Tuesday, 28 January 2025

अपने बनाये संसार से बाहर नहीं निकल पा रहे राहुल

म.प्र के महू नगर में गत दिवस कांग्रेस की रैली हुई जिसमें राहुल गाँधी अपने भाषण में  जातिगत जनगणना, आरक्षण की सीमा , अंबानी और अदाणी जैसे  मुद्दों में ही उलझे रहे। संविधान पर खतरे के साथ ही  नौकरशाहों में दलित और पिछड़ी जातियों के अधिकारियों की कम संख्या का रोना भी उन्होंने रोया। इन बातों का जनता पर  कितना प्रभाव हुआ ये तो हालिया चुनाव परिणाम बता ही चुके हैं। आजकल  दिल्ली में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ  हैं। सभी पार्टियां पूरा जोर लगा रही हैं किंतु राहुल एक - दो सभाएं कर सुस्त हो गए। चर्चा है कि वरिष्ट नेता अजय माकन को पत्रकार वार्ता करने से रोक रखा गया है क्योंकि वे केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने वाले थे।  केजरीवाल सरकार को सबसे बड़ा झटका जिस शराब घोटाले से लगा उसकी जांच भी कांग्रेस की शिकायत पर ही शुरू हुई थी।  इसीलिए इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी का शामिल होना भी स्थानीय कांग्रेस जनों को रास नहीं आया। लोकसभा चुनाव  मिलकर लड़ने के बाद भी राजधानी की सातों सीटें हार जाने पर दोनों के बीच खटास फिर बढ़ी और विधानसभा चुनाव में दोनों एक - दूसरे के विरुद्ध डटे हुए हैं। हाल ही में आम आदमी पार्टी ने सबसे भ्रष्ट नेताओं का जो पोस्टर जारी किया उसमें तीसरे स्थान पर श्री गाँधी हैं । अब तक उन्होंने उस पर टिप्पणी का साहस नहीं दिखाया। दिल्ली चुनाव के बारे में कहा जा रहा था कि कांग्रेस इस बार दलितों तथा मुसलमानों के बीच अपना  जनाधार हासिल करने के लिए पूरा जोर लगायेगी किंतु ऐसा लगता है शीर्ष नेतृत्व एक बार फिर  आम आदमी पार्टी को छोड़ भाजपा को रोकने की रणनीति पर चल पड़ा है।  संदीप दीक्षित और अजय  माकन तो न जाने कितनी बार आम आदमी पार्टी के प्रति सख्त होने की मांग कर चुके हैं किंतु ऐसा लगता है गाँधी परिवार आज तक श्री केजरीवाल की उस धमकी से घबराया हुआ है कि उनके हाथ ईडी आ जाए तो सोनिया गाँधी को जेल में डाल देंगे। ये भी स्मरणीय है कि उन्होंने इटली से अगस्ता  वेस्टलैंड हेलीकाप्टरों के सौदे में हुए भ्रष्टाचार के  विरुद्ध कारवाई करने की चुनौती मोदी सरकार को दी थी। रॉबर्ट वाड्रा पर शिकंजा कसने की मांग भी श्री केजरीवाल लम्बे समय तक करते रहे।  ऐसे में जितनी मशक्कत राहुल ने अदाणी और अंबानी के विरुद्ध मोर्चा खोलने में की उसकी आधी भी  केजरीवाल सरकार  की घेराबंदी में करते तो  इस बार मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ होता। महू की रैली में श्री गाँधी ने समाचार माध्यमों पर  अंबानी परिवार के विवाह के प्रसारण का तंज तो कसा किंतु वे इस बात को भूल गए कि कांग्रेस के तमाम नेता भी उसमें शिरकत करने पहुंचे थे। कुल मिलाकर श्री गाँधी अपने बनाये संसार से बाहर निकलने तैयार नहीं हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के संदर्भ में जब उन्हें आगे आकर मोर्चा संभालना था तब वे विदेश चले गए। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद वे जरूरत से ज्यादा आत्ममुग्ध हो उठे थे । हालांकि हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों ने उस खुशफहमी की हवा निकाल दी। दिल्ली चुनाव की शुरुआत में ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस को ये बात समझ में आ चुकी है कि उसके असली दुश्मन क्षेत्रीय दल हैं जिन्होंने उसी के वोट बैंक में सेंध लगाकर अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली कि कांग्रेस को उनका पिछलग्गू बनने मजबूर होना पड़ा। आम आदमी पार्टी के कारण तो कांग्रेस राष्ट्रीय राजधानी में चारों खाने चित्त होने जैसी शर्मनाक स्थिति में आ पहुंची। ऐसे में श्री गाँधी को चाहिए था कि वे अपना पूरा समय दिल्ली चुनाव में लगाते हुए कांग्रेस को पुरानी गौरवशाली स्थिति तक ले जाने के प्रयास करते। कांग्रेस के विरोधी भी ये कहते मिल जायेंगे कि दिल्ली का जितना विकास स्व. शीला दीक्षित ने किया वह अतुलनीय है। लेकिन कांग्रेस इसका लाभ नहीं ले पा रही। मत प्रतिशत में वृद्धि की संभावना के बावजूद उसकी सीटों को लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है। वहीं भाजपा 2015 और 2020 की हार से सबक लेते सरकार बनाने के हौसले के साथ उतरी क्योंकि उसका शीर्ष नेतृत्व भी मैदान में है। पाँच फरवरी को दिल्ली में मतदान होना है। मौजूदा सरकार के प्रति नाराजगी सतह पर नजर भी आने लगी है किंतु कांग्रेस अभी तक गंभीर नजर नहीं आ रही जिससे मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच सिमटकर रह गया है। ताजा सर्वे बता रहे हैं कि दोनों पार्टियों के बीच बेहद नजदीकी टक्कर है जिसमें बाजी किसी के भी हाथ लग सकती है। वहीं कांग्रेस शून्य के आंकड़े से कुछ ऊपर आ जाए तो भी आश्चर्य से कम नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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