Wednesday, 8 January 2025

दिल्ली का चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण



दिल्ली विधानसभा  चुनाव की तिथि घोषित हो गई। हालाँकि चुनाव प्रचार काफी पहले से शुरू हो  चुका है। आम आदमी पार्टी ने तो लोकसभा चुनाव के फौरन बाद ही अकेले लड़ने की घोषणा कर दी थी। हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा एक भी सीट न दिये जाने  के बाद दोनों के बीच पूरी तरह से अलगाव हो गया। हालाँकि दिल्ली के कांग्रेस नेताओं को अरविंद केजरीवाल का साथ कभी रास नहीं आया। आम आदमी पार्टी बनने के बाद श्री केजरीवाल ने गाँधी परिवार सहित कांग्रेस के अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए वे पार्टी को सदैव कचोटते रहे।  उल्लेखनीय है कि जिस शराब घोटाले के कारण मनीष  सिसौदिया और श्री केजरीवाल को जेल जाना पड़ा उसकी शिकायत उपराज्यपाल से कांग्रेस ने ही की थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को रोकने बने इंडिया गठबंधन में जब आम आदमी पार्टी भी शामिल हो गई तब स्थानीय नेता मन मसोसकर रह गये। श्री केजरीवाल के जेल में रहने के दौरान दिल्ली में गठबंधन की जो रैली हुई उसमें उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल को सोनिया गाँधी के साथ बिठाया गया। बाद में लोकसभा चुनाव भी दोनों पार्टियों ने मिलकर लड़ा किंतु एक भी सीट नहीं मिली। उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब  रहने से इंडिया गठबंधन में राहुल गाँधी के नेतृत्व के विरोध में आवाजें उठने लगीं। इसकी मुहिम ममता बैनर्जी ने शुरू की जिसे शिवसेना ( उद्धव ) , लालू प्रसाद यादव और सपा का समर्थन मिलने से कांग्रेस के लिए शर्मनाक स्थिति बन गई। संसद के शीतकालीन सत्र में भी विपक्ष का बिखराव खुलकर सामने आया जिसका कारण  श्री गाँधी की कार्यशैली ही रही। खुद को श्री मोदी  का विकल्प मान लेने की उनकी खुशफहमी बाकी विपक्षी नेताओं को नागवार गुजरने लगी। इसीलिए अदाणी मुद्दे पर एक - दो को छोड़कर बाकी दलों ने कांग्रेस से दूरी बना ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय के बाद विपक्षी एकता की गुंजाइश तो पहले ही खत्म हो चुकी थी। बाकी कसर पूरी कर दी कांग्रेस द्वारा गठबंधन के साथियों से सलाह किये बिना चुनाव में उतरने से। पार्टी के वरिष्ट नेता अजय माकन द्वारा श्री केजरीवाल को  एंटी नेशनल ( देश विरोधी) कहे जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने तो कांग्रेस को इंडिया गठबंधन से निकाल बाहर करने तक की मांग कर डाली। कांग्रेस  इस चुनाव में जिस हौसले के साथ उतरी उससे लगा था कि वह अपनी खोई जमीन वापिस लेने में कामयाब हो जायेगी। उल्लेखनीय है  विधानसभा चुनावों में लुटिया डुबोने के बावजूद भी  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से ज्यादा मत प्राप्त हुए थे। लेकिन 2013 में दिल्ली की सरकार गंवाने के बाद भाजपा को रोकने के लिए श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने हेतु समर्थन देकर कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की जो गलती की उससे वह आज तक उबर नहीं पाई। शीला दीक्षित के बाद कोई ऐसा चेहरा उसके पास नहीं है जो मतदाताओं को आकर्षित कर सके।  और जिन राहुल के दम पर पार्टी अपने स्वर्णिम दिनों को पुनर्जीवित करना चाह रही है उन्होंने दिल्ली का दंगल छोड़ विदेश जाकर नया साल मनाने को प्राथमिकता दी और वह भी पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन के फ़ौरन बाद। जिसे लेकर उनकी चौतरफा आलोचना हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद श्री गाँधी पार्टी की उम्मीदों के केंद्र हैं। जब श्री केजरीवाल दिल्ली की गली - गली में घूमकर प्रचार में जुटे हुए हैं और प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भाजपा की तरफ से मोर्चा संभाल लिया तब कांग्रेस के शीर्ष नेता का युद्धभूमि से दूर चला जाना बेहद गैर जिम्मेदाराना कदम  माना जा रहा है। जबकि ये चुनाव इंडिया गठबंधन से ज्यादा कांग्रेस  के लिए महत्वपूर्ण है। दिल्ली में सत्ता हासिल करना तो उसके लिए नामुमकिन है लेकिन यदि वह पिछले चुनावों की तरह ही चारों खाने चित्त हुई तब नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव में लालू यादव एंड कं उन्हें कितना भाव देगी ये सोचने वाली बात है। प. बंगाल में ममता तो कांग्रेस को कुछ समझती ही नहीं हैं। ये सब देखते हुए अपेक्षा थी कि न सिर्फ राहुल बल्कि प्रियंका वाड्रा भी पार्टी की नैया डूबने से बचाने आगे आयेंगी। लेकिन अब तक जो देखने मिला उसके अनुसार कांग्रेस का प्रथम परिवार   अपने आप में मगन है। चुनाव में जय - पराजय होती रहती है किंतु योद्धा वह होता है जो पूरी हिम्मत से लड़े। आम आदमी पार्टी और भाजपा के  दिग्गज तो बिना समय गंवाए मैदान में उतर आये जबकि कांग्रेस  के प्रमुख सेनापति नये साल के जश्न की खुमारी से निकल नहीं पा रहे। ऐसे में उसका क्या हश्र होगा उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता पर तो हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे पानी फेर ही चुके हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

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