Saturday, 25 January 2025

मुस्लिम तुष्टीकरण के हर प्रयास से हिंदुओं का ध्रुवीकरण बढ़ेगा


वक्फ संशोधन विधेयक पर  गठित जेपीसी ( संयुक्त संसदीय समिति) की बैठक में गत दिवस हुए हंगामे के बाद 10 विपक्षी सदस्यों को  निलंबित कर दिया गया। अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने आरोप लगाया कि विपक्षी सदस्यों ने उन्हें गालियाँ दीं। उल्लेखनीय है  पिछली बैठक में भी तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बेनर्जी ने गुस्से में काँच की बोतल  तोड़ डाली थी जिस पर उन्हें निलम्बित किया गया।असदुद्दीन ओवैसी भी हर बैठक में गर्मी दिखाते हैं। समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को शीतकालीन सत्र में ही सौंपने वाली थी किंतु  समय सीमा बजट सत्र तक बढ़ा दी गई । लगता है विपक्षी सदस्यों का उद्देश्य रिपोर्ट को संसद में पेश होने से रोकना है। समिति द्वारा मांगे जाने पर  देश भर से लाखों लोगों ने  वक़्फ़ विधेयक पर  अपनी राय भेजी जिन पर  समिति की रिपोर्ट मिलने पर संसद अपना निर्णय करेगी। ये  सही है कि जेपीसी में बहुमत सत्ता पक्ष का ही रहता है क्योंकि उसका गठन  सदन में पार्टियों की सदस्य संख्या के आधार पर होता है। यही कारण था कि जब राहुल गाँधी हिंडनबर्ग द्वारा किये गए खुलासे के बाद अदाणी समूह की जाँच हेतु जेपीसी  की जिद पकड़कर बैठ गए तब विपक्षी दलों की बैठक में अविभाजित एनसीपी के नेता शरद पवार ने भी ये कहकर जेपीसी  की मांग को अर्थहीन बताया  कि सत्ता पक्ष के बहुमत की वजह से विपक्ष को कुछ हासिल नहीं होगा। बावजूद उसके श्री गाँधी ने पिछले संसद सत्र में गौतम अदाणी के विरुद्ध अमेरिका में दर्ज आपराधिक प्रकरण की जांच हेतु जेपीसी की मांग दोहराई । लेकिन अन्य  विपक्षी इस मांग से कन्नी काट गए । शरद पवार और ममता बेनर्जी तो शुरू से ही  अदाणी की जांच के लिए जेपीसी  का विरोध कर रहे थे किंतु पिछले सत्र में सपा और शिवसेना ने भी उससे दूरी बना ली। दूसरी तरफ सरकार ने पहले वक्फ संशोधन और फिर एक देश एक चुनाव सम्बन्धी विधेयक विपक्ष की मांग के बिना ही जेपीसी के हवाले कर दिये। यदि दोनों विधेयकों पर संसद में बहस होती तब भी उनका  पारित होना तय था किंतु वक़्फ़ विधेयक  मुस्लिम समुदाय से जुड़े होने से  जेपीसी के जरिये जनता की राय लेने का रास्ता चुना गया । इसका लाभ ये हुआ कि वक़्फ़ बोर्ड को मिले असीमित अधिकार और उसकी संपत्तियों में हो रही हेराफेरी की जानकारी आम जनता के संज्ञान में आने लगी। बोर्ड  द्वारा अवैध रूप से कब्जाई अनेक संपत्तियों का ब्यौरा भी सार्वजनिक हुआ। जेपीसी में शामिल श्री ओवैसी ने तो उ.प्र की एक आमसभा में स्वीकारा भी कि राज्य में वक़्फ़ की अधिकांश संपत्तियों के स्वामित्व संबंधी वैध दस्तावेज ही नहीं हैं। ऐसा ही शपथ पत्र उ.प्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में भी पेश किया गया । वक़्फ़ संशोधन विधेयक पेश होते ही देश भर से वक़्फ़  की दादागिरी के विरुद्ध  शिकायतें आने लगीं। उधर वक़्फ़ बोर्ड  वाले भी देश की अनेक ऐतिहासिक और सरकारी इमारतों के उनकी जमीन पर होने का दावा करने लगे। हद तो तब हो गई जब प्रयागराज में महाकुंभ के स्थल को भी वक़्फ़ संपत्ति बताने का दुस्साहस किया गया।  प्रतिक्रिया स्वरूप लोग खुलकर वक़्फ़ बोर्ड के अवैध कब्जों के विरुद्ध  सामने आने लगे जिससे  मुस्लिम मतों के ठेकेदार राजनीतिक दलों में घबराहट व्याप्त हो गई। दरअसल  लोकसभा चुनाव के बाद आम मुसलमान के मन में ये धारणा बिठाई गई कि उसी ने भाजपा को 240 सीटों पर रोक दिया। इसकी प्रतिक्रिया हिंदुओं के बीच भी हुई और  देश भर के साधु - महात्मा हिन्दू हितों को लेकर मुखर हो उठे। महाकुंभ से आ रहे समाचार इसकी पुष्टि कर रहे हैं। इन सब बातों से उपजी घबराहट ही वक़्फ़ पर बनी जेपीसी में विपक्षी सदस्यों के हंगामे का कारण है किंतु वे भूल रहे हैं कि आखिरकार  अध्यक्ष श्री पाल अपनी रिपोर्ट संसद को प्रेषित कर ही देंगे जहाँ उसका पारित होना भी सुनिश्चित है। विपक्ष को ये भी समझ लेना चाहिए कि  मुस्लिम तुष्टीकरण के हर प्रयास से हिंदुओं का ध्रुवीकरण बढ़ेगा।  ऐसे में उसके लिए यही हितकर होगा कि वह वक़्फ़ बोर्ड  के  असीमित अधिकारों में कटौती के लिए लाये  विधेयक का समर्थन  कर बुद्धिमत्ता दिखाये।अल्पसंख्यकों की संपत्ति की सुरक्षा होनी चाहिए किंतु वक़्फ़ बोर्ड जहाँ चाहे कब्जा कर ले इसकी छूट धर्मनिर्पेक्षता नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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