कांग्रेस की इससे ज्यादा किरकिरी और क्या होगी कि जो इंडिया गठबंधन उसकी अगुआई में बना और लोकसभा चुनाव में जिसके कारण भाजपा अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत हासिल करने से वंचित रह गई उसी के घटक उसको ठेंगा दिखाने लगे हैं। महाराष्ट्र में जबरदस्त पराजय के बाद गठबंधन के नेतृत्व परिवर्तन की मांग को कांग्रेस ने जिस प्रकार उपेक्षित किया उसका असर गत दिवस दिखाई दिया जब ममता बैनर्जी , अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का समर्थन करने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि भाजपा को वही हरा सकती है। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत के ये कहने पर कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी कांग्रेस की विरोधी है, प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अरविंद केजरीवाल ने अपना ये आरोप दोहराया कि कांग्रेस का भाजपा से गुप्त गठजोड़ है इसीलिए वह भाजपा की बजाय आम आदमी पार्टी को अपना विरोधी बता रही है। उधर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के नेता तेजस्वी ने इंडिया गठबंधन के बिखरने संबंधी सवाल पर कहा कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि वह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए ही बना था। वैसे भी उसमें दरार तो हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान ही आ गई थी जब कांग्रेस ने सपा और आम आदमी पार्टी का लिए एक भी सीट छोड़ने से दो टूक इंकार कर दिया। लोकसभा चुनाव में 10 में से 5 सीटें जीतने से वह आत्मविश्वास से भरी थी किंतु उसके मंसूबे धरे रह गए और भाजपा ने तीसरी बार सरकार बना ली । उस परिणाम पर अखिलेश और उद्धव की शिवसेना ने खुलकर कहा कि कांग्रेस अपने बलबूते चुनाव जीतने की क्षमता खो चुकी है। यद्यपि महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन कायम रहा किंतु परिणाम आते ही कांग्रेस पर फिर हमले शुरू हो गए। लेकिन इस बार निशाना बने राहुल गाँधी जो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद गठबंधन के स्वयंभू नेता बन बैठे थे। ममता बैनर्जी तो श्री गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर शुरू से ही सवाल उठाती आ रही थीं किंतु अखिलेश और उद्धव के बाद जब लालू ने भी उनका समर्थन कर दिया तब कांग्रेस को सतर्क हो जाना चाहिए था जबकि वह नेतृत्व संबंधी अपने दावे के औचित्य को सिद्ध करने में ही लगी रही। यदि राहुल उक्त नेताओं से बात करते तब उनका गुस्सा ठंडा हो सकता था किंतु वे अदाणी के मुद्दे से ही चिपके रहे जिससे ज्यादातर विपक्षी दल किनारा कर चुके हैं। महाराष्ट्र चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाई जाती तब भी काफी विवाद सुलझाये जा सकते थे किंतु श्री गाँधी ने कोई पहल नहीं की। उनका ग़ैर जिम्मेदाराना रवैया जम्मू कश्मीर के चुनाव में ही दिख गया था जिसकी उनके सहयोगी उमर अब्दुल्ला ने बीच चुनाव ही आलोचना कर डाली। महाराष्ट्र चुनाव में भी वे ज्यादा सक्रिय नहीं रहे और पूरा जोर वायनाड में प्रियंका वाड्रा को जितवाने में लगाया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी निश्चित रूप से बड़ी क्षेत्रीय शक्ति है। ऐसे में कांग्रेस को गठबंधन धर्म का पालन करते हुए ठीक उसी तरह उसका नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए था जिसकी अपेक्षा वह अपने प्रभाव वाले राज्यों में गठबंधन के अन्य दलों से करती है। बहरहाल दिल्ली के चुनाव में ममता, अखिलेश और उद्धव द्वारा आम आदमी पार्टी का खुलकर समर्थन करने पर कहा जा सकता है कि इंडिया गठबंधन के समाप्त होने के दिन आ गए। यदि उसका अस्तित्व बना रहा तब भी उस पर कांग्रेस का प्रभुत्व संभव नहीं होगा। इसके लिए दोषी श्री गाँधी ही माने जायेंगे जो राजपरिवार की मानसिकता से बाहर ही नहीं निकल पा रहे। इंडिया गठबंधन में एक - दो को छोड़कर बाकी के नेताओं की जमीन उनकी बनाई हुई है। ममता , लालू, केजरीवाल की ताकत के पीछे उनकी मेहनत है। अखिलेश भले ही पिता की वजह से आगे आये लेकिन उनके न रहने के बावजूद अपना प्रभाव बनाये हुए हैं। इस सबसे लगता है कांग्रेस मुक्त विपक्ष की स्थिति बन सकती है। आम आदमी पार्टी द्वारा कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाले जाने की मांग के बाद ममता, अखिलेश और उद्धव का दिल्ली चुनाव में श्री केजरीवाल के समर्थन का ऐलान किसी नई राजनीतिक पटकथा की भूमिका कही जा सकती है। तेजस्वी का ये कहना भी काबिले गौर है कि इंडिया गठबंधन तो केवल लोकसभा चुनाव तक था। इसका आशय ये कि बिहार विधानसभा के चुनाव में राजद द्वारा कांग्रेस को झटका दिया जा सकता है। इससे तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म की संभावना भी बढ़ रही हैं। दिल्ली के दंगल में कांग्रेस अपने मतों में यदि 10 फीसदी वृद्धि कर सकी तब आम आदमी पार्टी सत्ता से भले बाहर आ जाए किंतु सेहरा भाजपा के सिर पर होगा। और यदि ये हुआ तब कांग्रेस के भीतर ही न सिर्फ राहुल बल्कि गाँधी परिवार के विरुद्ध भी बगावत हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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