Friday, 17 January 2025

इजराइल और हमास में युद्धविराम की सफलता संदेह के घेरे में



अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा   शपथ लेने के पहले इजराइल और हमास के बीच युद्ध विराम होने की खबर पूरी दुनिया के लिए राहत लेकर आई है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजराइल पर सैकड़ों मिसाइलें छोड़े जाने के साथ ही जमीनी हमला किया गया। इसमें बड़ी संख्या में इजराइली मारे गए वहीं सैकड़ों बंधक बना लिए गए।  जवाब में इजराइल ने हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिये। देखते - देखते  समूचा गाजा क्षेत्र मलबे  में परिवर्तित होता गया। बच्चों सहित  हजारों लोग मारे जा चुके हैं । गाजा को बिजली सहित अन्य चीजों की आपूर्ति भी चूंकि इजराइल के जरिये ही होती थी जिसके रुक जाने से लोग अभूतपूर्व संकट में फंस गए। संरासंघ के अलावा अनेक देशों ने वहाँ राहत सामग्री पहुंचाई किंतु उसका वितरण भी बड़ी समस्या बन गई। स्वास्थ्य सेवाएं भी चरमरा गईं। इजराइल की रणनीति गाजा को पूरी तरह बरबाद करने की थी जिसमें वह काफी हद तक सफल भी हुआ। हमास के ढांचे को भी उसने बुरी तरह तहस - नहस कर दिया। इसका जो दुष्परिणाम गाजा वासियों ने भोगा वह  दिल दहलाने वाला है। यद्यपि इसके लिए हमास ही जिम्मेदार है जिसने अकारण हमला किया।  उसके दस्तों ने इजराइल में घुसकर जिस  हैवानियत का प्रदर्शन किया उसका भी कोई  औचित्य नहीं  था।  चूंकि हमास द्वारा  इजराइल  की अभेद्य सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगाए जाने से नेतन्याहू की जबरदस्त किरकिरी हुई इसीलिए वे आर - पार  की जिद पकड़कर बैठ गए। गाजा से बड़ी संख्या में पलायन शुरू हुआ किंतु  पड़ोसी देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं। उधर लेबनान में सक्रिय हिजबुल्ला नामक आतंकवादी संगठन  ने भी हमास के समर्थन में इजराइल पर हमले का दुस्साहस किया जिसके बाद  एक और मोर्चा खुल गया। आशंका ये थी कि अमेरिका का घोर विरोधी ईरान भी इजराइल से भिड़ेगा किंतु उसके इरादों को नेतन्याहू के आक्रामक अंदाज ने ठंडा कर दिया। यद्यपि सवा साल तक लड़ाई चलने के बाद भी हमास ने घुटने नहीं टेके जो इजराइल के लिए भी चिंता का कारण बनता जा रहा था। दूसरी तरफ यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के कारण परेशान दुनिया के तमाम देश पश्चिम एशिया में लगातार खराब हो रहे हालातों से पस्त हो चुके थे। सही बात ये है कि  अवकाश लेने जा रहे अमेरिका के  राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ही उक्त दोनों युद्धों की पटकथा लिखी थी। यूक्रेन और रूस की जंग रुकवाने की कुव्वत तो उनकी थी नहीं क्योंकि रूसी राष्ट्रपति पुतिन झुकने को तैयार नहीं हैं। लेकिन इजराइल पर दबाव डालने में वे सक्षम थे। और फिर डोनाल्ड ट्रम्प  जिस तरह दोनों लड़ाईयां रुकवाने की बात कर रहे हैं उसके बाद बाइडेन ने श्रेय लेने के फेर में जाते - जाते युद्ध विराम करवाने की पहल की जिसके लिए हमास तो राजी था ही किंतु नेतन्याहू  भी अमेरिका के दबाव में न चाहते हुए भी रजामंद हो गए। सही बात ये है कि ज्यादातर इस्लामिक देश इजराइल से दोस्ताना कायम करने लालायित हो रहे हैं। सं.अरब अमीरात के बाद सऊदी अरब भी उससे बड़ा समझौता करने जा ही रहा था किंतु उसी बीच ईरान के उकसावे में हमास ने हमला कर तनाव पैदा कर दिया। अब जबकि युद्धविराम होने जा रहा है तब ये सवाल उठना स्वाभाविक  है कि क्या पश्चिम एशिया में  स्थायी शांति कायम हो सकेगी क्योंकि फिलीस्तीन की समस्या का समाधान नहीं होने तक शांति की बात सोचना बेमानी है। और ये भी सही है कि अमेरिका  इजराइल के जरिये अरब जगत में उथलपुथल मचाये रखने की नीति तब तक जारी रखेगा जब तक वहाँ उसके पैर पूरी तरह से न जम जाएं । स्मरणीय है हाल ही में सीरिया में रूस समर्थक असद की सत्ता पलट को जिन इस्लामिक आतँकवादी लड़ाकों ने अंजाम दिया वे मूलतः अमेरिका विरोधी थे किंतु  उनको वाशिंगटन की पूरी मदद मिली। ये देखते हुए युद्धविराम कितना सफल होगा ये कहना कठिन है। सीरिया को टुकड़े - टुकड़े करवाने की हालत तक पहुंचाने में रूस भी बराबर का दोषी है जो असद जैसे तानाशाह को संरक्षण देता रहा। कुल मिलाकर दुनिया में जहाँ भी युद्ध या आतंकवाद जैसे हालात हैं उनके लिए अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियाँ ही जिम्मेदार हैं जॊ अपने स्वार्थों की खातिर निर्दोषों का खून बहाने में तनिक भी नहीं हिचकतीं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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