मार्च 1971 की बात है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ को बुलवाकर पूर्वी पाकिस्तान से आ रहे शरणार्थियों के सैलाब को रोकने के लिए उस पर हमला करने कहा। इस पर जनरल ने पूछा क्या आप युद्ध जीतना चाहती हैं? इंदिरा जी के हाँ कहने पर उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति और मौसम का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें 6 महीने का समय दिया जाए तो युद्ध में जीत की गारंटी होगी। कहते हैं इंदिरा जी को सेनाध्यक्ष की वह स्पष्टवादिता पसंद नहीं आई लेकिन उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था। इसके बाद दिसम्बर में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान पर हमला किया और मात्र 10 दिन में ही बांग्ला देश नामक नये देश का उदय हो गया। इस प्रसंग का उल्लेख ये स्पष्ट करना है कि राजनीतिक नेतृत्व को अपना निर्णय सेना पर थोपना नहीं चाहिए क्योंकि सत्ता में बैठे नेता तो वातानुकूलित कमरे में बैठकर निर्णय करते हैं लेकिन सेना को युद्धभुमि में विषम परिस्थितियों का सामना करना होता है। इसलिए उसका निर्णय उसके विवेक पर छोड़ना ही उचित होता है। गत दिवस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी सिद्धांत का अनुसरण करते हुए एक महत्वपूर्ण बैठक की जिसमें रक्षा मंत्री , राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार , चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और तीनों सेनाओं के प्रमुख उपस्थित रहे। उस दौरान पहलगाम में आतंकवादी हमले से उत्पन्न परिस्थितियों में निर्णायक सैन्य कार्रवाई का दायित्व सेना को सौंपते हुए अधिकार दे दिया कि वह युद्ध के लक्ष्य, तरीके और समय खुद तय करे। दिल्ली में इन दिनों सरगर्मी चरम पर है। विदेश मंत्री जयशंकर विदेशी राजनयिकों के सामने भारत का पक्ष रखते हुए विश्व जनमत भारत के पक्ष में मोड़ने में जुटे हैं। गृहमंत्री अमित शाह सीमा सुरक्षा बल सहित अन्य संगठनों के साथ रणनीति बनाने में व्यस्त हैं। आज रक्षा मामलों की मंत्रीमंडलीय समिति की बैठक भी हो रही है । इन बैठकों की बातचीत का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं होता लेकिन गत दिवस संपन्न बैठक के बाद प्रधानमंत्री द्वारा पाकिस्तान पर कारवाई करने का निर्णय सेना प्रमुखों पर छोड़ने की बात अधिकारिक रूप से सार्वजनिक । हर बात में सरकार की आलोचना करने के अभ्यस्त तबके को निश्चित रूप से निराशा हुई जो इसके पहले तक प्रधानमंत्री के साहस को चुनौती देते फिर रहे थे। साथ ही जो लोग घर बैठे युद्ध विशेषज्ञ बने हुए थे उन्हें झटका लगा क्योंकि प्रधानमंत्री ने किसी भी बड़ी कारवाई संबंधी फैसला उस सेना पर छोड़ दिया जिसे मैदान में उतरना है। उल्लेखनीय है पाकिस्तान में सेना का राजनीति में पूरा दखल रहता है। इसीलिए सत्ता में कोई नेता कितने समय तक रह पायेगा इसका फैसला जनता नहीं अपितु सेनाध्यक्ष करते हैं। अस्तित्व में आने के कुछ साल बाद से ही इस देश का लोकतंत्र सेना द्वारा नियंत्रित होता रहा। जनरल अयूब खान, याह्या खाँ, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ ने चुनी हुई सरकार का तख्ता पलटकर सत्ता हथियाई। लेकिन जब जनता द्वारा चुने नेता सरकार चलाते हैं तब भी उसका रिमोट कंट्रोल सेनाध्यक्ष के पास ही रहता है। वाजपेयी सरकार के समय कारगिल में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ जब लड़ाई में बदली तब तक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को उसकी कुछ भी जानकारी नहीं थी क्योंकि सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ ने उनसे पूछने की जरूरत ही नहीं समझी। लेकिन भारत में आज तक सेना ने राजनीतिक नेतृत्व के अधीन ही काम किया है। 1962 में चीन के हाथों शर्मनाक हार के बाद भी पं. नेहरू की सत्ता को कोई खतरा नहीं पहुंचा वहीं पाकिस्तान में भारत के साथ हर बड़े युद्ध में हार के बाद सत्ताधारी को हटना पड़ा जिसमें फौजी जनरल की मुख्य भूमिका रही। भारत में सरकार की नीतियों के कारण कई बार सेना को लगता है उसके हाथ बंधे हुए हैं । अनेक अवसरों पर उसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात करने के बाद बिना लड़े ही वापस बुला लिया गया। कारगिल युद्ध के दौरान भी सेना को स्पष्ट निर्देश थे कि नियंत्रण रेखा पार नहीं करनी जबकि भारतीय सैनिकों ने सभी चोटियों से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया था और छूट मिलती तो वे सीमा पार जाकर दुश्मन की जमीन में भी तिरंगा फहरा देते। 2014 के बाद फौज को कई बार सर्जिकल स्ट्राइक जैसे अभियान हेतु सीमा पार करने की अनुमति मिली जिसका उसने चतुराई पूर्वक उपयोग करते हुए अपने काम को अंजाम देकर सुरक्षित वापसी की। उस दृष्टि से गत दिवस प्रधानमंत्री ने सेना को पाकिस्तान पर सैन्य कारवाई हेतु लक्ष्य, तरीका और समय निश्चित करने की छूट देकर ये दिखा दिया कि राजनीतिक नेतृत्व को सेना की निर्णय क्षमता और रणनीतिक कुशलता में पूर्ण विश्वास है। ऐसा करके श्री मोदी ने 140 करोड़ जनता की भावना और इच्छा का ही सम्मान किया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी