Wednesday, 30 April 2025

सेना को निर्णय की छूट देना स्वागत योग्य कदम


मार्च 1971 की बात है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ को बुलवाकर पूर्वी पाकिस्तान से आ रहे शरणार्थियों के सैलाब को रोकने के लिए उस पर हमला करने कहा।  इस पर जनरल ने पूछा क्या आप युद्ध जीतना चाहती हैं? इंदिरा जी के हाँ कहने पर उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति और मौसम का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें 6 महीने का समय दिया जाए तो  युद्ध में जीत की गारंटी होगी। कहते हैं इंदिरा जी को सेनाध्यक्ष की वह स्पष्टवादिता पसंद नहीं आई लेकिन उनके पास  दूसरा विकल्प नहीं था। इसके बाद दिसम्बर में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान पर हमला किया और मात्र 10 दिन में ही बांग्ला देश नामक नये देश का उदय हो गया। इस प्रसंग का उल्लेख ये स्पष्ट करना है कि राजनीतिक नेतृत्व को अपना निर्णय सेना पर थोपना नहीं चाहिए क्योंकि सत्ता में बैठे नेता तो वातानुकूलित कमरे में बैठकर निर्णय करते हैं लेकिन सेना को युद्धभुमि में  विषम परिस्थितियों का सामना करना होता है। इसलिए उसका निर्णय उसके विवेक पर छोड़ना ही उचित होता है।   गत दिवस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी सिद्धांत  का अनुसरण करते हुए एक महत्वपूर्ण बैठक की जिसमें रक्षा मंत्री , राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार , चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और तीनों सेनाओं के प्रमुख उपस्थित रहे। उस दौरान पहलगाम में  आतंकवादी हमले से उत्पन्न परिस्थितियों में निर्णायक सैन्य कार्रवाई का दायित्व सेना को सौंपते हुए  अधिकार दे दिया कि वह युद्ध के  लक्ष्य, तरीके और समय खुद तय करे। दिल्ली में  इन दिनों  सरगर्मी चरम पर है। विदेश मंत्री जयशंकर विदेशी राजनयिकों के सामने भारत का पक्ष रखते हुए विश्व जनमत भारत के पक्ष में मोड़ने में जुटे हैं। गृहमंत्री अमित शाह  सीमा सुरक्षा बल सहित अन्य संगठनों के साथ  रणनीति बनाने में व्यस्त हैं। आज रक्षा मामलों की मंत्रीमंडलीय समिति की बैठक भी हो रही है । इन बैठकों की बातचीत का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं होता लेकिन गत दिवस संपन्न बैठक के बाद प्रधानमंत्री द्वारा पाकिस्तान पर  कारवाई करने का  निर्णय सेना प्रमुखों पर छोड़ने की बात अधिकारिक रूप से सार्वजनिक । हर बात में सरकार की आलोचना करने के अभ्यस्त तबके को निश्चित रूप से निराशा हुई जो इसके पहले तक प्रधानमंत्री के साहस को चुनौती देते फिर रहे थे। साथ ही जो लोग घर बैठे युद्ध विशेषज्ञ बने हुए थे उन्हें झटका लगा क्योंकि प्रधानमंत्री ने किसी भी बड़ी कारवाई संबंधी फैसला उस सेना पर छोड़ दिया जिसे मैदान में उतरना है। उल्लेखनीय है पाकिस्तान में सेना का राजनीति में पूरा दखल रहता है। इसीलिए सत्ता में कोई नेता कितने समय तक रह पायेगा इसका फैसला जनता नहीं अपितु सेनाध्यक्ष करते हैं।  अस्तित्व में आने के कुछ साल बाद से ही इस देश का लोकतंत्र सेना द्वारा नियंत्रित होता रहा। जनरल अयूब खान, याह्या खाँ, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ ने चुनी हुई सरकार का तख्ता पलटकर सत्ता हथियाई। लेकिन जब जनता द्वारा चुने नेता सरकार चलाते हैं तब भी उसका रिमोट कंट्रोल सेनाध्यक्ष के पास ही रहता है। वाजपेयी सरकार के समय कारगिल में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ जब लड़ाई में बदली तब तक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को उसकी कुछ भी जानकारी नहीं थी क्योंकि सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ ने उनसे पूछने की जरूरत ही नहीं समझी। लेकिन भारत में आज तक सेना ने राजनीतिक नेतृत्व के अधीन ही काम किया है। 1962 में चीन के हाथों शर्मनाक हार के बाद भी पं. नेहरू की सत्ता को कोई खतरा नहीं पहुंचा वहीं पाकिस्तान में भारत के साथ हर बड़े युद्ध में हार के बाद सत्ताधारी को हटना पड़ा जिसमें फौजी जनरल की मुख्य भूमिका रही। भारत में सरकार की नीतियों के कारण कई बार सेना को लगता है उसके हाथ बंधे हुए हैं । अनेक अवसरों पर उसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात करने के बाद बिना लड़े ही वापस बुला लिया गया। कारगिल युद्ध के दौरान भी सेना को स्पष्ट निर्देश थे कि नियंत्रण रेखा पार नहीं करनी जबकि  भारतीय सैनिकों ने सभी  चोटियों से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया था और  छूट मिलती तो वे सीमा पार जाकर दुश्मन की जमीन में भी तिरंगा फहरा देते।  2014 के बाद फौज को कई बार सर्जिकल स्ट्राइक जैसे अभियान हेतु सीमा पार करने की अनुमति मिली जिसका उसने चतुराई पूर्वक उपयोग करते हुए अपने काम को अंजाम देकर सुरक्षित वापसी की। उस दृष्टि से गत दिवस प्रधानमंत्री ने सेना को पाकिस्तान पर सैन्य कारवाई हेतु लक्ष्य, तरीका और समय निश्चित करने की छूट देकर ये दिखा दिया कि राजनीतिक नेतृत्व को सेना की निर्णय क्षमता और रणनीतिक कुशलता में पूर्ण विश्वास है।  ऐसा करके श्री मोदी ने 140 करोड़ जनता की भावना और इच्छा का ही सम्मान किया है। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 29 April 2025

ऐसा कुछ न कहें जिससे दुश्मन का मनोबल बढ़े


पहलगाम में  आतंकवादी हमले के बाद हुई सर्वदलीय बैठक में जिस तरह की आम सहमति बनी  और सभी दलों ने सरकार को पूर्ण  समर्थन का आश्वासन दिया उसका सकारात्मक संदेश पूरे देश में गया। वैसे इसमें नया कुछ भी नहीं है। जब - जब देश पर संकट आया है राजनीतिक मतभेद भुलाकर सभी पार्टियों ने सरकार को देशहित में जरूरी फैसले लेने के लिए खुला हाथ दिया। लेकिन मौजूदा संकट के समय कुछ राजनेताओं के गैर जिम्मेदाराना बयानों ने  राजनीतिक कटुता पैदा की। सोशल मीडिया पर तो कुछ लोग दिन - रात सरकार को घेरने के प्रयास में देश का मनोबल गिराने में लगे हैं। पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर किये गए कत्लेआम  को झुठलाने के लिए एड़ी - चोटी का जोर लगाया जा रहा है। कश्मीरी मुसलमानों की तारीफ में अतिशयोक्ति को भी पीछे छोड़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयानों से भी ये साफ झलका कि सीमा पर मंडरा रहे संकट के बावजूद देश में एकता का अभाव है। हालांकि उनमें से कुछ अपनी बदजुबानी के लिए कुख्यात हैं और कांग्रेस उनकी वजह से काफी नुकसान भी सह चुकी है। शायद इसीलिए इस बार पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने सभी कांग्रेस जनों को सख्त निर्देश दिये हैं कि वे पार्टी लाइन से  हटकर कोई बयानबाजी न करें। ये भी कहा गया है कि जिन नेताओं ने सरकार पर निशाना साधा वह उनकी निजी राय है जिससे पार्टी सहमत नहीं है। पार्टी प्रवक्ता जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा की गई हत्याओं के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध जवाबी कारवाई करने के लिए पार्टी ने सरकार को पूरी तरह समर्थन देने की बात सर्वदलीय बैठक में ही कह दी थी। इसलिए कांग्रेसजन पहलगाम मुद्दे पर मुँह बंद रखें। हालांकि कुछ अन्य विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने सर्वदलीय बैठक के बाद भी राजनीतिक लाभ लेने के लिए अवांछित बयान दिये किंतु कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के साथ ही संसद के दोनों सदनों में मान्यता प्राप्त विपक्षी दल होने के कारण मुख्य धारा में है। इसलिये उससे ज्यादा जिम्मेदारी की अपेक्षा रहती है। लेकिन उसके कुछ नेता हमेशा कुछ न कुछ ऐसा बोल जाते हैं जिससे पूरी पार्टी को शर्मिंदा होना पड़ता है। अच्छा हुआ इस बार जल्दी कदम उठा लिया गया वरना कतिपय नेताओं ने पुरानी गलतियों को दोहराकर पार्टी की फजीहत करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इनमें एक तो ऐसे हैं जो अपनी बदजुबानी के चलते पार्टी से निलंबित भी हो चुके हैं। बहरहाल कांग्रेस पार्टी ने जो हिदायत दी वह समयानुकूल और देश हित में है। अच्छा होगा यदि सभी राजनीतिक दल ऐसे ही निर्देश अपने लोगों को दें। सत्ताधारी भाजपा को भी चाहिए वह अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को दो टूक समझाइश दे कि स्थिति से निपटने का काम सरकार और सेना का है। ऐसे अवसरों पर जनता के मन में जोश जगाना बुरा नहीं है किंतु बढ़ा - चढ़ाकर बातें करने से कोई लाभ नहीं होता। यदि विपक्ष से कोई आपत्तिजनक बात कहता भी है तो उसका जवाब देने के लिए अधिकृत व्यक्ति ही सामने आये। सोशल मीडिया में बैठे सूरमाओं से भी अपेक्षा है वे जंग को सीमा तक ही सीमित रखें। खुद विषय की जानकारी नहीं होने के बाद भी कहीं से नकल करते हुए तथ्यहीन सामग्री परोसने से देश का अंदरूनी वातावरण खराब हो रहा है। एक वर्ग विशेष तो सरकार की आड़ में देश का विरोध करने की हद तक जा रहा है। जो कदम सरकार द्वारा उठाये गए उनकी सफलता पर पाकिस्तान से ज्यादा संदेह तो सोशल मीडिया पर सक्रिय कतिपय तत्व व्यक्त कर रहे हैं। ये स्थिति किसी भी तरह से अच्छी नहीं कही जा सकती। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है किंतु जब राष्ट्र पर संकट हो तब सभी को एक स्वर में बात करनी चाहिए क्योंकि इंटरनेट के युग में  कोई भी  बात पलक झपकते ही दुनिया भर में  फैल जाती है। ये देखते हुए न सिर्फ राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को बल्कि सोशल मीडिया में सक्रिय वर्ग को भी जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए क्योंकि हमारे आपसी मतभेद  शत्रु राष्ट्र के लिए रक्षा कवच बन जाये ये अच्छा नहीं है। सिंधु जल संधि को निलंबित किये जाने के फैसले के विरुद्ध पाकिस्तान भारत को धमकियाँ दे तो बात समझ में आती है किंतु जब हमारे देश में ही अपनी ताकत पर सवाल उठेंगे तो उससे दुश्मन को ही लाभ होगा। इसलिए राजनेताओं के साथ ही देश के हर नागरिक को इस समय ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिए जिससे हमारी एकता पर प्रश्न चिन्ह लगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 28 April 2025

पाकिस्तान के बहिष्कार में भारतीय टीवी चैनल भी साथ आएं


पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए हत्याकांड  के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान पर पर अनेक प्रतिबंध लगा दिये। उसके जो नागरिक यहाँ वैध तरीके से आये हुए थे उन्हें 48 घंटे में लौटने के फरमान के साथ नये  वीजा देने पर भी रोक लगा दी गई है।  फिल्म उद्योग में कार्यरत पाकिस्तानी अभिनेताओं और अन्य कलाकारों को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। दोनों देशों के बीच  क्रिकेट संबंध पहले से ही नहीं हैं। हाल ही में संपन्न विश्व कप का आयोजक यद्यपि पाकिस्तान था किंतु भारत ने वहाँ खेलने से मना कर दिया तो उसके सभी मैच दुबई में हुए। यहाँ तक कि फाइनल मुकाबला भी वहीं हुआ। इसके कारण पाकिस्तान में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का खूब मजाक उड़ा जिसने अपने स्टेडियमों को विश्व कप के लिए सजाने - संवारने में काफी धनराशि खर्च की। लेकिन पाकिस्तान के कलाकार  हमारे फिल्म उद्योग से जुड़े रहे। अनेक टीवी कार्यक्रमों में भी उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है। इनमें वहाँ के क्रिकेटर भी शामिल होते हैं। ये बात स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है  कि कला और खेल से जुड़े पाकिस्तानी विशुद्ध पेशेवर अंदाज में पेश आने के कारण विवादग्रस्त बात करने से बचते हैं । लेकिन जो समाचारों से जुड़े टीवी चैनल हैं वे अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए  पाकिस्तानी पत्रकारों, पूर्व फौजी अधिकारियों सहित ऐसे लोगों को पैनल का हिस्सा बना लेते हैं जिनके रहने से माहौल बेहद गर्म हो जाता है। दोनों पक्ष एक दूसरे पर तीखे हमले करते हुए अपने देश की तरफदारी करने में पीछे नहीं रहते। आरोप - प्रत्यारोप की बाढ़ आ जाती है। चुनौतियाँ और धमकियाँ भी सुनने मिलती हैं। पाकिस्तान के पक्षधर उसके परमाणु शक्ति  संपन्न होने का दंभ भरते हैं तो बहस में शामिल भारतीय भी पाकिस्तान का नामो - निशां मिटाने का हौसला दिखाने से बाज नहीं आते। पहलगाम की घटना के बाद जब भारत सरकार ने सिंधु जल संधि निलंबित करने का फैसला किया तो उसके बाद हुई बहसों में इसे लेकर भी तर्क - वितर्क से बात कुतर्कों तक जा पहुंची।  ये सब देखते हुए ये प्रश्न सहज रूप से उठता है कि टीवी चैनलों द्वारा पाकिस्तानियों को बुलाकर भारत के विरुद्ध बोलने का अवसर देना कौन सी बुद्धिमत्ता है ? शत्रु देश के लोगों से  अपमानजनक बातें और धमकियाँ सुनने और फिर कृत्रिम उत्तेजना का प्रदर्शन करते हुए उन्हें जवाब देने का औचित्य समझ से परे है। हालांकि जिस बहस में केवल भारतीय होते हैं उनमें भी तथ्यों से अधिक व्यर्थ की बातों का समावेश होता है। लेकिन बात घर के भीतर ही रहती है किंतु जब पाकिस्तानी लोग सीमा के पार से शामिल होते हैं तब उनके द्वारा भारतीय नीतियों और   निर्णयों की आलोचना उनके मुल्क वालों को पसंद आती हैं। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तानी चैनलों पर बैठने वाले अपने देश की आलोचना नहीं करते किंतु उसे सुनकर हमें कोई लाभ नहीं होता क्योंकि ज्योंही इस्लाम का जिक्र उठता है हर पाकिस्तानी भारत के विरोध में मुँह चलाने लगता है। ये देखते हुए जिस प्रकार भारत सरकार ने पाकिस्तानी कलाकारों और नागरिकों के यहाँ आने पर रोक लगाई वैसे ही भारतीय समाचार टीवी चैनलों को भी कहा जाए कि वे अपने कार्यक्रमों में पाकिस्तानी मेहमानों को बिठाकर भारत को गालियाँ और धमकियाँ देने का अवसर देना बंद करें।  हो सकता है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह की रोक का विरोध हो किंतु जब पाकिस्तान के आम और खास सभी भारत के विरुद्ध ज़हर उगलने पर आमादा हों तब उन्हें वैसा करने हेतु मंच और मौका देना अपने देशवासियों का मनोबल गिराने में सहायक बनना है। उल्लेखनीय है भारत में एक तबका है जो देश के भीतर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच गंगा - जमुनी रिश्तों की माला जपता रहता है जबकि  इसकी संभावना दूरदराज तक नजर नहीं आती। इसी तरह कुछ लोग अभी भी उसी खुशफहमी में जी  रहे हैं कि  समान सांस्कृतिक विरासत के कारण आम भारतीय और पाकिस्तानी के बीच भावनात्मक एकता उत्पन्न की जा सकेगी। इसलिए बेहतर होगा पाकिस्तानियों का बहिष्कार व्यापक स्तर पर किया जाए। वैसे भी जितनी उदारता से भारत में पाकिस्तान के कलाकारों का स्वागत और सम्मान होता है उसका दसवां हिस्सा भी सीमा के उस पार महसूस नहीं होता। भारत में  धारा 370 हटाये जाने के विरोधियों में गैर मुस्लिमों की संख्या बहुत बड़ी है। वक़्फ़ विधेयक के विरोध में लोकसभा में जितने मत गिरे वे सदन में मुस्लिम सदस्यों से 10 गुना ज्यादा थे। लेकिन पाकिस्तान में हिन्दू विरोधी किसी भी  नीति को लगभग 100 फीसदी मुस्लिम समर्थन प्रदान करते हैं। इसलिए समय की मांग है पाकिस्तान का बहिष्कार पूरी तरह से हो और समाचार चैनल भी इसमें योगदान दें  । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 26 April 2025

सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद राहुल को माफी मांगनी चाहिए


