Wednesday, 15 January 2025

दिल्ली में कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अभी तक भाजपा और आम आदमी पार्टी के बड़े नेता ही मोर्चे पर नजर आ रहे थे । कांग्रेस शुरुआत में तो बेहद हमलावर दिखी किंतु अचानक उसके सुर धीमे पड़ने लगे। हालांकि अरविंद केजरीवाल लगातार ये प्रचार कर रहे हैं कि इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस का गुप्त गठबंधन है। नववर्ष मनाने जब राहुल गाँधी विदेश चले गए तब ये बात जोरदारी से प्रचारित हुई कि कांग्रेस ने इस चुनाव में उन्हीं सीटों पर जोर लगाने की नीति अपनाई है जहाँ उसके लिए  तनिक भी गुंजाइश है। इसके पीछे सोच ये बताई गई  कि कांग्रेस यदि ज्यादा जोर लगायेगी तो उससे आम आदमी पार्टी को तो नुकसान होगा लेकिन उसका लाभ अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा उठा लेगी । राहुल की अनुपस्थिति से और भी चर्चाएं होने लगीं। दिल्ली के जो कांग्रेस नेता लंबे समय से आम आदमी पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए थे वे भी उच्च नेतृत्व के उदासीन और ढुलमुल रवैये से निराश और नाराज थे। ऐसे में इस आशंका को बल मिला कि बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं द्वारा कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया जाएगा। पार्टी हाईकमान में  उक्त आशय की खबरें पहुँचने से घबराहट फैली और उसी के बाद  तय किया गया कि कांग्रेस पूरी ताकत से मैदान में उतरेगी और अपना खोया हुआ जनाधार वापस लेने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा। इसका प्रमाण श्री गाँधी द्वारा दिल्ली के मुस्लिम इलाकों में आयोजित सभाओं में आम आदमी पार्टी पर ये आरोप लगाए जाने से मिला कि उसने मतदाताओं से किये वायदे पूरे नहीं किये । उन्होंने आम आदमी पार्टी के साथ ही भाजपा पर भी ऐसे ही आरोप लगाए। दिल्ली का ये चुनाव जैसा कि श्री केजरीवाल कहते भी हैं कांग्रेस के लिए अस्तित्व का सवाल बन गया है। उसका वोट प्रतिशत लगातार घटते जाने से उसके परंपरागत समर्थक तो निराश हैं ही संगठन से जुड़े नेता भी हौसला खोते जा रहे हैं। 2013 में पहली बार भाजपा को रोकने के लिए श्री केजरीवाल को सरकार बनाने हेतु समर्थन देने की ऐतिहासिक भूल का दुष्परिणाम ही है कि पार्टी विधानसभा में शून्य पर आ गई। सही बात तो यही है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस को रौंदकर ही दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई । लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व बने इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच याराना कायम हुआ जिसके तहत दिल्ली में दोनों मिलकर लड़े। हालांकि सफलता नहीं मिली और उसके फ़ौरन बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अकेले लड़ने का ऐलान करते हुए कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। रही - सही कसर पूरी हो गई हरियाणा में जहाँ उसने  उम्मीदवार उतारकर भाजपा विरोधी मतों के बंटवारे की स्थिति पैदा कर दी जिससे कांग्रेस का सत्ता प्राप्त करने का सपना चूर हो गया। दिल्ली के कांग्रेस नेताओं का हाईकमान  से यही कहना रहा है कि जब श्री केजरीवाल ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि उनकी पार्टी के मैदान में होने से हरियाणा में भाजपा को लाभ मिलेगा तब कांग्रेस भाजपा को रोकने के फेर में उनको मजबूत होने का अवसर क्यों दे? ये तर्क  वाजिब है क्योंकि भाजपा यदि दिल्ली में सत्ता से बाहर रही तब भी उसकी हैसियत और ताकत में अंतर नहीं आने वाला किंतु दिल्ली का दुर्ग यदि ढह गया तब श्री केजरीवाल के पैरों के नीचे से जमीन खिसकते न देर नहीं लगेगी क्योंकि दिल्ली ही उनकी शक्ति का स्रोत है। इन्हीं सब बातों पर विचार करने के बाद श्री गाँधी ने मैदान में उतरने का निर्णय लिया। हालांकि उन्होंने काफी देर कर दी किंतु जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर यदि कांग्रेस दिल्ली  में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए पूरा जोर लगा दे तो भले ही उसका लाभ भाजपा को मिले किंतु तब पार्टी के पास दिखाने के वोट बैंक रूपी पूंजी तो होगी ।  अन्यथा वर्तमान स्थिति तो दयनीयता का चरमोत्कर्ष है। इसके अलावा श्री गाँधी के अपने आभामंडल के लिए भी दिल्ली  में कांग्रेस का पहले से बेहतर प्रदर्शन जरूरी है क्योंकि इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दलों द्वारा बीते कुछ दिनों में जो बयानबाजी की गई उसका निशाना वही थे। हालांकि दिल्ली का दंगल ले देकर आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच ही है किंतु कांग्रेस के लिए ये अपना वजूद कायम रखने का आखिरी अवसर है। यदि उसका प्रदर्शन पिछले दो चुनावों जैसा ही रहा तब उसके साथ जो इक्का - दुक्का दल हैं वे भी पिंड छुड़ाकर चलते बनेंगे। चुनौती भाजपा के सामने भी कम नहीं है क्योंकि इस बार भी यदि वह सत्ता में नहीं आ सकी तब श्री केजरीवाल प्रधानमंत्री के विकल्प के तौर पर  उभरने में सफल हो जाएंगे और इंडिया गठबंधन भी ऱाहुल को छोड़ उनमें संभावनाएं तलाशने लगेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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