Saturday, 18 January 2025

बाकी वर्गों की बेहतरी भी सरकार का दायित्व

  

केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा कर सरकारी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों और अधिकारियों को नये साल में खुश होने का अवसर प्रदान कर दिया। यदि सब कुछ ठीक - ठाक रहा तब 1 जनवरी 2026 से नया वेतनमान लागू हो जाएगा। 10 वर्ष बाद वेतन - भत्तों में समयानुकूल वृद्धि पूरी तरह न्यायोचित है। समाचार माध्यमों में नये वेतनमान को लेकर जो अनुमानित आंकड़े प्रकाशित हो रहे हैं उनके अनुसार  उसके लागू होते ही उपभोक्ता बाजार में रौनक बढ़ने से  अर्थव्यवस्था में गतिशीलता आयेगी। ये जानकारी भी मिल रही है कि सरकार का कर संग्रह भी बढ़ेगा क्योंकि कुछ नये लोग आयकर के दायरे में आयेंगे वहीं कुछ को उच्च स्लैब में आने के कारण पहले से अधिक आयकर चुकाना होगा। मोटे अनुमान के अनुसार नये वेतनमान से लाभान्वित होने वाले औसत कर्मचारियों की बढ़ी हुई  कमाई का एक चौथाई हिस्सा तो आयकर में चला जायेगा जिसे प्रत्यक्ष कर कहा जाता है । वहीं उसे परोक्ष तौर पर  जीएसटी जैसा कर भी चुकाना होगा। जिसकी दरों को लेकर मध्यम वर्ग पर पहले से ही काफी दबाव है।  दूसरा पहलू ये भी है कि शासकीय कर्मचारियों के वेतन - भत्ते बढ़ने की खबर आते ही बाजार को नियन्त्रित कर रही ताकतें अभी से कीमतों में वृद्धि की तैयारी करने लगी हैं। अर्थशास्त्र में मांग और पूर्ति  का जो सिद्धांत है उसका असर वेतनमान लागू होते ही नजर आने लगेगा। सीधे तौर पर कहें तो महंगाई भी छलांग मारे बिना नहीं रहेगी। ज़ाहिर है उद्योग - व्यापार जगत वेतन आयोग गठित होने की खबर से उतना ही प्रसन्न है जितना कि सरकारी कर्मचारी और अधिकारी क्योंकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से बाजार में पैसे की आवक बढ़ेगी।  लेकिन देश में सरकारी क्षेत्र के अलावा जो नौकरपेशा वर्ग है उसे महंगाई में वृद्धि का सामना करना पड़ेगा । दरअसल निजी क्षेत्र में कार्यरत बहुत बड़ा वर्ग है जिसके पास अपने अधिकारों के लिए वैसा दबाव बनाने की ताकत नहीं है जैसी सरकारी कर्मचारियों के श्रमिक संगठनों में। उदारीकरण के बाद श्रमिक कानूनों का प्रभाव भी पहले जैसा नहीं रहा।  निजी क्षेत्र में तो श्रमिक आंदोलन अतीत की बात हो चुकी है। अब तो  संविदा नियुक्ति की व्यवस्था को सरकारी क्षेत्र ने भी पूरे तौर पर अंगीकार कर लिया है । परिणामस्वरूप उसमें स्थायी कर्मचारियों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। रिक्त पड़े पदों को नहीं भरा जा रहा क्योंकि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्यों की उनके पास स्थापना  व्यय बढ़ाने की क्षमता नहीं है। पुरानी पेंशन बंद करने के पीछे भी यही कारण रहा। कुछ राज्यों ने चुनावी लाभ के लिए पुरानी पेंशन शुरू भी की किंतु उसके बोझ से उनकी कमर टूट रही है। सरकार ने अपना काम चलाने के लिए निजी क्षेत्र की सेवाएं लेने का तरीका भी खोज लिया है। ये बात पूरी तरह सही है कि  नया वेतन आयोग गठित करना सरकार की बाध्यता है लेकिन विरोधाभासी स्थिति ये है कि मौजूदा वेतन - भत्तों का बोझ ही उसके लिए असहनीय होता जा रहा है। ऐसे में स्थापना व्यय में होने वाली  वृद्धि के लिए संसाधन जुटाना बड़ी समस्या बनेगी। और ये भी कि सबका साथ, सबका विकास के नारे का तकाजा है कि सरकार  केवल अपने अमले की बेहतरी तक सीमित न रहते हुए ये भी सोचे कि  जो अन्य मध्यमवर्गीय तबका है उसकी आय बढ़ाने के लिए क्या किया जा सकता है? सरकार का कर  संग्रह लगातार जिस मात्रा मात्रा में  बढ़ रहा है उसे देखते हुए आगामी केंद्रीय बजट में  जीएसटी की दरें घटाने और आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 10 लाख किये जाने की नितांत आवश्यकता है। ऐसा किये बिना गैर सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों और  लघु तथा मध्यम वर्गीय कारोबारियों को राहत की बजाय महंगाई का बोझ सहना पड़ेगा। सरकार को ये बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि उसके अपने अमले के अतिरिक्त जो जनता है उसकी बेहतरी के उपाय करना भी उसकी जिम्मेदारी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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