हालांकि शरद पवार और उद्धव ठाकरे के दबाव के बाद भले ही लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने स्वातंत्र्य वीर सावरकर के बारे में सार्वजनिक तौर  अपमानजनक बातें  कहना बंद कर दिया था किंतु उन टिप्पणियों को वापस नहीं लिया। सावरकर जी द्वारा अंडमान की सेलुलर जेल से ब्रिटिश सरकार को अपनी रिहाई के लिए लिखे गए पत्र को लेकर श्री गाँधी और उनकी देखासीखी तमाम कांग्रेस नेता  उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाते आये हैं। लंबे समय तक सावरकर जी का विरोध श्री गाँधी के भाषणों का प्रमुख अंश बना रहा।  उद्धव ठाकरे और उनके साथी इस पर आपत्ति व्यक्त करते रहे लेकिन वे नहीं माने। वो तो जब शरद पवार ने  सख्त लहजे में समझाया कि  सावरकर विरोध महाराष्ट्र में  नुकसान पहुंचा सकता है तब वह सिलसिला थमा । उनके बयान के विरुद्ध उ.प्र की एक अदालत में दायर मुकदमे में जारी समन के विरुद्ध श्री गाँधी सर्वोच्च न्यायालय गए तो उसने समन पर तो फ़िलहाल रोक लगा दी किंतु उनके अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के जरिये उन्हें इस बात के लिए फटकार लगाई कि जिन्होंने देश को आजादी दिलाई उनके साथ आप ऐसा व्यवहार करते हैं। साथ ही ये चेतावनी भी दी कि भविष्य में उनके ऐसे बयान पर वह खुद संज्ञान ले सकता है। राहुल द्वारा सावरकर जी को अंग्रेजों का वफादार बताये जाने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने श्री सिंघवी से पूछा कि क्या उनको पता है कि ब्रिटिश वायसराय को लिखे पत्रों में महात्मा गाँधी भी आपका वफादार सेवक जैसे शब्दों का उपयोग करते थे तब क्या उन्हें भी अंग्रेजों का सेवक माना जा सकता है। सर्वोच्च अदालत ने श्री गाँधी को ये भी याद दिलाया कि उनकी दादी स्व. इंदिरा गाँधी ने भी स्वाधीनता संग्राम में  सावरकर जी की प्रशंसा करते हुए पत्र लिखा था। श्री गाँधी द्वारा उनके बारे में की गई टिप्पणियों को अदालत ने गैर जिम्मेदाराना बताया। इस मामले में अलाहाबाद उच्च न्यायालय में श्री गाँधी के विरुद्ध दायर मामले में अंतिम निर्णय जो भी हो किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने सावरकर जी को देशभक्त मानकर उनके विरुद्ध टिप्पणी किये जाने पर स्वतः संज्ञान लेने और देश को आजादी दिलाने वालों के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की निंदा कर श्री गाँधी को नैतिक रूप से तो दोषी ठहरा ही दिया है। इस फटकार  के बावजूद भी  श्री गाँधी और उनके समर्थक क्या सावरकर जी के विरुद्ध दुष्प्रचार जारी रखेंगे या  सार्वजनिक क्षमा याचना करेंगे इसका उत्तर उनसे अपेक्षित है। गौरतलब है इंदिरा जी द्वारा प्रधानमंत्री रहते हुए 20 मई 1980 को  स्वातंत्र्य वीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक को संबोधित पत्र  में लिखा था कि वीर सावरकर का ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मजबूत प्रतिरोध हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काफी अहम है। श्रीमती गाँधी ने उन्हें  देश का महान सपूत भी बताया था।  उक्त पत्र का जिक्र पहले भी होता आया है किंतु राहुल ने सावरकर जी के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां जारी रखीं। अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनको स्वाधीनता सेनानियों का अपमान मानकर उसकी पुनरावृत्ति नहीं होने के प्रति चेतावनी दे डाली इसलिए यदि श्री गाँधी के मन में स्वाधीनता सेनानियों के प्रति लेशमात्र भी सम्मान है तो उन्हें सावरकर जी  के बारे में कही गई अनर्गल बातों के लिए सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। चूंकि सावरकर जी हिन्दूवादी थे इसलिए उनकी देशभक्ति पर सवाल खड़े करने वाले राहुल और उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले क्या राष्ट्रपिता गाँधी जी की देशभक्ति पर भी महज इसलिए संदेह जतायेंगे क्योंकि उन्होंने भी वायसराय को भेजे गए पत्रों के अंत में आपका वफादार सेवक जैसे शब्दों का प्रयोग किया था? श्री गाँधी के अधिवक्ता श्री सिंघवी ने जब ये सफाई देनी चाही कि उनका इरादा किसी को आहत करने का नहीं था तो न्यायालय ने पलटकर पूछा कि फिर उन्होंने ऐसी टिप्पणी क्यों की और वह भी महाराष्ट्र में जहाँ सावरकर जी की पूजा होती है। बहस के दौरान अदालत ने जो कुछ भी कहा वह श्री गाँधी और उनके साथ - साथ उनके समर्थकों के गाल पर जोरदार तमाचा है । इसमें दो मत नहीं है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सावरकर जी के प्रति राहुल की अपमानजनक टिप्पणियों ने भी कांग्रेस का सफाया करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पता नहीं कांग्रेस  और उसके नेतृत्व को ये बात कब समझ में आयेगी कि श्री गाँधी की अपरिपक्वता से पार्टी को बड़ा नुकसान होता है। इंडिया गठबंधन में आ रही टूटन के लिए भी उन्हीं को जिम्मेदार माना जाता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 25 April 2025

मृतकों की पत्नी और परिजन भी क्या झूठ बोल रहे हैं


पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद पूरे देश ने अभूतपूर्व भावनात्मक एकता का प्रदर्शन किया। इसके पहले भी कश्मीर घाटी में आतंकवादी निर्दोष लोगों को बेरहमी से मौत के घाट उतारते रहे हैं। इनमें पुलिस और सेना में कार्यरत कश्मीरी मुस्लिम भी थे । लेकिन पहलगाम में धर्म पूछकर की गई हत्याओं के कारण न सिर्फ घाटी बल्कि देश के बाहर भी मुस्लिम समुदाय दबाव में आ गया। असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता तक ने आतंकवादियों के प्रति बेहद तीखे शब्दों का प्रयोग किया। घाटी के भीतर भी बंद के जरिये  मुस्लिम समुदाय ने खुद को पाक - साफ साबित करने का भरपूर प्रयास  किया जबकि उसके पीछे का एकमात्र मकसद अपने पर्यटन व्यवसाय की रक्षा करना है जो उक्त हादसे के बाद चौपट होने के कगार पर आ गया। पहलगाम में एक कश्मीरी मुस्लिम भी मारा गया जिसके घोड़े पर एक पर्यटक बैठा था। मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी जमात उसका उदाहरण देकर आतंकवादियों की धर्मांधता पर परदा डालने के प्रयास में जुटी है।  सोशल मीडिया पर भी धर्म  पूछकर हत्या किये जाने के सबूत मांगे जा रहे हैं। जहाँ तक बात सुरक्षा प्रबंधों में चूक की है तो वह सर्वदलीय बैठक में सरकार द्वारा भी स्वीकार की जा चुकी है किन्तु आतंकवादियों द्वारा धर्म के आधार पर  हत्या किये जाने की बात को झूठ बताना  उन विधवाओं और अनाथों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा पाप है जो चिल्ला - चिल्लाकर बता रहे हैं कि आतंकवादियों ने स्पष्ट तौर पर धर्म पूछकर हत्याएं कीं। इंदौर के जिस ईसाई व्यक्ति ने पहलगाम हत्याकाण्ड में जान गंवाई उसकी पत्नी और परिजन खुलेआम कह रहे हैं कि मृतक से कलमा पढ़ने कहा गया किन्तु जब उसने अपने इसाई होने की बात बताई तब उसके सीने में गोली मार दी गई। राजस्थान में एक बच्चे ने भी अपने पिता की हत्या धर्म पूछकर किये जाने की बात टीवी चैनलों को बताई।  जिन फौजियों को मुस्लिम न होने के कारण गोली मारी गई उनमें से एक के कपड़े उतरवाकर उसके धर्म का पता लगाने और फिर हत्या करने की पुष्टि उसकी पत्नी ने की। इतना सब होने के बाद भी वर्ग विशेष इन बातों को झुठलाने पर आमादा है। कुछ लोगों  को अखबारों की खबरों में धर्म पूछकर हत्या किये जाने वाले  शीर्षक से परेशानी हो रही है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। भारत सरकार ने पाकिस्तान के विरुद्ध जिन कड़े फैसलों का ऐलान किया उनमें सिंधु नदी समझौता रोकना भी है। इस पर पाकिस्तान सवाल उठाता उसके पहले ही भारत में ये कहने वाले सामने आ गए कि हमारे पास सिंधु का पानी रोकने के इंतजाम नहीं हैं और कुछ समय बाद यह रोक  वापिस ले ली जाएगी । ऐसी बातों से ये लोग भले ही अपनी भड़ास निकाल ले किन्तु इसे सीधे - सीधे पाकिस्तान का हौसला बढ़ाने वाला कदम माना जाएगा। गत दिवस सर्वदलीय बैठक के दौरान समूचे विपक्ष ने एक स्वर से सरकार द्वारा उठाये जाने वाले किसी भी कदम का समर्थन करने का आश्वासन दिया। लेकिन कतिपय यूट्यूबर और सोशल मीडिया पर लगातार मोदी विरोधी अभियान चलाने वाले वर्ग ने सरकार के फैसलों को असरहीन बताने की मुहिम छेड़ दी। कुछ तो ये कहने से भी बाज नहीं आये कि  सिंधु नदी समझौता पंडित नेहरू द्वारा हस्ताक्षरित था इसलिए मोदी सरकार इससे पीछे हटना चाह रही है। कांग्रेस नेता और पाकिस्तान में राजनयिक रहे मणिशंकर अय्यर ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा इससे पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते और बिगड़ेंगे। ऐसा लगता है मणिशंकर पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हों। कुल मिलाकर बात ये है कि जब पूरे देश को एक स्वर में आतंकवाद और पाकिस्तान के विरुद्ध अपना गुस्सा व्यक्त करना चाहिए तब पूर्वाग्रहों से ग्रसित वर्ग अपना राजनीतिक स्वार्थ साधने और मुस्लिम तुष्टीकरण से बाज नहीं आ रहा। पहलगाम में अपने परिजनों को गंवाने वालों की बात  सुनने के बाद भी धर्म पूछकर हत्याओं  को कपोलकल्पित बताने वालों की  निष्ठा पर संदेह उत्पन्न होना अस्वाभविक नहीं है। भारत सरकार ने जो कदम दो दिन पहले उठाये वे कितने कारगर होंगे और पाकिस्तान उनसे कितना दबाव में आयेगा ये कुछ समय बाद ही स्पष्ट होगा किन्तु इतना तय है कि सिंधु समझौते से पीछे हटने के पहले सरकार ने काफी कुछ सोचा होगा। ऐसे मामलों में  रणनीति का खुलासा सार्वजनिक रूप से करना  मूर्खता होती है । दुनिया के तमाम महत्वपूर्ण देशों से जो समर्थन हमें मिल रहा है उससे पाकिस्तान दबाव में है। ऐसे में  उसके विरुद्ध भारत सरकार द्वारा लिए फैसलों पर सवाल उठाने वाले देश का मनोबल गिराने की गलती कर रहे हैं। सरकार और नरेंद्र मोदी का विरोध कोई अपराध नहीं है किन्तु जब सवाल देश की सुरक्षा और सम्मान का हो तब ऐसी कोई बात नहीं होना चाहिए जिससे हमारी आपसी फूट सामने आये। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 24 April 2025

आपदा के समय हवाई टिकिटों की कालाबाजारी शर्मनाक


पहलगाम हत्याकांड के बाद कश्मीर घाटी में मौजूद पर्यटकों ने अपना कार्यक्रम बीच में ही रद्द कर सुरक्षित घर लौटने के लिए जब हवाई जहाज की टिकिट खरीदनी चाही तब उनसे चार - पाँच गुना किराया वसूला गया। उल्लेखनीय है नागर विमानन मंत्रालय  ने हवाई कंपनियों को हिदायत दे रखी थी कि वे ऐसी स्थिति में यात्रियों की मजबूरी का लाभ उठाते हुए उनका शोषण न करें। लेकिन कुछ हवाई कंपनियां ऐसे अवसर पर भी मुनाफाखोरी करने की नीचता दिखाने से बाज नहीं आईं। जब समाचार माध्यमों एवं सोशल मीडिया पर उनकी लूटपाट का पर्दाफ़ाश हुआ तब जाकर वे मानवता दिखाने लगीं और किराये सामान्य कर दिये। लेकिन इसके लिए केंद्रीय नागर विमानन मंत्री राम मोहन नायडू को खुलकर सामने आना पड़ा। ताजा खबर ये है कि किराये सामान्य कर दिये गए हैं। इसके अलावा 30 अप्रैल तक टिकिट रद्द करवाने और यात्रा की तिथि बदलवाने जैसे कार्य भी निःशुल्क करने की सुविधा दी गई है। कतिपय हवाई कंपनियों द्वारा उक्त दर्दनाक हादसे के बाद यात्रियों से जबरन बढ़ा हुआ किराया वसूलने का जो घिनौना कार्य किया गया उसकी पूरे देश में रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई। हवाई कंपनियां वैसे भी उड़ान की तारीख निकट आते - आते टिकिट के दाम बढ़ाकर  यात्रियों का शोषण करती आई हैं। सरकार और अदालतों द्वारा कई बार आपत्ति व्यक्त किये जाने के बाद भी वे ऐसा करने से बाज नहीं आ रहीं। इसे टिकिटों की कालाबाजारी कहना भी गलत नहीं होगा। किसी शहर से उड़ान शुरू होने के कुछ समय बाद हवाई कंपनी बिना कारण बताये सेवा बंद करने की घोषणा कर देती है। बाद में पता चलता है उसने वह उड़ान किसी अन्य मार्ग पर शुरू कर दी क्योंकि वहाँ अधिक कमाई की गुंजाइश है। चूंकि विमानन क्षेत्र में निजी कंपनियों का वर्चस्व है इसलिये उनसे घाटे में सेवा के संचालन की उम्मीद करना तो गलत है किन्तु   किराये को लेकर अनिश्चितता एक हद के बाद स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। रेलवे की तर्ज पर तत्काल  टिकिट के लिए अतिरिक्त शुल्क जैसी व्यवस्था हवाई टिकिट में भी रहे तो वह सहन की जा सकेगी किन्तु सामान्य से चार - पाँच गुना किराया वसूलना अमानवीय भी है और अनुचित भी। ये देखते हुए सरकार को चाहिए वह हवाई टिकिटों की खुलेआम कालाबाजारी को रोके । इसके लिए यदि कड़े नियम बनाने की आवश्यकता पड़े तो उसमें भी संकोच नहीं करना चाहिए। कश्मीर घाटी में अचानक बदली परिस्थितियों के बीच हवाई कंपनियों द्वारा जिस तरह से यात्रियों की जेब काटने दुस्साहस किया गया वह संकट के समय हमारे  देश के चरित्र का एहसास करवाता है। होना तो ये चाहिए था कि बिना सरकार के दखल का इंतजार किये ही मुसीबत में फंसे यात्रियों को टिकिटों में रियायत देकर हवाई कंपनियां इंसानियत का परिचय देतीं। उनके ऐसा करने से अन्य सेवाओं को भी प्रेरणा मिलती। हालांकि जो खबरें आ रही हैं उनसे ये जानकर संतोष होता है कि घाटी में पर्यटन सेवाएं उपलब्ध करवाने वाले तमाम कारोबारी यात्रियों को बुकिंग रद्द करवाने पर पूरा पैसा लौटा रहे हैं। धर्मस्थलों में लोगों को ठहराने की व्यवस्थाएं भी निःशुल्क की गई। लेकिन कुछ हवाई कंपनियां जिस तरह आपदा में अवसर को गलत तरीके से भुनाने  में जुटीं वह बेहद निम्नस्तरीय सोच का परिचायक था। भले ही चौतरफा थू - थू होने के बाद उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए हों किन्तु जिन हवाई कंपनियों ने दहशत में डूबे यात्रियों  को लूटने मैं शर्म नहीं की उन्हें   अधिक राशि लौटाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। यही नहीं तो उनको इस कालाबाजारी के लिए दंडित भी किया जाना जरूरी है जिससे दोबारा कोई ऐसा करने की हिम्मत न दिखा सके। ये कहना गलत नहीं होगा कि  हमारे देश में उपभोक्ता के अधिकारों का संरक्षण करने की चिंता किसी को नहीं है। निजी क्षेत्र को छोड़ दें तो सरकारी क्षेत्र में भी सेवा शुल्क के रूप में अनाप - शनाप वसूली जारी है। बेहतर है इस बारे में सार्थक प्रयास हों। पहलगाम  घटना के बाद हवाई कंपनियों ने जो शर्मनाक व्यवहार किया उसकी पुनरावृत्ति न हो इसका पुख्ता  प्रबंध होना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 23 April 2025

क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होगी : सरकार और सेना पर भरोसा रखें



