Thursday, 2 January 2025

आर्थिक विकास में धर्म स्थल भी निभा सकते हैं महत्वपूर्ण भूमिका


जो लोग मंदिर बनाने अथवा तीर्थस्थलों के विकास की आलोचना करते हुए उस पैसे का उपयोग विद्यालय, शौचालय और ऐसे ही अन्य कार्यों पर खर्च करने की वकालत करते हैं उनको गत दिवस देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं  की संख्या देखकर अपनी सोच की समीक्षा करनी चाहिए। जो समाचार आये हैं उनके अनुसार देश के जितने भी बड़े मंदिर और गुरुद्वारे हैं उनमें वर्ष 2025   के प्रथम दिवस अभूतपूर्व जनसैलाब नजर आया  । बावजूद इसके कि 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला नव वर्ष मूलतः ईसाई काल गणना से जुड़ा हुआ है और अंतर्राष्ट्रीय कैलेंडर भी इसी पर आधारित है। गत दिवस न सिर्फ हिन्दू मंदिरों अपितु अमृतसर के सुप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में भी अयोध्या के राम मंदिर के बराबर दर्शनार्थी पहुंचे। वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और उज्जैन के महाकाल परिसर में भी यही नजारा दिखा। इसके अलावा नदियों के तट पर भी उत्सव का माहौल देखने मिला। यद्यपि नये साल का स्वागत शराब - कबाब से करने वाले भी कम नहीं थे किंतु उनकी दुनिया अलग है। आशय ये है कि धार्मिक पर्यटन भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। अयोध्या में गत वर्ष राम मंदिर के निर्माण के बाद से ही वहाँ दर्शनार्थियों की दैनिक संख्या औसतन 50 हजार है जो किसी भी विशिष्ट अवसर पर लाखों का आंकड़ा पार कर जाती है। 2025  शुरू होने के पूर्व ही अयोध्या के सारे होटल , धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस भर चुके थे। लगभग यही स्थिति वाराणसी, उज्जैन, शिरडी, तिरुपति आदि की रही। अयोध्या के पहले काशी विश्वनाथ और महाकाल परिसर को विकसित स्वरूप प्रदान करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जाने के साथ ही पुराने निर्माण हटाये गए जिससे आवागमन सुलभ हो। उसका विरोध भी हुआ , राजनीति की दुकानें भी सजीं। लेकिन जब विकास पूरा हुआ तब विरोधियों  के मुँह ये देखकर बंद हो गए कि उक्त मंदिरों में आने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई, जिनमें ज्यादातर लोग बाहरी थे। अर्थात इन मंदिरों के कारण वाराणसी और उज्जैन में होटल और टैक्सी जैसे व्यवसाय में तो बढ़ोत्तरी हुई ही किंतु  पूजा सामग्री विक्रेताओं का भी कारोबार जमकर चलने लगा। यहाँ तक कि साइकिल और ऑटो रिक्शा चालकों की कमाई भी बढ़ी। वाराणसी में साड़ियों के अलावा गलीचों के कारोबारी भी विश्वनाथ परिसर के विकास के बाद अपने व्यवसाय में वृद्धि से प्रसन्न हैं। उज्जैन में महाकाल परिसर इलाके में जिनके मकान हैं उनमें से बहुतों ने होम स्टे की व्यवस्था कर अतिरिक्त  आय का स्रोत पैदा कर लिया। एक मोटे अनुमान के अनुसार उज्जैन में फूल -  माला बेचने वालों की संख्या में 25 हजार की वृद्धि हुई है। म.प्र में ही महाकाल के साथ ओंकारेश्वर को भी नया स्वरूप दिये जाने के बाद वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यही सब देखकर केंद्र सरकार ने देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का विकास करने की योजना बनाई है जिनमें गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर भी है। वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर बेहद संकरे स्थान में होने से श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफ होती है। एक - दो  बड़े हादसों के बाद उ.प्र सरकार ने उसके भी समुचित विकास का निर्णय किया है। भारत में धार्मिक आस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद नई पीढ़ी  में धर्म के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है। लेकिन धर्मस्थलों पर बाबा आदम के जमाने की लचर व्यवस्थाओं की वजह से  युवा वहाँ जाने से कतराते थे। लेकिन जिन धार्मिक स्थलों को नया स्वरूप दिया गया उनमें आने वालों में युवा दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि  विकास  पर किये गए खर्च का औचित्य सिद्ध कर रही है। हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि धार्मिक यात्रा को पर्यटन का स्वरूप दिये जाने से धर्मस्थलों की पवित्रता और काफी हद तक मर्यादा नष्ट होती है। उत्तराखंड के चार धामों की सड़कें विकसित होने के बाद वहाँ तीर्थयात्रियों की संख्या साल दर साल बढती जाने से पर्यावरण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। लेकिन इन यात्राओं का पेशेवर तरीके से प्रबंध किया जाए तो उसका हल हो सकता है। जमीनी सच्चाई ये है कि सदियों पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को समय के साथ यदि दुरुस्त किया जाए तो धार्मिक स्थलों के जरिये रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास संभव है। भारत सरकार को चाहिए सभी राज्यों से प्रमुख धर्मस्थलों की सूची लेकर उनको विकसित करने की कार्य योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे  मूल स्वरूप को छेड़े बिना वहाँ आने वालों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। हालिया अनुभव बताते हैं जिन भी धार्मिक स्थलों को विकसित किया गया वहाँ दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि होने से अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला। घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी ये कदम सहायक साबित होगा इसमें दो मत नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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