Friday, 18 April 2025

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में सर्वोच्चता का विवाद सुलझना जरूरी


भारतीय संविधान में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका तीनों के कार्यक्षेत्र  विभाजित हैं। ये अपेक्षा की जाती है कि कोई किसी अन्य के क्षेत्राधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालांकि विधायिका नये  कानून बनाने और पुरानों में संशोधन कर सकती है लेकिन न्यायपालिका को ये अधिकार है कि संसद और विधानसभा  द्वारा लिए गए निर्णयों की समीक्षा करते हुए देखे कि वे  संविधान के अनुरूप हों। संसद को तो संविधान में संशोधन का भी अधिकार है बशर्ते उसके मूल ढांचे से छेड़छाड़ न हो। आजादी के बाद अनेक अवसर आये जब विधायिका और न्यायपालिका में मतभिन्नता दिखी । लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता असंदिग्ध है क्योंकि वह जनता का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन बीते कुछ वर्षों से ये देखने में आया है कि न्यायपालिका का संसद और कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। उनके  महत्वपूर्ण  निर्णयों पर अदालतें जिस तत्परता से सुनवाई शुरू करती हैं वह असामान्य प्रतीत होता है। विधायिका और कार्यपालिका की स्वच्छन्दता पर नियंत्रण करना न्यापालिका का अधिकार भी है और कर्तव्य भी किंतु वह इनके अधिकारों में अतिक्रमण नहीं कर सकती। मौजूदा केन्द्र सरकार के प्रथम कार्यकाल में न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का निर्णय संसद के दोनों सदनों ने निर्विरोध पारित किया था। राज्यसभा में मात्र स्व. राम जेठमलानी ने उसके विरोध में मत दिया। उस आयोग का कार्य  न्यायाधीशों की नियुक्ति करना था जो अभी कालेजियम व्यवस्था के द्वारा न्यायपालिका द्वारा ही चयनित होते हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को रद्द कर दिया। हर बात की समीक्षा के लिए आतुर सर्वोच्च न्यायालय कालेजियम व्यवस्था के विरुद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहता। इधर बीते कुछ दिनों में कुछ ऐसी बातें हुईं जिनके कारण न्यायपालिका की छवि प्रभावित हो रही  है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के निवास अग्निकांड में करोड़ों रु. के नोट जले हुए पाए जाने के बाद  जब उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज होने की याचिका लगी तब सर्वोच्च न्यायालय ने उसे सुनवाई योग्य ही नहीं समझा। इस  पर  उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने खुलकर नाराजगी जताई । इसी तरह  लंबित  विधेयकों पर  तीन महीने में फैसला लेने का निर्देश राज्यपाल के साथ ही राष्ट्रपति को दिये जाने की आलोचना करते हुए उन्होंने  पूछा  कि सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति को कैसे आदेश दे सकता है? इसके अलावा भी सर्वोच्च न्यायालय पर तरह - तरह के आरोप लग रहे हैं। गत दिवस एक अधिवक्ता ने  टीवी चैनल पर कहा कि पूर्व में वक़्फ़ संबंधी तमाम याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने सुनने से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी किंतु संसद द्वारा पारित नये वक़्फ़ कानून के विरुद्ध  सुनवाई के लिए फ़ौरन राजी हो गया! ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें न्यायपालिका अतिशय सक्रियता प्रदर्शित करती है । ऐसे में  उपराष्ट्रपति ने जो मुद्दे उठाये उनका सर्वोच्च न्यायालय को संज्ञान लेना चाहिए। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि शाह बानो को गुजारा भत्ता दिये जाने वाले उसके ऐतिहासिक फैसले को स्व. राजीव गाँधी की सरकार ने संसद में रद्द करवा दिया परंतु  सर्वोच्च न्यायालय ने एक शब्द तक नहीं कहा। संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच सर्वोच्चता की ये लड़ाई किसी अप्रिय स्थिति को जन्म दे उसके पहले ही कोई  समाधान निकालना आवश्यक है। वक़्फ़ कानून के विरुद्ध याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय  द्वारा उठाई जा रहीं आपतियाँ यदि फैसले में बदलीं तब  अधिकार क्षेत्र का विवाद और गहरायेगा। उस स्थिति में सरकार यदि दोबारा कानून पारित करवा ले तब सर्वोच्च न्यायालय क्या करेगा ये सवाल उठ खड़ा होगा। बेहतर है न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका संविधान द्वारा खींची गई मर्यादा की रेखा के भीतर रहें जिससे सभी का सम्मान बना रहे। सर्वोच्च न्यायालय के साथ जुड़ा सर्वोच्च शब्द न्यायपालिका की विभिन्न इकाइयों से उसके  सर्वोच्च होने का  एहसास तो करवाता है किंतु क्या वह संसद और राष्ट्रपति से भी सर्वोच्च है इस प्रश्न का उत्तर मिलना भी जरूरी है। संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ का सबसे बड़ा अपराध स्व. इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाकर किया था। विपक्ष को जेल में डालकर संविधान की प्रस्तावना में ही संशोधन कर दिया गया, लोकसभा का कार्यकाल भी एक साल बढ़ा दिया गया, मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गए और जिस अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा हेतु न्यायपालिका आये दिन अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करती है उसे भी  छीन लिया गया । लेकिन  सर्वोच्च न्यायालय आपातकाल को असंवैधानिक घोषित करने का साहस नहीं जुटा सका। इन्हीं सब वजहों से न्यायपालिका के प्रति जन साधारण के मन में सम्मान निरंतर कम हो रहा है। बेहतर होगा  दूसरों को उनकी सीमाएं बताने वाली न्यायपालिका अपनी सीमाएं भी तय कर ले क्योंकि वर्तमान स्थिति किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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