Saturday, 11 January 2025

विपक्षी एकता में दरार का ठीकरा राहुल पर फूट रहा

लोकसभा चुनाव के पूर्व जब नये  विपक्षी गठबंधन की शुरुआत हुई तब कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के सुझाव पर उसका नाम Indian National Developmental Inclusive Alliance  रखा गया जो  इंडिया नाम से प्रचलित हुआ। गठबंधन में 26 दलों के शामिल होने से  लगा कि वह नरेंद्र मोदी को तीसरी पारी खेलने से रोकने में कामयाब हो जायेगा किंतु पूरी ताकत लगाने के बाद भी वह श्री मोदी को न रोक सका। यद्यपि उनकी जीत में 2014 और 2019 वाली चमक नहीं थी।  400 पार का नारा 300 से नीचे अटक गया। भाजपा भी घटकर 240 पर आ गई। उस परिणाम ने विपक्ष के हौसले बुलंद कर दिये। उसकी आक्रामकता में जबरदस्त वृद्धि देखने मिली। मोदी सरकार के जल्द गिरने के दावे होने लगे। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर और तीखे हमले करने लगे। वहीं भाजपा पूरी तरह रक्षात्मक दिखने लगी। लोकसभा चुनाव के  परिणाम उसकी समझ से बाहर थे।  चंद्रा बाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु  इंडिया गठबन्धन एक बड़ी ताकत के रूप में खड़ा हो गया। संसद में भाजपा के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल लगने लगा। वक्फ संशोधन और एक देश एक चुनाव जैसे विधेयक इसीलिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजने पड़े। अदाणी और संविधान के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार पर हावी रही।  इसी बीच जम्मू -  कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के चुनाव आ गए। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्ष दोनों में जीत के प्रति आश्वस्त था। लेकिन भाजपा ने जहाँ जम्मू - कश्मीर में अपनी संख्या  कई गुना बढ़ाई वहीं हरियाणा में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए तीसरी बार सरकार बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया। कांग्रेस के लिए ये बहुत बड़ा झटका था क्योंकि जम्मू - कश्मीर में वह कुछ खास न कर सकी और हरियाणा में  बुरी तरह चित्त हो गई। इन नतीजों से इंडिया गठबंधन में दरार उत्पन्न होने लगी।  राहुल की क्षमता पर सवाल उठने लगे किंतु महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव सामने होने से मतभेदों पर पर्दा डालकर रखा गया। झारखंड में तो हेमंत सोरेन सरकार बचा ले गए किंतु महाराष्ट्र में भाजपा ने तो धमाकेदार प्रदर्शन किया ही उसकी सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) और एनसीपी ( अजीत) ने भी जबरदस्त कामयाबी हासिल कर विपक्षी गठबंधन की कमर तोड़कर रख दी। इस परिणाम ने एक साथ  राहुल, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को जोरदार चोट पहुंचाई। लेकिन ठीकरा फूटने लगा श्री गाँधी के सिर पर। ममता बैनर्जी ने नेतृत्व परिवर्तन की आवाज उठा दी जिसे शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और लालू यादव का समर्थन मिलने से  गठबंधन की एकता पर खतरा मंडराने लगा। इसी बीच दिल्ली के चुनाव आ गए जिसमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच तलवारें खिंचने से रही - सही कसर भी पूरी हो गई। ममता, अखिलेश और उद्धव ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर राहुल  के विरुद्ध खुली बगावत का संदेश दे दिया।  उधर उमर अब्दुल्ला ने इंडिया गठबंधन के निष्क्रिय होने की बात कहते हुए लोकसभा चुनाव के बाद उसकी बैठक न होने का मुद्दा छेड़ दिया। उनकी बात को उद्धव के दाहिने हाथ संजय राउत ने आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस को आगाह किया कि यही हालत रही तो गठबंधन  की इतिश्री हो जायेगी और दोबारा उसका गठन नामुमकिन होगा। चौंकाने वाली बात ये है कि जो  राहुल गाँधी गठबंधन के घटक दलों के निशाने पर हैं उनका कोई अता - पता नहीं है। 2024 खत्म होने के पहले ही वे नववर्ष मनाने विदेश चले गए। वे लौटे या नहीं इसकी कोई जानकारी किसी के पास नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपनी मर्जी से कुछ बोलने की हैसियत नहीं रखते। सोनिया गाँधी अस्वस्थता के कारण परिदृश्य से बाहर होती जा रही हैं। चूँकि श्री गाँधी ही कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं इसलिये सारे निर्णय और अपेक्षाएं उन्हीं पर केंद्रित हैं। दिल्ली चुनाव की शुरुआत में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के विरुद्ध जो तीखे तेवर दिखाये वे अचानक ठंडे पड़ने लगे। कहा जा रहा है इसके पीछे राहुल का ही हाथ है क्योंकि उनको डर है कि अरविंद केजरीवाल कहीं गाँधी परिवार के विरुद्ध मोर्चा न खोल दें। लेकिन न सिर्फ इंडिया गठबंधन में शामिल अनेक पार्टियां अपितु कांग्रेस के भीतर भी श्री गाँधी की उदासीनता को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी कहने लगे हैं कि उनसे तो सोनिया जी  बेहतर थी जिन्होंने लंबे समय तक यूपीए को एकजुट रखा। ये बात कई विपक्षी नेता कह चुके हैं कि इंडिया गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव तक ही था लेकिन न तो श्री गाँधी और न ही कांग्रेस का कोई नेता समूचे विवाद में प्रतिक्रिया दे रहा है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि गठबंधन का नामकरण करने वाले राहुल ही उसके विघटन के कारण बन रहे हैं और  विपक्षी एकता का यह प्रयोग भी विफल होने के कगार पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



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