Friday, 3 January 2025

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव भारत के लिए लाभदायक


जब अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी फ़ौजें काबिज थीं तब पाकिस्तान की नीति दोगलेपन की थी। एक तरफ तो उसने तालिबानी लड़ाकों पर हवाई हमले के लिए अपने हवाई अड्डे अमेरिकी  को उपलब्ध करवाए वहीं दूसरी  तरफ अमेरिकी फौजों से लड़ने के लिए तालिबानियों को अपनी सीमा के भीतर अड्डे बनाने की अनुमति दी।  जब अमेरिकी सेना ने अपना डेरा समेट कर तालिबानियों को सत्ता सौंप दी तब पाकिस्तान  ने जमकर जश्न मनाया जिसमें उसका आका  चीन भी शामिल हुआ। भारत में भी वामपंथी तबके सहित अन्य विपक्षी दल बल्लियों उछल रहे थे। चूंकि मुल्ला - मौलवी अमेरिका को अपना दुश्मन मानते हैं इसलिए उनको खुश करने के लिए धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार विजयोल्लास में डूबे थे। भारत सरकार के चूंकि अमेरिका से रिश्ते सुधार पर थे इसलिए तालिबानियों की जीत पर भारत की विदेश नीति पर भी सवाल उठाये जाने लगे। वहाँ रह रहे हिन्दू और सिखों की सुरक्षा की चिंता भी होने लगी। जो भारतीय कंपनियां वहाँ ठेका लिए हुई थीं उनके कारोबार पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे। तालिबानी हुकूमत को भारत ने  मान्यता भी नहीं दी। इसलिए जो माहौल बना उसमें ये चिंता तैर  रही थी कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान की जुगलबंदी भारत के लिए बड़ी समस्या बनेगी।  इस पहाड़ी देश की सीमा ईरान के अलावा मध्य एशिया के उन देशों से भी मिलती है जो सोवियत संघ के हिस्से हुआ करते थे। इसलिए चीन इस समूचे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की फ़िराक में था। लेकिन चार साल बाद उन तमाम कयासों पर विराम लग गया। जो पाकिस्तान तालिबानियों की जीत पर ढोल पीट रहा था वही आज अफ़ग़ानिस्तान के हमलों का सामना करने मजबूर है। पश्चिमी सीमांत के जिस  इलाके में उसने  तालिबानी  अड्डे बनाने की छूट दी थी उन्होंने उन्हें खाली करने से न सिर्फ  इंकार कर दिया बल्कि वे पाकिस्तानी सीमा में और भी भीतर घुसकर अपनी चौकियाँ बना रहे हैं। दोनों देशों के बीच सीमा का जो निर्धारण अंग्रेजों द्वारा किया गया था उसे तालिबानियों ने मानने से साफ मना कर दिया। उनके हमलों से त्रस्त होने के बाद पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा हवाई हमले कर लगभग 50 अफगानी मार दिये गए तो तालिबानियों ने दोगुनी ताकत दिखाकर पाकिस्तान की अनेक सैनिक चौकियाँ छीन लीं। काबुल में बैठे शासक जिस तरह से पाकिस्तान के प्रति आक्रामक हो उठे वह चौंकाने वाला है। उससे भी बड़ी बात ये है कि कूटनीतिक रिश्ते न होने के बाद भी तालिबानी सत्ता का रुख भारत के प्रसि नर्म हुआ है। भारतीय कंपनियों को वहाँ किये जा रहे विकास कार्यों में भाग लेने का विधिवत प्रस्ताव मिलने के साथ भारत से खाद्यान्न एवं अन्य जरूरी चीजें वहाँ भेजे जाने से सम्बन्ध काफी सुधरे हैं। हालांकि कश्मीर में आतंकी घटनाओं में अफगानिस्तान का हाथ भी रहा है किंतु इस बार का तालिबानी शासन भारत से दोस्ती का पक्षधर होने के साथ ही पाकिस्तान से दुश्मनी पाल बैठा है जो इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव कहा जाएगा। भारत के लिए ये स्थिति बेहद सुखद है। क्योंकि बांग्ला देश में शेख हसीना की सत्ता के पतन के बाद जो अंतरिम सरकार काबिज हुई उसने पाकिस्तान से जिस तरह का दोस्ताना बढ़ाया वह भारत के लिए बड़े खतरे की शुरुआत मानी जा रही थी। ये भी कहा जाने लगा था कि पाकिस्तान एक बार फिर  युद्ध की परिस्थिति पैदा कर सकता है जिससे भारत दोहरे संकट में फंसे। लेकिन बलूचिस्तान में पहले से चल रहे विद्रोह को दबाने में तो उसे पसीने छूट ही रहे थे ऊपर से तालिबानी लड़ाकों के हमलों से मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। कश्मीर के जिस हिस्से को उसने कब्जा रखा है वहाँ भी  बगावत का माहौल है। चीन की जो परियोजनाएं चल रही हैं उनका भी विरोध स्थानीय निवासी कर रहे हैं जिससे चीन नाराज है। राजनीतिक तौर भी अंदरूनी हालात इतने दयनीय कभी नहीं नहीं रहे। भारत के विरुद्ध जनता के मन में नफरत पैदा करने का दाँव भी काम नहीं कर रहा। इसका प्रमाण वहाँ से आने वाले वीडियो हैं जिनमें आम नागरिक विशेष तौर पर युवा अपने देश की दुर्दशा के लिए हुकूमत को कोसने के साथ भारत की प्रगति की प्रशंसा करते देखे जा सकते हैं। टीवी चैनलों में होने वाली बहस में भी भारत के पक्ष में बोलने वाले बढ़ रहे हैं जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और उसके पिछलग्गू देश तो पाकिस्तान से दूरी बना ही रहे हैं किंतु अब तो चीन भी उसके भिखमंगेपन से त्रस्त होकर उसे खाली हाथ लौटाने लगा है। यद्यपि ये कहना तो जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान टूट जायेगा क्योंकि बलूचिस्तान की आजादी बिना विदेशी मदद के संभव  नहीं किंतु अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर सीमांत क्षेत्र में जिस तरह से कब्जा करना शुरू किया वह उसके लिए लाईलाज मर्ज बन सकता है क्योंकि तालिबानियों से पार पाना उसके बस के बाहर है। सियासी अनिश्चितता के कारण सेना भी असमंजस में फंसी है। इमरान खान की गिरफ्तारी  सरकार के लिए गले की फांस साबित हो रही है। ये हालात भारत के लिए पूरी तरह अनुकूल हैं क्योंकि कहाँ तो तालिबानी हुकूमत के साथ मिलकर पाकिस्तान कश्मीर में गड़बड़ी पैदा करने का मंसूबा पाल रहा था  और कहाँ तालिबान उसी के लिए मुसीबत बन बैठे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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