दिल्ली विधानसभा चुनाव में बाकी मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए और पूरा चुनाव मुफ्त रेवड़ियों पर केंद्रित हो गया। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता हासिल ही मुफ्त बिजली और पानी का लालच देकर की थी। यद्यपि सरकारी शालाओं का स्तर सुधारने और मोहल्ला क्लीनिक जैसे उसकी सरकार के कार्यों को हर किसी ने सराहा किंतु अरविंद केजरीवाल को 2015 और 2020 के चुनाव में जो ऐतिहासिक बहुमत मिला उसका मुख्य श्रेय मुफ्त बिजली और पानी को ही दिया जाता है। इन दोनों का लाभ समाज के उस वर्ग ने भी उठाया जो शासकीय शालाओं और मोहल्ला क्लीनिक की सेवाएं नहीं लेता। बाद में अन्य राज्यों के चुनावों में भी ऐसे ही वायदों की शुरुआत हुई। किसी राजनीतिक दल ने इसे गारंटी का नाम दिया तो किसी ने कुछ और। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस ने मुफ्त सुविधाओं की जो गारंटियाँ घोषणापत्र के जरिये दीं उनके कारण ही उसे वहाँ सफलता मिली। बाद में म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना प्रारंभ कर अंतिम छह माह में भाजपा के पक्ष में जबरदस्त लहर पैदा कर दी। लेकिन शोध का विषय है कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की राज्य सरकार द्वारा अंधाधुंध रेवड़ियां बांटे जाने के बाद भी भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को मुफ्त राशन, रसोई गैस कनेक्शन और प्रधानमंत्री आवास योजना का भरपूर लाभ मिला वरना वह सत्ता से सत्ता से बाहर हो सकती थी। उसके बाद चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। उनमें झारखंड में हेमंत सोरेन और महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति सरकार की वापसी के लिए महिलाओं के लिए चुनाव के कुछ महीने पहले शुरू की गई लाड़ली बहना जैसी योजना को श्रेय मिला। उससे प्रभावित होकर श्री केजरीवाल ने दिल्ली में महिलाओं को 2100 रु प्रतिमाह देने का वायदा करने के साथ ही वृद्धों को भी हर माह निश्चित राशि देने और 25 लाख तक का मुफ्त इलाज निजी अस्पताल में करवाने जैसी रेवड़ियों की घोषणा कर दी। इसके अलावा मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों के लिए भी 18 हजार प्रतिमाह सम्मान निधि का वायदा कर दिया गया। जवाब में भाजपा और कांग्रेस ने भी महिलाओं को 2500 रु. हर माह देने के अलावा और भी बढ़ - चढ़कर वायदे कर डाले। हालांकि चुनाव में आम आदमी पार्टी सरकार की शराब नीति, शीश महल और अधूरे वायदे भी मुद्दे हैं , जिनको लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों श्री केजरीवाल को घेर रही हैं । वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी इस बात का रोना रोते नहीं थक रही कि केंद्र सरकार ने उसे काम नहीं करने दिया। और भी बातें हो रही हैं किंतु चुनाव विश्लेषक ये मान रहे हैं कि फैसला रेवड़ियों से ही प्रभावित होगा। मसलन मुफ्त बिजली और पानी जैसी सुविधाओं का गरीब वर्ग में असर है। हालांकि नये वायदों को लेकर आम आदमी पार्टी पर ये आरोप भी लग रहे हैं कि पंजाब में उसने जिन रेवड़ियों का वायदा किया था वह पूरा नहीं किया। इसलिये उस पर भरोसा न किया जाए। इसी के साथ मतदाताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो मुफ्त खोरी को बढ़ावा देने वाली इन नीतियों को नापसंद करता है किंतु अब जबकि आम आदमी पार्टी के अलावा भाजपा और कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चल रही हैं तब किसे दोष दिया जाए ये समझ से परे है। सबसे बड़ी बात ये है कि अपनी नीतियों और कार्यक्रमों से मतदाताओं को आकर्षित करने की जगह मुफ्त उपहार बाँटकर चुनाव जीतने के इन तरीकों पर न तो चुनाव आयोग रोक लगा रहा है और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लेने की तकलीफ की। ऐसे में अब पूरा चुनाव इस बात पर आकर टिक गया है कि कौन सी पार्टी कितनी ज्यादा खैरात देगी। केजरीवाल सरकार ने यदि 10 सालों में बहुत अच्छा काम किया तब उस नई रेवड़ियां बांटने की जरूरत नहीं पड़ती। इसी तरह अपनी विफलताओं के लिए केंद्र सरकार को कसूरवार ठहराना भी बेमानी है क्योंकि श्री केजरीवाल फिर सत्ता में आये तब भी उनका इसी केंद्र सरकार से पाला पड़ेगा। ऐसा लगता है राजनीतिक दलों का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा चुका है। चूंकि वे पुराने वायदे पूरे नहीं कर पाते इसलिये वे रेवड़ियों के जरिये मतदाताओं को लुभाने के लिये नगद राशि का प्रलोभन देते हैं जो अनुचित भी है और अनैतिक भी। चूंकि सभी राजनीतिक दलों का उद्देश्य किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना है इसलिये वे इसके विरोध में बोलने का साहस नहीं दिखा पाते। लेकिन इनके कारण सरकार का खजाना जिस तरह खाली होता जा रहा है वह बड़े खतरे का कारण बन रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि रेवड़ियों का चलन समाज में वर्ग भेद उत्पन्न करने का कारण बन रहा है। जरूरतमंद लोगों की सहायता और संरक्षण सरकारों का दायित्व है किंतु इसकी आड़ में लोगों, विशेष रूप से युवाओं को अकर्मण्य बनाना किसी अपराध से कम नहीं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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