दिवस म.प्र की राजधानी भोपाल में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड और म.प्र डेयरी फेडरेशन के बीच एम. ओ. यू पर हस्ताक्षर हुए जिसके अंतर्गत अब म.प्र के प्रसिद्ध साँची ब्रांड के दुग्ध उत्पादों की मार्केटिंग राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड करेगा। इससे उनका अमूल की तरह से ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विक्रय किया जा सकेगा। अनुबंध के अंतर्गत साँची नाम यथावत रहेगा। श्री शाह ने गुजरात की तरह से म.प्र में भी दुग्ध उत्पादन बढ़ाने हेतु महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने की सलाह देते हुए सहकारी समितियों के जरिये उत्पादकों से दूध खरीदकर उन्हें लाभ पहुंचाने की बात कही। गुजरात का अमूल ब्रांड टेस्ट ऑफ इंडिया कहा जाता है किंतु अब यह विश्व भर में रह रहे भारतीयों की पसंद बन चुका है। इसका निर्यात सालाना 1000 करोड़ रु. का है। साँची के उत्पादों को उस स्तर तक पहुँचने में कुछ समय तो लगेगा परंतु चूंकि इसकी मार्केटिंग सरकारी बाबुओं के बजाय अब पेशेवर संस्थान के हाथों होगी इसलिए ये उम्मीद की जा सकती है कि म.प्र में लोकप्रिय साँची ब्रांड को बड़ा बाजार उपलब्ध होगा। पूर्व में ये अफवाह उड़ी थी कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड उसका अधिगृहण कर लेगा। लेकिन उसकी वर्तमान स्थिति जारी रहेगी और समस्त कर्मचारी भी प्रदेश शासन के अधीन ही रहेंगे। ये निर्णय निश्चित ही प्रगतिशील और दूरगामी सोच पर आधारित है जिससे प्रदेश में गुजरात की तरह दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हो सकेगी और दुग्ध उत्पादकों को विक्रय पर होने वाले खर्च में कमी का लाभ मिलेगा। इसके साथ ही श्री शाह ने उक्त अवसर पर जानकारी दी कि सहकारी आंदोलन को सुदृढ़ करने के लिए अब सहकारी समितियों के कार्यक्षेत्र में विस्तार करते हुए उनके जरिये 300 वस्तुओं का विक्रय और सेवाएं प्रदान की जाएंगी जिनमें जल वितरण, पेट्रोल पंप संचालन, दवा दुकान, गैस बांटने से लेकर रेलवे टिकिट विक्रय जैसे कार्य संचालित होंगे। अमूल सदृश संस्थानों के अलावा बैंकिंग, गृह निर्माण और हाथ करघा जैसे अनेक क्षेत्रों में सहकारिता ने बड़ा योगदान दिया। देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन भी सहकारी समितियों के जरिये होता आया है। कुछ बड़े सहकारी सुपर बाजार भी सफलता पूर्वक चल रहे हैं। महाराष्ट्र सहित अनेक राज्यों में चीनी मिलें सहकारिता आंदोलन की जीती - जागती प्रतीक हैं। सरकार द्वारा न्यूनतम खरीदी मूल्य पर की जाने वाली खरीदी भी अनेक स्थानों पर सहकारिता के जरिये की जाती है। ऐसे में श्री शाह ने इसके विस्तार की जो योजना सामने रखी वह समाज में रचनात्मक प्रवृत्ति के विकास में सहायक होने के साथ रोजगार सृजन में भी मददगार साबित होगी। लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये है कि सहकारी आंदोलन में भ्रष्टाचार का अतिक्रमण न हो। साथ ही उसे राजनीतिक नेताओं की चारागाह बनने से रोका जाए। स्मरणीय है म.प्र में भी कभी सहकारिता आंदोलन काफी मजबूत हुआ करता था। बैंक, ऋण समितियाँ, गृह निर्माण समितियाँ और राशन की दुकान कहे जाने वाले सार्वजनिक वितरण केंद्र इसके प्रतीक थे। सरकारी क्षेत्र में दुग्ध संघ सहित अनेक संस्थान सहकारिता पर आधारित थे जिनमें राज्य हाथकरघा संघ प्रमुख था किंतु ज्यादातर का राजनीतिकरण होने से वे या तो बंद हो गए या किसी तरह जीवित हैं। दरअसल प्रदेश में भ्रष्टाचार और सहकारिता एक दूसरे के पर्याय बन गए। ये देखते हुए श्री शाह द्वारा जो नई योजना प्रस्तुत की गई उसकी सफलता के लिए सहकारिता के क्षेत्र में हुई पुरानी गलतियों को सुधारना जरूरी है अन्यथा आगे पाट पीछे सपाट की कहावत चरितार्थ होती रहेगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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