दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल के बीच चल रहे शब्द बाणों ने विपक्ष के दो ध्रुवों में बंट जाने की स्थिति उत्पन्न कर दी है। हालांकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भले ही एक दूसरे के विरुद्ध लड़ रही हैं किंतु दोनों इंडिया गठबंधन में हैं। ये भी रोचक है कि गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस, सपा और शिवसेना ने जहाँ खुलकर आम आदमी पार्टी को समर्थन देने का ऐलान कर रखा है वहीं अन्य घटक तटस्थ हैं। वैसे तो जम्मू कश्मीर और हरियाणा में भी आम आदमी पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे थे किंतु तब उसके और कांग्रेस के बीच उतनी कड़वाहट नजर नहीं आई जितनी दिल्ली में देखने मिल रही है। अब तक स्थानीय नेता ही केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहे लेकिन अब तो श्री गाँधी भी खुलकर हमले कर रहे हैं। उन्होंने श्री केजरीवाल द्वारा सादगी का दिखावा करने के बाद सभी सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने, मुख्यमंत्री निवास को करोड़ों रुपये खर्च कर महल का स्वरूप देने, यमुना की सफाई न करवाने और गंदे पेयजल की आपूर्ति जैसे मुद्दे उठाकर उनकी तीख़ी आलोचना कर डाली। दूसरे खेमे ने भी जवाब देने में कोई लिहाज नहीं किया और नेशनल हेराल्ड मामले में गाँधी परिवार परिवार पर लगे आरोपों को उछालने के साथ ही ये सवाल भी दागा कि रॉबर्ट वाड्रा अब तक कैसे बचे हुए हैं? सबसे मजेदार बात ये है कि दोनों एक दूसरे पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि श्री गाँधी अपनी तरफ से आम आदमी पार्टी के प्रति नर्म रवैया अपनाने के पक्षधर थे। इसीलिए कुछ समय तक प्रचार से दूर भी रहे । इससे ये धारणा बनने लगी कि किसी को बहुमत नहीं मिला तो कांग्रेस 2013 की तरह से ही श्री केजरीवाल की ताजपोशी में सहायक बनेगी। ये प्रचार आम आदमी पार्टी को नुकसानदेह लगा , इसीलिए उसने गाँधी परिवार पर सीधा हमला बोल दिया। यहाँ तक कि सबसे भ्रष्ट नेताओं का जो पोस्टर प्रकाशित किया उसमें राहुल को तीसरे स्थान पर बता दिया जिससे उनका तिलमिलाना स्वाभाविक था। चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा ये तो अच्छे - अच्छे नहीं बता पा रहे क्योंकि भाजपा ने तो श्री केजरीवाल के विरुद्ध तगड़ी मोर्चेबंदी की ही किंतु कांग्रेस भी पूरे उत्साह के साथ लड़ती दिखाई दे रही है। शुरुआती हिचक के बाद श्री गाँधी ने आम आदमी पार्टी पर आरोपों की जो बौछार की उसके पीछे विपक्षी राजनीति के भावी समीकरण ही हैं। उनके मन में ये भय बैठ गया है कि यदि आम आदमी पार्टी बहुमत ले गई और श्री केजरीवाल फिर मुख्यमंत्री बने तो विपक्षी गठबंधन में वे बड़े नेता के तौर पर स्थापित हो जाएंगे। हरियाणा और महाराष्ट्र की पराजय के बाद इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी के विरुद्ध आवाजें उठने का परिणाम ही है कि ममता बेनर्जी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के पक्ष में खड़े हो गए। उन सबका मानना है कि कांग्रेस इस चुनाव में भी बुरी तरह हारेगी जिसके बाद राहुल का बचा - खुचा आभा मंडल भी फीका पड़ जाएगा। वहीं श्री केजरीवाल सरकार बनाने में सफल हो गए तब वे विपक्ष के ऐसे चेहरे के तौर पर उभरेंगे जिसने प्रधानमंत्री से लगातार तीसरा मुकाबला जीता। ये स्थिति श्री गाँधी को किसी भी तरह स्वीकार नहीं होगी। उनके मन में ये बात भी गहराई तक बैठ गई है कि महाराष्ट्र की हार के लिए तो शरद पवार और उद्धव ठाकरे भी जिम्मेदार माने गए किंतु हरियाणा में यदि श्री केजरीवाल ने अपने प्रत्याशी नहीं उतारे होते तो भाजपा विरोधी मतों में विभाजन की नौबत नहीं आती। इसीलिए वे आम आदमी पार्टी से हरियाणा का बदला लेने पर उतारू हैं। वे इस बात को समझ गए हैं कि दिल्ली में भाजपा की जीत श्री केजरीवाल की शिकस्त मानी जाएगी जिसके बाद कांग्रेस को अपने पाँव दोबारा जमाने में सहूलियत होगी। स्मरणीय है 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस अकेले लड़ी तब उसका मत प्रतिशत आम आदमी पार्टी से काफी ज्यादा था । 2013 में वह श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने में मदद न करती तो आम आदमी पार्टी इतनी बुलंदियों पर न पहुंच पाती। गाँधी परिवार इस बात को भी भांप गया है कि श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं केवल दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने तक सीमित नहीं रहने वालीं। और इस बार भी वे जीते तब उनका कद काफी ऊँचा हो जाएगा जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस और श्री गाँधी को होगा। यही सब सोचकर कांग्रेस दिल्ली चुनाव को त्रिकोणीय बनाने में जुट गई है। भाजपा को रोकने के लिए आम आदमी पार्टी को अपनी पीठ पर लादने की गलती वह नहीं दोहराना चाह रही। इसका कितना लाभ उसे मिलेगा ये तो 8 फरवरी की दोपहर को पता चलेगा किंतु राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल के बीच की जुबानी जंग ने इंडिया गठबंधन के दो फाड़ होने की शुरुआत कर दी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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