हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव के बाद से ही इंडिया गठबंधन में बिखराव के संकेत आने लगे थे। नेतृत्व परिवर्तन के मुद्दे पर जिस तरह से आवाजें उठीं उनसे ये लगने लगा कि राहुल गाँधी के प्रति अन्य दलों में अस्वीकृति का भाव बढ़ता ही जा रहा है। लोकसभा चुनाव के पहले तक एक - दो को छोड़कर गठबंधन में शामिल अधिकांश दलों में उनको नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष का चेहरा मान लेने पर मौन स्वीकृति थी। सरकार बनाने पर शायद उन्हें प्रधानमंत्री बनाये जाने पर भी कोई ऐतराज नहीं । हालांकि भाजपा स्पष्ट बहुमत से चूक गई किंतु एनडीए के पास सरकार बनाने लायक संख्याबल था लिहाजा तीसरी बार श्री मोदी प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। वहीं श्री गाँधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाये गए। शुरू - शुरू में लगा कि अपनी बढ़ी हुई ताकत के साथ विपक्ष सरकार के सामने कदम - कदम पर अड़चनें पैदा करेगा किंतु जल्द ही गठबंधन में दरारें नजर आने लगीं। यद्यपि जम्मू - कश्मीर और झारखंड में भाजपा को सफलता नहीं मिल सकी परंतु हरियाणा में भाजपा और महाराष्ट्र में भाजपा की अगुआई वाली महायुति को भारी बहुमत मिलने से विपक्ष में जो निराशा उत्पन्न हुई उसका ठीकरा कांग्रेस पर फूटने लगा। हरियाणा में तो कांग्रेस ने गठबंधन के सहयोगी दलों को घास तक नहीं डाली किंतु महाराष्ट्र में उनको भी सीटें दी गईं। हालांकि कांग्रेस सबसे अधिक स्थानों पर चुनाव लड़ी। लेकिन महाविकास अगाड़ी नामक विपक्षी मोर्चे का सफाया हो गया। कांग्रेस ने अपने इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया। इसका फौरी प्रभाव इंडिया गठबंधन की एकता पर नजर आया जब ममता बेनर्जी ने नेतृत्व परिवर्तन की मुहिम छेड़ दी जिसे ऐसे घटकों का समर्थन भी मिला जो श्री गाँधी में श्री मोदी का विकल्प देखने लगे थे। संसद के पिछले सत्र में भी विपक्ष के बीच मतभेद स्पष्ट नजर आये। ऐसी उम्मीद थी कि नया साल शुरू होने पर दरारें पाटने का प्रयास किया जाएगा किंतु कांग्रेस ने कोई पहल नहीं की। और तो और श्री गाँधी छुट्टियां मनाने विदेश निकल गए। अन्य दलों की ओर से साफ उलाहना दिया गया कि लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की एक भी बैठक नहीं हुई। ये सफाई भी आने लगी कि उसका गठन केवल लोकसभा चुनाव के लिए हुआ था लिहाजा उसे खत्म कर देना चाहिए। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी द्वारा एक - दूसरे के विरुद्ध ताल ठोकने की स्थिति बन जाने से गठबंधन की टूटन खुलकर सामने आ गई। यहाँ तक भी ठीक था क्योंकि हरियाणा में भी दोनों अलग - अलग लड़े थे किंतु जब ममता बेनर्जी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे ने भी आम आदमी पार्टी को खुलकर समर्थन देने की घोषणा की तब विभाजन स्पष्ट हो गया। आश्चर्य की बात ये है कि अभी तक कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उसे समर्थन देने वाले उक्त तीनों नेता इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं। लेकिन राहुल ने विदेश से लौटते ही केजरीवाल की सरकार पर जिस प्रकार से तीखा हमला किया उसके बाद विपक्ष में बिखराव की संभावना और मजबूत हो गई। श्री केजरीवाल तो कांग्रेस पर सरे आम आरोप लगा रहे हैं कि वह भाजपा के साथ मिली हुई है। राजनीतिक विश्लेषक भी ये मान रहे हैं कि दिल्ली में कांग्रेस की बढ़त भाजपा की किस्मत खोल देगी। शुरू में ऐसा लगा कि कांग्रेस किसी भी स्थिति में भाजपा की जीत में मददगार बनने के आरोप से बचना चाह रही है। उसकी आक्रामकता में आई कमी से इसकी पुष्टि भी हुई किंतु राहुल ने मैदान में उतरते ही जिस तरह से आम आदमी पार्टी को कटघरे में खड़ा किया उससे लगने लगा कि वह श्री केजरीवाल की सत्ता में वापसी में सहायक बनने की गलती नहीं दोहरायेगी जिसका दुष्परिणाम आज तक भोग रही है। कांग्रेस को जानने वाले भी ये कहने लगे कि इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों के दबाव से पार्टी को मुक्त कराने की रणनीति के चलते ही राहुल ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोला है। उसे ये समझ में आ गया है कि उसकी मौजूदा स्थिति क्षेत्रीय दलों की वजह से ही बनी है। लेकिन इसकी भनक लगते ही इंडिया गठबंधन के सदस्यों द्वारा दिल्ली चुनाव के बाद बैठक बुलाकर कांग्रेस से छीनकर नेतृत्व किसी क्षेत्रीय दल के नेता के हाथ सौंपने के संकेत दिये जाने लगे हैं। इसके पीछे उनकी सोच ये है कि कांग्रेस खुद को मजबूत करे इसके पहले ही उसे किनारे लगा दिया जाए। जाहिर है ये स्थिति कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं होगी। कम से कम राहुल किसी भी सूरत में ममता या अखिलेश जैसे किसी क्षेत्रीय छत्रप के नेतृत्व में काम करना पसंद नहीं करेंगे। क्या होगा ये पक्के तौर पर तो कहना फ़िलहाल संभव नहीं किंतु इंडिया गठबंधन अब कांग्रेस की छाया से निकलना चाह रहा है। उसमें शामिल क्षेत्रीय दलों को ये लगने लगा है कि उनके प्रभाव वाले राज्यों में उनके सहारे खड़े रहने वाली कांग्रेस बजाय आभार के रौब दिखाती है। ये सब देखते हुए दिल्ली चुनाव के बाद विपक्ष की एकता नये रूप में सामने आयेगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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