नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे के विरुद्ध ईडी द्वारा आरोप पत्र दाखिल किये जाने से राजनीति गर्म हो गई है। कांग्रेस ने इसे बदले की भावना से प्रेरित बताते हुए देशव्यापी विरोध का ऐलान कर दिया। ये मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री डाॅ. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 2012 में की गई शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था। उस समय डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार थी। यदि मामला गलत था तब गाँधी परिवार को प्रारंभिक स्तर पर ही अदालती कारवाई के जरिये उसे खत्म करवा देना चाहिए था। लेकिन वह इस खुशफहमी में रहा कि आगे भी सरकार कांग्रेस ही बनायेगी परंतु हुआ उल्टा और भाजपा सत्ता में आ गई। जाँच आगे बढ़ी तो गाँधी परिवार ने उसे रुकवाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने भी उससे इंकार कर दिया। यद्यपि सोनिया जी और राहुल को जमानत जरूर मिल गई। ये मामला काफी स्पष्ट है। नेशनल हेराल्ड की देश भर में फैली अरबों की संपत्ति नाम मात्र के भुगतान पर यंग इंडिया लिमिटेड के पास आ गई जिसमें श्रीमती गाँधी और राहुल की 76 फीसदी हिस्सेदारी थी। आरोप ये है कि एसोसिएटेड जर्नल लि. नामक जो कंपनी नेशनल हेराल्ड की मालिक थी उसके 1057 अंशधारकों को सूचित किये बिना ही उक्त सौदा हो गया। पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने भी उक्त सौदे पर ऐतराज व्यक्त करते हुए कहा कि उनके परिवार के पास भी नेशनल हेराल्ड के शेयर थे किंतु कंपनी का सौदा करते समय अंशधारकों की सहमति नहीं ली गई। उक्त दोनों महानुभाव उच्च कोटि के विधि विशेषज्ञ हैं और उन्हें भाजपा समर्थक भी नहीं कहा जा सकता। गाँधी परिवार के पास दिग्गज अधिवक्ताओं की फौज है किंतु अभी तक अदालतों ने डाॅ. स्वामी की शिकायत को रद्द करने लायक नहीं समझा और सोनिया जी और राहुल को जमानत लेनी पड़ी तब ये कहना गलत नहीं होगा कि न्यायपालिका ने भी उसको संज्ञान योग्य माना। जहाँ तक बदले की भावना से कार्रवाई की बात है तो उल्टे डाॅ. स्वामी केन्द्र सरकार पर गाँधी परिवार के प्रति नर्म बने रहने का आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि बीते 10 वर्षों में इस प्रकरण में लंबी पूछताछ और जांच आदि चली। हाल ही में कुछ संपत्ति का ईडी द्वारा अधिगृहण भी किया गया। यदि दुर्भावना होती तब जो आरोप पत्र अभी दाखिल हुआ वह पहले भी हो सकता था। सही बात ये है कि कानूनी मामले में अदालत की बजाय राजनीतिक मंच का सहारा लेना आपके पक्ष की कमजोरी का संकेत देता है। स्मरणीय है ईडी दफ्तर में गाँधी परिवार के सदस्य से पूछताछ के दौरान कांग्रेस जन बाहर धरना दिये बैठे रहते थे। नेशनल हेराल्ड का प्रकरण अदालत के पास है जो सही - गलत का फैसला करेगी किंतु गाँधी परिवार सहित राजनीतिक जगत में उच्च पदों पर विराजमान हस्तियों को ये बात स्वीकार करनी ही होगी कि कानून के सामने उनकी हैसियत देश के साधारण नागरिक से ज्यादा नहीं है। इस मामले में रोचक तथ्य ये भी है कि एक समय में डॉ. स्वामी स्व. राजीव गांधी के नजदीकी दोस्तों में भी शामिल थे। बोफोर्स कांड के दौरान वे सदन में ये सार्वजनिक तौर पर ये कह चुके थे कि राजीव ने कोई पैसा नहीं लिया है। आज श्रीमती गांधी को मुश्किल में डालने वाले डॉ.स्वामी ने 1999 में वाजपेयी सरकार को गिराने की कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने सोनिया और जयललिता की अशोक होटल में मुलाकात भी कराई। हालांकि ये कोशिश नाकाम हो गई। ईडी ने जो आरोप पत्र कल प्रस्तुत किया उसे बदले से प्रेरित बताने वाली कांग्रेस को ये पता होना चाहिए कि भाजपा में होते हुए भी डाॅ. स्वामी समय - समय पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना करने में भी संकोच नहीं करते। इसलिए नेशनल हेराल्ड मामले में बजाय केन्द्र सरकार के विरुद्ध हल्ला मचाने के कांग्रेस को शिकायतकर्ता डाॅ. स्वामी के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए थी जिन्होंने सोनिया जी और राहुल के विरुद्ध अनेक शिकायतें दर्ज कर रखी हैं। अच्छा हो गाँधी परिवार और उसके निकटस्थ श्री पित्रौदा और श्री दुबे ईडी के आरोप पत्र पर अपना कानूनी बचाव करें क्योंकि अदालत को कानून की भाषा समझ में आती है नेतागिरी की नहीं। हालांकि ऐसे मामलों में विरोधाभास भी खुलकर सामने आते रहे हैं। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जिस शराब घोटाले में जेल में रहे वह कांग्रेस की शिकायत पर ही दर्ज हुआ था । जब ईडी ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी की तब कांग्रेस के नेताओं ने खुशियाँ मनाईं। अब उसी ईडी ने सोनिया जी और राहुल के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया तो उसे खलनायक साबित किया जा रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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