आज रात डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। यह उनका दूसरा कार्यकाल होगा। गत वर्ष उनके राष्ट्रपति चुने जाते ही पूरे विश्व में जबरदस्त उत्सुकता देखने मिली क्योंकि निवर्तमान राष्ट्रपति बाइडेन का कार्यकाल अमेरिका सहित शेष विश्व के लिए भी निराशाजनक रहा। उन्होंने समस्याएं तो खूब पैदा कीं किंतु समाधान नहीं निकाल पाए जिससे पूरी दुनिया हलाकान हुई। 2021 में जब वे राष्ट्रपति बने तब कोरोना की पहली लहर के दर्दनाक अनुभवों से विश्व के तमाम देश उबर ही रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आवागमन चौपट हो जाने से अनेक धन संपन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं चौपट हो चुकी थीं। ऐसे राष्ट्र जिनकी अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के आकर्षण में विदेशी इलाज करवाने आते थे, वे अपने नागरिकों की कोरोना से रक्षा करने में ही अक्षम साबित हुए। अमेरिका भी अपवाद नहीं रहा। 2021 में आई कोरोना की दूसरी लहर तो पहले से भी अधिक खतरनाक साबित हुई। लेकिन बतौर राष्ट्रपति बाइडेन कोरोना से बचाव का ऐसा कोई मॉडल दुनिया के समक्ष नहीं रख सके जो अपेक्षित था। कोरोना के कारण चीन के प्रति अविश्वास उत्पन्न होने से अमेरिका का महत्व बढ़ा। लेकिन बाइडेन ने बजाय बड़े भाई के तौर पर पेश आने के दुनिया भर में तनाव पैदा करने का कुचक्र रचा। यदि अमेरिका नहीं चाहता तो यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध इतना लंबा नहीं चलता। हमास और इजराइल के बीच भड़की लड़ाई में भी उसकी भूमिका भड़काऊ रही। यहाँ तक कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के भीतर राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का हरसंभव प्रयास किया गया। जॉर्ज सोरोस नामक षडयंत्रकारी को संरक्षण देकर बाइडेन ने पूरी दुनिया में चुनी हुई सरकारों को गिराने या कमजोर करने का चक्रव्यूह रचा। यही वजह है कि जिन ट्रम्प को अमेरिका की जनता ने चार साल पहले राष्ट्रपति पद से हटा दिया इस बार उन्हीं को बागडोर सौंप दी। दरअसल ट्रम्प को मिले ऐतिहासिक बहुमत के पीछे बाइडेन के प्रति उपजा गुस्सा ही था जिसका खामियाजा कमला हैरिस ने भुगता। बाइडेन न सिर्फ एक कमजोर राष्ट्रपति साबित हुए बल्कि उन्होंने अमेरिका को भी अंदर से बेहद कमजोर कर दिया। यूक्रेन संकट में उनकी अदूरदर्शितापूर्ण नीति ने अमेरिका समर्थक यूरोपियन देशों तक को खून के आँसू रुला दिये। भारत विरोधी खालिस्तानियों को प्रश्रय देकर बाइडेन ने आतंकवाद को संरक्षण देने की हिमाकत तो की ही , उनके कार्यकाल में अमेरिकी संस्था हिँडनबर्ग ने भारत के प्रमुख उद्योगपति गौतम अदाणी के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बारे में भ्रामक रिपोर्ट सार्वजनिक कर भारत में पूंजी लगाने वाले विदेशी निवेशकों को बिदकाने का दांव भी चला। पिछले लोकसभा चुनाव में भी बाइडेन पालित जॉर्ज सोरोस ने मोदी सरकार की वापसी रोकने के लिए विदेशी माध्यमों से दुष्प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके कार्यकाल में अमेरिकी एजेंसियों द्वारा अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का खेल रचा गया। लेकिन जिस चीन से अमेरिका को सबसे अधिक खतरा है, उसका वे कुछ न बिगाड़ सके। यूक्रेन को बेवजह रूस से भिड़वाकर उन्होंने इस देश को तो बरबादी की गहरी खाई में धकेला ही लेकिन उसका दुष्परिणाम भोगा यूरोप के देशों ने जो गैस के अभाव में मुसीबत में फंस गए। रूस पर लगाए गए प्रतिबंध भी पुतिन को रोकने में असमर्थ साबित हुए। कुल मिलाकर बाइडेन का जिक्र अमेरिका के बेहद कमजोर राष्ट्रपति के तौर पर होगा। लाॅस एंजिलिस में लगी आग को नियंत्रित करने में मिली विफलता ने उनकी विदाई को और भी फीका कर दिया। जहाँ तक बात ट्रम्प की है तो उनके प्रारंभिक तेवर देखकर ये आशंका जताई जा रही है कि भारतीय वस्तुओं पर अधिक कर लगाने और वीज़ा नियमों को कड़ा करने की उनकी घोषणा का विपरीत असर भारत पर पड़ेगा। लेकिन उनकी जीत में निर्णायक भूमिका निभाने वाले भारतीय समुदाय के दबाव के चलते भारत के प्रति नर्म रुख रखना उनकी मजबूरी होगी। चुनाव के दौरान भारत और हिंदुत्व के बारे में उनकी टिप्पणियां काफी कुछ कह गईं। हालांकि ट्रम्प थोड़े सनकी भी हैं लेकिन भारत के साथ उनके रिश्ते पहले भी प्रगाढ़ रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यक्तिगत तालमेल भी बेहतर है। सबसे बड़ी बात ये है कि भारत के बड़े बाजार की उपेक्षा करना अमेरिका सहित किसी भी आर्थिक शक्ति के लिए संभव नहीं है। ट्रम्प तो निजी तौर पर भारत में व्यवसाय भी करते रहे हैं। इस आधार पर ये उम्मीद गलत नहीं है कि अमेरिका में सत्ता परिवर्तन भारतीय हितों के अनुकूल माहौल बनाने में सहायक होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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