल उठना स्वाभाविक  है कि क्या पश्चिम एशिया में  स्थायी शांति कायम हो सकेगी क्योंकि फिलीस्तीन की समस्या का समाधान नहीं होने तक शांति की बात सोचना बेमानी है। और ये भी सही है कि अमेरिका  इजराइल के जरिये अरब जगत में उथलपुथल मचाये रखने की नीति तब तक जारी रखेगा जब तक वहाँ उसके पैर पूरी तरह से न जम जाएं । स्मरणीय है हाल ही में सीरिया में रूस समर्थक असद की सत्ता पलट को जिन इस्लामिक आतँकवादी लड़ाकों ने अंजाम दिया वे मूलतः अमेरिका विरोधी थे किंतु  उनको वाशिंगटन की पूरी मदद मिली। ये देखते हुए युद्धविराम कितना सफल होगा ये कहना कठिन है। सीरिया को टुकड़े - टुकड़े करवाने की हालत तक पहुंचाने में रूस भी बराबर का दोषी है जो असद जैसे तानाशाह को संरक्षण देता रहा। कुल मिलाकर दुनिया में जहाँ भी युद्ध या आतंकवाद जैसे हालात हैं उनके लिए अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियाँ ही जिम्मेदार हैं जॊ अपने स्वार्थों की खातिर निर्दोषों का खून बहाने में तनिक भी नहीं हिचकतीं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 January 2025

क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस से दूर रहने की तैयारी में


हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव के बाद से ही इंडिया गठबंधन में  बिखराव के संकेत आने लगे थे। नेतृत्व परिवर्तन के मुद्दे पर जिस तरह से आवाजें उठीं उनसे ये लगने लगा कि राहुल गाँधी के प्रति अन्य दलों में अस्वीकृति का भाव बढ़ता ही जा रहा है। लोकसभा चुनाव के पहले तक एक - दो को छोड़कर गठबंधन में शामिल अधिकांश  दलों में उनको नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष का चेहरा मान लेने पर मौन स्वीकृति थी। सरकार बनाने पर  शायद उन्हें प्रधानमंत्री बनाये जाने पर भी कोई ऐतराज नहीं । हालांकि भाजपा स्पष्ट बहुमत से चूक गई किंतु  एनडीए के पास सरकार बनाने लायक संख्याबल था लिहाजा तीसरी बार श्री मोदी  प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। वहीं श्री गाँधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाये गए। शुरू - शुरू में  लगा कि अपनी बढ़ी हुई ताकत के साथ विपक्ष सरकार के सामने कदम - कदम पर अड़चनें पैदा करेगा किंतु जल्द ही गठबंधन में दरारें नजर आने लगीं। यद्यपि जम्मू - कश्मीर और झारखंड में भाजपा को सफलता नहीं मिल सकी परंतु हरियाणा में भाजपा और महाराष्ट्र में भाजपा की अगुआई वाली महायुति को भारी बहुमत मिलने से विपक्ष में जो निराशा उत्पन्न हुई उसका ठीकरा कांग्रेस पर फूटने लगा। हरियाणा में तो कांग्रेस ने  गठबंधन के सहयोगी दलों को घास तक नहीं डाली किंतु महाराष्ट्र में उनको भी सीटें दी गईं। हालांकि कांग्रेस  सबसे अधिक स्थानों पर चुनाव लड़ी। लेकिन महाविकास अगाड़ी नामक विपक्षी  मोर्चे का सफाया हो गया। कांग्रेस ने अपने इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया। इसका फौरी प्रभाव इंडिया गठबंधन की एकता पर नजर आया जब ममता बेनर्जी ने नेतृत्व परिवर्तन की मुहिम छेड़ दी जिसे ऐसे घटकों का समर्थन भी मिला जो श्री गाँधी में श्री मोदी का विकल्प देखने लगे थे। संसद के पिछले सत्र में भी विपक्ष के बीच मतभेद स्पष्ट नजर आये। ऐसी उम्मीद थी कि नया साल शुरू होने पर दरारें पाटने का प्रयास किया जाएगा किंतु कांग्रेस ने कोई पहल नहीं की। और तो और श्री गाँधी छुट्टियां मनाने विदेश निकल गए। अन्य दलों की ओर से साफ उलाहना दिया गया कि लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की एक भी बैठक नहीं हुई।  ये सफाई भी आने लगी कि उसका गठन केवल लोकसभा चुनाव के लिए हुआ था लिहाजा उसे खत्म कर देना चाहिए। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी द्वारा एक - दूसरे के विरुद्ध ताल ठोकने की स्थिति बन जाने से गठबंधन की टूटन खुलकर सामने आ गई। यहाँ तक भी ठीक था क्योंकि हरियाणा में भी दोनों अलग - अलग लड़े थे किंतु जब ममता बेनर्जी, अखिलेश  यादव और उद्धव ठाकरे ने भी आम आदमी पार्टी को खुलकर समर्थन देने की घोषणा की तब विभाजन स्पष्ट हो गया। आश्चर्य की बात ये है कि अभी तक कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उसे समर्थन देने वाले उक्त तीनों नेता इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं। लेकिन  राहुल ने विदेश से लौटते ही केजरीवाल की सरकार पर जिस प्रकार से तीखा हमला किया उसके बाद विपक्ष में बिखराव की संभावना और मजबूत हो गई। श्री केजरीवाल तो कांग्रेस पर सरे आम आरोप लगा रहे हैं कि वह भाजपा के साथ मिली हुई है। राजनीतिक विश्लेषक भी ये मान रहे हैं कि दिल्ली में कांग्रेस की बढ़त भाजपा की किस्मत खोल देगी। शुरू में ऐसा लगा कि कांग्रेस किसी भी स्थिति में भाजपा की जीत में मददगार बनने के आरोप से बचना चाह रही है। उसकी आक्रामकता में आई कमी से इसकी पुष्टि भी हुई किंतु राहुल ने मैदान में उतरते ही जिस तरह से आम आदमी पार्टी को कटघरे में खड़ा किया उससे लगने लगा कि वह श्री केजरीवाल की सत्ता में वापसी में सहायक बनने की  गलती नहीं दोहरायेगी  जिसका दुष्परिणाम  आज तक भोग रही है।  कांग्रेस को जानने वाले भी ये कहने लगे कि इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों के दबाव से पार्टी को मुक्त कराने की रणनीति के चलते ही राहुल ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोला है। उसे ये समझ में आ गया है कि उसकी मौजूदा स्थिति क्षेत्रीय दलों की वजह से ही बनी है। लेकिन इसकी भनक लगते ही इंडिया गठबंधन के सदस्यों द्वारा दिल्ली चुनाव के बाद बैठक बुलाकर कांग्रेस से छीनकर नेतृत्व किसी क्षेत्रीय दल के नेता के हाथ सौंपने के संकेत दिये जाने लगे हैं। इसके पीछे उनकी सोच ये है कि कांग्रेस खुद को मजबूत करे इसके पहले ही उसे किनारे लगा दिया जाए। जाहिर है ये स्थिति कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं होगी। कम से कम राहुल किसी भी सूरत में ममता या अखिलेश  जैसे किसी क्षेत्रीय छत्रप के नेतृत्व में काम करना पसंद नहीं करेंगे। क्या होगा ये पक्के तौर पर तो कहना फ़िलहाल संभव नहीं किंतु इंडिया गठबंधन अब कांग्रेस की छाया से निकलना चाह रहा है। उसमें शामिल क्षेत्रीय दलों को ये लगने लगा है कि उनके प्रभाव वाले राज्यों में उनके सहारे खड़े रहने वाली कांग्रेस बजाय आभार के रौब दिखाती है। ये सब देखते हुए दिल्ली चुनाव के बाद विपक्ष की एकता नये रूप में सामने आयेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 15 January 2025