कश्मीर घाटी में सबसे ज्यादा पर्यटक पहलगाम जाते हैं। इसे अमरनाथ यात्रा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। गत दिवस इसके पास चार सशस्त्र आतंकवादियों ने 26 सैलानियों को भून  दिया। मृतकों में सभी पुरुष थे। प्रत्यक्षदर्शियों की जुबानी पुलिस की वर्दी में आये आतंकवादियों ने पर्यटकों को कलमा पढ़ने कहा और जो नहीं पढ़ सके उन्हें  गोली मार दी।  मारने से पहले लोगों से उनका धर्म भी पूछा। जहाँ उक्त घटना हुई वह  वृक्षों से घिरा एकांत स्थल है।  आतंकवादियों ने इसीलिए इस स्थान को चुना क्योंकि वहाँ से भाग निकलना आसान था और फिर वहाँ पुलिस अथवा अन्य सुरक्षा बल नहीं थे। पहलगाम में आतंकी घटनाएं पहले भी होती रही हैं। अमरनाथ यात्रा के शिविर पर भी एक बार हमला हुआ था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में आतंकवादी घटनाओं में कमी आने के कारण पहलगाम पर्यटकों के लिए काफी सुरक्षित समझा जाने लगा था। पर्यटकों की संख्या  पिछले सभी  रिकार्ड तोड़ रही थी। आगामी अमरनाथ यात्रा के प्रति भी उत्साह नजर आ रहा था। सीमा के नजदीकी इलाकों में तो सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ होती रहती है किन्तु पहलगाम में ऐसा हो जाना कई सवाल खड़े करता है। कश्मीर घाटी की भौगोलिक रचना ऐसी है कि सीमा पार से घुसपैठ को पूरी तरह खत्म कर पाना कठिन है। इसका कारण स्थानीय लोगों में घुसे पाकिस्तान समर्थक हैं। धारा 370 समाप्त होने के बाद लंबे समय तक वहाँ केंद्र का शासन रहा किन्तु गत वर्ष विधानसभा चुनाव संपन्न हुए और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार भी बन गई जिसके केन्द्र से कुछ नीतिगत मुद्दों को छोड़कर रिश्ते सामान्य बने हुए हैं। हालांकि घुसपैठ और छोटी - छोटी आतंकवादी घटनाएं होती रही हैं किन्तु ये जो वारदात हुई वह  अप्रत्यक्ष तौर पर शत्रु देश का हमला है। जो जानकारी अब तक आई उसके मुताबिक तीन पाकिस्तानी और एक स्थानीय नागरिक ने मिलकर उक्त हत्याकांड किया। हमले का समय अनेक दृष्टियों से गौर तलब है। एक दिन पहले अमेरिका के उपराष्ट्रपति भारत आये और उनसे भेंट के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब रवाना हो गए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी अमेरिका प्रवास पर हैं। विश्व की अर्थव्यवस्था अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के कारण डगमगा चुकी थी किन्तु प्रारंभिक झटकों के बाद भारत के पैर मजबूती से टिकने लगे। विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों में अपना विश्वास जताया है। दूसरी तरफ पाकिस्तान के भीतरी हालात बेहद नाजुक हैं। इधर बांग्ला देश के नये हुक्मरान भी पाकिस्तान के नक्शे कदम पर चलते हुए चीन के पिछलग्गू बनकर हमारे  दुश्मन बन बैठे हैं। उनकी हरकत का जवाब देने के लिए भारत ने उनके माल की आवाजाही के लिए अपनी धरती का उपयोग बंद कर दिया। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष ने भी गत सप्ताह बेहद भड़काऊ बयान दिया। सबसे बड़ी बात देश के भीतर वक़्फ़ कानून को लेकर मुस्लिम समाज का विरोध और सेकुलर जमात का उसके साथ खड़े होना है। सर्वोच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। आतंकवादियों ने हत्या करने के बाद महिलाओं से प्रधानमंत्री श्री मोदी के बारे में जो कहा उसका असली उद्देश्य भारत के मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध आक्रामक होने के लिए भड़काना था। यदि वे सीधे - सीधे हत्याएं कर भाग जाते तब बात अलग होती किन्तु पहले धर्म पूछना और कलमा पढ़ने बाध्य करने जैसी बातों से स्पष्ट हो गया कि उक्त घटना का संबंध देश की वर्तमान स्थितियों से है जो वक़्फ़ कानून पारित होने के बाद उत्पन्न हुईं। प. बंगाल के मुर्शिदाबाद के बाद पहलगाम की घटना के तार भले ही एक दूसरे से सीधे न जुड़े हों किन्तु दोनों के मकसद और उसके पीछे की मानसिकता इस्लामिक कट्टरवाद से प्रेरित और प्रोत्साहित है। लेकिन दुख और चिंता का विषय ये है कि इतने गंभीर मुद्दे पर भी एक वर्ग सरकार और सुरक्षा बलों को घेरने में लगा है। आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर की गई हत्याओं में  राजनीति देखने के अलावा ये कहने में भी शर्म नहीं की जा रही कि ये सब आगामी चुनावों में लाभ लेने के लिए प्रायोजित किया गया है। ये बातें सीधे - सीधे तौर पर हमारी आंतरिक फूट को उजागर करती हैं जिसकी ताजा बानगी अमेरिका प्रवास में श्री गाँधी द्वारा की जा रही टिप्पणियां हैं। घटना के तत्काल बाद गृह मंत्री अमित शाह का श्रीनगर पहुंचना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सऊदी अरब का दौरा बीच में छोड़कर नई दिल्ली लौटने से ही लग जाता है कि सरकार  कितनी गंभीर है। सुरक्षा बलों के लिए भी ये घटना बड़ी चुनौती है। इसका जवाब सैन्य मोर्चे पर दिया जाएगा या कूटनीतिक तरीके से ये फिलहाल कहना कठिन है किन्तु जिस तरह अमेरिका और रूस ने भारत का साथ देने की बात कही उससे  अंदाज लगाया जा सकता है कि क्रिया की प्रतिक्रिया  अवश्य होगी। ऐसे क्षणों में पूरे देश को सरकार और सेना पर विश्वास रखना चाहिए क्योंकि शत्रु का मनोबल तोड़ने के लिए एकजुटता जरूरी है। चूंकि उक्त हमले में इटली और इसरायल के नागरिक की भी हत्या हुई है इसलिए इसके दूरगामी परिणाम की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 22 April 2025

सर्वाधिक हिन्दी फिल्में बनाने वाले महाराष्ट्र में हिन्दी का विरोध चौंकाने वाला


आजादी के बाद भाषावार प्रांतों की रचना के रूप में की गई भूल देश को कितनी महंगी पड़ी ये बताने की जरूरत नहीं है। इसकी वजह से भाषा को राज्यों की पहिचान के रूप में देखा जाने लगा। शुरुआत में ही विवाद शुरू हो गए। कुछ सीमावर्ती इलाकों पर एक एक से अधिक राज्यों के दावे आज तक उलझे पड़े हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बेलगाम का विवाद 78 वर्ष बाद भी नहीं सुलझ सका जबकि इसके लिए न जाने कितनी बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं जिनमें सार्वजनिक संपत्ति तो नष्ट हुई ही , अनेक लोगों की अमूल्य ज़िंदगी तक चली गई। भाषा विवाद को लेकर तमिलनाडु हमेशा केन्द्र से भिड़ने के लिए तैयार रहता है। नई शिक्षा नीति के अनुसार प्राथमिक शिक्षा के दौरान तीन भाषाओं  को पढ़ाया जाना जरूरी है जिसमें दो भारतीय होना अनिवार्य हैं । उनमें से एक हिन्दी हो ऐसी केन्द्र की मंशा है किंतु अनिवार्य नहीं । नई नीति के अनुसार पांचवी कक्षा अर्थात प्राथमिक तक राज्य की मातृभाषा में पढ़ाई जरूरी है ताकि अंग्रेजी माध्यम का वर्चस्व कम किया जा सके । साथ ही विद्यार्थी दो अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी को भी वैकल्पिक के रूप में चुन सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन चूंकि हिन्दी के नाम से ही चिढ़ते हैं इसलिए वे केन्द्र के साथ भाषा युद्ध की धमकी देने पर आमादा हैं। हालांकि इसके पीछे बड़ा कारण आगामी वर्ष होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव हैं। जहाँ तक बात तमिलनाडु की है तो वहाँ की राजनीति हिन्दी और उत्तर भारत के विरोध पर ही चलती है। लेकिन महाराष्ट्र सरीखे राज्य में जिस प्रकार प्राथमिक शिक्षा में भारतीय भाषा के तौर पर हिन्दी की अनिवार्यता का विरोध किया जा रहा है वह चौंकाने वाला है। भले ही महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टियां मराठी के वर्चस्व को लेकर सदैव आवाज उठाती रहीं किंतु देवनागरी  लिपि में लिखी जाने वाली मराठी और हिन्दी दोनों सगी न सही किंतु चचेरी बहनें जैसी तो हैं ही। दक्षिणी राज्यों में हिन्दी नहीं जानने वाले बहुत लोग होंगे किंतु महाराष्ट्र में हिन्दी न जानने वाले ढूढ़ने पर भी मुश्किल से मिलेंगे। ऐसे में  हिन्दी पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी के बहाने उसके विरोध की राजनीति क्षेत्रीय भावनाएं भड़काने का प्रयास ही लगता है। जो लोग महाराष्ट्र में मराठी के वर्चस्व के लिए मरने - मारने पर आमादा हो जाते हैं वे भूल जाते हैं कि मुंबई के फिल्म उद्योग में बनने वाली सबसे ज्यादा फिल्में हिन्दी की ही होती हैं। विश्वविख्यात पार्श्व गायिका भारत रत्न लता मंगेशकर की लोकप्रियता हिन्दी में गाये उनके गीतों से ही थी। उनकी बहिन आशा भोंसले, किशोरकुमार  मन्ना डे, कुमार शानू , श्रेया घोषाल और अलका याग्निक सहित अनेक गायक और संगीतकार गैर हिन्दी भाषी रहे किन्तु वे भी हिन्दी के जरिये ही पहिचान बना सके। चेन्नई में राजश्री , प्रसाद , एवीएम जैसे बड़े फिल्म निर्माताओं ने सफलतम हिन्दी फिल्में बनाकर खूब पैसे कमाए। अब तो दक्षिण भारत की भाषाओं में बनने वाली बड़े बजट की फिल्मों को हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में डब करना आम होता जा रहा है। क्या तमिलनाडु  की हिन्दी विरोधी लॉबी ने कभी कमल हासन और रजनीकांत को हिन्दी फिल्मों में काम करने से रोका ? दक्षिण भारतीय  अनेक अभिनेत्रियां हिन्दी फिल्मों में शीर्ष पर पहुंची जिनमें हेमा मालिनी, रेखा  श्रीदेवी और जयाप्रदा के नाम उल्लेखनीय हैं। हेमा और जयाप्रदा तो उत्तरप्रदेश से लोकसभा का चुनाव भी जीतीं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं स्व. जयललिता भी हिन्दी विरोधी राजनीति करती रहीं किन्तु बतौर अभिनेत्री उन्होंने भी हिन्दी फिल्मों में काम किया। सही बात तो ये है कि महाराष्ट्र के फिल्म उद्योग की तो कल्पना ही बिना हिन्दी के नहीं की जा सकती। यद्यपि उसमें मराठी सहित प्रादेशिक भाषाओं की सैकड़ों फिल्में प्रतिवर्ष बनती हैं किन्तु यदि बॉलीवुड कहे जाने वाले इस उद्योग में हिन्दी फिल्मों का निर्माण बंद हो जाए तो इसकी चमक - दमक खत्म होते देर नहीं लगेगी। हिन्दी फिल्मों में कलात्मकता को बढ़ावा देने वाले स्व. वी. शांताराम मराठी भाषी थे। इसी तरह बंगाल से आकर बॉलीवुड में नाम कमाने वाले निर्देशकों में बिमल रॉय, हृषिकेश मुखर्जी, वासु भट्टाचार्य ने हिन्दी फिल्मों के जरिये ही शोहरत कमाई। ये सब देखते हुए महाराष्ट्र में हिन्दी का विरोध गले नहीं उतरता। महाराष्ट्र की राजनीति में चूंकि उद्धव ठाकरे लगातार हाशिए पर आते जा रहे हैं इसलिए वे मराठी भाषा जैसा भावनात्मक मुद्दा उठवा रहे हैं। सत्ताधारी गठबंधन भी ऐसे मुद्दों पर दबाव में आ जाता है। लेकिन ऐसे मामलों में केवल राजनीतिक स्वार्थों के आधार पर नहीं सोचना चाहिए क्योंकि  तमिलनाडु और महाराष्ट्र के लाखों लोग उत्तर भारतीय राज्यों में न सिर्फ कार्यरत अपितु स्थायी रूप से बसे हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 21 April 2025

अनुराग जैसों का विरोध सामूहिक रूप से होना चाहिए

हिन्दी फिल्मों में वास्तविकता के नाम पर अश्लील गालियों को प्रचलित करने वाले निर्देशक अनुराग कश्यप द्वारा ब्राह्मणों के बारे में की गई एक टिप्पणी ने पूरे देश में हलचल मचा दी। सोशल मीडिया के दौर में इस तरह की कोई भी बात पलक झपकते ही सर्वत्र फैल जाती है और वही इस मामले में भी हुआ। जवाब में दूसरे पक्ष से भी हमला शुरू हो गया और कश्यप की गिरफ्तारी की मांग भी उठने लगी। गीतकार और संवाद लेखक मनोज मुंतशिर ने भी अनुराग को तीखी भाषा में चेतावनी दे डाली। हालांकि बाकी फिल्मी बिरादरी  ब्राह्मणों के प्रति घटिया टिप्पणी करने वाले निर्देशक के बारे में बोलने से बचती दिखाई दी। ज्यादा दबाव बन जाने के बाद अनुराग ने माफी तो मांगी किंतु उसमें भी उनकी घटिया सोच उजागर हुई।  अनुराग द्वारा निर्देशित गैंग्स ऑफ वासेपुर बिहार के कोयला माफिया के बारे में थी। फिल्म अपने  कथानक और जबरदस्त अभिनय के कारण सफल रही किंतु इसने फिल्मी दुनिया को नई राह दिखा  दी। वेब सिरीज मिर्जापुर  इसका उदाहरण है जिनके जरिये अश्लीलता का प्रदर्शन भारतीय परिवारों के भीतर तक आ गया। अनुराग का पारिवारिक जीवन भी बिखराव से भरा रहा है। ऐसे लोग मानसिक विकृति से ग्रसित भी  हो जाते हैं। मनुवाद की आड़ में न सिर्फ ब्राह्मण अपितु अन्य उच्च जातियों के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां करना  आम होता जा रहा है। राजनेता तो जातीय ध्रुवीकरण के लिए ऐसा करते हैं किंतु  अनेक लेखक, पत्रकार एवं अन्य बुद्धिजीवी भी  हैं जिनकी रोजी - रोटी  सवर्णों को गालियाँ देकर ही चला करती है। सेकुलर जमात के लोगों में भी चूंकि सनातन विरोधी भावना कूट- कूटकर भरी हुई है इसलिए वे भी हिंदुओं के बीच फूट डालने  में आगे - आगे नजर आते हैं। अनुराग किसी राजनीतिक दल या अन्य संगठन से जुड़े हैं ये जानकारी तो नहीं है किंतु ब्राह्मण विरोधी घिनौनी टिप्पणी के चौतरफा विरोध के बाद जारी उनके  माफीनामे में कहीं नहीं लगता कि उन्हें अपनी निम्नस्तरीय बात पर तनिक भी ग्लानि हुई हो। आश्चर्य ये है कि ब्राह्मणों के प्रति  गन्दी टिप्पणी करने वाले अनुराग के विरुद्ध विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा किसी दलित या पिछड़ी जाति के अपमान को लेकर होता है। खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण साबित करने वाले  राहुल गाँधी भी चुप रहे और मायावती के दाहिने हाथ रहे सतीश चंद्र मिश्र भी। तेजस्वी और अखिलेश यादव की पार्टियों में भी अनेक ब्राह्मण नेता हैं किंतु उनकी भी बोलती बंद है। सही बात ये है कि ऐसी हरकतें  सनातन के अनुयायियों के बीच फूट डालने के निहित उद्देश्य से की जाती हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन  और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे द्वारा सनातन धर्म के बारे में जो आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं यदि उसका शतांश भी इस्लाम के बारे में कहा गया होता तो सिर तन से जुदा जैसी धमकियाँ गूंजने लग जातीं। कहने का आशय ये है कि हिंदुओं की सहिष्णुता का बेजा लाभ उठाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। विशेष रूप से सवर्ण जातियों के प्रति विद्वेष का भाव फैलाने का सुनियोजित प्रयास हो रहा है। जिसे राजनीतिक प्रश्रय मिलने से वातावरण दिन ब दिन विषैला होने लगा है। अनुराग कश्यप इतनी बड़ी हस्ती नहीं जो ब्राह्मण तो क्या किसी अन्य जाति की छवि धूमिल कर सके लेकिन उनकी संदर्भित टिप्पणी ने सामाजिक समरसता की जड़ों को कमजोर करने का गंदा काम किया है जिसके लिए उनकी निंदा हिंदुओं द्वारा सामूहिक स्तर पर होनी चाहिए।  वरना एक - एक कर सभी जातियों के विरुद्ध  अमर्यादित टिप्पणियां की जाती रहेगीं। उदाहरण के लिए राणा सांगा के बारे में सपा के एक सांसद द्वारा कही गई आपत्तिजनक बातों का करणी सेना द्वारा विरोध किया गया जिससे लगा उनका अपमान केवल राजपूतों तक सीमित है  जबकि राणा सांगा तो पूरे भारत के गौरव पुत्र थे। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जब स्टालिन और खरगे जी के साहेबजादों ने सनातन धर्म को कोरोना और डेंगू जैसे संबोधनों से नवाजा था तब ही  पूरा हिन्दू समाज एकजुट होकर विरोध करता तब शायद आगे किसी की हिम्मत नहीं होती , गुस्ताखी करने की। नीचता का जवाब नीचता से दिया जाना तो  शोभा नहीं देता किंतु इतना सहनशील हो जाना भी उचित नहीं कि कोई भी ऐरा - गैरा  अपमान करने का दुस्साहस करे और हम चुपचाप होकर बैठे रहें। ऐसे में अनुराग कश्यप जैसे लोगों के हौसले पस्त करने का दायित्व समूचे  हिन्दू समाज का है वरना ये सिलसिला  इसी तरह जारी रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 19 April 2025

