आज ग्रामीण भारत महोत्सव 2025 के शुभारंभ के पूर्व सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है कि हमारे गाँव जितने समृद्ध होंगे, विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में उनकी भूमिका उतनी ही बड़ी होगी। 9 जनवरी तक चलने वाला यह महोत्सव विकसित भारत 2047 के लिए एक लचीले ग्रामीण भारत का निर्माण विषय पर केंद्रित ही। इस महोत्सव के दौरान ग्रामीण भारत की उद्यमशीलता की भावना और सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाया जाएगा। ये बात तो हर कोई जानता और मानता है कि भारत कृषि प्रधान देश है और अंधाधुंध शहरीकरण के बावजूद आज भी लगभग तीन चौथाई जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है। हालांकि शहरी क्षेत्रों का विस्तार होते जाने के साथ ही सड़क और बिजली पहुँचने के कारण ग्रामीण भारत में भी जबरदस्त बदलाव हुआ है। जनता के रहन - सहन के तौर - तरीकों में आया परिवर्तन आश्चर्यचकित करने वाला वाला है। सड़क और बिजली के बाद ग्रामीण जीवन को जिस चीज ने सबसे अधिक प्रभावित किया वह है संचार माध्यम। टीवी, और मोबाइल के साथ इंटरनेट सुविधा की उपलब्धता ने भारत के गाँवों में बीते 20 वर्षों में जितना बदलाव किया उतना आजादी के बाद के 50 सालों में देखने नहीं मिला। और इसीलिए तमाम उपभोक्ता कंपनियों ने शहरों के समानांतर ग्रामीण उपभोक्ता पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। परिणाम वहाँ से पूर्वापेक्षा ज्यादा मांग आ रही है। टीवी, फ्रिज के बाद अब गाँवों में एयर कंडीशनर भी देखने मिल जाते हैं। वो जमाने लद गए जब वहाँ केवल मोटर साइकिल, जीप और ट्रैक्टर की मांग थी। उससे आगे बढ़कर अब ग्रामीण भारत में स्कूटी और महंगी लग्जरी कारें भी जमकर बिक रही हैं। निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को भी गाँवों में कमाई का स्रोत नजर आया तो उन्होंने भी शहरों के बाहर अपने संस्थान खोलकर ग्रामीण जनता को आकर्षित करने का दांव चला। उसके चलते वहाँ एंबुलेंस और स्कूल बसों की आवाजाही नजर आने लगी है। हालांकि ये स्थिति उन गाँवों की ही है जो शहरों के निकट हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित कम आबादी वाले हजारों गाँवों के लिए विकास एक सपने जैसा है। आजादी के बाद से ही गाँवों, के विकास के लिए अनगिनत योजनाएं बनीं। ग्रामीण विकास के लिए हर सरकार भारी - भरकम बजट का प्रावधान करती है। लेकिन भ्रष्टाचार के कारण उसका सही लाभ गाँवों को नहीं मिल सका। शहरों की तरफ भागने की प्रवृत्ति के पीछे विकास की कमी ही बड़ा कारण है। ग्रामीण भारत महोत्सव उस दिशा में एक अच्छा प्रयास कहा जायेगा बशर्ते वह सरकारी कर्मकांड से परे ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को गहराई से समझकर उन्हें पूरा करने पर ध्यान दे। इस दिशा में सबसे बड़ा विचारणीय मुद्दा है खेती के प्रति ग्रामीण युवाओं की घटती रुचि। केवल बाजार के विकास और ग्रामीण जनता को उपभोक्तावाद के शिकंजे में जकड़ लेना विकास का सही पैमाना नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की कल्पना बिना कृषि के असंभव है। तमाम विसंगतियों के बाद भी खेती रोजगार के आधारभूत स्रोतों में है। इसीलिए मशीनीकरण के बाद भी बुवाई और कटाई के मौसम में शहरी इलाकों में कार्यरत श्रमिक गाँवों में चले जाते हैं। लेकिन बाकी समय खेतिहर मजदूरों की कमी के चलते कृषि करने वाले परेशान होते हैं। ग्रामीण भारत का नौजवान शहरी आकर्षण के वशीभूत जिस प्रकार गाँव छोड़ देता है उसकी वजह से पीढ़ियों से खेती करते आ रहे लोग अपनी जमीनें बेचने मजबूर हैं। विकास कार्यों के लिए भूमि का अधिगृहण भी खेती के रकबे में कमी का कारण है। खेती को लाभ का व्यवसाय तभी बनाया जा सकेगा जब किसान का पूरा परिवार उसमें संलग्न हो। इसके लिए जरूरी है ग्रामीण और शहरी इलाकों के विकास में विषमता दूर की जाए। शिक्षा के प्रसार के कारण ग्राम छोड़ने की परिस्थिति उत्पन्न होना अलग बात है किंतु रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन होना देश के कृषि प्रधान होने के दावे पर संदेह उत्पन्न करता है। किसानों की आत्महत्या, न्यूनतम समर्थन मूल्य, गाँवों से पलायन जैसे अनेक मुद्दे लंबे समय से राष्ट्रीय विमर्श में हैं किंतु कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाने के कारण व्यर्थ का तनाव बना हुआ है। हालांकि इसके पीछे सक्रिय ताकतों का उद्देश्य गाँवों और किसानों का हित न होकर अपनी राजनीति चमकाने के अलावा अराजकता को प्रश्रय देना है। लेकिन गाँवों के विकास को शहरी चश्मे से देखने की बजाय वहाँ की जमीनी जरूरत के मुताबिक किये जाने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोके बिना उनके विकास की बात सोचना बेमानी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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