दिल्ली में कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अभी तक भाजपा और आम आदमी पार्टी के बड़े नेता ही मोर्चे पर नजर आ रहे थे । कांग्रेस शुरुआत में तो बेहद हमलावर दिखी किंतु अचानक उसके सुर धीमे पड़ने लगे। हालांकि अरविंद केजरीवाल लगातार ये प्रचार कर रहे हैं कि इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस का गुप्त गठबंधन है। नववर्ष मनाने जब राहुल गाँधी विदेश चले गए तब ये बात जोरदारी से प्रचारित हुई कि कांग्रेस ने इस चुनाव में उन्हीं सीटों पर जोर लगाने की नीति अपनाई है जहाँ उसके लिए  तनिक भी गुंजाइश है। इसके पीछे सोच ये बताई गई  कि कांग्रेस यदि ज्यादा जोर लगायेगी तो उससे आम आदमी पार्टी को तो नुकसान होगा लेकिन उसका लाभ अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा उठा लेगी । राहुल की अनुपस्थिति से और भी चर्चाएं होने लगीं। दिल्ली के जो कांग्रेस नेता लंबे समय से आम आदमी पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए थे वे भी उच्च नेतृत्व के उदासीन और ढुलमुल रवैये से निराश और नाराज थे। ऐसे में इस आशंका को बल मिला कि बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं द्वारा कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया जाएगा। पार्टी हाईकमान में  उक्त आशय की खबरें पहुँचने से घबराहट फैली और उसी के बाद  तय किया गया कि कांग्रेस पूरी ताकत से मैदान में उतरेगी और अपना खोया हुआ जनाधार वापस लेने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा। इसका प्रमाण श्री गाँधी द्वारा दिल्ली के मुस्लिम इलाकों में आयोजित सभाओं में आम आदमी पार्टी पर ये आरोप लगाए जाने से मिला कि उसने मतदाताओं से किये वायदे पूरे नहीं किये । उन्होंने आम आदमी पार्टी के साथ ही भाजपा पर भी ऐसे ही आरोप लगाए। दिल्ली का ये चुनाव जैसा कि श्री केजरीवाल कहते भी हैं कांग्रेस के लिए अस्तित्व का सवाल बन गया है। उसका वोट प्रतिशत लगातार घटते जाने से उसके परंपरागत समर्थक तो निराश हैं ही संगठन से जुड़े नेता भी हौसला खोते जा रहे हैं। 2013 में पहली बार भाजपा को रोकने के लिए श्री केजरीवाल को सरकार बनाने हेतु समर्थन देने की ऐतिहासिक भूल का दुष्परिणाम ही है कि पार्टी विधानसभा में शून्य पर आ गई। सही बात तो यही है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस को रौंदकर ही दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई । लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व बने इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच याराना कायम हुआ जिसके तहत दिल्ली में दोनों मिलकर लड़े। हालांकि सफलता नहीं मिली और उसके फ़ौरन बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अकेले लड़ने का ऐलान करते हुए कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। रही - सही कसर पूरी हो गई हरियाणा में जहाँ उसने  उम्मीदवार उतारकर भाजपा विरोधी मतों के बंटवारे की स्थिति पैदा कर दी जिससे कांग्रेस का सत्ता प्राप्त करने का सपना चूर हो गया। दिल्ली के कांग्रेस नेताओं का हाईकमान  से यही कहना रहा है कि जब श्री केजरीवाल ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि उनकी पार्टी के मैदान में होने से हरियाणा में भाजपा को लाभ मिलेगा तब कांग्रेस भाजपा को रोकने के फेर में उनको मजबूत होने का अवसर क्यों दे? ये तर्क  वाजिब है क्योंकि भाजपा यदि दिल्ली में सत्ता से बाहर रही तब भी उसकी हैसियत और ताकत में अंतर नहीं आने वाला किंतु दिल्ली का दुर्ग यदि ढह गया तब श्री केजरीवाल के पैरों के नीचे से जमीन खिसकते न देर नहीं लगेगी क्योंकि दिल्ली ही उनकी शक्ति का स्रोत है। इन्हीं सब बातों पर विचार करने के बाद श्री गाँधी ने मैदान में उतरने का निर्णय लिया। हालांकि उन्होंने काफी देर कर दी किंतु जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर यदि कांग्रेस दिल्ली  में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए पूरा जोर लगा दे तो भले ही उसका लाभ भाजपा को मिले किंतु तब पार्टी के पास दिखाने के वोट बैंक रूपी पूंजी तो होगी ।  अन्यथा वर्तमान स्थिति तो दयनीयता का चरमोत्कर्ष है। इसके अलावा श्री गाँधी के अपने आभामंडल के लिए भी दिल्ली  में कांग्रेस का पहले से बेहतर प्रदर्शन जरूरी है क्योंकि इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दलों द्वारा बीते कुछ दिनों में जो बयानबाजी की गई उसका निशाना वही थे। हालांकि दिल्ली का दंगल ले देकर आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच ही है किंतु कांग्रेस के लिए ये अपना वजूद कायम रखने का आखिरी अवसर है। यदि उसका प्रदर्शन पिछले दो चुनावों जैसा ही रहा तब उसके साथ जो इक्का - दुक्का दल हैं वे भी पिंड छुड़ाकर चलते बनेंगे। चुनौती भाजपा के सामने भी कम नहीं है क्योंकि इस बार भी यदि वह सत्ता में नहीं आ सकी तब श्री केजरीवाल प्रधानमंत्री के विकल्प के तौर पर  उभरने में सफल हो जाएंगे और इंडिया गठबंधन भी ऱाहुल को छोड़ उनमें संभावनाएं तलाशने लगेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 January 2025

महाकुंभ : सनातन धर्म रूपी वट वृक्ष का विराट स्वरूप

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प्रयागराज में गंगा - यमुना के पवित्र संगम पर आयोजित महाकुंभ आज से प्रारंभ हो गया। पहले दिन ही 1 करोड़ श्रद्धालु पुण्य लाभ हेतु पहुँचे जिनमें अनेक देशों से आये लोग भी हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से  ग्रहों की वर्तमान  स्थिति 144 वर्षों बाद बनी जिसकी वजह से इस बार का कुम्भ विशेष माना जा रहा है। उ.प्र सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार लगभग सवा महीने चलने वाले इस आयोजन में 60 करोड़ लोगों के प्रयागराज पहुँचने की उम्मीद है। ठहरने के इंतजाम हर आर्थिक स्थिति के श्रद्धालुओं की क्षमतानुसार किये गए हैं। साधु, संन्यासियों और धर्मगुरुओं द्वारा संचालित अन्न क्षेत्र में प्रतिदिन लाखों लोगों को निःशुल्क भोजन प्रदान किया जावेगा । अनेक धार्मिक संस्थाएं एवं दानदाता भी श्रद्धालुओं के भोजन और आवास की व्यवस्था कर रहे हैं। समूचे मेला क्षेत्र की व्यवस्था इस तरह की गई है जिससे विशेष स्नान वाले दिनों में   करोड़ों लोगों के जमा होने पर भी किसी प्रकार की समस्या न खड़ी हो। उ.प्र की पुलिस और प्रशासन के लिए महाकुंभ बड़ी चुनौती है। देश से ही नहीं अपितु पूरी दुनिया से सनातन धर्म में आस्था रखने वाले  प्रयागराज में पुण्य स्नान हेतु आयेंगे । लेकिन उनके अलावा विभिन्न देशों के लाखों लोग महाकुंभ की भव्यता, भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता का प्रत्यक्ष दर्शन करने पहुंचेंगे।   दुनियाँ भर के प्रबंधन संस्थानों के शोधार्थी महाकुंभ की व्यवस्था का अध्ययन करने आ चुके हैं। पूरे विश्व के समाचार माध्यम प्रयागराज में डेरा जमाए हुए हैं। महाकुंभ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके साथ जुड़े पौराणिक प्रसंग से अलग हटकर देखें तो भी यह आयोजन भारत की एकता और सनातन धर्म के प्रति जनमानस में आस्था का जीवंत प्रमाण है।  भाषा, प्रांत और जीवन शैली की विभिन्नताएं यहाँ आकर  वैसे ही विलुप्त हो जाती हैं जैसे गंगा - यमुना में आकर मिलने वाली  सरस्वती नदी अदृश्य है। यद्यपि कुछ लोग महाकुंभ को लेकर भी अपनी नकारात्मक सोच का परिचय देने से बाज नहीं आ रहे। भीम आर्मी के संस्थापक सांसद चंद्रशेखर आजाद का कहना है जिसने पाप किये हों वे महाकुंभ में डुबकी लगाने जाएं। कुंठित प्रवृत्ति के कुछ सनातन विरोधियों ने साधु - संतों के बारे में अनर्गल बातें प्रचारित करने की मुहिम छेड़ रखी है। भारत की प्राचीनता और आध्यात्मिक विचारधारा को कपोल -  कल्पित मानने वाले पूर्वाग्रही भी अपनी कुंठा निकालने में जुटे हुए हैं। जिन लोगों को हिन्दू और हिंदुत्व शब्द से ही चिढ़ है वे महाकुंभ के चलते चैन से नहीं सो सकेंगे क्योंकि बीते कुछ वर्षों में सनातन संस्कृति के प्रति आस्था में जो वृद्धि हुई उसके परिणामस्वरूप हिंदुत्व  केंद्र में आ गया है। ये कहना भी गलत नहीं है कि राजनीति हिंदुत्व समर्थक और विरोधी नामक दो ध्रुवों में बंट गई है। हालांकि सनातन और हिंदुत्व भारत की आत्मा हैं किंतु विगत तीन दशकों में जो स्वस्फूर्त उत्साह हिंदुत्व को लेकर देखने मिला वह 21 वीं सदी में भारत के स्वर्णिम भविष्य का शंखनाद है। हिन्दू समाज को जातियों के नाम पर विभाजित कर अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने वाली ताकतों को महाकुंभ आकर देखना  चाहिए कि सनातन संस्कृति हिन्दू समाज को किस तरह एकजुट रखने में सक्षम है। इस विराट समागम में  ऊंच - नीच, अगड़ा - पिछड़ा, अमीर - गरीब जैसे संबोधन गुम होकर रह जाते हैं। देश के कोने - कोने में भारत की आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत रखने में जुटे असंख्य साधु, संत, पंडित, पुरोहित, महंत, महामंडलेश्वर और जगद्गुरु के पद पर विराजमान विभूतियों का महाकुंभ में एकत्रीकरण सनातन धर्म रूपी वट वृक्ष के विराट स्वरूप को समूचे विश्व के समक्ष प्रस्तुत करता है। धर्म संसद के जरिये सनातन धर्म के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने की कार्य योजना भी महाकुंभ में तय की जाती है। इस वर्ष का महाकुंभ अनेक विशिष्टताओं को अपने आप में समेटे हुए है। वैश्विक परिस्थितियों में आ रहे तेज बदलाव और उनमें भारत की सक्रिय भूमिका के कारण पूरे विश्व में भारत के प्रति सम्मान बढ़ा है। दुनिया के हर हिस्से में भारतीय समुदाय की प्रभावशाली उपस्थिति उत्साहित करने वाली है। महाकुंभ में अप्रवासी भारतवंशी बड़ी संख्या में आने वाले हैं। उनके साथ वे बच्चे भी इसकी भव्यता का दर्शन करेंगे जिनका जन्म और परवरिश वहीं के माहौल में हुई। भारत को सपेरों और मदारियों का देश प्रचारित किये जाने वाले दिन अतीत की गर्त में समा चुके हैं। यह महाकुंभ 21 वीं सदी के उस भारत  से साक्षात्कार करवाएगा जो आधुनिक ज्ञान - विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने के साथ ही अपनी मौलिकता से जुड़ा हुआ है और जिसको अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर गर्व है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 January 2025