बटेंगे तो कटेंगे का नारा प. बंगाल में भी असर दिखायेगा



वक़्फ़ कानून का मुस्लिम समुदाय पूरे देश में विरोध कर रहा है। हालांकि अनेक मौलवियों ने नये कानून का समर्थन किया। बोहरा मुस्लिमों का प्रतिनिधिमंडल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार जताने जा पहुंचा। यद्यपि ज्यादातर मुस्लिमों के मन में ये अवधारणा बिठा दी गई है कि नये कानून के बन जाने के बाद उनकी मस्जिदें और कब्रिस्तान सरकार छीन लेगी। वक़्फ़ की संपत्ति जिन  राज्यों में सर्वाधिक है उनमें उ.प्र ,प. बंगाल , तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि वक़्फ़ कानून के विरुद्ध उक्त राज्यों में से 4 में शांतिपूर्ण आंदोलन हुए और अभी भी हो रहे हैं लेकिन ममता बैनर्जी शासित प. बंगाल में बांग्ला देश से सटे जिलों में हुए विरोध ने हिन्दू विरोध का रूप ले लिया। हूबहू बांग्ला देश की शैली में हिंदुओं के घरों में लूटपाट और आगजनी हुई, महिलाओं की अस्मत लूटने जैसे कुकृत्य तो  हुए ही नृशंस हत्याएं भी की गईं। सैकड़ों परिवारों को अपना घर छोड़कर दूसरे शहरों में शरण लेनी पड़ी। इन घटनाओं के वीडियो देखकर तो लगता है 1947 के अगस्त महीने में देश को आजादी मिलने के समय   बंगाल में मो. अली जिन्ना के आह्वान पर मुस्लिम जिहादियों ने जो कत्ले आम किया था ये उसी की पुनरावृत्ति है। सबसे दुखद ये है कि प. बंगाल  सरकार ने आशंकाओं के बावजूद संवेदनशील मुस्लिम बहुल जिलों में पुलिस के पुख्ता इंतजाम नहीं किये दूसरे हिंदुओं के घर लूटने, जलाने, महिलाओं के साथ दुष्कर्म और हत्याएं करने वालों को खुली छूट दे डाली। उसी से नाराज उच्च न्यायालय ने तत्काल केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किये जाने का आदेश दिया। बतौर मुख्यमंत्री ममता का फर्ज था कि वे मुस्लिम गुंडों से प्रताड़ित हुए हिंदुओं के घावों पर मरहम लगातीं किंतु वे उल्टे भाजपा पर आरोप लगाने लगीं कि उसने बांग्ला देश से गुंडे बुलवाकर दंगे करवाए। साथ ही ये भी कि सीमा की सुरक्षा का दायित्व केंद्र सरकार का है। दंगे होने के बाद ममता का रवैया ऐसा था मानों वे किसी मुस्लिम  देश की शासक हों। राज्य से आ रही खबरों से पूरा देश चिंतित है। उच्च न्यायालय के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी वक़्फ़ संबंधी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान उसके विरोध में हो रही हिंसा   पर चिंता जताई किंतु ममता के माथे पर शिकन तक नहीं आई। बजाय मुस्लिम दंगाइयों के विरुद्ध कुछ बोलने के वे मुसलमानों के सामने ये कहते हुए गिड़गिड़ा रही हैं कि वक़्फ़ कानून केन्द्र सरकार ने बनाया तो उसका विरोध करें। उल्लेखनीय है कानून लागू होते ही मुख्यमंत्री ने ये ऐलान कर मुसलमानों को खुश करने का दाँव चला था कि वे प. बंगाल में इसे लागू नहीं करेंगी। बावजूद इसके जब मुर्शिदाबाद सहित कुछ जगहों पर मुस्लिम जिहादियों ने हिंदुओं पर अकारण कहर बरपाया तब ये स्पष्ट हो गया कि बीते महीनों में बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हुए उनसे प. बंगाल के मुसलमानों का हौसला बुलंद हो गया। आगामी वर्ष राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ममता की नजर हमेशा की तरह 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं पर है। चूंकि कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन उनके विरुद्ध है इसलिए मुख्यमंत्री को चिंता सता रही है कि कहीं मुस्लिमों मतों में बंटवारा न हो जाए। इसी डर से उन्होंने मुसलमानों को मनमानी की पूरी छूट दे डाली। एक साल बाद क्या होगा इसकी भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी है किंतु मुर्शिदाबाद के दंगों में जिस तरह से हिंदुओं के साथ अमानुषिक व्यवहार हुआ और ममता सरकार मूक दर्शक बनी रही उसकी प्रतिक्रिया पूरे राज्य के हिंदुओं में हुई है जो बांग्ला देश के हालातों से पहले से ही गुस्से में है। लोगों के मन में ये बात गहराई तक बैठती जा रही है कि मुसलमानों के थोक मतों के लालच में ममता बैनर्जी हिंदुओं को घर की मुर्गी मान बैठी हैं। समाज का पढ़ा - लिखा मध्यमवर्गीय हिन्दू तो उनसे पहले ही कट चुका है। इसका प्रमाण 2021 में मिल चुका था किंतु अब गरीब वर्ग में भी  बंटेगे तो कटेंगे का नारा असर दिखाने लगा है। हिंदुओं में ये भय समा गया है कि इस बार भी ममता सत्ता में लौटीं तो पूरे राज्य में मुर्शिदाबाद जैसे हालात पैदा होते देर नहीं लगेगी। सुना है रास्वसंघ  ने हरियाणा और दिल्ली जैसी मोर्चेबंदी प. बंगाल में भी शुरू कर दी है जिसके अंतर्गत हिन्दू मतदाताओं को जागरूक करते हुए मुस्लिम आतंक से बचने के लिए एकजुट किया जाएगा। साथ ही मतदान के दिन तृणमूल के गुंडों से निपटने की तैयारी भी हो रही है। राज्य से जो संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार ममता का हश्र भी अरविंद केजरीवाल जैसा हो सकता है जो कहते थे इस जनम में तो मोदी जी उनको नहीं हरा सकते। त्रिपुरा  असम और उड़ीसा जीतने के बाद प. बंगाल में सरकार बनाना भाजपा की सर्वोच्च प्राथमिकता है क्योंकि इससे बांग्ला देश को भी माकूल संदेश जायेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 18 April 2025

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में सर्वोच्चता का विवाद सुलझना जरूरी


भारतीय संविधान में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका तीनों के कार्यक्षेत्र  विभाजित हैं। ये अपेक्षा की जाती है कि कोई किसी अन्य के क्षेत्राधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालांकि विधायिका नये  कानून बनाने और पुरानों में संशोधन कर सकती है लेकिन न्यायपालिका को ये अधिकार है कि संसद और विधानसभा  द्वारा लिए गए निर्णयों की समीक्षा करते हुए देखे कि वे  संविधान के अनुरूप हों। संसद को तो संविधान में संशोधन का भी अधिकार है बशर्ते उसके मूल ढांचे से छेड़छाड़ न हो। आजादी के बाद अनेक अवसर आये जब विधायिका और न्यायपालिका में मतभिन्नता दिखी । लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता असंदिग्ध है क्योंकि वह जनता का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन बीते कुछ वर्षों से ये देखने में आया है कि न्यायपालिका का संसद और कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। उनके  महत्वपूर्ण  निर्णयों पर अदालतें जिस तत्परता से सुनवाई शुरू करती हैं वह असामान्य प्रतीत होता है। विधायिका और कार्यपालिका की स्वच्छन्दता पर नियंत्रण करना न्यापालिका का अधिकार भी है और कर्तव्य भी किंतु वह इनके अधिकारों में अतिक्रमण नहीं कर सकती। मौजूदा केन्द्र सरकार के प्रथम कार्यकाल में न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का निर्णय संसद के दोनों सदनों ने निर्विरोध पारित किया था। राज्यसभा में मात्र स्व. राम जेठमलानी ने उसके विरोध में मत दिया। उस आयोग का कार्य  न्यायाधीशों की नियुक्ति करना था जो अभी कालेजियम व्यवस्था के द्वारा न्यायपालिका द्वारा ही चयनित होते हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को रद्द कर दिया। हर बात की समीक्षा के लिए आतुर सर्वोच्च न्यायालय कालेजियम व्यवस्था के विरुद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहता। इधर बीते कुछ दिनों में कुछ ऐसी बातें हुईं जिनके कारण न्यायपालिका की छवि प्रभावित हो रही  है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के निवास अग्निकांड में करोड़ों रु. के नोट जले हुए पाए जाने के बाद  जब उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज होने की याचिका लगी तब सर्वोच्च न्यायालय ने उसे सुनवाई योग्य ही नहीं समझा। इस  पर  उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने खुलकर नाराजगी जताई । इसी तरह  लंबित  विधेयकों पर  तीन महीने में फैसला लेने का निर्देश राज्यपाल के साथ ही राष्ट्रपति को दिये जाने की आलोचना करते हुए उन्होंने  पूछा  कि सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति को कैसे आदेश दे सकता है? इसके अलावा भी सर्वोच्च न्यायालय पर तरह - तरह के आरोप लग रहे हैं। गत दिवस एक अधिवक्ता ने  टीवी चैनल पर कहा कि पूर्व में वक़्फ़ संबंधी तमाम याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने सुनने से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी किंतु संसद द्वारा पारित नये वक़्फ़ कानून के विरुद्ध  सुनवाई के लिए फ़ौरन राजी हो गया! ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें न्यायपालिका अतिशय सक्रियता प्रदर्शित करती है । ऐसे में  उपराष्ट्रपति ने जो मुद्दे उठाये उनका सर्वोच्च न्यायालय को संज्ञान लेना चाहिए। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि शाह बानो को गुजारा भत्ता दिये जाने वाले उसके ऐतिहासिक फैसले को स्व. राजीव गाँधी की सरकार ने संसद में रद्द करवा दिया परंतु  सर्वोच्च न्यायालय ने एक शब्द तक नहीं कहा। संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच सर्वोच्चता की ये लड़ाई किसी अप्रिय स्थिति को जन्म दे उसके पहले ही कोई  समाधान निकालना आवश्यक है। वक़्फ़ कानून के विरुद्ध याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय  द्वारा उठाई जा रहीं आपतियाँ यदि फैसले में बदलीं तब  अधिकार क्षेत्र का विवाद और गहरायेगा। उस स्थिति में सरकार यदि दोबारा कानून पारित करवा ले तब सर्वोच्च न्यायालय क्या करेगा ये सवाल उठ खड़ा होगा। बेहतर है न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका संविधान द्वारा खींची गई मर्यादा की रेखा के भीतर रहें जिससे सभी का सम्मान बना रहे। सर्वोच्च न्यायालय के साथ जुड़ा सर्वोच्च शब्द न्यायपालिका की विभिन्न इकाइयों से उसके  सर्वोच्च होने का  एहसास तो करवाता है किंतु क्या वह संसद और राष्ट्रपति से भी सर्वोच्च है इस प्रश्न का उत्तर मिलना भी जरूरी है। संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ का सबसे बड़ा अपराध स्व. इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाकर किया था। विपक्ष को जेल में डालकर संविधान की प्रस्तावना में ही संशोधन कर दिया गया, लोकसभा का कार्यकाल भी एक साल बढ़ा दिया गया, मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गए और जिस अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा हेतु न्यायपालिका आये दिन अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करती है उसे भी  छीन लिया गया । लेकिन  सर्वोच्च न्यायालय आपातकाल को असंवैधानिक घोषित करने का साहस नहीं जुटा सका। इन्हीं सब वजहों से न्यायपालिका के प्रति जन साधारण के मन में सम्मान निरंतर कम हो रहा है। बेहतर होगा  दूसरों को उनकी सीमाएं बताने वाली न्यायपालिका अपनी सीमाएं भी तय कर ले क्योंकि वर्तमान स्थिति किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 17 April 2025

आर्थिक विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रही दुनिया


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया भर में जो उथल - पुथल मचाई उसने आर्थिक महायुद्ध के हालात उत्पन्न कर दिये हैं। टैरिफ के नाम पर शुरू  की गई मुहिम अब आक्रमण और प्रत्याक्रमण में बदलती जा रही है। शुरुआत में ये ट्रम्प का एक साधारण नीतिगत कदम माना जा रहा था किंतु जल्द ही इसे अन्य देशों की आर्थिक आजादी पर हमले का नाम दिया जाने लगा। अमेरिका के उत्पादक के बजाय आयातक देश बन जाने से उसकी अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर होने का खतरा तो लंबे समय से महसूस किया जा रहा था। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात ये रही कि उसकी अपनी कंपनियों ने सस्ते श्रमिकों के लालच में चीन सहित तमाम दक्षिण एशियाई देशों में अपनी उत्पादन इकाइयां स्थापित कीं जिनके बनाये सामान अपेक्षाकृत सस्ते होने से अमेरिकी बाजारों में छा गए। अन्य देशों से भी वहाँ आयात बढ़ा। सही बात ये है कि अमेरिका बड़ी चीजों और हथियारों के उत्पादन को महत्व देने लगा। इसके साथ ही उसने तकनीक के शोध पर ज्यादा ध्यान दिया जो उसकी असली ताकत है किंतु इस बीच छोटी - छोटी उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन के प्रति उसकी उदासीनता बढ़ने से इनका आयात बढ़ता गया। चूंकि ये अमेरिकी उत्पादों की तुलना में सस्ती थीं लिहाजा आम अमेरिकी ने इन्हें हाथों - हाथ लिया। ये स्थिति रातों - रात बनी हो ऐसा भी नहीं है। विश्व व्यापार संगठन के अस्तित्व में आने के बाद जब दुनिया खुले बाजार में बदल गई तब चीन जैसे जिस देश के साथ अमेरिका के रिश्ते  सांप और नेवले जैसे थे वह उसका व्यापारिक साझेदार बन गया। माओ के दौर की साम्यवादी लौह दीवार को तोड़कर चीन ने अपने दरवाजे विदेशी पूंजी के लिए खोल दिये। इस कदम ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुए शीतयुद्ध को तिलांजलि देते हुए नई वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म दिया। शुरुआत में  कहा जाता था कि आर्थिक उदारवाद अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए प्रारंभ किया गया था। भारत जैसे देश में आर्थिक गुलामी के खतरे के तौर पर इसका विरोध भी हुआ परंतु विदेशी पूंजी के आगमन ने उसको दबा दिया। इस नई व्यवस्था का सर्वाधिक लाभ चीन ने उठाया और देखते ही देखते वह अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों के लिए चुनौती बनने लगा। उसके सैन्य महाशक्ति बनने तक तो बात फिर भी ठीक थी क्योंकि चीन का भारत को छोड़ किसी अन्य देश से सीधा सैन्य तनाव नहीं है। ताईवान को लेकर जरूर अमेरिका और उसके बीच समय - समय पर तनाव होता है किंतु  जंग की स्थिति नहीं बन सकी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा था। अमेरिकी अर्थतंत्र में चीनी घुसपैठ भी काफी गहराई तक जा पहुंची। इस बारे में रोचक बात ये है कि यूरोप के कुछ बड़े देश भी चीन की आर्थिक प्रगति और विश्व बाजार में उसकी धमक के आगे असहाय नजर आ रहे थे। वहीं अमेरिका पर कर्ज का बोझ दरअसल दुनिया का चौधरी बनने की होड़ के कारण बढ़ता जा रहा था। तकनीक के मामले में भी चीन और भारत ने जो प्रगति बीते कुछ दशकों में की उसके कारण अमेरिका का दबदबा कम होने लगा। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बतौर राष्ट्रपति बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका की साख और धाक दोनों में कमी आई। ट्रम्प ने  चूंकि चुनाव उनके शासन को विफल साबित कर जीता था लिहाजा उनके लिए नई नीतियों के साथ शुरुआत करने की मजबूरी थी किंतु वे जिस तरह की जल्दबाजी दिखा गए उसने पूरे विश्व को परेशान कर दिया। भले ही बढ़े हुए टैरिफ को उन्होंने  90 दिनों के लिए लंबित कर लिया किंतु चीन के साथ उनकी रस्साकशी बच्चों के खेल का रूप ले बैठी है। जिस तरह दोनों देश एक दूसरे पर टैरिफ थोप रहे हैं उसमें नीतिगत गंभीरता की जगह नाक के सवाल ने ले ली। लेकिन इन दो महाशक्तियों की खींचातानी ने  वैश्विक अर्थव्यवस्था को जबरदस्त अनुश्चितता में उलझा दिया है। एक तरफ तो मंदी का खतरा मंडरा रहा है वहीं दूसरी तरफ चीन द्वारा अपने उत्पादों की कीमत कम किये जाने से भारत जैसे देश में उसके सामानों की डंपिंग का भी खतरा पैदा हो गया है। दुर्भाग्य से रूस चूंकि यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए अमेरिका और चीन दोनों को रोकने वाला कोई नहीं बचा। लेकिन यदि वे इसी तरह एक दूसरे पर बाँहें चढ़ाते रहे तब आर्थिक विश्वयुद्ध की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। और यदि ऐसा हुआ तब दुनिया के अनेक  छोटे देशों को आर्थिक तबाही का सामना करना पड़ सकता है जो विदेशी तकनीक और सामान के आयात पर निर्भर हैं। भारत के लिए भी बहुत ही संभलकर चलने की जरूरत है क्योंकि एक गलत कदम भी सारी उपलब्धियों पर भारी पड़ सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 16 April 2025

