कल लोकसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय बजट प्रस्तुत करेंगी। मई 2024 में तीसरी बार सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार का यह बजट कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण होगा। पिछला बजट आधे वर्ष के लिए ही था जबकि इस बजट का प्रभाव पूरे कारोबारी वर्ष पर होने से यह पूर्ण माना जाएगा। हमारे देश में हर वर्ष कहीं न कहीं चूंकि चुनाव होते रहते हैं इसलिए केंद्र में सत्तासीन दल पर अनेक तरह के दबाव होते हैं। विभिन्न राज्यों में विरोधी विचारधारा की सरकारें होने से भी बजट में राजनीतिक संतुलन बनाने पड़ते हैं। लिहाजा उस पर सियासत पूरी तरह हावी होती है। ये देखते हुए नये बजट में भी वित्त मंत्री पर राजनीतिक दबाव रहेगा क्योंकि मात्र 4 दिन बाद ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव हेतु मतदान है। वहाँ ढाई दशक से भाजपा सत्ता से बाहर है इसलिए केंद्र सरकार ऐसा कुछ जरूर करेगी जिससे उन मतदाताओं को प्रभावित कर सके जो लोकसभा में तो कमल का बटन दबाने में नहीं झिझकते किंतु विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को समर्थन देते हैं क्योंकि उसने मुफ्त बिजली, पानी जैसी सुविधाएं दे रखी हैं। यद्यपि ये वर्ग हिंदुत्व सहित अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा के साथ है किंतु मुफ्त सुविधाओं का लालच भी नहीं छोड़ पाता। इस बार हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत से भाजपा का हौसला काफी बुलंद है। इसलिए प्रधानमंत्री बजट में जितना संभव होगा ऐसा प्रयास करेंगे जिससे कि दिल्ली के मध्यमवर्गीय शासकीय कर्मचारियों और व्यवसायियों को भाजपा के पक्ष में ला सकें। आर्थिक विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि आयकर में छूट के साथ ही महिलाओं और गरीबों के कल्याण के लिए कुछ ऐसे प्रावधान होंगे जिनका असर दिल्ली चुनाव पर पड़े। उस दृष्टि से आयकर छूट की सीमा 10 लाख तक बढाए जाने के साथ ही पेट्रोल - डीजल सस्ता करने जैसे उठाए जा सकते हैं। ऐसा करने से मध्यम वर्ग के साथ ही अन्य तबके भी लाभान्वित होंगे जो महंगाई से परेशान हैं। उल्लेखनीय है भाजपा के परंपरागत समर्थक वर्ग में इस बात को लेकर काफी नाराजगी है कि केंद्र सरकार गरीबों को तो दिल खोलकर बाँट रही है किंतु उसका भार करदाताओं पर पड़ता है। पेट्रोल - डीजल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में घटने के बाद भी भारत में उस अनुपात में कम नहीं किये गए। लोकसभा चुनाव में भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे हो जाने के पीछे मध्यमवर्गीय मतदाताओं की उदासीनता भी एक बड़ा कारण थी। प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी तक में इस वर्ग ने मतदान के प्रति अपेक्षित उत्साह नहीं दिखाया जिससे उनकी जीत का अंतर बहुत ही साधारण रह गया। यद्यपि हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में भाजपा को धमाकेदार जीत हासिल हुई किंतु जम्मू कश्मीर और झारखंड में स्थानीय समीकरण खिलाफ होने से उसे पराजय झेलनी पड़ी। दिल्ली में उन्हीं आधारों पर आम आदमी पार्टी की मजबूती है जिसे तोड़ने के लिए भाजपा को उसके द्वारा खींची लकीर से बड़ी खींचनी होगी। केंद्रीय बजट में ही वह इसकी कोशिश करेगी ऐसी उम्मीद है। यद्यपि मुफ्त उपहारों की राजनीति के प्रधानमंत्री खुद भी विरोधी हैं किंतु भाजपा भी राज्य स्तर पर वही कर रही है। जहाँ तक विकास की बात है तो मोदी सरकार की उपलब्धियों से लोगों में खुशी है किंतु आम जनता के सामने अपनी जरूरतें पूरी करने की जो समस्या है उसका हल किये जाने की जरूरत है। रक्षा और ग्रामीण विकास पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। इन्फ्रा स्ट्रक्चर पर भी इस सरकार ने भारी निवेश किया जिसका सकारात्मक परिणाम देखने मिल भी रहा है । लेकिन शिक्षा और चिकित्सा का बढ़ता खर्च आम जनता को हलाकान किये हुए है। इसमें दो राय नहीं हैं कि श्री मोदी के कार्यकाल में देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रति माह होने वाला जीएसटी संग्रह है। आयकर सहित अन्य प्रत्यक्ष करों की वसूली भी उम्मीद से ज्यादा बढ़ी है। वाहनों की बिक्री के अलावा घर बनाने या खरीदने वालों की संख्या में भी जबरदस्त वृद्धि हो रही है। कोरोना काल में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन और खातों में सीधे राशि जमा किए जाने से देश अराजकता से बच गया। केंद्र सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण के लिए जो योजनाएं शुरू की गईं उनका लाभ उन्हें बिना बिचौलियों को घूस दिए मिला। यद्यपि प्रधानमंत्री आवास योजना में ज़रूर घूसखोरी की शिकायतें विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से मिलती हैं किंतु जिन योजनाओं में सहायता राशि सीधे हितग्राही के बैंक खाते में जमा होती है उनमें सरकारी अमले की लूट - खसोट पर विराम लग गया। विख्यात चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर का ये कहना अर्थपूर्ण है कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के प्रमुख कारणों में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के अलावा लाभार्थी भी हैं। लेकिन वित्तमंत्री को ध्यान रखना होगा कि आर्थिक नीतियों से उद्योगपति और गरीब तो संतुष्ट हैं किंतु नौकरपेशा और मध्यमवर्गीय व्यवसायी महसूस करते हैं कि सरकार उसके हितों के बारे में उतनी संवेदनशील नहीं है। ऐसे में अपेक्षा है कि वे बजट के साथ जुड़ी मर्यादाओं का पालन करते हुए भी मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों और व्यवसायियों के प्रति उदारता बरतें। कम से कम इस बात का संकेत तो दिया ही जा सकता है कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद यह सरकार उनके हितों के संरक्षण हेतु क्या - क्या करेगी ? पेट्रोल - डीजल के दामों के अलावा जीएसटी की दरों को युक्तियुक्त बनाने के बारे में भी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं। मोदी सरकार की आयुष्मान योजना ने गरीबों और बुजुर्गों को तो जबरदस्त राहत दी किंतु मध्यम आय वाले इलाज के महंगे होने से हलाकान हैं। इसलिए इस बारे में किसी क्रांतिकारी ऐलान की उम्मीद भी है और जरूरत भी।
- रवीन्द्र वाजपेयी