विपक्षी एकता में दरार का ठीकरा राहुल पर फूट रहा

लोकसभा चुनाव के पूर्व जब नये  विपक्षी गठबंधन की शुरुआत हुई तब कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के सुझाव पर उसका नाम Indian National Developmental Inclusive Alliance  रखा गया जो  इंडिया नाम से प्रचलित हुआ। गठबंधन में 26 दलों के शामिल होने से  लगा कि वह नरेंद्र मोदी को तीसरी पारी खेलने से रोकने में कामयाब हो जायेगा किंतु पूरी ताकत लगाने के बाद भी वह श्री मोदी को न रोक सका। यद्यपि उनकी जीत में 2014 और 2019 वाली चमक नहीं थी।  400 पार का नारा 300 से नीचे अटक गया। भाजपा भी घटकर 240 पर आ गई। उस परिणाम ने विपक्ष के हौसले बुलंद कर दिये। उसकी आक्रामकता में जबरदस्त वृद्धि देखने मिली। मोदी सरकार के जल्द गिरने के दावे होने लगे। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर और तीखे हमले करने लगे। वहीं भाजपा पूरी तरह रक्षात्मक दिखने लगी। लोकसभा चुनाव के  परिणाम उसकी समझ से बाहर थे।  चंद्रा बाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु  इंडिया गठबन्धन एक बड़ी ताकत के रूप में खड़ा हो गया। संसद में भाजपा के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल लगने लगा। वक्फ संशोधन और एक देश एक चुनाव जैसे विधेयक इसीलिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजने पड़े। अदाणी और संविधान के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार पर हावी रही।  इसी बीच जम्मू -  कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के चुनाव आ गए। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्ष दोनों में जीत के प्रति आश्वस्त था। लेकिन भाजपा ने जहाँ जम्मू - कश्मीर में अपनी संख्या  कई गुना बढ़ाई वहीं हरियाणा में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए तीसरी बार सरकार बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया। कांग्रेस के लिए ये बहुत बड़ा झटका था क्योंकि जम्मू - कश्मीर में वह कुछ खास न कर सकी और हरियाणा में  बुरी तरह चित्त हो गई। इन नतीजों से इंडिया गठबंधन में दरार उत्पन्न होने लगी।  राहुल की क्षमता पर सवाल उठने लगे किंतु महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव सामने होने से मतभेदों पर पर्दा डालकर रखा गया। झारखंड में तो हेमंत सोरेन सरकार बचा ले गए किंतु महाराष्ट्र में भाजपा ने तो धमाकेदार प्रदर्शन किया ही उसकी सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) और एनसीपी ( अजीत) ने भी जबरदस्त कामयाबी हासिल कर विपक्षी गठबंधन की कमर तोड़कर रख दी। इस परिणाम ने एक साथ  राहुल, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को जोरदार चोट पहुंचाई। लेकिन ठीकरा फूटने लगा श्री गाँधी के सिर पर। ममता बैनर्जी ने नेतृत्व परिवर्तन की आवाज उठा दी जिसे शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और लालू यादव का समर्थन मिलने से  गठबंधन की एकता पर खतरा मंडराने लगा। इसी बीच दिल्ली के चुनाव आ गए जिसमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच तलवारें खिंचने से रही - सही कसर भी पूरी हो गई। ममता, अखिलेश और उद्धव ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर राहुल  के विरुद्ध खुली बगावत का संदेश दे दिया।  उधर उमर अब्दुल्ला ने इंडिया गठबंधन के निष्क्रिय होने की बात कहते हुए लोकसभा चुनाव के बाद उसकी बैठक न होने का मुद्दा छेड़ दिया। उनकी बात को उद्धव के दाहिने हाथ संजय राउत ने आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस को आगाह किया कि यही हालत रही तो गठबंधन  की इतिश्री हो जायेगी और दोबारा उसका गठन नामुमकिन होगा। चौंकाने वाली बात ये है कि जो  राहुल गाँधी गठबंधन के घटक दलों के निशाने पर हैं उनका कोई अता - पता नहीं है। 2024 खत्म होने के पहले ही वे नववर्ष मनाने विदेश चले गए। वे लौटे या नहीं इसकी कोई जानकारी किसी के पास नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपनी मर्जी से कुछ बोलने की हैसियत नहीं रखते। सोनिया गाँधी अस्वस्थता के कारण परिदृश्य से बाहर होती जा रही हैं। चूँकि श्री गाँधी ही कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं इसलिये सारे निर्णय और अपेक्षाएं उन्हीं पर केंद्रित हैं। दिल्ली चुनाव की शुरुआत में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के विरुद्ध जो तीखे तेवर दिखाये वे अचानक ठंडे पड़ने लगे। कहा जा रहा है इसके पीछे राहुल का ही हाथ है क्योंकि उनको डर है कि अरविंद केजरीवाल कहीं गाँधी परिवार के विरुद्ध मोर्चा न खोल दें। लेकिन न सिर्फ इंडिया गठबंधन में शामिल अनेक पार्टियां अपितु कांग्रेस के भीतर भी श्री गाँधी की उदासीनता को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी कहने लगे हैं कि उनसे तो सोनिया जी  बेहतर थी जिन्होंने लंबे समय तक यूपीए को एकजुट रखा। ये बात कई विपक्षी नेता कह चुके हैं कि इंडिया गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव तक ही था लेकिन न तो श्री गाँधी और न ही कांग्रेस का कोई नेता समूचे विवाद में प्रतिक्रिया दे रहा है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि गठबंधन का नामकरण करने वाले राहुल ही उसके विघटन के कारण बन रहे हैं और  विपक्षी एकता का यह प्रयोग भी विफल होने के कगार पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 10 January 2025