नेशनल हेराल्ड मामला : बिना आग के धुंआ नहीं निकलता


नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे के विरुद्ध ईडी द्वारा आरोप पत्र दाखिल किये जाने से राजनीति गर्म हो गई है। कांग्रेस ने इसे बदले की भावना से प्रेरित बताते हुए देशव्यापी विरोध का ऐलान कर दिया। ये मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री डाॅ. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 2012 में की गई शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था। उस समय  डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार थी।  यदि मामला गलत था तब गाँधी परिवार को प्रारंभिक स्तर पर ही अदालती कारवाई के जरिये उसे खत्म करवा देना चाहिए था। लेकिन वह इस खुशफहमी में रहा कि आगे भी सरकार कांग्रेस ही बनायेगी परंतु हुआ उल्टा और भाजपा सत्ता में आ गई। जाँच आगे बढ़ी तो गाँधी परिवार ने उसे रुकवाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने भी उससे इंकार कर दिया। यद्यपि सोनिया जी और राहुल को जमानत जरूर मिल गई। ये मामला काफी स्पष्ट  है। नेशनल हेराल्ड की देश भर में फैली अरबों की संपत्ति नाम मात्र के भुगतान पर  यंग इंडिया लिमिटेड के पास आ गई जिसमें श्रीमती गाँधी और राहुल की 76 फीसदी हिस्सेदारी थी। आरोप ये है कि एसोसिएटेड जर्नल लि. नामक जो कंपनी नेशनल हेराल्ड की मालिक थी  उसके 1057 अंशधारकों को सूचित किये बिना ही उक्त सौदा हो गया। पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण और   सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू  ने भी उक्त सौदे  पर ऐतराज व्यक्त करते हुए कहा कि उनके परिवार के पास  भी नेशनल हेराल्ड के शेयर थे किंतु कंपनी का सौदा करते समय अंशधारकों की सहमति नहीं ली गई। उक्त दोनों महानुभाव उच्च कोटि के विधि विशेषज्ञ हैं और उन्हें भाजपा समर्थक भी नहीं कहा जा सकता। गाँधी परिवार के पास दिग्गज अधिवक्ताओं की फौज है किंतु अभी तक अदालतों ने डाॅ. स्वामी की शिकायत को रद्द करने लायक नहीं समझा और सोनिया जी और राहुल को जमानत लेनी पड़ी तब ये कहना गलत नहीं होगा कि न्यायपालिका ने भी उसको संज्ञान योग्य माना। जहाँ तक  बदले की भावना से कार्रवाई की बात है तो उल्टे डाॅ. स्वामी केन्द्र सरकार पर गाँधी परिवार के प्रति नर्म बने रहने का आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि  बीते 10 वर्षों में इस प्रकरण में लंबी पूछताछ और जांच आदि चली। हाल ही में कुछ संपत्ति का ईडी द्वारा अधिगृहण भी किया गया। यदि दुर्भावना होती तब जो आरोप पत्र अभी दाखिल हुआ वह पहले भी हो सकता था। सही बात ये है कि  कानूनी मामले में अदालत की बजाय राजनीतिक मंच का सहारा लेना आपके पक्ष की कमजोरी का संकेत देता है। स्मरणीय है ईडी  दफ्तर में गाँधी परिवार के सदस्य से पूछताछ के दौरान कांग्रेस जन बाहर धरना दिये बैठे रहते थे।  नेशनल हेराल्ड का प्रकरण अदालत के पास है जो सही - गलत का फैसला करेगी किंतु गाँधी परिवार सहित राजनीतिक जगत में उच्च पदों पर विराजमान हस्तियों को ये बात स्वीकार करनी ही होगी कि कानून के सामने उनकी हैसियत देश के साधारण नागरिक से ज्यादा नहीं है। इस मामले में रोचक तथ्य ये भी है कि एक समय में डॉ. स्वामी स्व. राजीव गांधी के नजदीकी दोस्तों में भी शामिल थे। बोफोर्स कांड के दौरान वे सदन में ये सार्वजनिक तौर पर ये कह चुके थे कि राजीव ने कोई पैसा नहीं लिया है। आज श्रीमती गांधी को मुश्किल में डालने वाले डॉ.स्वामी ने 1999 में वाजपेयी सरकार को गिराने की कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने सोनिया और जयललिता की अशोक होटल में मुलाकात भी कराई। हालांकि ये कोशिश नाकाम हो गई।  ईडी ने जो आरोप पत्र कल प्रस्तुत किया उसे बदले से प्रेरित बताने वाली कांग्रेस  को ये पता होना चाहिए कि भाजपा में होते हुए भी डाॅ. स्वामी समय - समय पर   मोदी सरकार की  तीखी आलोचना  करने में भी संकोच नहीं करते। इसलिए नेशनल हेराल्ड मामले में बजाय केन्द्र सरकार के विरुद्ध हल्ला मचाने के कांग्रेस को शिकायतकर्ता  डाॅ. स्वामी के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए थी जिन्होंने सोनिया जी और राहुल के विरुद्ध अनेक शिकायतें दर्ज कर रखी हैं। अच्छा हो गाँधी परिवार और उसके निकटस्थ श्री पित्रौदा और श्री दुबे ईडी के आरोप पत्र पर अपना कानूनी बचाव करें क्योंकि अदालत को कानून की भाषा समझ में आती है नेतागिरी की नहीं। हालांकि ऐसे मामलों में विरोधाभास भी खुलकर सामने आते रहे हैं।  दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री  अरविंद केजरीवाल जिस शराब घोटाले में जेल में रहे वह कांग्रेस की शिकायत पर ही दर्ज हुआ था । जब ईडी ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी की तब कांग्रेस के नेताओं ने खुशियाँ मनाईं। अब उसी ईडी ने सोनिया जी और राहुल के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया तो उसे खलनायक साबित किया जा रहा है।


 - रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 15 April 2025

मुस्लिम तुष्टीकरण ने प. बंगाल में बना दिया लघु बांग्ला देश


ममता बैनर्जी द्वारा प.बंगाल में नया वक़्फ़ कानून लागू नहीं करने की  घोषणा के बाद भी राज्य के मुर्शिदाबाद इलाके में मुस्लिम समुदाय हिंसा पर उतर आया। हिंदुओं के घरों और प्रतिष्ठानों पर हमले, लूटपाट और महिलाओं की अस्मत लूटने जैसी वारदातों के परिणामस्वरूप सैकड़ों हिन्दू परिवार पड़ोसी जिलों में भागने  मजबूर हो गए। इस घटना से नाराज उच्च न्यायालय ने केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करने का आदेश देते हुए टिप्पणी की कि वह चुपचाप नहीं बैठ सकता क्योंकि राज्य पुलिस उपद्रव रोकने में असफल रही । सच्चाई यही है कि इस हिंसा के लिए ममता खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने  इतना अधिक मुस्लिम तुष्टीकरण किया कि ये समुदाय पूरी तरह अराजक हो गया। राज्य का  राजनीतिक संतुलन भी बुरी तरह बिगड़ चुका है। 27 फीसदी मुस्लिम आबादी के कारण 100 विधानसभा और 13 लोकसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में आ गए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में बहरामपुर में ये बात प्रमाणित हो गई। इस सीट से लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी 1999 से जीतते आ रहे थे। 52 फीसदी मुस्लिम आबादी वाली इस सीट पर कभी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीत पाया था। लेकिन 2024 में वह परंपरा टूट गई। अधीर रंजन से निजी खुन्नस के चलते ममता ने गुजरात के क्रिकेटर युसुफ पठान को उम्मीदवार बना दिया और मुस्लिम ध्रुवीकरण के कारण वे जीत गए। ममता की राजनीतिक सफलता में मुस्लिम समुदाय का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण है। एक जमाना था जब वामपंथी सरकार ने भी मुस्लिमों को खुश रखते हुए अपना वर्चस्व बनाये रखा। लेकिन तब उसमें से कुछ हिस्सा कांग्रेस भी बटोर लिया करती थी। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि प. बंगाल में मुस्लिम आबादी बढ़ाने के लिए वामपंथी सरकार सर्वाधिक कसूरवार है जिसने  बांग्ला देशी घुसपैठियों के  राशन कार्ड बनवाकर उनके नाम मतदाता सूची में जुड़वा दिये। कांग्रेस भी चूंकि तुष्टीकरण में लिप्त थी इसलिए वह खामोश होकर देखती रही। वैसे भी वह वामपंथी सरकार की बी टीम के तौर पर बदनाम थी और इसी कारण ममता ने उससे नाता तोड़ तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कर वामपंथियों के खिलाफ कमर कसी। जनता चूंकि वामपंथी गुंडों से त्रस्त हो चुकी थी लिहाजा उसने ममता को सत्ता में बिठाकर असंभव को संभव कर दिखाया। लेकिन जल्द ही वे भी उसी रास्ते पर चलने लगीं। जिन असामाजिक तत्वों को चुनाव में वामपंथी सरकार के लिए गुंडागर्दी के बदले लूटपाट का अघोषित लाइसेंस मिल जाया करता था, वे सत्ता बदलते ही तृणमूल में आकर वही सब ममता के लिए करने लग गए। दूसरी तरफ ममता ने  वामपंथियों को भी पीछे छोड़ते हुए बांग्लादेश के अलावा म्यांमार से आये रोहिंग्या मुसलमानों को मतदाता बनाकर  अपनी स्थिति मजबूत कर ली और बदले में उन्हें स्वच्छंद हो जाने की छूट दे दी। । मुर्शिदाबाद में जो हालात बने ये नई बात नहीं है। संदेशखाली में मुस्लिम अपराधी सरगना के अत्याचार लोग भूले नहीं हैं। प. बंगाल के सैकड़ों कस्बे और गाँव बांग्ला देश जैसा  एहसास करवाते हैं। मुर्शिदाबाद में वक़्फ़ कानून के विरोध में मुस्लिम समुदाय ने जिस तरह की नीचता की वैसी ही बांग्ला देश में शेख हसीना के सत्ता पलट के बाद हिंदुओं के साथ हुई थी। जो समाचार आ रहे हैं उनके अनुसार मुर्शिदाबाद में हिंदुओं  पर हुए हमलों के तार बांग्ला देश से जुड़े हुए हैं। लेकिन बजाय कड़ी कारवाई करने के मुख्यमंत्री केवल नकली आँसू बहा रही हैं। यदि यही हादसा मुस्लिमों के साथ हुआ होता तो अभी तक देश भर की सेकुलर जमात के पेट में मरोड़ होने लगता और धड़ाधड़ नेताओं के दौरे होने लगते।  उच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी के बाद भी ममता सरकार  जिस प्रकार उदासीन रही उससे स्पष्ट हो गया कि आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए वे  बिना ये सोचे मुस्लिमों को पूरी तरह अराजक होने की छूट देने पर आमादा हैं कि पड़ोसी बांग्ला देश इससे लाभ उठाकर भारत में गड़बड़ी फैलाने से बाज नहीं आयेगा। उल्लेखनीय है संसद में गृह मंत्री अमित शाह ने खुलकर आरोप लगाया था कि घुसपैठ रोकने के लिए बांग्ला देश सीमा पर तार की बाड़ ( फेंसिंग) लगाने का काम जिस 400 कि.मी क्षेत्र में बचा है वहाँ ममता सरकार केन्द्र को भूमि उपलब्ध नहीं करवा रही जबकि इसके लिए  अनेक स्मरण पत्र दिए जा चुके हैं। ममता या उनकी सरकार की ओर से इस आरोप का खंडन नहीं किया जाना उसकी पुष्टि करने पर्याप्त है। राज्य के वर्तमान हालात देखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की मांग हो रही है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि कांग्रेस और वामपंथी दल संदेशखाली कांड के विरोध में तो ममता सरकार के विरुद्ध खुलकर मैदान में आ गए थे किंतु मुर्शिदाबाद हिंसा पर इसलिए मुँह में दही जमाये बैठे हैं क्योंकि हिंसा वक़्फ़ कानून के विरोध में हो रही है। इस प्रकार राज्य  की वर्तमान स्थिति के लिए ममता के साथ ये पार्टियां भी बराबर की दोषी हैं जिन्होंने प. बंगाल में  लघु बांग्ला देश बना दिया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 14 April 2025

सहकारिता के उज्ज्वल भविष्य के लिए पिछली गलतियों को सुधारना जरूरी

 दिवस म.प्र की राजधानी भोपाल में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड और म.प्र डेयरी फेडरेशन के बीच एम. ओ. यू पर हस्ताक्षर हुए जिसके अंतर्गत  अब म.प्र के प्रसिद्ध साँची ब्रांड के दुग्ध उत्पादों की मार्केटिंग राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड करेगा। इससे उनका अमूल की तरह से ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विक्रय किया जा सकेगा। अनुबंध के अंतर्गत  साँची नाम यथावत रहेगा। श्री शाह ने गुजरात की तरह से म.प्र में भी दुग्ध उत्पादन बढ़ाने हेतु महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने की सलाह देते हुए सहकारी समितियों के जरिये उत्पादकों से दूध खरीदकर उन्हें लाभ पहुंचाने की बात कही। गुजरात का अमूल ब्रांड  टेस्ट ऑफ इंडिया कहा जाता है किंतु अब यह विश्व भर में रह रहे भारतीयों की पसंद बन चुका है। इसका निर्यात सालाना 1000 करोड़ रु. का है। साँची के उत्पादों को उस स्तर तक पहुँचने में कुछ समय तो लगेगा परंतु चूंकि इसकी मार्केटिंग सरकारी बाबुओं के बजाय अब पेशेवर संस्थान के हाथों होगी इसलिए ये उम्मीद की जा सकती  है कि  म.प्र में लोकप्रिय साँची ब्रांड  को बड़ा बाजार उपलब्ध होगा। पूर्व में ये अफवाह उड़ी थी कि राष्ट्रीय डेयरी विकास  बोर्ड  उसका अधिगृहण कर लेगा। लेकिन उसकी वर्तमान स्थिति जारी रहेगी और समस्त कर्मचारी भी प्रदेश शासन के अधीन ही रहेंगे। ये निर्णय निश्चित ही प्रगतिशील और दूरगामी सोच पर आधारित है जिससे प्रदेश में गुजरात की तरह दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हो सकेगी और दुग्ध उत्पादकों को विक्रय पर होने वाले खर्च में कमी का लाभ मिलेगा। इसके साथ ही श्री शाह ने उक्त अवसर पर जानकारी दी कि सहकारी आंदोलन को सुदृढ़ करने के लिए अब सहकारी समितियों के कार्यक्षेत्र में विस्तार करते हुए उनके जरिये 300 वस्तुओं का विक्रय और सेवाएं प्रदान की जाएंगी जिनमें जल वितरण, पेट्रोल पंप संचालन, दवा दुकान, गैस बांटने से लेकर रेलवे टिकिट विक्रय जैसे कार्य संचालित होंगे। अमूल सदृश  संस्थानों के अलावा  बैंकिंग, गृह निर्माण और हाथ करघा जैसे अनेक क्षेत्रों में सहकारिता ने बड़ा योगदान दिया। देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन भी सहकारी समितियों के जरिये होता आया है। कुछ बड़े सहकारी सुपर बाजार भी सफलता पूर्वक चल रहे हैं। महाराष्ट्र सहित अनेक राज्यों में चीनी मिलें सहकारिता आंदोलन की जीती - जागती प्रतीक हैं। सरकार द्वारा न्यूनतम खरीदी मूल्य पर की जाने वाली खरीदी भी अनेक स्थानों पर सहकारिता के जरिये की जाती है। ऐसे में श्री शाह ने इसके विस्तार की जो योजना सामने रखी वह समाज में रचनात्मक प्रवृत्ति के विकास में सहायक होने के साथ रोजगार सृजन में भी मददगार साबित होगी। लेकिन  ध्यान रखने वाली बात ये है कि सहकारी आंदोलन में भ्रष्टाचार का अतिक्रमण न हो। साथ ही उसे राजनीतिक नेताओं की चारागाह बनने से रोका जाए। स्मरणीय है म.प्र में भी कभी सहकारिता आंदोलन काफी मजबूत हुआ करता था। बैंक, ऋण समितियाँ, गृह निर्माण समितियाँ और राशन की दुकान कहे जाने वाले सार्वजनिक वितरण केंद्र इसके प्रतीक थे। सरकारी क्षेत्र में दुग्ध संघ सहित अनेक संस्थान सहकारिता पर आधारित थे जिनमें राज्य हाथकरघा संघ प्रमुख था किंतु ज्यादातर का राजनीतिकरण होने से वे या तो बंद हो गए या किसी तरह जीवित हैं। दरअसल प्रदेश में भ्रष्टाचार और सहकारिता एक दूसरे के पर्याय बन गए। ये देखते हुए श्री शाह द्वारा जो नई योजना प्रस्तुत की गई उसकी सफलता के लिए सहकारिता के क्षेत्र में हुई पुरानी गलतियों को सुधारना जरूरी है अन्यथा आगे पाट पीछे सपाट  की कहावत चरितार्थ होती रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 April 2025

नेपाल की स्थिति पर भारत को पैनी नजर रखनी चाहिये


शुरू - शुरू में लगा था कि नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए लोगों का सड़कों पर उतरना महज बुलबुला है जो जल्द फूट जायेगा । लेकिन इसका जो कारण समझ में आया वह है राजनीतिक अस्थिरता क्योंकि बीते लगभग दो दशक के माओवादी शासन के दौरान 10 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। 2006 में 10 साल तक चले गृहयुद्ध के बाद वहाँ माओवादी सत्ता में आये और राजशाही खत्म कर  एकमात्र हिन्दू राष्ट्र को धर्म निरपेक्ष बना दिया गया।  2001 में राजघराने में हुए हत्याकांड में महाराजा वीरेंद्र के पूरे परिवार के सफ़ाये  के बाद उनके अनुज ज्ञानेंद्र की ताजपोशी तो हो गई लेकिन रहस्य आज तक नहीं सुलझा। हालांकि माओवादी आंदोलन उसके पूर्व से चला आ रहा था किंतु महाराजा वीरेंद्र के खात्मे के बाद राज परिवार के प्रति नेपाल की जनता में जो श्रद्धा थी उसमें कमी आती गई जिसका लाभ माओवादियों ने उठाया। खास तौर पर युवा पीढ़ी में साम्यवाद के प्रति आकर्षण बढ़ा। भारत के साम्यवादियों और समाजवादी नेताओं द्वारा भी नेपाल के माओवादियों को हर तरह से संरक्षण और सहायता प्रदान की गई। प्रचंड जैसे नेता ने तो भारत में निर्वासित जीवन भी बिताया। माओवादी नेताओं  के बीच मतभेद बढ़े तब भारत से सीताराम येचुरी जैसे वामपंथी नेता बीच - बचाव हेतु वहाँ गये। ये बात बिल्कुल सही है कि  हिन्दू राष्ट्र होने के बाद भी नेपाल का राजवंश यदि चीन की तरफ झुका तो उसका कारण भारत की तत्कालीन सरकारों का उसके प्रति विरोध था। नेहरू जी को तो हिन्दू शब्द से ही चिढ़ थी। यदि आजादी के बाद से ही नेपाल के मन में विश्वास कायम किया जाता तो जैसा संबंध दोनों देशों की जनता के बीच है वैसा ही सरकारों के बीच होता। जनता पार्टी की सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नेपाल की यात्रा को तीर्थ यात्रा कहकर रिश्तों में अविश्वास दूर करने का प्रयास किया किंतु वह सरकार जल्द चली गई। 2014 में नरेंद्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री बनते ही उस सिलसिले को दोबारा शुरू किया किंतु वहाँ के माओवादी शासकों ने उसमें व्यवधान उत्पन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चीन की शह पर सीमा विवाद भी हुआ और जवाब में  भारत ने भी नाकेबंदी करते हुए दबाव बना दिया। उसके बाद दोनों तरफ से स्थिति सामान्य बनी रही किंतु राजनीतिक अस्थिरता के परिणामस्वरूप इस पहाड़ी देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। सबसे बड़ी बात जनता को जो नागवार गुजरी वह है भ्रष्टाचार। राजशाही के जमाने में  माओवादियों ने जनता के मन में ये बात गहराई तक बिठा दी कि राजघराना उनका शोषण करता है। इसीलिये  उसके पास तो बेशुमार धन - संपत्ति है जबकि नेपाल दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल था। बची - खुची कसर पूरी कर दी राजपरिवार में हुए हत्याकांड ने। इसमें कोई दो मत नहीं है कि ज्ञानेंद्र में अपने अग्रज स्वर्गीय वीरेंद्र जैसी गंभीरता नहीं है। उनका बेटा भी बेहद गैर जिम्मेदार है। लेकिन फिर भी यदि नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए स्वस्फूर्त जनांदोलन शुरू हुआ तो उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि बात राजशाही की वापसी से अधिक हिन्दू राष्ट्र की बहाली की होने लगी है। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर नेपाल में प्रदर्शित होना साधारण बात नहीं कही जा सकती। वहाँ के लोग खुलकर कह रहे हैं कि योगी - मोदी चाहें तो नेपाल फिर से हिन्दू राष्ट्र बन सकता है। नेपाल में हिन्दू राष्ट्र के लिए राजशाही की वापसी की मांग कर रहे लोगों का साफ कहना है कि उसमें तो एक ही व्यक्ति ( राजा) लूटता था किंतु माओवादी सरकारों में तो दर्जनों लुटेरे आ गए। हालांकि माओवादी आसानी से   सत्ता छोड़ देंगे ये नहीं लगता क्योंकि उनकी पीठ पर चीन का हाथ है । ऐसे में नेपाली सेना की भूमिका पर सबकी नजर है क्योंकि यदि वह  राजशाही के पक्ष में झुक गई तब जरूर ज्ञानेंद्र का पलड़ा भारी हो जाएगा। भारत के लिए नेपाल के वर्तमान हालात चिंता बढ़ाने वाले हैं क्योंकि दोबारा  यह देश गृहयुद्ध में फंसा तब वहाँ से शरणार्थियों के आने की आशंका बढ़ जाएगी। और दूसरा चीन यदि  माओवादी सत्ता के बचाव में आ गया तब हमारे लिए दोहरा संकट उत्पन्न हो जाएगा। ऐसे में आवश्यक है हिन्दू राष्ट्र के लिए आंदोलन करने वालों की मदद की जाए। नेपाल में बड़ी संख्या में हिन्दू संगठन हैं जो माओवादी सत्ता के विरुद्ध लामबंद हुए हैं। केन्द्र सरकार को चाहिये वह नेपाल की स्थिति पर पैनी नजर रखे क्योंकि वह भले ही अलग देश हो लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से वह हमारे सबसे करीब है। आज भी हमारी सेना में नेपाली भर्ती किये जाते हैं वहीं भारत में लाखों नेपाली परिवार पीढ़ियों से कार्यरत हैं। ऐसे में हम वहाँ होने वाली किसी भी राजनीतिक हलचल को नजरंदाज नहीं कर सकते। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 April 2025

