गत वर्ष आज ही के दिन जब अयोध्या स्थित राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई तब समूचे विश्व में फैले सनातनियों के मन में विजयोल्लास हिलोरें मार रहा था। सदियों तक चले संघर्ष के बाद बन सका यह मंदिर केवल ईंट - गारे से बना भवन ही नहीं बल्कि सैकड़ों वर्षों की मानसिक गुलामी से हासिल मुक्ति का प्रतीक है। हालांकि 15 अगस्त 1947 को विदेशी सत्ता से भारत को आजादी मिल गई थी किंतु देश के विभाजन से उत्पन्न पीड़ा के कारण आत्मगौरव का वह भाव उत्पन्न नहीं किया जा सका जो भारत के अस्तित्व का आधार रहा है। सच्चाई तो ये है कि राम मंदिर के जरिये पूरे विश्व को ये संदेश दिया गया कि भारत ने मानसिक स्वाधीनता के लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग अब जाकर खोजा है। इसीलिए उसको मात्र सनातन धर्म से जोड़ना उचित नहीं है क्योंकि जिस तरह से दिल्ली के राजघाट में बापू की समाधि पर लिखा हे राम , पूरे देश के मनोभावों का प्रतिनिधित्व करता है उसी तरह अयोध्या में निर्मित राम मंदिर भारत की सनातन संस्कृति का उद्घोष है । समूचे विश्व में बसे भारतीय समुदाय द्वारा उक्त अवसर पर व्यक्त हर्षोल्लास के पीछे इस देश की मिट्टी के प्रति उनकी अखंड आस्था है जो मातृभूमि से हजारों मील की दूरी के बाद भी जीवंत है तो उसका आधार श्री राम ही हैं , जो आदर्शमय जीवन के ऐसे मापदंड हैं जिसका कोई विकल्प आज तक न उत्पन्न हुआ और न ही होगा। राम जन्मभूमि पर आततायी विधर्मी शासकों के आधिपत्य के विरुद्ध सैकड़ों वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। यद्यपि जयचंद की मानसिकता से ग्रसित लोग यह भ्रम फैलाने से बाज नहीं आये कि राम एक कल्पना मात्र हैं जिनके अस्तित्व की प्रामाणिकता नहीं है । दरअसल इसी तरह के कुतर्कों ने उस विकृत मानसिकता को जन्म दिया जिसके कारण हमें सदियों तक सनातन विरोधियों की गुलामी झेलनी पड़ी । उस दौरान हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने के षडयंत्र लगातार चले परंतु श्री राम में अटूट विश्वास ने भारतवासियों का मनोबल ऊंचा रखा। 15 अगस्त 1947 के बाद उम्मीद थी कि महात्मा गांधी की इच्छानुसार रामराज आयेगा किंतु अंग्रेजी संस्कृति से प्रभावित राजनीतिक नेतृत्व ने बापू की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए उस बुनियादी भाव को उपेक्षित और अपमानित करने का कुचक्र रचा जो हमारी एकता का आधार है । लेकिन समय ने करवट ली और भारत का लुप्त होता स्वाभिमान लौटने लगा जिसकी झलक पिछली शताब्दि के अंतिम दशक में ही दिखाई देने लगी थी। यद्यपि राम जन्मभूमि की मुक्ति का संघर्ष तो कई पीढ़ियों से चला आ रहा था किंतु सफलता तभी मिली जब वह जनांदोलन बना । ये एक तरह से आसुरी शक्तियों को परास्त करने के लिए वानर सेना का गठन किये जाने जैसा था। राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा संघर्ष जब चरमोत्कर्ष पर पहुंचा तो फिर विधर्मी दासता के प्रतीक को धूल - धूसरित होते देर न लगी। जो इस बात का प्रमाण था कि अभेद्य राक्षसी दुर्ग को राम भक्ति की साधारण शक्ति भी तहस - नहस करने में सक्षम है। उस दृष्टि से 6 दिसंबर 1992 की तारीख एक नए अध्याय की शुरुआत थी । राम मंदिर के निर्माण से अयोध्या को उसकी प्राचीन भव्यता मिलने के साथ ही देश को अपनी दिव्यता का जो अनुभव हुआ वह सही मायने में सनातन परंपरा से जुड़े करोड़ों भारतीयों के मन में नव विश्वास की प्राण - प्रतिष्ठा है। इसके माध्यम से भारत ने पूरे विश्व को ये आभास करवा दिया कि उसने अपने आधारभूत आदर्शों को पुनर्स्थापित करने का संकल्प ले लिया है। राम मंदिर में गत वर्ष संपन्न प्राण प्रतिष्ठा से महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद के उस विश्वास की पुष्टि हुई है कि 21 वीं सदी भारत के नाम होगी। बीते एक वर्ष में अयोध्या आये लाखों श्रद्धालुओं ने इस मंदिर निर्माण के औचित्य को साबित कर दिया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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