1974 में टावरिंग इन्फर्नो नामक अमेरिकी फिल्म ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। जॉन गुइलेरमिन द्वारा निर्देशित उस फिल्म के निर्माता इरविन एलन थे। एक गगनचुंबी बहुमंजिला इमारत में आग लगने के बाद किये गए बचाव कार्यों का बड़ा ही रोमांचित करने वाला चित्रण उस फिल्म में था। तकनीक के बेहतरीन प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हालीवुड की वह फिल्म ढेर सारे ऑस्कर अवार्ड जीतकर कालजयी बन गई। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए वह फिल्म एक मार्गदर्शक कहलाई। उससे प्रेरित होकर अनेक देशों में आपदा आधारित फिल्में बनीं जिनमें भारत की बर्निंग ट्रेन भी थी। हालांकि दर्शकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी फिल्मों में भी नाटकीयता भरी जाती है किंतु देखने में आया है कि अक्सर पथकथा लेखक की काल्पनिकता कालांतर में वास्तविकता बन जाती है । विगत कुछ दिनों से अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य के लॉस एंजिलिस शहर और उसके इर्द - गिर्द लगी भीषण आग ने अग्निकांड आधारित कहानियों को वास्तविकता में बदल दिया है। आग की लपटें हालीवुड के फिल्मी क्षेत्र तक जा पहुंची हैं। लॉस एंजिलिस अमेरिका के बेहद महंगे शहरों में गिना जाता है। फिल्मी सितारों के अलावा तमाम धनकुबेर इस शहर में रहते हैं। अमेरिका की वर्तमान उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का निवास भी यहीं है। आग जिस तरह फैल रही है उसकी वजह से अनेक नामी - गिरामी फिल्मी सितारों तथा अन्य हस्तियों के महलनुमा घर जलकर राख हो गए। आग बुझाने के लिए हेलीकाप्टर और अन्य अग्नि शमन साधनों का उपयोग किया जा रहा है किंतु उसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। हालात बेकाबू हो चुके हैं। जिन संस्थानों के जिम्मे आग बुझाने का दायित्व है वे संसाधनों के अभाव का रोना रो रहे हैं। 10 दिन बाद राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने जा रहे डोनाल्ड ट्रम्प ने निवर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन पर इसका ठीकरा फोड़ते हुए आपदा प्रबंधन की दयनीय स्थिति का पर्दाफाश किया। साथ ही कैलीफोर्निया राज्य के गवर्नर पर भी गुस्सा व्यक्त किया है। स्मरणीय है अमेरिका का यह राज्य निकटवर्ती जंगलों में लगने वाली आग के कारण लंबे समय से परेशानी झेल रहा है। जंगलों में पतझड़ के बाद सूखे पत्तों में आग से उठने वाला धुंआ शहरों के आसमान में फैलकर वातावरण को प्रदूषित करता है लेकिन इस बार बात धुएं से आगे बढ़कर आग तक जा पहुंची जिसके कारण हजारों मकान भस्म हो चुके हैं। लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। आग जिस तरह फैलती जा रही है उसे देखकर अग्नि शमन के काम में लगीं एजेंसियां असहाय नजर आ रही हैं। ये दशा उस देश की है जो विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है। तकनीक के मामले में भी वह दुनिया का सिरमौर है। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के सामने उसकी लाचारी समय - समय पर उजागर होती रही है। कभी समुद्री चक्रवात उसके तटवर्ती शहरों में जल प्रलय के हालात पैदा कर देते हैं तो कभी बर्फबारी से जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। ये देश दुनिया भर को तकनीक निर्यात करता है। इसे अपनी साधन संपन्नता पर बड़ा घमंड है। भारत सहित विकासशील देशों के युवाओं का सपना अमेरिका में बसने का होता है। वहाँ की सुरक्षित और सुविधा संपन्न जीवन शैली आकर्षण का प्रमुख कारण है। लेकिन लॉस एंजिलिस का ताजा अग्निकांड साबित कर रहा है कि ज्ञान - विज्ञान के अनंत आकाश छू लेने के बाद भी प्रकृति के कोप से बचने की सामर्थ्य इंसान पैदा नहीं कर सका। भारत को अमेरिका में आई इस आपदा से सतर्क होकर अपने आपदा प्रबंधों को दुरुस्त करने की सख्त जरूरत है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में अनेक अग्निकांड ऐसे हुए जिनका सामना करने वाली व्यवस्था अपर्याप्त भी थी और घटिया भी। कुछ अस्पतालों में लगी आग में घिरकर वहाँ भर्ती अनेक मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ा जिनमें बच्चे भी काफी थे। जाँच में पाया गया कि आग बुझाने हेतु की गई व्यवस्था समय पर धोख़ा दे गई। म.प्र की राजधानी भोपाल स्थित सचिवालय भवन में लगी आग को बमुश्किल बुझाया गया वह भी सेना की मदद से। ये देखते हुए भारत में आपदा प्रबन्धन की जो भी व्यवस्थाएं हैं उनकी समीक्षा आवश्यक है। हमारे देश के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में आग से प्रतिवर्ष करोड़ों की वन संपदा की क्षति के साथ ही वन्य प्राणियों की भी मौत होती है। ऐसी आग को रोकने में संबंधित महकमा कितना सफल होता है ये किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में बनी टावरिंग इन्फर्नो नामक फिल्म तो कल्पना पर आधारित थी किंतु लॉस एंजिलिस में लगी आग हकीकत है जिससे सबक लेना भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि जब अमेरिका उस आपदा के सामने असहाय है तब हम अपनी स्थिति का आकलन आसानी से कर सकते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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