लॉस एंजिलिस की आग हमारे लिए चेतावनी


1974 में टावरिंग इन्फर्नो  नामक अमेरिकी  फिल्म ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। जॉन गुइलेरमिन द्वारा निर्देशित उस फिल्म के निर्माता  इरविन एलन थे। एक गगनचुंबी बहुमंजिला इमारत में आग लगने के बाद किये गए बचाव कार्यों का बड़ा ही रोमांचित करने वाला चित्रण उस फिल्म में था। तकनीक के बेहतरीन प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हालीवुड की वह फिल्म ढेर सारे ऑस्कर अवार्ड जीतकर कालजयी बन गई। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए वह फिल्म एक मार्गदर्शक कहलाई। उससे प्रेरित होकर अनेक देशों में आपदा आधारित फिल्में बनीं जिनमें भारत की बर्निंग ट्रेन भी थी। हालांकि दर्शकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी फिल्मों में भी नाटकीयता भरी जाती है किंतु देखने में आया है कि अक्सर  पथकथा लेखक की काल्पनिकता कालांतर में वास्तविकता बन जाती है । विगत कुछ दिनों से अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य के लॉस एंजिलिस शहर और उसके इर्द - गिर्द लगी भीषण आग ने अग्निकांड आधारित कहानियों को  वास्तविकता में बदल दिया है। आग की लपटें हालीवुड के फिल्मी क्षेत्र तक जा पहुंची हैं। लॉस एंजिलिस अमेरिका के बेहद महंगे शहरों में गिना जाता है। फिल्मी सितारों के अलावा तमाम धनकुबेर इस शहर में रहते हैं। अमेरिका की वर्तमान उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का निवास भी यहीं है। आग जिस तरह फैल रही है उसकी वजह से अनेक नामी - गिरामी फिल्मी सितारों तथा अन्य हस्तियों के महलनुमा घर जलकर राख हो गए। आग बुझाने के लिए हेलीकाप्टर और अन्य अग्नि शमन साधनों का उपयोग किया जा रहा है किंतु उसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। हालात बेकाबू हो चुके हैं। जिन संस्थानों के जिम्मे आग बुझाने का दायित्व है वे संसाधनों के अभाव का रोना रो रहे हैं। 10 दिन बाद राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने जा रहे डोनाल्ड ट्रम्प ने निवर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन पर इसका ठीकरा फोड़ते हुए आपदा प्रबंधन की दयनीय स्थिति का पर्दाफाश किया। साथ ही कैलीफोर्निया राज्य के गवर्नर पर भी गुस्सा व्यक्त किया है। स्मरणीय है अमेरिका का यह राज्य निकटवर्ती जंगलों में लगने वाली आग के कारण लंबे समय से परेशानी झेल रहा है।  जंगलों में पतझड़ के बाद सूखे पत्तों में आग से उठने वाला धुंआ शहरों के आसमान में फैलकर वातावरण को प्रदूषित करता है लेकिन इस बार बात धुएं से आगे बढ़कर आग तक जा पहुंची जिसके कारण हजारों मकान भस्म हो चुके हैं। लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। आग जिस तरह फैलती जा रही है उसे देखकर अग्नि शमन के काम में लगीं एजेंसियां असहाय नजर आ रही  हैं। ये दशा उस देश की है जो विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है। तकनीक के मामले में भी वह दुनिया का सिरमौर है। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के सामने उसकी लाचारी समय - समय पर उजागर होती रही है। कभी समुद्री चक्रवात उसके तटवर्ती शहरों में जल प्रलय के हालात पैदा कर देते हैं तो कभी बर्फबारी से जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। ये देश दुनिया भर को तकनीक निर्यात करता है। इसे अपनी साधन संपन्नता पर बड़ा घमंड है। भारत सहित विकासशील  देशों के युवाओं का सपना अमेरिका में बसने का होता है। वहाँ की सुरक्षित और  सुविधा संपन्न  जीवन शैली आकर्षण का प्रमुख कारण है। लेकिन लॉस एंजिलिस का ताजा अग्निकांड साबित कर रहा है कि ज्ञान - विज्ञान के अनंत आकाश छू लेने के बाद भी प्रकृति के कोप से बचने की सामर्थ्य  इंसान पैदा नहीं कर सका। भारत को  अमेरिका में आई इस आपदा से सतर्क होकर अपने आपदा प्रबंधों को दुरुस्त करने  की सख्त जरूरत है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में अनेक अग्निकांड ऐसे हुए जिनका सामना करने वाली व्यवस्था अपर्याप्त भी थी और घटिया भी। कुछ अस्पतालों में लगी आग में घिरकर वहाँ भर्ती अनेक मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ा जिनमें बच्चे भी काफी थे। जाँच में पाया गया कि आग बुझाने हेतु की गई व्यवस्था समय पर धोख़ा दे गई। म.प्र की राजधानी भोपाल स्थित सचिवालय भवन में लगी आग को बमुश्किल बुझाया गया वह भी सेना की मदद से। ये देखते हुए भारत में आपदा प्रबन्धन की जो भी व्यवस्थाएं हैं उनकी समीक्षा आवश्यक है। हमारे देश के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में आग से प्रतिवर्ष करोड़ों की वन संपदा की क्षति के साथ ही वन्य प्राणियों की भी मौत होती है। ऐसी आग को रोकने में संबंधित महकमा कितना सफल होता है ये किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में बनी टावरिंग इन्फर्नो नामक फिल्म तो कल्पना पर आधारित थी किंतु लॉस एंजिलिस में लगी आग हकीकत है जिससे सबक लेना भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि जब अमेरिका उस आपदा के सामने असहाय है तब हम अपनी स्थिति का आकलन आसानी से कर सकते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 9 January 2025

कांग्रेस मुक्त विपक्ष की संभावना बढ़ रही


कांग्रेस की इससे ज्यादा किरकिरी और क्या होगी कि जो  इंडिया गठबंधन उसकी अगुआई में बना और लोकसभा चुनाव में जिसके कारण भाजपा अपने बलबूते  स्पष्ट बहुमत हासिल करने से वंचित रह गई उसी के घटक उसको ठेंगा दिखाने लगे हैं। महाराष्ट्र में  जबरदस्त पराजय के बाद गठबंधन के नेतृत्व परिवर्तन की मांग को  कांग्रेस ने जिस प्रकार उपेक्षित किया उसका असर गत दिवस दिखाई दिया जब  ममता बैनर्जी ,  अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में  आम आदमी पार्टी का समर्थन करने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि भाजपा को वही हरा सकती है। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत के ये कहने पर कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी कांग्रेस की विरोधी है, प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अरविंद केजरीवाल ने अपना ये आरोप दोहराया कि कांग्रेस का भाजपा से गुप्त गठजोड़ है इसीलिए वह भाजपा की बजाय आम आदमी पार्टी को अपना विरोधी बता रही है। उधर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के नेता तेजस्वी ने इंडिया गठबंधन के बिखरने संबंधी सवाल पर कहा कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि वह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए ही बना था। वैसे भी उसमें दरार तो हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान ही आ गई थी जब कांग्रेस ने सपा और आम आदमी पार्टी का लिए एक भी सीट छोड़ने से दो टूक इंकार कर दिया।  लोकसभा चुनाव में 10 में से 5 सीटें जीतने से वह आत्मविश्वास  से भरी थी  किंतु  उसके मंसूबे धरे रह गए और भाजपा ने तीसरी बार सरकार बना ली । उस परिणाम पर अखिलेश और उद्धव की शिवसेना ने खुलकर कहा कि कांग्रेस अपने बलबूते चुनाव जीतने की क्षमता खो चुकी है। यद्यपि महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन कायम रहा किंतु परिणाम आते ही कांग्रेस पर फिर हमले शुरू हो गए। लेकिन इस बार निशाना बने राहुल गाँधी जो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद गठबंधन के स्वयंभू नेता बन बैठे थे। ममता बैनर्जी तो श्री गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर शुरू से ही सवाल उठाती आ रही थीं किंतु अखिलेश और उद्धव के बाद जब लालू ने भी उनका समर्थन कर दिया तब कांग्रेस को सतर्क हो जाना चाहिए था जबकि वह  नेतृत्व संबंधी अपने दावे के औचित्य को सिद्ध करने में ही लगी रही। यदि राहुल उक्त नेताओं से बात करते तब उनका गुस्सा ठंडा हो सकता था किंतु वे अदाणी के मुद्दे से ही चिपके रहे जिससे ज्यादातर विपक्षी दल किनारा कर चुके हैं। महाराष्ट्र चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाई जाती तब भी काफी विवाद सुलझाये जा सकते थे किंतु श्री गाँधी ने कोई पहल नहीं की। उनका ग़ैर जिम्मेदाराना रवैया जम्मू कश्मीर के चुनाव में ही दिख गया था जिसकी उनके सहयोगी उमर अब्दुल्ला ने बीच चुनाव ही आलोचना कर डाली। महाराष्ट्र चुनाव में भी वे ज्यादा सक्रिय  नहीं  रहे और  पूरा जोर वायनाड में प्रियंका वाड्रा को जितवाने में लगाया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी निश्चित रूप से बड़ी क्षेत्रीय शक्ति है। ऐसे में कांग्रेस को गठबंधन धर्म का पालन करते हुए ठीक उसी तरह उसका नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए था जिसकी अपेक्षा वह अपने प्रभाव वाले राज्यों में गठबंधन के अन्य दलों से करती है। बहरहाल दिल्ली के चुनाव में ममता, अखिलेश और उद्धव  द्वारा आम आदमी पार्टी का खुलकर समर्थन करने पर कहा जा सकता है कि  इंडिया गठबंधन के समाप्त होने के दिन आ गए। यदि उसका अस्तित्व बना  रहा तब भी  उस पर कांग्रेस का प्रभुत्व  संभव नहीं होगा। इसके लिए दोषी श्री गाँधी ही माने जायेंगे जो  राजपरिवार की मानसिकता से बाहर ही नहीं निकल पा रहे। इंडिया गठबंधन में एक - दो को छोड़कर बाकी के नेताओं की जमीन उनकी बनाई हुई है। ममता , लालू, केजरीवाल की ताकत के पीछे उनकी मेहनत है। अखिलेश भले ही पिता की  वजह से आगे आये लेकिन उनके न रहने के बावजूद अपना प्रभाव बनाये हुए हैं।  इस सबसे लगता है कांग्रेस मुक्त  विपक्ष की स्थिति बन सकती है। आम आदमी पार्टी द्वारा कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाले जाने की मांग के बाद ममता, अखिलेश और उद्धव का दिल्ली चुनाव में श्री केजरीवाल के  समर्थन का ऐलान किसी नई राजनीतिक पटकथा की भूमिका कही जा सकती है। तेजस्वी का ये कहना भी काबिले गौर है कि इंडिया गठबंधन तो केवल लोकसभा चुनाव तक था। इसका आशय ये कि  बिहार विधानसभा के चुनाव में राजद द्वारा कांग्रेस को झटका दिया जा सकता है। इससे तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म की संभावना भी बढ़ रही हैं। दिल्ली के दंगल में कांग्रेस अपने मतों में  यदि 10 फीसदी वृद्धि कर सकी तब  आम आदमी पार्टी  सत्ता से भले बाहर आ जाए किंतु सेहरा भाजपा के सिर पर होगा। और यदि ये हुआ तब कांग्रेस के भीतर ही  न सिर्फ राहुल बल्कि गाँधी परिवार के विरुद्ध भी बगावत हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 January 2025

दिल्ली का चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण



दिल्ली विधानसभा  चुनाव की तिथि घोषित हो गई। हालाँकि चुनाव प्रचार काफी पहले से शुरू हो  चुका है। आम आदमी पार्टी ने तो लोकसभा चुनाव के फौरन बाद ही अकेले लड़ने की घोषणा कर दी थी। हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा एक भी सीट न दिये जाने  के बाद दोनों के बीच पूरी तरह से अलगाव हो गया। हालाँकि दिल्ली के कांग्रेस नेताओं को अरविंद केजरीवाल का साथ कभी रास नहीं आया। आम आदमी पार्टी बनने के बाद श्री केजरीवाल ने गाँधी परिवार सहित कांग्रेस के अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए वे पार्टी को सदैव कचोटते रहे।  उल्लेखनीय है कि जिस शराब घोटाले के कारण मनीष  सिसौदिया और श्री केजरीवाल को जेल जाना पड़ा उसकी शिकायत उपराज्यपाल से कांग्रेस ने ही की थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को रोकने बने इंडिया गठबंधन में जब आम आदमी पार्टी भी शामिल हो गई तब स्थानीय नेता मन मसोसकर रह गये। श्री केजरीवाल के जेल में रहने के दौरान दिल्ली में गठबंधन की जो रैली हुई उसमें उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल को सोनिया गाँधी के साथ बिठाया गया। बाद में लोकसभा चुनाव भी दोनों पार्टियों ने मिलकर लड़ा किंतु एक भी सीट नहीं मिली। उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब  रहने से इंडिया गठबंधन में राहुल गाँधी के नेतृत्व के विरोध में आवाजें उठने लगीं। इसकी मुहिम ममता बैनर्जी ने शुरू की जिसे शिवसेना ( उद्धव ) , लालू प्रसाद यादव और सपा का समर्थन मिलने से कांग्रेस के लिए शर्मनाक स्थिति बन गई। संसद के शीतकालीन सत्र में भी विपक्ष का बिखराव खुलकर सामने आया जिसका कारण  श्री गाँधी की कार्यशैली ही रही। खुद को श्री मोदी  का विकल्प मान लेने की उनकी खुशफहमी बाकी विपक्षी नेताओं को नागवार गुजरने लगी। इसीलिए अदाणी मुद्दे पर एक - दो को छोड़कर बाकी दलों ने कांग्रेस से दूरी बना ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय के बाद विपक्षी एकता की गुंजाइश तो पहले ही खत्म हो चुकी थी। बाकी कसर पूरी कर दी कांग्रेस द्वारा गठबंधन के साथियों से सलाह किये बिना चुनाव में उतरने से। पार्टी के वरिष्ट नेता अजय माकन द्वारा श्री केजरीवाल को  एंटी नेशनल ( देश विरोधी) कहे जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने तो कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाल बाहर करने तक की मांग कर डाली। कांग्रेस  इस चुनाव में जिस हौसले के साथ उतरी उससे लगा था कि वह अपनी खोई जमीन वापिस लेने में कामयाब हो जायेगी। उल्लेखनीय है  विधानसभा चुनावों में लुटिया डुबोने के बावजूद भी  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से ज्यादा मत प्राप्त हुए थे। लेकिन 2013 में दिल्ली की सरकार गंवाने के बाद भाजपा को रोकने के लिए श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने हेतु समर्थन देकर कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की जो गलती की उससे वह आज तक उबर नहीं पाई। शीला दीक्षित के बाद कोई ऐसा चेहरा उसके पास नहीं है जो मतदाताओं को आकर्षित कर सके।  और जिन राहुल के दम पर पार्टी अपने स्वर्णिम दिनों को पुनर्जीवित करना चाह रही है उन्होंने दिल्ली का दंगल छोड़ विदेश जाकर नया साल मनाने को प्राथमिकता दी और वह भी पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन के फ़ौरन बाद। जिसे लेकर उनकी चौतरफा आलोचना हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद श्री गाँधी पार्टी की उम्मीदों के केंद्र हैं। जब श्री केजरीवाल दिल्ली की गली - गली में घूमकर प्रचार में जुटे हुए हैं और प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भाजपा की तरफ से मोर्चा संभाल लिया तब कांग्रेस के शीर्ष नेता का युद्धभूमि से दूर चला जाना बेहद गैर जिम्मेदाराना कदम  माना जा रहा है। जबकि ये चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस  के लिए महत्वपूर्ण है। दिल्ली में सत्ता हासिल करना तो उसके लिए नामुमकिन है लेकिन यदि वह पिछले चुनावों की तरह ही चारों खाने चित्त हुई तब नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव में लालू यादव एंड कं उन्हें कितना भाव देगी ये सोचने वाली बात है। प. बंगाल में ममता तो कांग्रेस को कुछ समझती ही नहीं हैं। ये सब देखते हुए अपेक्षा थी कि न सिर्फ राहुल बल्कि प्रियंका वाड्रा भी पार्टी की नैया डूबने से बचाने आगे आयेंगी। लेकिन अब तक जो देखने मिला उसके अनुसार कांग्रेस का प्रथम परिवार   अपने आप में मगन है। चुनाव में जय - पराजय होती रहती है किंतु योद्धा वह होता है जो पूरी हिम्मत से लड़े। आम आदमी पार्टी और भाजपा के  दिग्गज तो बिना समय गंवाए मैदान में उतर आये जबकि कांग्रेस  के प्रमुख सेनापति नये साल के जश्न की खुमारी से निकल नहीं पा रहे। ऐसे में उसका क्या हश्र होगा उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता पर तो हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे पानी फेर ही चुके हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 January 2025

सनातन के बाद तमिलनाडु में राष्ट्रगान का भी अपमान


दक्षिण के राज्यों में उत्तर भारत और हिन्दी के प्रति यदि सबसे अधिक नफरत कहीं है तो वह तमिलनाडु है। वहाँ इस बात को भी प्रचारित किया जाता रहा है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़ हैं जबकि आर्य विदेशों से आये थे। आजादी के बाद से ही वहाँ उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध में वातावरण बनाया जाने लगा। रामास्वामी पेरियार ने उच्च जातियों के विरुद्ध आंदोलन चलाकर जिस नास्तिकतावाद को द्रविड़ आंदोलन की शक्ल में आगे बढ़ाया कालांतर में इस राज्य की राजनीति उसी में उलझकर रह गई। द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) से शुरू उस राजनीतिक धारा को यद्यपि आगे चलकर  एम.जी.रामचंद्रन ने (अद्रमुक) अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बनाकर  दो हिस्सों में बांट दिया। उसमें से भी छोटी - छोटी कुछ धाराएं और निकलीं किंतु मुख्य रूप से द्रमुक और अद्रमुक ही बारी - बारी से राज करते रहे। संघीय ढांचे के कारण तमिलनाडु को भी  केंद्र से रिश्ते रखने पड़ते हैं और इसी वजह से दोनों द्रविड़ पार्टियां केंद्र  में बनी गठबंधन सरकारों से जुड़ती रहीं किंतु उनका दृष्टिकोण सदैव  राष्ट्रीय हितों से परे द्रविड़ अस्मिता से प्रेरित और प्रभावित रहा। इसके चलते उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं किया। ये दुर्भाग्य ही है कि मुख्यधारा से अलग चलने के बावजूद इन दोनों पार्टियों के दबाव को कांग्रेस और भाजपा दोनों सहती आ रही हैं। राजीव गाँधी की हत्या के आरोप से घिरी द्रमुक  के साथ कांग्रेस का गठबंधन है जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अकारण गिरवा देने वाली अद्रमुक से बाद में भाजपा  ने गठबंधन कर लिया। केंद्र पर दबाव डालकर अपने राज्य के लिए अधिकाधिक  संसाधन या अन्य सुविधा हासिल करने में तो दक्षिण के सभी राज्यों का रवैया एक जैसा रहा है किंतु तमिलनाडु जैसी अलगाव की भावना उनमें नहीं है। श्रीलंका में चले तमिल इलम आंदोलन को द्रमुक का खुला समर्थन था। ये कहना भी गलत नहीं है कि तमिलनाडु को अलग देश बनाने का सपना स्व. करुणानिधि देखने लगे थे। हालांकि वह साकार नहीं हो सका , लेकिन अलगाववाद रूपी ज़हर के बीज समय - समय पर अंकुरित होते रहे हैं। कभी कोई नेता हिन्दी लादने पर भारत से अलग होने की धमकी देता है तो कोई सनातन को नष्ट करने का आह्वान करने की हिमाकत कर बैठता है। सरकार में बैठते समय भारत के संविधान की शपथ लेने वाले तमिलनाडु के राजनेता उसकी धज्जियां उड़ाने की धृष्टता गाहे - बगाहे करते रहते हैं। हालांकि तमिलनाडु के लाखों लोग देश के अन्य राज्यों में बस गए हैं। वहाँ उनके साथ कभी भेदभाव नहीं हुआ और न ही उन्होंने हिन्दी के प्रति कभी कोई शिकायत की। उत्तर भारत के सस्थानों से हिन्दी में उपाधि अर्जित कर सैकड़ों तमिलभाषी केंद्रीय विभागों में राजभाषा अधिकारी बन गए। ये सब देखकर लगता है कि तमिलनाडु में हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान तीनों को लेकर जो विषवमन किया जाता है उसके पीछे वह राष्ट्रविरोधी सोच ही है जो स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की स्थापना की पक्षधर है। इसका ताजा उदाहरण है गत दिवस राज्य विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण के अवसर पर राष्ट्रगान की बजाय तमिलनाडु का राज्य गान गाया जाना। परंपरानुसार राज्यपाल के अभिभाषण के पूर्व और उपरांत राष्ट्रगान गाया जाता है।  लेकिन केवल तमिलनाडु का राज्य गान ही हुआ तब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष से राष्ट्रगान हेतु कहा किंतु उन्होंने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जिससे रुष्ट होकर वे बिना अभिभाषण पढ़े लौट आये और सोशल मीडिया पर भी राज्य सरकार के प्रति आलोचनात्मक टिप्पणी पोस्ट कर दी। जवाब में मुख्यमंत्री ने राज्यपाल पर तमिलनाडु के अपमान का आरोप लगाते हुए पद छोड़ने की मांग कर डाली। हालांकि  राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच तनातनी नई बात नहीं है। गैर भाजपा शासित अन्य  राज्यों से भी  इस तरह की खबरें आये दिन सुनाई देती हैं। लेकिन राष्ट्रगान के स्थान पर राज्य गान का वादन या  गायन संघीय व्यवस्था के प्रति अलगाव के भाव को दर्शाता है। मुख्यमंत्री स्टालिन और राज्यपाल के बीच चलने वाली खींचतान के चलते संवैधानिक परंपराओं और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों का अपमान हो तो ये अक्षम्य है। स्मरणीय है स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने , जो उनकी सरकार में मंत्री भी हैं, कुछ समय पूर्व सनातन की तुलना कोरोना और कैंसर से करते हुए उसे नष्ट करने का आह्वान किया था। आश्चर्य ये है कि इंडिया गठबंधन के किसी भी घटक ने तमिलनाडु विधानसभा में राष्ट्रगान के अपमान पर द्रमुक सरकार की आलोचना नहीं की। कांग्रेस भी तमिलनाडु में स्टालिन सरकार का हिस्सा है। एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उससे ये अपेक्षा है कि वह राष्ट्रगान के अपमान के लिए मुख्यमंत्री स्टालिन की आलोचना करे। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि तमिल राष्ट्र के आंदोलन से उपजी घृणा ने ही राजीव गाँधी की जान ले ली थी।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

दिल्ली के चुनाव को प्रदूषित कर रहे बयान


दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होने से सरगर्मी  कुछ ज्यादा ही है। कांग्रेस जो पिछले दो चुनावों में शून्य पर पहुँच गई थी इस बार अपना अस्तित्व बचाने हाथ पाँव मार रही है। वहीं भाजपा की कोशिश है वह लोकसभा चुनाव के धमाकेदार प्रदर्शन के अनुरूप विधानसभा चुनाव में भी सफलता हासिल कर सके जिसके लिए वह बीते 25 साल से तरस रही है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस बार अपने को घिरा हुआ मानकर बेहद सतर्क है। शराब घोटाले के अलावा मुख्यमंत्री आवास पर श्री केजरीवाल द्वारा किया गया बेतहाशा खर्च भी उसके लिए मुसीबत बना हुआ है। कांग्रेस और भाजपा दोनों रोजाना नये - नये सवाल पूछकर आम आदमी पार्टी को रक्षात्मक होने मजबूर कर रही हैं। इस बार के चुनाव में अनेक पुराने साथी श्री केजरीवाल का साथ छोड़ गए। वहीं मनीष सिसौदिया जैसे दिग्गज को तो चुनाव क्षेत्र बदलना पड़ गया। आक्रमण आम आदमी पार्टी भी कर रही है किंतु उसे इस बात का डर सताने लगा है कि यदि कांग्रेस अपने मतों में 5 फीसदी की वृद्धि भी  कर ले गई तब उसकी राह कठिन हो जाएगी। इसीलिए  श्री केजरीवाल आरोप लगा रहे हैं कि उनके विरुद्ध कांग्रेस और भाजपा में गुप्त समझौता हुआ है। हालांकि उनके विरुद्ध कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र पूर्व सांसद संदीप दीक्षित को उतार दिया जबकि भाजपा ने भी पूर्व मुख्यमंत्री साहेब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को उम्मीदवार बनाया है जो पिछली लोकसभा के सदस्य थे किंतु उन्हें टिकिट से वंचित रखा गया। बयानों के तीर सभी पक्षों से चल रहे हैं। लेकिन ये बात सही है कि इस बार भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध उतनी आक्रामक नहीं हैं और दोनों की तोपों के मुँह आम आदमी पार्टी की तरफ ही हैं। लेकिन गत दिवस कालका सीट से भाजपा के उम्मीदवार रमेश बिधूड़ी  ने पहले कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा और उसके बाद मुख्यमंत्री आतिशी सिंह के बारे में आपत्तिजनक बयान देकर भाजपा को व्यर्थ की मुसीबत में डाल दिया। एक बयान में उन्होंने मतदाताओं को आश्वस्त किया कि भले ही लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सड़कों को हेमा  मालिनी के गालों की तरह चिकना बनवाने का वायदा पूरा नहीं किया किंतु वे दिल्ली की सड़कों को प्रियंका के गालों जैसा बनवाएंगे। उनके इस बयान की चौतरफा आलोचना हुई तो उन्होंने माफी की रस्म अदायगी कर डाली । लेकिन कुछ देर बाद ही वे बोल बैठे कि मुख्यमंत्री आतिशी ने तो अपना पिता बदल लिया जो पहले अपने नाम के साथ मार्लेना लगाती थीं किंतु अब आतिशी सिंह लिखती हैं। इसके बाद आम आदमी पार्टी भाजपा पर चढ़ बैठी और इस बयान को  दिल्ली की महिलाओं का अपमान बताते हुए मुद्दा बनाने की पहल शुरू कर दी। यद्यपि तीख़ी बयानबाजी सभी पक्षों द्वारा जारी है किंतु श्री बिधूड़ी ने प्रियंका और आतिशी के बारे में  जो कुछ कहा वह शालीनता के लिहाज से बेहद आपत्तिजनक था। लालू ने बरसों पहले जो कहा उसे आधार बनाकर नई टिप्पणी करना दिमागी दिवालियापन नहीं तो और क्या है? ये वही बिधूड़ी हैं जिहोंने लोकसभा में किसी विपक्षी सांसद पर बेहद निम्नस्तरीय कटाक्ष कर दिया। उस पर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग भी उठी। हालांकि वह मंजूर नहीं हुई किंतु भाजपा ने उनकी लोकसभा टिकिट काट दी। जिससे ये संदेश गया कि लोकसभा में उनकी टिप्पणी को पार्टी नेतृत्व ने पसंद नहीं किया। लेकिन विधानसभा चुनाव में उनको उम्मीदवार बना दिया गया। उल्लेखनीय है श्री बिधूड़ी  दिल्ली से लोकसभा और विधानसभा सदस्य रह चुके हैं जिससे उनका जनाधार साबित होता है। ये भी हो सकता है कि उनको बगावत से रोकने मुख्यमंत्री के विरुद्ध उतारकर बलि का बकरा बना दिया गया हो। लेकिन उनके संदर्भित बयानों ने भाजपा की अच्छी भली आक्रामकता को झटका दे दिया। यद्यपि बेलगाम जुबान वाले नेता कमोबेश हर पार्टी में हैं किंतु भाजपा जैसी अनुशासन पसंद पार्टी में  श्री बिधूड़ी जैसे नेताओं को क्यों ढोया जाता है ये समझ से परे है। हालांकि राजनीतिक विमर्श में भाषा की मर्यादा जिस तरह तार - तार हो रही है वह चिंता का विषय है। चुनाव जीतने की क्षमता ही उम्मीदवारी का आधार मान लेने के कारण पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों को अवसर देती हैं। श्री बिधूड़ी जीतेंगे या नहीं ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि उन्होंने अपनी पार्टी  को शर्मिंदगी झेलने मजबूर कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 January 2025