नये वक़्फ़ कानून का विरोध करने वाले ही मुसलमानों के असली दुश्मन




वक़्फ़ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद राष्ट्रपति के  हस्ताक्षर होते ही कानून बन गया। अनेक मुस्लिम  संगठनों द्वारा इसका समर्थन किया गया किंतु  वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के प्रभाव में होंगे। हालांकि आम मुसलमान  पुराने और नये कानून के बारे में  उतना ही अनभिज्ञ है जितना अन्य लोग। इसका लाभ उठाकर के धार्मिक और राजनीतिक नेता ये भय फैलाने में जुट गए कि नया वक़्फ़ कानून लागू होते ही मस्जिदें, कब्रिस्तान एवं अन्य संपत्तियों को सरकार छीन लेगी। चूंकि मुसलमानों में शिक्षा का बेहद अभाव है इसलिए धार्मिक मामलों में वे जल्द ही बहकावे में आ जाते हैं।  मुल्ला - मौलवी तो इसका लाभ उठाते ही हैं किंतु मुस्लिम  मतों के दम पर नेतागिरी करने वाले राजनेता भी पीछे नहीं रहते। शाहबानो की तरह तीन तलाक़ को गैर कानूनी ठहराने की लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक मुस्लिम महिलाएं ही ले गईं थीं। फैसले के बाद देश भर में तीन तलाक़ को लेकर सैकड़ों मुकदमे दर्ज होने से साबित हुआ कि उक्त निर्णय को सीमित मात्रा में ही सही किंतु सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो गई ।  सी.ए.ए ( नागरिकता संशोधन कानून) के बारे में भी ये  दुष्प्रचार हुआ कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छिन जायेगी। दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन काफी चर्चित हुआ क्योंकि उसमें मुस्लिम महिलाएं ही धरने पर बैठी रहीं।  नागरिकता रजिस्टर के विरोध में भी मुस्लिम समुदाय को पहिचान पत्र नहीं दिखाने के लिए भड़काया गया जबकि  शासकीय  योजनाओं का लाभ लेने के लिए वे हर कागज दिखाने तैयार रहते हैं। सही बात ये है कि  सरकारी फैसलों को धर्म के विरुद्ध बताकर मुसलमानों को आंदोलित करने का खतरनाक खेल आजादी के बाद से चला आ रहा है। वक़्फ़ कानून को लेकर फैलाये गए भ्रम के कारण देश भर में मुसलमानों  को  आंदोलन के लिए उकसाया जा रहा है। कुछ मुस्लिम संगठन और राजनीतिक दल सर्वोच्च न्यायालय में कानून को रद्द करवाने की गुहार लगा चुके हैं। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में  वक़्फ़ कानून लागू नहीं करने का ऐलान कर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का नाटक भी किया। इसके पीछे आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव ही हैं। वहाँ मुस्लिम मतदाता तृणमूल के पीछे गोलबंद हैं इसलिए उनकी मजबूरी है ऐसा करना किंतु जिस तरह से वक़्फ़ संपत्तियों में मुस्लिम समुदाय के तथाकथित रहनुमाओं द्वारा की गई लूटमार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें देखते हुए जल्द ही आम मुसलमान को समझ आ जाएगा कि जिस वक़्फ़ संपत्ति का इस्तेमाल उनके लिए होना चाहिये था उस पर ओवैसी जैसे लोगों के बड़े - बड़े संस्थान बने हैं जबकि उनका रत्ती भर भला नहीं हो पाता। ओवैसी खुद बैरिस्टर होने के नाते जानते हैं कि वक़्फ़ कानून अब एक हकीकत है जिसे वे चाहे फाड़कर फेकें या आग के हवाले करें किंतु वह लागू हो चुका है। इसी तरह  ममता का ये कहना कि वे इस कानून को लागू नहीं करेंगी ,मुसलमानों को धोखे में रखने जैसा है क्योंकि संसद द्वारा पारित कानून को बाधित करना संवैधानिक संकट पैदा करेगा। दरअसल मुस्लिम समाज  तुष्टीकरण के मायाजाल में फंसकर मुख्यधारा से कटता चला गया। उसके धार्मिक नेताओं ने भी उसे प्रगतिशील नहीं होने दिया। उनके बीच से जो राजनीतिक नेतृत्व निकला उसने भी अपना स्वार्थ तो सिद्ध किया किंतु समुदाय शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर पिछड़ता गया। आजादी के बाद आधी सदी तक मुस्लिम कांग्रेस के पिछलग्गू बनकर शोषित हुए और फिर विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने उनकी ठेकेदारी ले ली। लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे नेताओं ने भी उनके कंधे पर चढ़कर अपना और अपने परिवार का भला किया किंतु विरासत के लिए किसी मुस्लिम की बजाय अपने बेटों को ही चुना। दुर्भाग्य से मुस्लिम आज भी इस चालबाजी को समझ नहीं सके। वक़्फ़ कानून के विरोध के लिए उनको सड़कों पर उतरने के लिए उकसाने वाले ही उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं।  इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहता कि बेशुमार संपत्ति के बाद भी वक़्फ़ बोर्डों में कुंडली मारकर बैठे मुस्लिमों ने कौम की बेहतरी के लिए क्या किया? ये बात भी सामने आने लगी है कि बड़ी मात्रा में वक़्फ़ संपत्ति पर समुदाय के प्रभावशाली लोगों या उनके कृपापात्रों के अवैध कब्जे हैं जिसके बारे में कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। नये कानून के लागू होने के बाद वक़्फ़ संपत्ति का चूंकि विधिवत पंजीकरण किया जाएगा इसलिए उसका  गलत उपयोग करने वालों में घबराहट है और  वे अपने बचाव के लिए आम मुसलमान की धार्मिक भावनाएं भड़काने में जुट गए हैं। केन्द्र सरकार को चाहिए वह वक़्फ़ संपत्तियों में हुई गड़बड़ियों को जल्द उजागर कर दोषी तत्वों पर कार्रवाई करे जिससे मुसलमानों को ये पता लग सके कि जिन्हें वे अपना रहनुमा मानते आये हैं वे ही उनकी बदहाली के जिम्मेदार हैं। 


मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी


नये वक़्फ़ कानून का विरोध करने वाले ही मुसलमानों के असली दुश्मन


वक़्फ़ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद राष्ट्रपति के  हस्ताक्षर होते ही कानून बन गया। अनेक मुस्लिम  संगठनों द्वारा इसका समर्थन किया गया किंतु  वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के प्रभाव में होंगे। हालांकि आम मुसलमान  पुराने और नये कानून के बारे में  उतना ही अनभिज्ञ है जितना अन्य लोग। इसका लाभ उठाकर के धार्मिक और राजनीतिक नेता ये भय फैलाने में जुट गए कि नया वक़्फ़ कानून लागू होते ही मस्जिदें, कब्रिस्तान एवं अन्य संपत्तियों को सरकार छीन लेगी। चूंकि मुसलमानों में शिक्षा का बेहद अभाव है इसलिए धार्मिक मामलों में वे जल्द ही बहकावे में आ जाते हैं।  मुल्ला - मौलवी तो इसका लाभ उठाते ही हैं किंतु मुस्लिम  मतों के दम पर नेतागिरी करने वाले राजनेता भी पीछे नहीं रहते। शाहबानो की तरह तीन तलाक़ को गैर कानूनी ठहराने की लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक मुस्लिम महिलाएं ही ले गईं थीं। फैसले के बाद देश भर में तीन तलाक़ को लेकर सैकड़ों मुकदमे दर्ज होने से साबित हुआ कि उक्त निर्णय को सीमित मात्रा में ही सही किंतु सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो गई ।  सी.ए.ए ( नागरिकता संशोधन कानून) के बारे में भी ये  दुष्प्रचार हुआ कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छिन जायेगी। दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन काफी चर्चित हुआ क्योंकि उसमें मुस्लिम महिलाएं ही धरने पर बैठी रहीं।  नागरिकता रजिस्टर के विरोध में भी मुस्लिम समुदाय को पहिचान पत्र नहीं दिखाने के लिए भड़काया गया जबकि  शासकीय  योजनाओं का लाभ लेने के लिए वे हर कागज दिखाने तैयार रहते हैं। सही बात ये है कि  सरकारी फैसलों को धर्म के विरुद्ध बताकर मुसलमानों को आंदोलित करने का खतरनाक खेल आजादी के बाद से चला आ रहा है। वक़्फ़ कानून को लेकर फैलाये गए भ्रम के कारण देश भर में मुसलमानों  को  आंदोलन के लिए उकसाया जा रहा है। कुछ मुस्लिम संगठन और राजनीतिक दल सर्वोच्च न्यायालय में कानून को रद्द करवाने की गुहार लगा चुके हैं। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में  वक़्फ़ कानून लागू नहीं करने का ऐलान कर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का नाटक भी किया। इसके पीछे आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव ही हैं। वहाँ मुस्लिम मतदाता तृणमूल के पीछे गोलबंद हैं इसलिए उनकी मजबूरी है ऐसा करना किंतु जिस तरह से वक़्फ़ संपत्तियों में मुस्लिम समुदाय के तथाकथित रहनुमाओं द्वारा की गई लूटमार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें देखते हुए जल्द ही आम मुसलमान को समझ आ जाएगा कि जिस वक़्फ़ संपत्ति का इस्तेमाल उनके लिए होना चाहिये था उस पर ओवैसी जैसे लोगों के बड़े - बड़े संस्थान बने हैं जबकि उनका रत्ती भर भला नहीं हो पाता। ओवैसी खुद बैरिस्टर होने के नाते जानते हैं कि वक़्फ़ कानून अब एक हकीकत है जिसे वे चाहे फाड़कर फेकें या आग के हवाले करें किंतु वह लागू हो चुका है। इसी तरह  ममता का ये कहना कि वे इस कानून को लागू नहीं करेंगी ,मुसलमानों को धोखे में रखने जैसा है क्योंकि संसद द्वारा पारित कानून को बाधित करना संवैधानिक संकट पैदा करेगा। दरअसल मुस्लिम समाज  तुष्टीकरण के मायाजाल में फंसकर मुख्यधारा से कटता चला गया। उसके धार्मिक नेताओं ने भी उसे प्रगतिशील नहीं होने दिया। उनके बीच से जो राजनीतिक नेतृत्व निकला उसने भी अपना स्वार्थ तो सिद्ध किया किंतु समुदाय शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर पिछड़ता गया। आजादी के बाद आधी सदी तक मुस्लिम कांग्रेस के पिछलग्गू बनकर शोषित हुए और फिर विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने उनकी ठेकेदारी ले ली। लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे नेताओं ने भी उनके कंधे पर चढ़कर अपना और अपने परिवार का भला किया किंतु विरासत के लिए किसी मुस्लिम की बजाय अपने बेटों को ही चुना। दुर्भाग्य से मुस्लिम आज भी इस चालबाजी को समझ नहीं सके। वक़्फ़ कानून के विरोध के लिए उनको सड़कों पर उतरने के लिए उकसाने वाले ही उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं।  इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहता कि बेशुमार संपत्ति के बाद भी वक़्फ़ बोर्डों में कुंडली मारकर बैठे मुस्लिमों ने कौम की बेहतरी के लिए क्या किया? ये बात भी सामने आने लगी है कि बड़ी मात्रा में वक़्फ़ संपत्ति पर समुदाय के प्रभावशाली लोगों या उनके कृपापात्रों के अवैध कब्जे हैं जिसके बारे में कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। नये कानून के लागू होने के बाद वक़्फ़ संपत्ति का चूंकि विधिवत पंजीकरण किया जाएगा इसलिए उसका  गलत उपयोग करने वालों में घबराहट है और  वे अपने बचाव के लिए आम मुसलमान की धार्मिक भावनाएं भड़काने में जुट गए हैं। केन्द्र सरकार को चाहिए वह वक़्फ़ संपत्तियों में हुई गड़बड़ियों को जल्द उजागर कर दोषी तत्वों पर कार्रवाई करे जिससे मुसलमानों को ये पता लग सके कि जिन्हें वे अपना रहनुमा मानते आये हैं वे ही उनकी बदहाली के जिम्मेदार हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी




Thursday, 10 April 2025

बेहतर है कांग्रेस 2034 की तैयारी करे


अहमदाबाद में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न हो गया। इसमें  संगठन को मजबूत बनाने के साथ ही कमजोरियों पर भी मंथन हुआ। राहुल गाँधी ने स्वीकार किया कि पिछड़ी जातियाँ  कांग्रेस से छिटक गईं। उनकी यह टिप्पणी सपा और राजद जैसे दलों के लिये  संकेत है जो पिछड़ी जातियों  के दम पर अपना  अस्तित्व बनाये हुए हैं। उल्लेखनीय है बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ  कांग्रेस, लालू  यादव की  पिछलग्गू बनी रही। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के बाद श्री गाँधी ने क्षेत्रीय दलों से दूरी बनाना शुरू कर दिया। महाराष्ट्र में तो वे  कुछ न कर सके किंतु हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन नहीं किया। अब तक की खबरों के मुताबिक कांग्रेस और लालू की पार्टी के बीच सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा। दिल्ली के चुनाव में तृणमूल और सपा  ने खुलकर आम आदमी पार्टी का प्रचार किया। इंडिया गठबंधन के बारे में भी  घटक दलों के जो बयान आये उनमें राहुल के प्रति अनिच्छा झलक रही थीं। ममता बैनर्जी ने तो  गठबंधन का नेतृत्व करने की पेशकश तक कर डाली जिसे शिवसेना,  आम आदमी पार्टी और सपा ने तो समर्थन दिया ही , लालू ने भी उसका स्वागत कर दिया।   लोकसभा में श्री गाँधी के रवैये से भी गठबंधन के साथी नाराज बताये जाते हैं। हरियाणा , महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनावी नतीजों ने कांग्रेस की स्थिति और कमजोर कर दी। उ.प्र विधानसभा के 10 उपचुनावों में सपा के साथ  तालमेल नहीं होने से कांग्रेस ने मैदान छोड़ दिया। भाजपा ने 7 सीटों पर जीत हासिल कर ली।  अखिलेश इसके लिए कांग्रेस को कसूरवार मानते हैं जो उपचुनावों के दौरान  पूरी तरह उदासीन रही। इस प्रकार इंडिया गठबंधन धीरे - धीरे निष्क्रिय होता गया। इसके पीछे एक तरफ जहाँ कांग्रेस की एकला चलो नीति है वहीं दूसरी तरफ अन्य घटक दलों का भी उससे छिटकना है। दरअसल राहुल को लग रहा है कि क्षेत्रीय दलों के पीछे चलने की बजाय अपना जनाधार बढ़ाया जाए। उ.प्र और बिहार में पिछड़ी जातियों के नेता बनकर लालू और उनके बेटे जहाँ  मुकाबले में हैं वहीं उ.प्र में अखिलेश ने यादव - मुस्लिम गठजोड़ के बलबूते अपनी हैसियत बना रखी है। राहुल जानते हैं उक्त दोनों राज्यों में कांग्रेस के पास मजबूत प्रादेशिक नेतृत्व ही नहीं है। इसीलिये वे  क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की सोच रहे हैं । लेकिन सवाल ये है कि कांग्रेस  ,बिहार में राजद से अलग होकर लड़ती है तब क्या वह यादव मतों में सेंध लगा पायेगी जो लालू के पीछे चट्टान बनकर खड़े हैं। यही स्थिति उ.प्र में भी है जहाँ अखिलेश को हिलाना उसके लिए आसान नहीं है। दिल्ली में अकेले लड़कर कांग्रेस भले ही इस बात पर खुश हो कि आम आदमी पार्टी की हार से  अरविंद केजरीवाल की अकड़ खत्म हो गई किंतु राहुल के मैदान में उतरने के बावजूद वह तीसरी बार भी शून्य पर ही सिमटी रही। अहमदाबाद अधिवेशन में भाजपा की शैली में संगठन को मजबूत बनाने और चुनाव हेतु अपनी मशीनरी को चुस्त बनाने जैसे संकल्प  लिए गए । संघ और भाजपा से लड़ने का हौसला भी दिखाया गया। वक़्फ़ संशोधन के बाद मोदी सरकार की नजर ईसाई संस्थानों की जमीनों पर है जैसी शिगूफेबाजी भी की गई। लेकिन अधिवेशन के पहले  श्री गाँधी के बौद्धिक सलाहकार सैम पित्रौदा ने पार्टी नेतृत्व पर तंज कस दिया कि निर्णय तो बड़े - बड़े होते हैं परंतु उन्हें जमीन पर नहीं उतारा जाता। उनकी बात काफी हद तक सच है क्योंकि कांग्रेस में संगठन के बजाय व्यक्ति निष्ठा का बोलबाला है। आला कमान और जमीनी स्तर पर काम करने वालों के बीच संवाद हीनता है। संगठन के पदों पर बड़े नेताओं के कृपापात्र बैठते हैं। राहुल गाँधी बोलते तो बहुत कुछ हैं किंतु उसे धरातल पर उतारने में विफल रहे हैं।  लोकसभा में वक़्फ़ संशोधन विधेयक पर नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उन्हें मुख्य भूमिका में होना था किंतु वे गैर जरूरी मुद्दों में उलझे रहे। उनको पिछड़ी जातियों की कमी अब जाकर समझ आई जबकि तेजस्वी और अखिलेश से मुकाबले के लिए भाजपा ने गैर यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ मिला कर सोशल इंजीनियरिंग का शानदार प्रदर्शन किया। किसी पार्टी का अधिवेशन उसकी भावी दिशा तय करता है। गुजरात में इस आयोजन के जरिये कांग्रेस ने भाजपा के इस गढ़ को जीतने का जो इरादा जताया उसका कारगर होना उतना आसान नहीं है। उसे याद रखना चाहिए कि दो वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी पार्टी ने अधिवेशन किया था किंतु कुछ माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में  उसके हाथ से सत्ता खिसक गई।  बेहतर हो कांग्रेस 2034 के लोकसभा चुनाव को लक्ष्य बनाकर तैयारी करे क्योंकि उसकी वर्तमान स्थिति पूरी तरह दिशाहीन   है। अनेक राज्यों में तो वह अस्तित्व के लिए तरस रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 April 2025

