दक्षिण के राज्यों में उत्तर भारत और हिन्दी के प्रति यदि सबसे अधिक नफरत कहीं है तो वह तमिलनाडु है। वहाँ इस बात को भी प्रचारित किया जाता रहा है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़ हैं जबकि आर्य विदेशों से आये थे। आजादी के बाद से ही वहाँ उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध में वातावरण बनाया जाने लगा। रामास्वामी पेरियार ने उच्च जातियों के विरुद्ध आंदोलन चलाकर जिस नास्तिकतावाद को द्रविड़ आंदोलन की शक्ल में आगे बढ़ाया कालांतर में इस राज्य की राजनीति उसी में उलझकर रह गई। द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) से शुरू उस राजनीतिक धारा को यद्यपि आगे चलकर एम.जी.रामचंद्रन ने (अद्रमुक) अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बनाकर दो हिस्सों में बांट दिया। उसमें से भी छोटी - छोटी कुछ धाराएं और निकलीं किंतु मुख्य रूप से द्रमुक और अद्रमुक ही बारी - बारी से राज करते रहे। संघीय ढांचे के कारण तमिलनाडु को भी केंद्र से रिश्ते रखने पड़ते हैं और इसी वजह से दोनों द्रविड़ पार्टियां केंद्र में बनी गठबंधन सरकारों से जुड़ती रहीं किंतु उनका दृष्टिकोण सदैव राष्ट्रीय हितों से परे द्रविड़ अस्मिता से प्रेरित और प्रभावित रहा। इसके चलते उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं किया। ये दुर्भाग्य ही है कि मुख्यधारा से अलग चलने के बावजूद इन दोनों पार्टियों के दबाव को कांग्रेस और भाजपा दोनों सहती आ रही हैं। राजीव गाँधी की हत्या के आरोप से घिरी द्रमुक के साथ कांग्रेस का गठबंधन है जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अकारण गिरवा देने वाली अद्रमुक से बाद में भाजपा ने गठबंधन कर लिया। केंद्र पर दबाव डालकर अपने राज्य के लिए अधिकाधिक संसाधन या अन्य सुविधा हासिल करने में तो दक्षिण के सभी राज्यों का रवैया एक जैसा रहा है किंतु तमिलनाडु जैसी अलगाव की भावना उनमें नहीं है। श्रीलंका में चले तमिल इलम आंदोलन को द्रमुक का खुला समर्थन था। ये कहना भी गलत नहीं है कि तमिलनाडु को अलग देश बनाने का सपना स्व. करुणानिधि देखने लगे थे। हालांकि वह साकार नहीं हो सका , लेकिन अलगाववाद रूपी ज़हर के बीज समय - समय पर अंकुरित होते रहे हैं। कभी कोई नेता हिन्दी लादने पर भारत से अलग होने की धमकी देता है तो कोई सनातन को नष्ट करने का आह्वान करने की हिमाकत कर बैठता है। सरकार में बैठते समय भारत के संविधान की शपथ लेने वाले तमिलनाडु के राजनेता उसकी धज्जियां उड़ाने की धृष्टता गाहे - बगाहे करते रहते हैं। हालांकि तमिलनाडु के लाखों लोग देश के अन्य राज्यों में बस गए हैं। वहाँ उनके साथ कभी भेदभाव नहीं हुआ और न ही उन्होंने हिन्दी के प्रति कभी कोई शिकायत की। उत्तर भारत के सस्थानों से हिन्दी में उपाधि अर्जित कर सैकड़ों तमिलभाषी केंद्रीय विभागों में राजभाषा अधिकारी बन गए। ये सब देखकर लगता है कि तमिलनाडु में हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान तीनों को लेकर जो विषवमन किया जाता है उसके पीछे वह राष्ट्रविरोधी सोच ही है जो स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की स्थापना की पक्षधर है। इसका ताजा उदाहरण है गत दिवस राज्य विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण के अवसर पर राष्ट्रगान की बजाय तमिलनाडु का राज्य गान गाया जाना। परंपरानुसार राज्यपाल के अभिभाषण के पूर्व और उपरांत राष्ट्रगान गाया जाता है। लेकिन केवल तमिलनाडु का राज्य गान ही हुआ तब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष से राष्ट्रगान हेतु कहा किंतु उन्होंने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जिससे रुष्ट होकर वे बिना अभिभाषण पढ़े लौट आये और सोशल मीडिया पर भी राज्य सरकार के प्रति आलोचनात्मक टिप्पणी पोस्ट कर दी। जवाब में मुख्यमंत्री ने राज्यपाल पर तमिलनाडु के अपमान का आरोप लगाते हुए पद छोड़ने की मांग कर डाली। हालांकि राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच तनातनी नई बात नहीं है। गैर भाजपा शासित अन्य राज्यों से भी इस तरह की खबरें आये दिन सुनाई देती हैं। लेकिन राष्ट्रगान के स्थान पर राज्य गान का वादन या गायन संघीय व्यवस्था के प्रति अलगाव के भाव को दर्शाता है। मुख्यमंत्री स्टालिन और राज्यपाल के बीच चलने वाली खींचतान के चलते संवैधानिक परंपराओं और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों का अपमान हो तो ये अक्षम्य है। स्मरणीय है स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने , जो उनकी सरकार में मंत्री भी हैं, कुछ समय पूर्व सनातन की तुलना कोरोना और कैंसर से करते हुए उसे नष्ट करने का आह्वान किया था। आश्चर्य ये है कि इंडिया गठबंधन के किसी भी घटक ने तमिलनाडु विधानसभा में राष्ट्रगान के अपमान पर द्रमुक सरकार की आलोचना नहीं की। कांग्रेस भी तमिलनाडु में स्टालिन सरकार का हिस्सा है। एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उससे ये अपेक्षा है कि वह राष्ट्रगान के अपमान के लिए मुख्यमंत्री स्टालिन की आलोचना करे। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि तमिल राष्ट्र के आंदोलन से उपजी घृणा ने ही राजीव गाँधी की जान ले ली थी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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