दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होने से सरगर्मी कुछ ज्यादा ही है। कांग्रेस जो पिछले दो चुनावों में शून्य पर पहुँच गई थी इस बार अपना अस्तित्व बचाने हाथ पाँव मार रही है। वहीं भाजपा की कोशिश है वह लोकसभा चुनाव के धमाकेदार प्रदर्शन के अनुरूप विधानसभा चुनाव में भी सफलता हासिल कर सके जिसके लिए वह बीते 25 साल से तरस रही है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस बार अपने को घिरा हुआ मानकर बेहद सतर्क है। शराब घोटाले के अलावा मुख्यमंत्री आवास पर श्री केजरीवाल द्वारा किया गया बेतहाशा खर्च भी उसके लिए मुसीबत बना हुआ है। कांग्रेस और भाजपा दोनों रोजाना नये - नये सवाल पूछकर आम आदमी पार्टी को रक्षात्मक होने मजबूर कर रही हैं। इस बार के चुनाव में अनेक पुराने साथी श्री केजरीवाल का साथ छोड़ गए। वहीं मनीष सिसौदिया जैसे दिग्गज को तो चुनाव क्षेत्र बदलना पड़ गया। आक्रमण आम आदमी पार्टी भी कर रही है किंतु उसे इस बात का डर सताने लगा है कि यदि कांग्रेस अपने मतों में 5 फीसदी की वृद्धि भी कर ले गई तब उसकी राह कठिन हो जाएगी। इसीलिए श्री केजरीवाल आरोप लगा रहे हैं कि उनके विरुद्ध कांग्रेस और भाजपा में गुप्त समझौता हुआ है। हालांकि उनके विरुद्ध कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र पूर्व सांसद संदीप दीक्षित को उतार दिया जबकि भाजपा ने भी पूर्व मुख्यमंत्री साहेब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को उम्मीदवार बनाया है जो पिछली लोकसभा के सदस्य थे किंतु उन्हें टिकिट से वंचित रखा गया। बयानों के तीर सभी पक्षों से चल रहे हैं। लेकिन ये बात सही है कि इस बार भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध उतनी आक्रामक नहीं हैं और दोनों की तोपों के मुँह आम आदमी पार्टी की तरफ ही हैं। लेकिन गत दिवस कालका सीट से भाजपा के उम्मीदवार रमेश बिधूड़ी ने पहले कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा और उसके बाद मुख्यमंत्री आतिशी सिंह के बारे में आपत्तिजनक बयान देकर भाजपा को व्यर्थ की मुसीबत में डाल दिया। एक बयान में उन्होंने मतदाताओं को आश्वस्त किया कि भले ही लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकना बनवाने का वायदा पूरा नहीं किया किंतु वे दिल्ली की सड़कों को प्रियंका के गालों जैसा बनवाएंगे। उनके इस बयान की चौतरफा आलोचना हुई तो उन्होंने माफी की रस्म अदायगी कर डाली । लेकिन कुछ देर बाद ही वे बोल बैठे कि मुख्यमंत्री आतिशी ने तो अपना पिता बदल लिया जो पहले अपने नाम के साथ मार्लेना लगाती थीं किंतु अब आतिशी सिंह लिखती हैं। इसके बाद आम आदमी पार्टी भाजपा पर चढ़ बैठी और इस बयान को दिल्ली की महिलाओं का अपमान बताते हुए मुद्दा बनाने की पहल शुरू कर दी। यद्यपि तीख़ी बयानबाजी सभी पक्षों द्वारा जारी है किंतु श्री बिधूड़ी ने प्रियंका और आतिशी के बारे में जो कुछ कहा वह शालीनता के लिहाज से बेहद आपत्तिजनक था। लालू ने बरसों पहले जो कहा उसे आधार बनाकर नई टिप्पणी करना दिमागी दिवालियापन नहीं तो और क्या है? ये वही बिधूड़ी हैं जिहोंने लोकसभा में किसी विपक्षी सांसद पर बेहद निम्नस्तरीय कटाक्ष कर दिया। उस पर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग भी उठी। हालांकि वह मंजूर नहीं हुई किंतु भाजपा ने उनकी लोकसभा टिकिट काट दी। जिससे ये संदेश गया कि लोकसभा में उनकी टिप्पणी को पार्टी नेतृत्व ने पसंद नहीं किया। लेकिन विधानसभा चुनाव में उनको उम्मीदवार बना दिया गया। उल्लेखनीय है श्री बिधूड़ी दिल्ली से लोकसभा और विधानसभा सदस्य रह चुके हैं जिससे उनका जनाधार साबित होता है। ये भी हो सकता है कि उनको बगावत से रोकने मुख्यमंत्री के विरुद्ध उतारकर बलि का बकरा बना दिया गया हो। लेकिन उनके संदर्भित बयानों ने भाजपा की अच्छी भली आक्रामकता को झटका दे दिया। यद्यपि बेलगाम जुबान वाले नेता कमोबेश हर पार्टी में हैं किंतु भाजपा जैसी अनुशासन पसंद पार्टी में श्री बिधूड़ी जैसे नेताओं को क्यों ढोया जाता है ये समझ से परे है। हालांकि राजनीतिक विमर्श में भाषा की मर्यादा जिस तरह तार - तार हो रही है वह चिंता का विषय है। चुनाव जीतने की क्षमता ही उम्मीदवारी का आधार मान लेने के कारण पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों को अवसर देती हैं। श्री बिधूड़ी जीतेंगे या नहीं ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि उन्होंने अपनी पार्टी को शर्मिंदगी झेलने मजबूर कर दिया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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