लेकिन राज्यपाल का काम केवल विधेयकों को मंजूरी देना नहीं है


तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों को लम्बे समय तक दबाये रखने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ का निर्णय निश्चित रूप से ऐतिहासिक है। उसने स्पष्ट रूप से राज्यपाल को तीन विकल्प दिये हैं। पहला विधेयक पर स्वीकृति प्रदान करना, दूसरा उसे विधानसभा को पुनर्विचार हेतु लौटाना और  राष्ट्रपति  के पास भेजे जाने के लिए सुरक्षित रखना। इसके लिए उसके पास अधिकतम तीन माह का समय होगा। लेकिन लौटाया गया विधेयक यदि दोबारा जस का तस विधानसभा से पारित होकर आता है तब वे उसे अनुमोदित करने बाध्य होंगे। न्यायालय ने राज्यपाल के पॉकेट वीटो पर ऐतराज जताते हुए साफ किया कि वे निर्वाचित विधायिका और मंत्रीपरिषद के निर्णयों को रोकने का अधिकार नहीं रखते। फैसले में ये भी कहा गया है कि जिस विधेयक को राज्यपाल स्वीकृत करते हैं उसमें शीघ्रातिशीघ्र का सिद्धांत पालन होना चाहिये। कुल मिलाकर इस फैसले ने राज्यपालों को राज्य सरकार के सामने असहाय बनाकर रख दिया। संवैधानिक प्रमुख होने के नाते उनका दायित्व है कि राज्य का शासन संविधान सम्मत चले। संघीय व्यवस्था में इस तरह के पद की इसीलिये आवश्यकता है , अन्यथा राज्यों के स्वेच्छाचारी होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच खींचतानी उन्हीं राज्यों में देखी जाती है जहाँ केंद्र में सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के विरोधी दल की सरकार हो। हालांकि कुछ अपवाद भी हैं उदाहरण के लिए उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक 24 साल मुख्यमंत्री रहे। उस दौरान केंद्र में कई सरकारें बनीं परंतु उनके सबके साथ अच्छे रिश्ते रहे। राज्यपाल के साथ  उनकी अनबन शायद ही किसी ने सुनी हो। लेकिन वर्तमान में प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की गैर भाजपा सरकारों की राज्यपाल से आये दिन टकराहट सुनाई देती है। दिल्ली के उप राज्यपाल और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच की रस्साकशी पूरे देश ने देखी। ये सिलसिला आजादी के बाद से ही चला आ रहा है। जब केंद्र में कांग्रेस का इकतरफा राज था तब राज्यपाल की सिफारिश पर राज्य सरकार को बर्खास्त कर देना आम बात थी। आजादी के बाद केरल में नंबूदरीपाद की वामपंथी सरकार को महज इसलिए बर्खास्त कर दिया गया था क्योंकि वह नेहरू जी को नापसंद थी। अब तक धारा 356 के जरिये 100 राज्य सरकारें अकारण गिराई गईं। सबसे अधिक 50 बार ऐसा इंदिरा जी के शासनकाल में हुआ। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने बोम्मई मामले में सरकार बर्खास्त करने के इस तरीके पर लगाम लगाते हुए कहा कि उसके बहुमत का फैसला विधानसभा में होना चाहिए। उ.प्र के राज्यपाल रहते हुए रोमेश भंडारी और बिहार में बूटा सिंह के कारनामों ने भी राज्यपाल के पद को कलंकित किया। सरकार बर्खास्त करने का चलन तो रुक गया किंतु केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल और अन्य दलों की राज्य सरकारों के बीच खींचतान रुकने का नाम नहीं ले रही। जाहिर है इसके पीछे दलीय स्वार्थ ही प्रमुख होता है। ये भी सही है कि भारतीय राजनीति मतभेद की बजाय मनभेद में बदल चुकी है। राज्य सरकार और केंद्र के बीच वैचारिक मतभेद अस्वाभविक नहीं है किंतु प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल  और जम्मू कश्मीर जैसे राज्य जब केंद्रीय कानूनों के प्रति असहमति जतायें, सीबीआई जैसी एजेंसी को आने से रोकें, घुसपैठियों को रोकने में रुकावट बनें तब राज्यपाल का सख्त होना देशहित में है। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अनेक बयान  सीधे - सीधे संघीय ढांचे को कमजोर करने वाले थे। ऐसे में राज्यपाल का पद बेहद महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विधेयक पर स्वीकृति अथवा अस्वीकृति संबंधी जो समय सीमा निर्धारित की वह  पूरी तरह सही है। क्योंकि राज्यपाल का केंद्र के एजेंट के तौर पर काम करना संसदीय लोकतंत्र के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है । लेकिन न्यायालय के संदर्भित निर्णय के परिप्रेक्ष्य में यदि राज्य सरकार संवैधानिक व्यवस्थाओं की अवहेलना करने का दुस्साहस करने लगे तब राज्यपाल मूक दर्शक बनकर बैठा रहे ये भी अच्छा नहीं रहेगा। ममता बैनर्जी, स्टालिन और विजयन जैसे मुख्यमंत्री जिस भाषा में बोलते हैं उसमें टकराव रोकना मुश्किल होगा क्योंकि राज्यपाल का काम केवल विधेयक पर हस्ताक्षर करना मात्र नहीं है। यद्यपि  उसे दलीय राजनीति से ऊपर होना ही चाहिये, लेकिन जब तक राजनीति से रिटायर किये जाने वाले राज्यपाल बनाये जाते रहेंगे तब तक ये विसंगति बनी रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 April 2025

ट्रम्प का आर्थिक आतंकवाद भारत के लिए स्वर्णिम अवसर हो सकता है


भारतीय दर्शन विश्व को परिवार मानता है जबकि पश्चिम के चिंतन पर  आर्थिक स्वार्थ सदैव हावी रहे। इसीलिए वहाँ  व्यापार की मानसिकता  प्रबल रही। जिसके चलते उन्होंने विश्व को बाजार का स्वरूप दे दिया। विश्व व्यापार संगठन और वैश्विक अर्थव्यवस्था इसी भावना से प्रेरित है। चाहे 19 वीं और 20 वीं सदी का उपनिवेशवाद हो या दूसरे महायुद्ध के पश्चात चला शीतयुद्ध , सभी के पीछे पश्चिमी जगत का आर्थिक स्वार्थ ही काम करता रहा। 21 वीं सदी के 25 वें साल में प्रवेश के बाद भी महाशक्तियों के तौर तरीकों में लेश मात्र भी बदलाव नहीं आया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दूसरे कार्यकाल में जिस तरह के आर्थिक आतंक से पूरी दुनिया को भयाक्रांत कर रहे हैं वह इसका ताजा प्रमाण है। आयातित वस्तुओं पर कर की दरों में बेतहाशा वृद्धि करने के पीछे उनका तर्क है कि अमेरिका जिन देशों को निर्यात करता है वे उस पर ज्यादा करारोपण करते हैं जबकि  अमेरिका में आयात होने वाली वस्तुओं पर लगने वाला कर कम है। इस आधार पर  ट्रम्प ने  आयातित वस्तुओं पर करों में बेतहाशा वृद्धि कर दी।  इसका असर दुनिया भर के शेयर बाजारों में आई बड़ी गिरावट के रूप में देखने मिल रहा है। रोचक बात ये है कि अमेरिका का व्यापार घाटा कम करने के लिए करों में की गई वृद्धि से आयातित वस्तुएँ महंगी हो गईं जिससे नाराज लोग सड़कों पर उतरकर ट्रम्प की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। जिस जनता ने उन्हें भारी मतों से जिताया था वही मात्र दो महीने के भीतर ही उनसे त्रस्त हो चली है किंतु ट्रम्प के मुताबिक़ ये स्थिति कड़वी दवा जैसी है जो लंबे समय तक लाभ पहुंचाएगी। अर्थशास्त्री  मान रहे हैं कि ट्रम्प  की नीतियों से दुनिया आर्थिक मंदी की गिरफ्त में आने जा रही है। यूरोपीय देश अमेरिका पर अपनी निर्भरता खत्म करने की दिशा में सोचने लगे हैं तो भारत और चीन जैसे देश  अन्य क्षेत्रों के बाजारों में संभावनाएं तलाशने में जुट गये हैं। अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात में कमी आने से भारत का परेशान होना स्वाभाविक है। गत दिवस शेयर बाजार के धड़ाम से गिरने के कारण निवेशकों को जबरदस्त नुकसान हुआ। ये गिरावट पूरे विश्व में देखी गई। यहाँ तक कि  ट्रम्प के अपने देश का शेयर बाजार भी हिचकोले खाने लगा । कोरोना, यूक्रेन - रूस युद्ध और इसरायल - हमास के बीच जंग ने पहले ही आर्थिक जगत में दहशत फैला रखी थी। ऊपर से ट्रम्प का सनकीपन दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत चरितार्थ कर रहा है। हालांकि  आज की दुनिया में  किसी देश का खुद में सीमित रहना मुश्किल भी है और अव्यवहारिक भी परंतु आपदा में अवसर तलाशने की क्षमता के बल पर भारत इस संकट से भी उसी तरह  सफल होकर बाहर आ जायेगा जैसा कोरोना महामारी के दौरान उसने कर दिखाया। हमारा विशाल  उपभोक्ता बाजार  सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकता है। उससे भी महत्वपूर्ण बात है आम भारतीय की संयमी  प्रवृत्ति। बढ़ते उपभोक्तावाद के बाद भी औसत भारतीय परिवार पश्चिमी देशों की विलासितापूर्ण जीवन शैली के विपरीत कम संसाधनों में भी जीवन यापन कर लेता है। घरेलू बचत भी भारतीय समाज की विशेषता है। यही वजह है कि भारत के शेयर बाजार पूरी तरह से विदेशी पूंजी पर निर्भर नहीं रहे। देश में निवेशकों का एक नया वर्ग तैयार हो चुका है। इसका ताजा प्रमाण है कल हुई गिरावट के बाद आज ही शेयर बाजार में आई उछाल। इन्हीं कारणों से अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि ट्रम्प के आर्थिक आतंकवाद से जूझने में भारत पूरी तरह सक्षम है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में उत्पादकों को मांग में कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यदि सरकार घरेलू उद्योगों को छूट देने के साथ ही उपभोक्ता की क्रय शक्ति बढ़ाने की दिशा में कदम उठाये तो देश मंदी से बचा रह सकता हैं। गत दिवस सरकार ने पेट्रोल - डीजल के दाम 2 रु. लीटर बढ़ाये किंतु उसका बोझ  पेट्रोलियम कंपनियों पर डालकर आम उपभोक्ता को राहत दे दी। इसी तरह की मेहरबानी जीएसटी की दरों में की जानी चाहिए।  मेक इन इंडिया को देश की पहिचान बनाने और आत्मनिर्भर भारत के  आत्मविश्वास को मज़बूत करने का यह स्वर्णिम अवसर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 7 April 2025

दमोह के मिशन अस्पताल में हुईं मौतों की निष्पक्ष जाँच जरूरी


म.प्र के दमोह जिला मुख्यालय के मिशन अस्पताल में फर्जी हृदय रोग विशेषज्ञ द्वारा जिन 15 मरीजों की शल्य चिकित्सा की गई  उनमें से 7 की मृत्यु हो गई। शिकायत जिला प्रशासन तक पहुंची जिसने उसे गंभीरता से नहीं लिया। 2 जनवरी से 20 फरवरी तक नरेंद्र यादव , डॉ. एनजोन केम बनकर इलाज करता रहा। इस दौरान हुईं मौतों  के बाद यदि जिला प्रशासन समय रहते जाग जाता तो मिशन अस्पताल की धोखाधड़ी और फर्जी चिकित्सक का पर्दाफाश हो जाता। उल्लेखनीय है बुंदेलखंड के दमोह जिले में  ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां काफी पुरानी हैं। यहाँ मिशन संचालित शिक्षण संस्थान , चर्च और अस्पताल के जरिये ईसाइयत का प्रचार - प्रसार होता रहा। शिक्षा और चिकित्सा के अलावा चर्च के संरक्षण में सेवा प्रकल्पों के माध्यम से वंचित वर्ग को ईसाई बनाने का अभियान आजादी के बाद से बेधड़क चलता आया है। चूंकि इनके  विद्यालयों में ज्यादातर  नेताओं और नौकरशाहों की संतानें पढ़ती हैं इसलिए इनको राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त होता रहा। ये बात भी सही है कि दमोह जैसे अनेक  पिछड़े क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाये जाने वाले अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाएँ सरकारी चिकित्सालयों से बेहतर होती हैं। इसलिए भी  इनकी धर्म प्रचार सम्बन्धी गतिविधियों पर ध्यान नहीं जाता। जबलपुर के पड़ोस में स्थित आदिवासी बहुल मंडला जिले का कटरा मिशन अस्पताल इसका उदाहरण है। चूंकि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित चिकित्सालयों तथा शिक्षण संस्थानों को विदेशी सहायता भी मिलती है इसलिए वे सरकारी संस्थानों से गुणवत्ता में बेहतर होते हैं। दमोह का मिशन अस्पताल इसका उदाहरण  है। लेकिन उनका सेवाभाव लोगों को ईसाई बनाने पर केंद्रित है लिहाजा उनकी कार्यशैली गोपनीय रहती है। दमोह में जिस फर्जी चिकित्सक से लोगों की हृदय रोग संबंधी चिकित्सा करवाई गई उसकी डिग्री की जांच न किये जाने के लिए अस्पताल का प्रबंधन अपराधिक उदासीनता का दोषी है।  7 लोगों की मौत होने के बाद हल्ला मचा और राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा फैली तब  जिला प्रशासन हरकत में आया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की दो सदस्यीय जाँच टीम आज दमोह आकर मामले की तह में जायेगी। ये देखते हुए गत दिवस मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाई। आरोपी  चिकित्सक फरार है। अब जानकारी आ रही है कि वह तेलंगाना में भी इसी तरह का अपराध कर चुका है । ऐसे में सवाल उठता है कि एक बाहरी चिकित्सक की शैक्षणिक योग्यता और अनिवार्य पेशेवर औपचारिकताओं के पूर्ण हुए बिना मिशन अस्पताल के संचालकों ने उसे किस आधार पर सेवा में रखा? सफाई में कहा जा रहा है कि किसी एजेंसी के माध्यम से 1 जनवरी को उक्त चिकित्सक को नियुक्त किया गया। इसलिए उसकी डिग्री की जांच करने की जरूरत नहीं समझी गई। जब 7 मरीजों की मौत से अस्पताल कटघरे में खड़ा हुआ तब फरवरी में वह बिना बताये भाग गया। उसके बारे में ये प्रचारित किया गया कि वह लंदन से आया है।  लेकिन सबसे गंभीर बात है कि  नरेंद्र यादव द्वारा हृदय रोग विशेषज्ञ बनकर 15 एंजियोप्लास्टी की गईं जिनमें से 7 की मौत होने पर मामला मुख्य चिकित्सा अधिकारी के संज्ञान में लाया गया जिन्होंने  उसे गंभीरता से नहीं लिया तब मानवाधिकार आयोग तक शिकायत पहुंचाई गई । उसके सक्रिय होने के बाद प्रशासन में खलबली मची वरना मिशनरी के प्रभाव और दबाव में प्रकरण को रफा - दफा कर दिया जाता। इस अस्पताल के संचालक अजय लाल  पहले भी विवादों में फंस चुके हैं। उनके द्वारा संचालित अनाथालय भी धर्मांतरण के आरोपों के बाद बंद हो चुका है। कुल मिलाकर मामला ईसाई मिशनरियों की गोपनीय  कार्यशैली के कारण और उलझता जा रहा है जिसमें जिला प्रशासन और मुख्य चिकित्सा अधिकारी की लापरवाही की भी जाँच होनी चाहिए। आरोपी चिकित्सक के अचानक फरार हो जाने से संदेह और बढ़ता जा रहा है। मानव अधिकार आयोग को इस मामले में गहराई तक जाकर जांच करना चाहिए । चौंकाने वाली बात ये है कि प्रदेश में लंबे समय से भाजपा का शासन होने के बावजूद ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों पर अपेक्षित  नियंत्रण नहीं हो पा रहा। उनके द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों की मनमानी यथावत जारी है। ब्रिटिश सत्ता  द्वारा ईसाई संस्थाओं को दी गईं बेशकीमती जमीनों की बंदरबांट भी सामने आने लगी है। जबलपुर में एक बिशप के विरुद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज होने के बाद मिशनरियों में चल रहे अवैध कारोबार उजागर हुए हैं। लेकिन इस बारे में ये बात ध्यान देने योग्य है कि समाज का प्रभावशाली वर्ग , राजनेता और अफसरशाही ईसाई मिशनरियों के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पा रहे जिसके कारण सर्वविदित हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 April 2025

उद्धव ठाकरे ने पिता की पुण्यायी को नष्ट कर दिया

जनीतिक दलों की पहिचान या तो व्यक्ति विशेष  ( नेता ) से होती है या  विचारधारा से। उस दृष्टि से  वामपंथी दलों के अलावा भाजपा ही है जिनकी नीतियों में स्पष्टता है । दूसरी ओर  राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस की वैचारिक विशिष्टता लगातार नष्ट होती जा रही है। देश में ऐसे क्षेत्रीय दलों की भी भरमार है जो किसी व्यक्ति या परिवार के नाम से ही जाने जाते हैं। उनकी विचारधारा तात्कालिक लाभ के अनुसार बदलती रहती है। लेकिन  शिवसेना एक ऐसी पार्टी थी जो उसके संस्थापक स्व. बाला साहेब ठाकरे के साथ ही अपनी कट्टर हिंदुवादी विचारधारा के लिए विख्यात रही। कुछ मामलों में तो वे भाजपा से भी ज्यादा हिंदुत्ववादी थे। बाबरी ढाँचे के ढहाने का आरोप जब  लगा तो बजाय पीछे हटने के उन्होंने कहा कि उन्हें उन शिवसैनिकों पर गर्व है।  अपनी हिंदूवादी नीतियों के कारण ही उसका भाजपा से गठजोड़ हुआ जो लगभग दो दशक चला। महाराष्ट्र में  सरकार बनी तो शिवसेना का मुख्यमंत्री बना क्योंकि बाला साहेब ने ही  तय किया था कि जिसके विधायक ज्यादा उसका मुख्यमंत्री होगा। केन्द्र में जब वाजपेयी सरकार बनी तब शिवसेना भी  उसमें शामिल हुई। उसके वरिष्ट नेता मनोहर जोशी लोकसभा के अध्यक्ष भी बने। सब कुछ ठीक चल रहा था किंतु बाला साहेब की मृत्यु के बाद जब  बागडोर उद्धव के हाथ आई तो पार्टी कमजोर होना शुरू हो गई। वहीं दूसरी तरफ भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ता चला गया जिसकी वजह से 2014 में वह शिवसेना से आगे निकल गई और देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन इसके पहले दोनों के बीच काफी खींचतानी हुई क्योंकि उद्धव ठाकरे खुद उस कुर्सी पर बैठना चाहते थे। उनके पिता ने तो जीवन में कभी चुनाव नहीं  लड़ा और न ही परिवार से किसी को लड़ाया। लेकिन उनके बाद उद्धव और उनके पुत्र आदित्य में सत्ता के प्रति  प्रेम हिलोरें मारने लगा। 2019 का विधानसभा  चुनाव दोनों अलग - अलग लड़े क्योंकि सीटों के बंटवारे को लेकर गठबंधन टूट चुका था। चुनाव में  भाजपा को शिवसेना से दोगुनी सीटें मिलने के बाद भी वह बहुमत से पीछे रह गई। चूंकि  शिवसेना ही उसकी स्वाभाविक सहयोगी हो सकती थी लिहाजा उससे संपर्क किया गया किंतु उसने उद्धव को मुख्यमंत्री बनाने की ज़िद पकड़ ली। इस दौरान कुछ नाटकीय घटनाएं भी घटीं जिसके बाद शरद पवार के जाल में फंसकर उद्धव  , कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बन गए। उनके बेटे आदित्य भी मंत्रीमंडल में शामिल हुए। लेकिन 2022 में पार्टी में बगावत हो गई। एकनाथ शिंदे दर्जनों शिवसेना विधायकों के साथ पार्टी छोड़ गए। भाजपा ने भी अवसर का लाभ उठाते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर उद्धव को सत्ता से बेदखल कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री श्री फड़नवीस को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। कानूनी लड़ाई में शिंदे गुट भारी पड़ा जिससे शिवसेना उसके कब्जे में आ गई और उद्धव गुट शिवसेना यूबीटी कहलाई।  कुछ समय बाद शरद पवार के भतीजे अजीत ने दोबारा बगावत की और इस तरह एनसीपी भी दो फाड़ हो गई । हालांकि लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में एनडीए को बड़ा झटका लगा। जिससे ये आशंका  जागी कि कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में शिंदे सरकार की विदाई हो जाएगी किंतु फड़नवीस, शिंदे और अजीत की तिकड़ी कांग्रेस, उद्धव और शरद पवार पर भारी पड़ गई। एनडीए को ऐतिहासिक बहुमत मिला और भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने के नजदीक आ गई। श्री शिंदे के साथ मुख्यमंत्री पद को लेकर उसकी थोड़ी अनबन तो हुई  किंतु अंततः वे श्री फड़नवीस के साथ उपमुख्यमंत्री बनने राजी हो गये। चुनाव के दौरान उद्धव और उनकी पार्टी ने जिस प्रकार से मुस्लिम तुष्टीकरण की कोशिशें कीं उससे  परंपरागत मतदाता छिड़क गए । चुनाव बाद कई बार लगा कि उद्धव हिंदुत्व के नाम पर फिर से  भाजपा के करीब आयेंगे किंतु ऐसा नहीं हो सका। बाला साहेब की तेजस्विता के पूरी तरह उलट वे एकदम लुँज - पुंज होकर रह गए। जिस कांग्रेस और एनसीपी को स्व. ठाकरे हिंदुत्व विरोधी मानकर तिरस्कृत करते थे , उन्हीं के सामने उद्धव का दंडवत होना आश्चर्यचकित करने वाला है। वक़्फ़ संशोधन विधेयक पर उद्धव गुट के सांसदों ने विरोध में मतदान ही नहीं किया बल्कि जो भाषण संसद के दोनों सदनों में दिये उनके  बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि पार्टी पूरी तरह से बालासाहेब की नीतियों को त्यागकर वैचारिक भटकाव की स्थिति में पहुँच चुकी है। उद्धव की भाजपा से शत्रुता तो समझ में आती है किंतु वक़्फ़ जैसे मुद्दे पर उनकी नीति मूल छवि के पूर्णतः विरुद्ध  थी। जबकि महाविकास अगाढ़ी में उसकी सहयोगी एनसीपी राज्यसभा में मतदान के समय अनुपस्थित रही। उद्धव ठाकरे का स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं है। उनके पुत्र आदित्य की चमक और धमक भी लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में पार्टी का अपनी पहिचान से दूर हो जाना उसके भविष्य के लिए खतरनाक है। इसीलिए उसके सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने की अटकलें आये दिन लगती हैं। कभी - कभी तो लगता है संजय राउत जैसे सलाहकार उद्धव की राजनीति को समुद्र में डुबोकर ही मानेंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 April 2025

वक़्फ़ बोर्ड मालामाल तो आम मुसलमान बदहाल क्यों


राज्यसभा से वक़्फ़ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद अब राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही इसे कानून का दर्जा मिल जायेगा।  इस विधेयक के विरोध में सड़कों पर उतरने की बात हो रही थीं।  देश टूटने जैसी डींगें भी हाँकी गईं। लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच से ही विधेयक के पक्ष में भी आवाजें उठीं। अनेक मौलवियों ने वक़्फ़ के नाम पर हुए घोटालों का खुलासा करते हुए आरोप लगाया कि इससे जरूरतमंद मुसलमानों को कोई सहायता नहीं मिली।  2006 की सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुसलमानों की हालत हिन्दू दलितों से भी बदतर बताई गई थी । उसी के बाद 2013 में तत्कालीन डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने पुराने  कानून में  बदलाव करते हुए वक़्फ़ बोर्ड को बेहद ताकतवर बना दिया जिससे मुस्लिम समाज की स्थिति में सुधार हो सके। लेकिन बात जस की तस रही।  निजी बातचीत में ज्यादातर मुसलमान मानते हैं कि  आम मुसलमान को शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार उपलब्ध करवाने में वक़्फ़ बोर्ड पूरी तरह विफल रहे हैं। रेलवे और सेना के बाद वक़्फ़ बोर्ड देश का सबसे बड़ा भूस्वामी है जिसके पास लाखों एकड़ भूमि का स्वामित्व है। इतनी  जमीन होने के बावजूद  वक़्फ़ की कुल सालाना आय मात्र 200 करोड़ बताई जाती है जो सवाल खड़े करती है। सच्चर कमेटी ने कहा था कि इतनी भूमि का सही उपयोग होने पर उक्त रकम 12 हजार करोड़  सालाना हो सकती है। कमेटी ने वक़्फ़ प्रबंधन में सुधार के लिए अनेक सुझाव दिये किंतु मनमोहन सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जो संशोधन किया उसमें बजाय जिम्मेदार बनाने के वक़्फ़ को  स्वच्छंद बना दिया। जिसके बल पर बीते 12 वर्ष में उसने अंधाधुंध कब्जे करते हुए सरकारी और गैर सरकारी जमीनें हथिया लीं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इस दौरान उसकी कार्य शैली ने भूमाफिया का रूप ले लिया। संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित  संशोधन विधेयक में वक़्फ़ प्रबंधन को कानून और मुस्लिम समुदाय के प्रति जवाबदेह बनाने की व्यवस्था की गई है जिसका विरोध समझ से परे है । इतनी बड़ी जमीन जिस समुदाय के पास हो उसके द्वारा  गरीबी और बेरोजगारी का रोना रोते हुए भेदभाव का आरोप लगाए जाने का कोई औचित्य नहीं है। और यदि वक़्फ़ बोर्ड  में सब कुछ पाक - साफ है तब उसमें सरकारी प्रतिनिधि या गैर मुस्लिम के होने पर छाती पीटने की क्या जरूरत है? रही बात नये संशोधन के पीछे राजनीतिक मंतव्य की तो भले ही भाजपा हिंदुवादी है किंतु जो विपक्षी दल विधेयक के विरोध में आसमान सिर पर उठाये  घूमते तरह उनकी रुचि भी  मात्र मुस्लिम समाज के मतों में है न कि आम मुसलमान की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति सुधारने में। यदि वे  उनके शुभचिंतक होते तो बजाय विधेयक का विरोध करने के वक़्फ़ बोर्डों में कुंडली मारकर बैठे मुस्लिमों से पूछते कि 2013 में अनाप - शनाप अधिकार मिलने के बाद सच्चर कमेटी द्वारा सुझाए गए कदम उठाकर मुसलमानों की बदहाली दूर करने के लिए क्या कदम उठाये गए? लेकिन बजाय इसके देश भर  में प्रचार किया गया कि वक़्फ़ संशोधन  मुसलमानों की मस्जिदें और कब्रिस्तान छीन लेगा। असलियत ये है कि वक़्फ़ के नाम पर किये गए कब्जे छिन जाने के डर से ये सब दुष्प्रचार किया गया। 2013 में हुए संशोधन के बाद देश भर में वक़्फ़ द्वारा निजी और सरकारी जमीनों पर जिस तरह अपना दावा करना शुरू किया उससे केवल हिन्दू ही नहीं अपितु ईसाई समुदाय भी भयाक्रांत है। केरल के चर्चों ने तो खुलकर वक़्फ़ के विरुद्ध आवाज उठाई। ये देखते हुए विपक्ष को चाहिए था कि विधेयक के विरोध की रस्म अदायगी  करने के बजाय वक़्फ़ बोर्डों का संचालन कर रहे लोगों को समझाते कि वे वक़्फ़ की अकूत संपत्ति का उपयोग मुस्लिम समुदाय की भलाई के लिए करें जो वक़्फ़ का मूल उद्देश्य है। संसद के दोनों सदनों में जिस आसानी से उक्त विधेयक पारित हुआ उसे केन्द्र सरकार की बड़ी राजनीतिक सफलता कहा जाएगा। चन्द्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की पार्टियों द्वारा  मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी की चिंता किये बिना विधेयक का खुलकर समर्थन करना अन्य विपक्षी दलों के लिए संकेत है कि वोट बैंक की घिसी- पिटी राजनीति से बाहर निकलकर देश के हित में सोचें। उक्त विधेयक का बेवजह विरोध करने वाले मुसलमानों के लिए भी सोचने का मुद्दा ये होना चाहिए कि वे अपने बच्चों का भविष्य संवारना चाहते हैं या फिर मौजूदा बदहाली में ही रहना उन्हें पसंद है? विधेयक तो पारित हो गया और कानून भी बनेगा। ऐसे में अब मुस्लिम समाज के समझदार तबके को चाहिए कि वह अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए समय के साथ चलने की बुद्धिमत्ता दिखाए। वक़्फ़ बोर्ड में बैठे लोगों पर मुस्लिम समाज के भीतर से ही ये दबाव बनना चाहिए कि उसके पास जो अपार संपत्ति है उसका लाभ कुछ लोगों तक सीमित न रहकर आम मुसलमान तक पहुंचे। मुसलमानों को ये बात भी ध्यान रखना होगी कि अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति  यदि वक़्फ़ से वापिस ली जायेगी तो  इससे न तो उन्हें कोई क्षति पहुंचेगी और न ही उनके धर्म को। वैसे भी उस संपत्ति से उन्हें कोई लाभ तो मिलता ही नहीं था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 April 2025

युद्ध विराम की पेशकश नक्सलियों का हौसला पस्त होने का संकेत है

न्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दावा है कि आगामी वर्ष तक देश नक्सलियों के आतंक से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा। मोदी सरकार बनने के बाद से ही नक्सल विरोधी मुहिम में तेजी आई और बड़ी संख्या में नक्सलियों को मौत के घाट उतारा जाता रहा । ताजा आंकड़ों के अनुसार  बीते एक वर्ष में 400 से ज्यादा नक्सली  मार गिराए गए जिनमें बड़े नक्सली नेता भी थे। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका नक्सलियों का पुराना गढ़ रहा है। यहाँ से उड़ीसा, झारखंड, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में उनकी आवाजाही होती रहती है। इसीलिए केंद्र सरकार ने बस्तर और निकटवर्ती इलाकों में नक्सल विरोधी अभियान को तेज किया जिसके अच्छे परिणाम भी देखने मिले। इसका कारण ये भी रहा कि सुरक्षा बलों को खुला हाथ दिया गया वरना नक्सलियों के प्रति हमदर्दी रखने वाले शासन - प्रशासन में बैठे तत्वों द्वारा सुरक्षा बलों के हाथ बांध दिये जाते थे। गृहमंत्री द्वारा लगातार  हालात का जायजा लेते रहने से भी सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ा। 2023 में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद केन्द्र और राज्य के बीच  बेहतर तालमेल का भी सकारात्मक परिणाम निकला। साथ ही बुद्धिजीवी बनकर समाज में घुसे हुए नक्सलियों के सफेदपोश समर्थकों का बीते कुछ सालों में पर्दाफाश होने से नक्सलियों की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई। प्रशासन में बैठे वामपंथी विचारधारा के लोग खुलकर सामने नहीं आते किंतु परदे के पीछे रहकर  वे नक्सली गतिविधियों को संरक्षण देने का कार्य करते रहे। पुलिस तक में नक्सलियों की घुसपैठ उजागर हो चुकी है। केंद्र सरकार ने ऐसे सभी तत्वों की घेराबंदी करते हुए नक्सलियों की जड़ों में मठा डालने की जो प्रतिबद्धता दिखाई उसके कारण ही पशुपति से तिरुपति तक नक्सली गलियारा बनाने का उनका इरादा विफल होने आ गया। यद्यपि बौखलाहट में उन्होंने अनेक हिंसक वारदातें कीं किंतु जल्द  जवाबी कारवाई होने से उनके हौसले पस्त होने लगे। इसी का परिणाम है कि श्री शाह के दो दिनों के दौरे पर छत्तीसगढ़ आने के पहले गत दिवस नक्सलियों के प्रमुख संगठन की ओर से युद्धविराम की पेशकश की गई। दरअसल हाल ही में अपने  कुछ दिग्गजों के मारे जाने के बाद नक्सली गिरोहों के सामने नेतृत्व का संकट आ गया है। सुरक्षा बलों से  जान बचाने के लिए बड़ी संख्या में नक्सली आत्म समर्पण के लिए बाध्य हुए जिनमें महिलाएं भी हैं। गौरतलब है कि जिन इलाकों में नक्सली  सक्रिय हैं उनमें से अधिकांश आदिवासी बहुल हैं । साथ ही उनमें खनिज भंडार हैं। खनन व्यवसायियों से जबरिया वसूली नक्सलियों की आय का स्रोत है। आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए आजादी के बाद से सरकारों ने बेतहाशा धन आवंटित किया किंतु वह  नौकरशाहों और राजनेताओं द्वारा किये गए भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। आदिवासियों का अन्य तरीकों से भी शोषण होता रहा। आरक्षण के नाम पर उन्हें लालीपॉप पकड़ाया गया किंतु उनके परंपरागत रोजगार के साधन छिनते चले गए। इन स्थितियों का लाभ लेकर नक्सलियों ने आदिवासियों से भावनात्मक रिश्ते कायम करते हुए उनके बीच पैठ बनाई और फिर दबाव बनाकर उनके इलाकों में वर्चस्व कायम करने के बाद आदिवासी युवक - युवतियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देकर हिंसा के रास्ते पर धकेलने का काम किया गया। उन इलाकों में फैले ईसाई मिशनरियों के साथ भी नक्सलियों के अच्छे ताल्लुकात बताये जाते हैं। इसीलिए शायद ही किसी ईसाई पादरी या नन को नक्सली हिंसा का शिकार होते देखा गया। चर्च को नुकसान पहुंचाने जैसी घटना भी नहीं सुनाई दी। वर्तमान केन्द्र सरकार ने जो इच्छाशक्ति दिखाई उसकी वजह से खूनी क्रांति के जरिये सत्ता हथियाने की नक्सली कार्ययोजना विफल होने के कगार पर आ गई है। अभी ये स्पष्ट नहीं है कि युद्ध विराम प्रस्ताव पर केन्द्र और संबंधित राज्य सरकारें क्या फैसला लेती हैं किंतु इससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि नक्सलियों का मनोबल टूटने लगा है।  इस लिहाज से श्री शाह का दो दिवसीय  छत्तीसगढ़ दौरा बेहद महत्वपूर्ण होगा। आगामी वर्ष तक नक्सली आतंक से देश को मुक्त कराने का लक्ष्य  यदि  प्राप्त  हो गया तो इससे आंतरिक सुरक्षा पर मंडरा रहा खतरा कम होने के साथ ही देश विरोधी तत्वों के मंसूबों पर पानी फिरते देर नहीं लगेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी