Friday, 25 April 2025

मृतकों की पत्नी और परिजन भी क्या झूठ बोल रहे हैं


पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद पूरे देश ने अभूतपूर्व भावनात्मक एकता का प्रदर्शन किया। इसके पहले भी कश्मीर घाटी में आतंकवादी निर्दोष लोगों को बेरहमी से मौत के घाट उतारते रहे हैं। इनमें पुलिस और सेना में कार्यरत कश्मीरी मुस्लिम भी थे । लेकिन पहलगाम में धर्म पूछकर की गई हत्याओं के कारण न सिर्फ घाटी बल्कि देश के बाहर भी मुस्लिम समुदाय दबाव में आ गया। असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता तक ने आतंकवादियों के प्रति बेहद तीखे शब्दों का प्रयोग किया। घाटी के भीतर भी बंद के जरिये  मुस्लिम समुदाय ने खुद को पाक - साफ साबित करने का भरपूर प्रयास  किया जबकि उसके पीछे का एकमात्र मकसद अपने पर्यटन व्यवसाय की रक्षा करना है जो उक्त हादसे के बाद चौपट होने के कगार पर आ गया। पहलगाम में एक कश्मीरी मुस्लिम भी मारा गया जिसके घोड़े पर एक पर्यटक बैठा था। मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी जमात उसका उदाहरण देकर आतंकवादियों की धर्मांधता पर परदा डालने के प्रयास में जुटी है।  सोशल मीडिया पर भी धर्म  पूछकर हत्या किये जाने के सबूत मांगे जा रहे हैं। जहाँ तक बात सुरक्षा प्रबंधों में चूक की है तो वह सर्वदलीय बैठक में सरकार द्वारा भी स्वीकार की जा चुकी है किन्तु आतंकवादियों द्वारा धर्म के आधार पर  हत्या किये जाने की बात को झूठ बताना  उन विधवाओं और अनाथों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा पाप है जो चिल्ला - चिल्लाकर बता रहे हैं कि आतंकवादियों ने स्पष्ट तौर पर धर्म पूछकर हत्याएं कीं। इंदौर के जिस ईसाई व्यक्ति ने पहलगाम हत्याकाण्ड में जान गंवाई उसकी पत्नी और परिजन खुलेआम कह रहे हैं कि मृतक से कलमा पढ़ने कहा गया किन्तु जब उसने अपने इसाई होने की बात बताई तब उसके सीने में गोली मार दी गई। राजस्थान में एक बच्चे ने भी अपने पिता की हत्या धर्म पूछकर किये जाने की बात टीवी चैनलों को बताई।  जिन फौजियों को मुस्लिम न होने के कारण गोली मारी गई उनमें से एक के कपड़े उतरवाकर उसके धर्म का पता लगाने और फिर हत्या करने की पुष्टि उसकी पत्नी ने की। इतना सब होने के बाद भी वर्ग विशेष इन बातों को झुठलाने पर आमादा है। कुछ लोगों  को अखबारों की खबरों में धर्म पूछकर हत्या किये जाने वाले  शीर्षक से परेशानी हो रही है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। भारत सरकार ने पाकिस्तान के विरुद्ध जिन कड़े फैसलों का ऐलान किया उनमें सिंधु नदी समझौता रोकना भी है। इस पर पाकिस्तान सवाल उठाता उसके पहले ही भारत में ये कहने वाले सामने आ गए कि हमारे पास सिंधु का पानी रोकने के इंतजाम नहीं हैं और कुछ समय बाद यह रोक  वापिस ले ली जाएगी । ऐसी बातों से ये लोग भले ही अपनी भड़ास निकाल ले किन्तु इसे सीधे - सीधे पाकिस्तान का हौसला बढ़ाने वाला कदम माना जाएगा। गत दिवस सर्वदलीय बैठक के दौरान समूचे विपक्ष ने एक स्वर से सरकार द्वारा उठाये जाने वाले किसी भी कदम का समर्थन करने का आश्वासन दिया। लेकिन कतिपय यूट्यूबर और सोशल मीडिया पर लगातार मोदी विरोधी अभियान चलाने वाले वर्ग ने सरकार के फैसलों को असरहीन बताने की मुहिम छेड़ दी। कुछ तो ये कहने से भी बाज नहीं आये कि  सिंधु नदी समझौता पंडित नेहरू द्वारा हस्ताक्षरित था इसलिए मोदी सरकार इससे पीछे हटना चाह रही है। कांग्रेस नेता और पाकिस्तान में राजनयिक रहे मणिशंकर अय्यर ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा इससे पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते और बिगड़ेंगे। ऐसा लगता है मणिशंकर पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हों। कुल मिलाकर बात ये है कि जब पूरे देश को एक स्वर में आतंकवाद और पाकिस्तान के विरुद्ध अपना गुस्सा व्यक्त करना चाहिए तब पूर्वाग्रहों से ग्रसित वर्ग अपना राजनीतिक स्वार्थ साधने और मुस्लिम तुष्टीकरण से बाज नहीं आ रहा। पहलगाम में अपने परिजनों को गंवाने वालों की बात  सुनने के बाद भी धर्म पूछकर हत्याओं  को कपोलकल्पित बताने वालों की  निष्ठा पर संदेह उत्पन्न होना अस्वाभविक नहीं है। भारत सरकार ने जो कदम दो दिन पहले उठाये वे कितने कारगर होंगे और पाकिस्तान उनसे कितना दबाव में आयेगा ये कुछ समय बाद ही स्पष्ट होगा किन्तु इतना तय है कि सिंधु समझौते से पीछे हटने के पहले सरकार ने काफी कुछ सोचा होगा। ऐसे मामलों में  रणनीति का खुलासा सार्वजनिक रूप से करना  मूर्खता होती है । दुनिया के तमाम महत्वपूर्ण देशों से जो समर्थन हमें मिल रहा है उससे पाकिस्तान दबाव में है। ऐसे में  उसके विरुद्ध भारत सरकार द्वारा लिए फैसलों पर सवाल उठाने वाले देश का मनोबल गिराने की गलती कर रहे हैं। सरकार और नरेंद्र मोदी का विरोध कोई अपराध नहीं है किन्तु जब सवाल देश की सुरक्षा और सम्मान का हो तब ऐसी कोई बात नहीं होना चाहिए जिससे हमारी आपसी फूट सामने आये। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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