शहरी चश्मे से देखने पर गाँवों का विकास असंभव है


आज ग्रामीण भारत महोत्सव 2025 के शुभारंभ के पूर्व  सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है कि  हमारे गाँव जितने समृद्ध होंगे, विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में उनकी भूमिका उतनी ही बड़ी होगी। 9  जनवरी तक चलने वाला यह महोत्सव विकसित भारत 2047 के लिए एक लचीले ग्रामीण भारत का निर्माण विषय पर केंद्रित ही। इस महोत्सव के दौरान ग्रामीण भारत की उद्यमशीलता की भावना और सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाया जाएगा। ये बात तो हर कोई जानता और मानता है कि भारत कृषि प्रधान देश है और अंधाधुंध शहरीकरण के बावजूद आज भी  लगभग तीन चौथाई जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है। हालांकि शहरी क्षेत्रों का विस्तार होते जाने के साथ ही सड़क और बिजली पहुँचने के कारण ग्रामीण भारत में भी जबरदस्त बदलाव हुआ है।  जनता के रहन - सहन के तौर - तरीकों में आया परिवर्तन  आश्चर्यचकित करने वाला वाला है। सड़क और बिजली के बाद ग्रामीण जीवन को  जिस चीज ने सबसे अधिक प्रभावित किया वह है संचार माध्यम। टीवी, और मोबाइल के साथ इंटरनेट सुविधा की उपलब्धता ने भारत के गाँवों में बीते 20 वर्षों में जितना बदलाव किया उतना आजादी के बाद के 50 सालों में देखने नहीं मिला। और इसीलिए तमाम उपभोक्ता कंपनियों ने शहरों के समानांतर ग्रामीण उपभोक्ता पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। परिणाम  वहाँ से पूर्वापेक्षा ज्यादा मांग आ रही है। टीवी, फ्रिज के बाद अब गाँवों में एयर कंडीशनर भी देखने मिल जाते हैं। वो जमाने लद गए जब वहाँ केवल मोटर साइकिल, जीप और ट्रैक्टर की मांग थी। उससे आगे बढ़कर अब ग्रामीण भारत में स्कूटी और  महंगी लग्जरी कारें भी जमकर बिक रही हैं। निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को भी गाँवों में कमाई का स्रोत नजर आया तो उन्होंने भी शहरों के बाहर अपने संस्थान खोलकर ग्रामीण जनता को आकर्षित करने का दांव चला। उसके चलते  वहाँ एंबुलेंस और स्कूल बसों की आवाजाही नजर आने लगी है। हालांकि ये स्थिति उन गाँवों की ही है जो शहरों के निकट हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित कम  आबादी वाले  हजारों गाँवों के लिए विकास एक सपने जैसा है। आजादी के बाद से ही गाँवों, के विकास के लिए अनगिनत योजनाएं बनीं। ग्रामीण विकास के लिए हर सरकार भारी -  भरकम बजट का प्रावधान करती है। लेकिन भ्रष्टाचार के कारण उसका सही लाभ गाँवों को नहीं  मिल सका। शहरों की तरफ भागने की प्रवृत्ति के पीछे विकास की कमी ही बड़ा कारण है। ग्रामीण भारत महोत्सव उस दिशा में एक अच्छा  प्रयास कहा जायेगा बशर्ते वह सरकारी कर्मकांड से परे ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को गहराई से समझकर उन्हें पूरा करने पर ध्यान दे। इस दिशा में  सबसे बड़ा विचारणीय मुद्दा है खेती के प्रति ग्रामीण युवाओं की घटती रुचि। केवल  बाजार के विकास और ग्रामीण जनता को उपभोक्तावाद के शिकंजे में जकड़ लेना विकास का सही पैमाना नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की कल्पना बिना कृषि के असंभव है। तमाम विसंगतियों के बाद भी खेती रोजगार के आधारभूत स्रोतों में है। इसीलिए मशीनीकरण के बाद भी बुवाई और कटाई के मौसम में शहरी इलाकों में कार्यरत श्रमिक गाँवों में चले जाते हैं। लेकिन बाकी समय खेतिहर मजदूरों की कमी के चलते कृषि करने वाले परेशान होते हैं। ग्रामीण भारत का नौजवान शहरी आकर्षण के वशीभूत जिस प्रकार गाँव छोड़ देता है उसकी वजह से पीढ़ियों से खेती करते आ रहे लोग अपनी जमीनें बेचने मजबूर  हैं। विकास कार्यों के लिए भूमि का अधिगृहण भी खेती के रकबे में कमी का कारण है। खेती को लाभ का व्यवसाय तभी बनाया जा सकेगा जब किसान का पूरा परिवार उसमें संलग्न हो। इसके लिए जरूरी है ग्रामीण और शहरी इलाकों  के विकास में  विषमता दूर की जाए। शिक्षा के प्रसार के कारण ग्राम छोड़ने की परिस्थिति उत्पन्न होना अलग बात है किंतु रोजगार की तलाश में  गांवों से पलायन होना देश के कृषि प्रधान होने के दावे पर संदेह उत्पन्न करता है। किसानों की आत्महत्या, न्यूनतम समर्थन मूल्य, गाँवों से पलायन जैसे अनेक मुद्दे  लंबे समय से राष्ट्रीय विमर्श  में हैं किंतु कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाने के कारण  व्यर्थ का तनाव बना हुआ है। हालांकि इसके पीछे सक्रिय ताकतों का  उद्देश्य गाँवों और किसानों का हित न होकर अपनी राजनीति चमकाने के अलावा अराजकता को प्रश्रय देना है। लेकिन गाँवों के विकास को शहरी चश्मे से देखने की बजाय वहाँ की जमीनी जरूरत के मुताबिक किये जाने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोके बिना उनके विकास की बात सोचना बेमानी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 January 2025

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव भारत के लिए लाभदायक


जब अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी फ़ौजें काबिज थीं तब पाकिस्तान की नीति दोगलेपन की थी। एक तरफ तो उसने तालिबानी लड़ाकों पर हवाई हमले के लिए अपने हवाई अड्डे अमेरिकी  को उपलब्ध करवाए वहीं दूसरी  तरफ अमेरिकी फौजों से लड़ने के लिए तालिबानियों को अपनी सीमा के भीतर अड्डे बनाने की अनुमति दी।  जब अमेरिकी सेना ने अपना डेरा समेट कर तालिबानियों को सत्ता सौंप दी तब पाकिस्तान  ने जमकर जश्न मनाया जिसमें उसका आका  चीन भी शामिल हुआ। भारत में भी वामपंथी तबके सहित अन्य विपक्षी दल बल्लियों उछल रहे थे। चूंकि मुल्ला - मौलवी अमेरिका को अपना दुश्मन मानते हैं इसलिए उनको खुश करने के लिए धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार विजयोल्लास में डूबे थे। भारत सरकार के चूंकि अमेरिका से रिश्ते सुधार पर थे इसलिए तालिबानियों की जीत पर भारत की विदेश नीति पर भी सवाल उठाये जाने लगे। वहाँ रह रहे हिन्दू और सिखों की सुरक्षा की चिंता भी होने लगी। जो भारतीय कंपनियां वहाँ ठेका लिए हुई थीं उनके कारोबार पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे। तालिबानी हुकूमत को भारत ने  मान्यता भी नहीं दी। इसलिए जो माहौल बना उसमें ये चिंता तैर  रही थी कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान की जुगलबंदी भारत के लिए बड़ी समस्या बनेगी।  इस पहाड़ी देश की सीमा ईरान के अलावा मध्य एशिया के उन देशों से भी मिलती है जो सोवियत संघ के हिस्से हुआ करते थे। इसलिए चीन इस समूचे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की फ़िराक में था। लेकिन चार साल बाद उन तमाम कयासों पर विराम लग गया। जो पाकिस्तान तालिबानियों की जीत पर ढोल पीट रहा था वही आज अफ़ग़ानिस्तान के हमलों का सामना करने मजबूर है। पश्चिमी सीमांत के जिस  इलाके में उसने  तालिबानी  अड्डे बनाने की छूट दी थी उन्होंने उन्हें खाली करने से न सिर्फ  इंकार कर दिया बल्कि वे पाकिस्तानी सीमा में और भी भीतर घुसकर अपनी चौकियाँ बना रहे हैं। दोनों देशों के बीच सीमा का जो निर्धारण अंग्रेजों द्वारा किया गया था उसे तालिबानियों ने मानने से साफ मना कर दिया। उनके हमलों से त्रस्त होने के बाद पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा हवाई हमले कर लगभग 50 अफगानी मार दिये गए तो तालिबानियों ने दोगुनी ताकत दिखाकर पाकिस्तान की अनेक सैनिक चौकियाँ छीन लीं। काबुल में बैठे शासक जिस तरह से पाकिस्तान के प्रति आक्रामक हो उठे वह चौंकाने वाला है। उससे भी बड़ी बात ये है कि कूटनीतिक रिश्ते न होने के बाद भी तालिबानी सत्ता का रुख भारत के प्रसि नर्म हुआ है। भारतीय कंपनियों को वहाँ किये जा रहे विकास कार्यों में भाग लेने का विधिवत प्रस्ताव मिलने के साथ भारत से खाद्यान्न एवं अन्य जरूरी चीजें वहाँ भेजे जाने से सम्बन्ध काफी सुधरे हैं। हालांकि कश्मीर में आतंकी घटनाओं में अफगानिस्तान का हाथ भी रहा है किंतु इस बार का तालिबानी शासन भारत से दोस्ती का पक्षधर होने के साथ ही पाकिस्तान से दुश्मनी पाल बैठा है जो इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव कहा जाएगा। भारत के लिए ये स्थिति बेहद सुखद है। क्योंकि बांग्ला देश में शेख हसीना की सत्ता के पतन के बाद जो अंतरिम सरकार काबिज हुई उसने पाकिस्तान से जिस तरह का दोस्ताना बढ़ाया वह भारत के लिए बड़े खतरे की शुरुआत मानी जा रही थी। ये भी कहा जाने लगा था कि पाकिस्तान एक बार फिर  युद्ध की परिस्थिति पैदा कर सकता है जिससे भारत दोहरे संकट में फंसे। लेकिन बलूचिस्तान में पहले से चल रहे विद्रोह को दबाने में तो उसे पसीने छूट ही रहे थे ऊपर से तालिबानी लड़ाकों के हमलों से मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। कश्मीर के जिस हिस्से को उसने कब्जा रखा है वहाँ भी  बगावत का माहौल है। चीन की जो परियोजनाएं चल रही हैं उनका भी विरोध स्थानीय निवासी कर रहे हैं जिससे चीन नाराज है। राजनीतिक तौर भी अंदरूनी हालात इतने दयनीय कभी नहीं नहीं रहे। भारत के विरुद्ध जनता के मन में नफरत पैदा करने का दाँव भी काम नहीं कर रहा। इसका प्रमाण वहाँ से आने वाले वीडियो हैं जिनमें आम नागरिक विशेष तौर पर युवा अपने देश की दुर्दशा के लिए हुकूमत को कोसने के साथ भारत की प्रगति की प्रशंसा करते देखे जा सकते हैं। टीवी चैनलों में होने वाली बहस में भी भारत के पक्ष में बोलने वाले बढ़ रहे हैं जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और उसके पिछलग्गू देश तो पाकिस्तान से दूरी बना ही रहे हैं किंतु अब तो चीन भी उसके भिखमंगेपन से त्रस्त होकर उसे खाली हाथ लौटाने लगा है। यद्यपि ये कहना तो जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान टूट जायेगा क्योंकि बलूचिस्तान की आजादी बिना विदेशी मदद के संभव  नहीं किंतु अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर सीमांत क्षेत्र में जिस तरह से कब्जा करना शुरू किया वह उसके लिए लाईलाज मर्ज बन सकता है क्योंकि तालिबानियों से पार पाना उसके बस के बाहर है। सियासी अनिश्चितता के कारण सेना भी असमंजस में फंसी है। इमरान खान की गिरफ्तारी  सरकार के लिए गले की फांस साबित हो रही है। ये हालात भारत के लिए पूरी तरह अनुकूल हैं क्योंकि कहाँ तो तालिबानी हुकूमत के साथ मिलकर पाकिस्तान कश्मीर में गड़बड़ी पैदा करने का मंसूबा पाल रहा था  और कहाँ तालिबान उसी के लिए मुसीबत बन बैठे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 January 2025

आर्थिक विकास में धर्म स्थल भी निभा सकते हैं महत्वपूर्ण भूमिका


जो लोग मंदिर बनाने अथवा तीर्थस्थलों के विकास की आलोचना करते हुए उस पैसे का उपयोग विद्यालय, शौचालय और ऐसे ही अन्य कार्यों पर खर्च करने की वकालत करते हैं उनको गत दिवस देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं  की संख्या देखकर अपनी सोच की समीक्षा करनी चाहिए। जो समाचार आये हैं उनके अनुसार देश के जितने भी बड़े मंदिर और गुरुद्वारे हैं उनमें वर्ष 2025   के प्रथम दिवस अभूतपूर्व जनसैलाब नजर आया  । बावजूद इसके कि 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला नव वर्ष मूलतः ईसाई काल गणना से जुड़ा हुआ है और अंतर्राष्ट्रीय कैलेंडर भी इसी पर आधारित है। गत दिवस न सिर्फ हिन्दू मंदिरों अपितु अमृतसर के सुप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में भी अयोध्या के राम मंदिर के बराबर दर्शनार्थी पहुंचे। वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और उज्जैन के महाकाल परिसर में भी यही नजारा दिखा। इसके अलावा नदियों के तट पर भी उत्सव का माहौल देखने मिला। यद्यपि नये साल का स्वागत शराब - कबाब से करने वाले भी कम नहीं थे किंतु उनकी दुनिया अलग है। आशय ये है कि धार्मिक पर्यटन भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। अयोध्या में गत वर्ष राम मंदिर के निर्माण के बाद से ही वहाँ दर्शनार्थियों की दैनिक संख्या औसतन 50 हजार है जो किसी भी विशिष्ट अवसर पर लाखों का आंकड़ा पार कर जाती है। 2025  शुरू होने के पूर्व ही अयोध्या के सारे होटल , धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस भर चुके थे। लगभग यही स्थिति वाराणसी, उज्जैन, शिरडी, तिरुपति आदि की रही। अयोध्या के पहले काशी विश्वनाथ और महाकाल परिसर को विकसित स्वरूप प्रदान करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जाने के साथ ही पुराने निर्माण हटाये गए जिससे आवागमन सुलभ हो। उसका विरोध भी हुआ , राजनीति की दुकानें भी सजीं। लेकिन जब विकास पूरा हुआ तब विरोधियों  के मुँह ये देखकर बंद हो गए कि उक्त मंदिरों में आने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई, जिनमें ज्यादातर लोग बाहरी थे। अर्थात इन मंदिरों के कारण वाराणसी और उज्जैन में होटल और टैक्सी जैसे व्यवसाय में तो बढ़ोत्तरी हुई ही किंतु  पूजा सामग्री विक्रेताओं का भी कारोबार जमकर चलने लगा। यहाँ तक कि साइकिल और ऑटो रिक्शा चालकों की कमाई भी बढ़ी। वाराणसी में साड़ियों के अलावा गलीचों के कारोबारी भी विश्वनाथ परिसर के विकास के बाद अपने व्यवसाय में वृद्धि से प्रसन्न हैं। उज्जैन में महाकाल परिसर इलाके में जिनके मकान हैं उनमें से बहुतों ने होम स्टे की व्यवस्था कर अतिरिक्त  आय का स्रोत पैदा कर लिया। एक मोटे अनुमान के अनुसार उज्जैन में फूल -  माला बेचने वालों की संख्या में 25 हजार की वृद्धि हुई है। म.प्र में ही महाकाल के साथ ओंकारेश्वर को भी नया स्वरूप दिये जाने के बाद वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यही सब देखकर केंद्र सरकार ने देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का विकास करने की योजना बनाई है जिनमें गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर भी है। वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर बेहद संकरे स्थान में होने से श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफ होती है। एक - दो  बड़े हादसों के बाद उ.प्र सरकार ने उसके भी समुचित विकास का निर्णय किया है। भारत में धार्मिक आस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद नई पीढ़ी  में धर्म के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है। लेकिन धर्मस्थलों पर बाबा आदम के जमाने की लचर व्यवस्थाओं की वजह से  युवा वहाँ जाने से कतराते थे। लेकिन जिन धार्मिक स्थलों को नया स्वरूप दिया गया उनमें आने वालों में युवा दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि  विकास  पर किये गए खर्च का औचित्य सिद्ध कर रही है। हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि धार्मिक यात्रा को पर्यटन का स्वरूप दिये जाने से धर्मस्थलों की पवित्रता और काफी हद तक मर्यादा नष्ट होती है। उत्तराखंड के चार धामों की सड़कें विकसित होने के बाद वहाँ तीर्थयात्रियों की संख्या साल दर साल बढती जाने से पर्यावरण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। लेकिन इन यात्राओं का पेशेवर तरीके से प्रबंध किया जाए तो उसका हल हो सकता है। जमीनी सच्चाई ये है कि सदियों पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को समय के साथ यदि दुरुस्त किया जाए तो धार्मिक स्थलों के जरिये रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास संभव है। भारत सरकार को चाहिए सभी राज्यों से प्रमुख धर्मस्थलों की सूची लेकर उनको विकसित करने की कार्य योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे  मूल स्वरूप को छेड़े बिना वहाँ आने वालों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। हालिया अनुभव बताते हैं जिन भी धार्मिक स्थलों को विकसित किया गया वहाँ दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि होने से अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला। घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी ये कदम सहायक साबित होगा इसमें दो मत नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी