शुरू - शुरू में लगा था कि नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए लोगों का सड़कों पर उतरना महज बुलबुला है जो जल्द फूट जायेगा । लेकिन इसका जो कारण समझ में आया वह है राजनीतिक अस्थिरता क्योंकि बीते लगभग दो दशक के माओवादी शासन के दौरान 10 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। 2006 में 10 साल तक चले गृहयुद्ध के बाद वहाँ माओवादी सत्ता में आये और राजशाही खत्म कर एकमात्र हिन्दू राष्ट्र को धर्म निरपेक्ष बना दिया गया। 2001 में राजघराने में हुए हत्याकांड में महाराजा वीरेंद्र के पूरे परिवार के सफ़ाये के बाद उनके अनुज ज्ञानेंद्र की ताजपोशी तो हो गई लेकिन रहस्य आज तक नहीं सुलझा। हालांकि माओवादी आंदोलन उसके पूर्व से चला आ रहा था किंतु महाराजा वीरेंद्र के खात्मे के बाद राज परिवार के प्रति नेपाल की जनता में जो श्रद्धा थी उसमें कमी आती गई जिसका लाभ माओवादियों ने उठाया। खास तौर पर युवा पीढ़ी में साम्यवाद के प्रति आकर्षण बढ़ा। भारत के साम्यवादियों और समाजवादी नेताओं द्वारा भी नेपाल के माओवादियों को हर तरह से संरक्षण और सहायता प्रदान की गई। प्रचंड जैसे नेता ने तो भारत में निर्वासित जीवन भी बिताया। माओवादी नेताओं के बीच मतभेद बढ़े तब भारत से सीताराम येचुरी जैसे वामपंथी नेता बीच - बचाव हेतु वहाँ गये। ये बात बिल्कुल सही है कि हिन्दू राष्ट्र होने के बाद भी नेपाल का राजवंश यदि चीन की तरफ झुका तो उसका कारण भारत की तत्कालीन सरकारों का उसके प्रति विरोध था। नेहरू जी को तो हिन्दू शब्द से ही चिढ़ थी। यदि आजादी के बाद से ही नेपाल के मन में विश्वास कायम किया जाता तो जैसा संबंध दोनों देशों की जनता के बीच है वैसा ही सरकारों के बीच होता। जनता पार्टी की सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नेपाल की यात्रा को तीर्थ यात्रा कहकर रिश्तों में अविश्वास दूर करने का प्रयास किया किंतु वह सरकार जल्द चली गई। 2014 में नरेंद्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री बनते ही उस सिलसिले को दोबारा शुरू किया किंतु वहाँ के माओवादी शासकों ने उसमें व्यवधान उत्पन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चीन की शह पर सीमा विवाद भी हुआ और जवाब में भारत ने भी नाकेबंदी करते हुए दबाव बना दिया। उसके बाद दोनों तरफ से स्थिति सामान्य बनी रही किंतु राजनीतिक अस्थिरता के परिणामस्वरूप इस पहाड़ी देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। सबसे बड़ी बात जनता को जो नागवार गुजरी वह है भ्रष्टाचार। राजशाही के जमाने में माओवादियों ने जनता के मन में ये बात गहराई तक बिठा दी कि राजघराना उनका शोषण करता है। इसीलिये उसके पास तो बेशुमार धन - संपत्ति है जबकि नेपाल दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल था। बची - खुची कसर पूरी कर दी राजपरिवार में हुए हत्याकांड ने। इसमें कोई दो मत नहीं है कि ज्ञानेंद्र में अपने अग्रज स्वर्गीय वीरेंद्र जैसी गंभीरता नहीं है। उनका बेटा भी बेहद गैर जिम्मेदार है। लेकिन फिर भी यदि नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए स्वस्फूर्त जनांदोलन शुरू हुआ तो उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि बात राजशाही की वापसी से अधिक हिन्दू राष्ट्र की बहाली की होने लगी है। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर नेपाल में प्रदर्शित होना साधारण बात नहीं कही जा सकती। वहाँ के लोग खुलकर कह रहे हैं कि योगी - मोदी चाहें तो नेपाल फिर से हिन्दू राष्ट्र बन सकता है। नेपाल में हिन्दू राष्ट्र के लिए राजशाही की वापसी की मांग कर रहे लोगों का साफ कहना है कि उसमें तो एक ही व्यक्ति ( राजा) लूटता था किंतु माओवादी सरकारों में तो दर्जनों लुटेरे आ गए। हालांकि माओवादी आसानी से सत्ता छोड़ देंगे ये नहीं लगता क्योंकि उनकी पीठ पर चीन का हाथ है । ऐसे में नेपाली सेना की भूमिका पर सबकी नजर है क्योंकि यदि वह राजशाही के पक्ष में झुक गई तब जरूर ज्ञानेंद्र का पलड़ा भारी हो जाएगा। भारत के लिए नेपाल के वर्तमान हालात चिंता बढ़ाने वाले हैं क्योंकि दोबारा यह देश गृहयुद्ध में फंसा तब वहाँ से शरणार्थियों के आने की आशंका बढ़ जाएगी। और दूसरा चीन यदि माओवादी सत्ता के बचाव में आ गया तब हमारे लिए दोहरा संकट उत्पन्न हो जाएगा। ऐसे में आवश्यक है हिन्दू राष्ट्र के लिए आंदोलन करने वालों की मदद की जाए। नेपाल में बड़ी संख्या में हिन्दू संगठन हैं जो माओवादी सत्ता के विरुद्ध लामबंद हुए हैं। केन्द्र सरकार को चाहिये वह नेपाल की स्थिति पर पैनी नजर रखे क्योंकि वह भले ही अलग देश हो लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से वह हमारे सबसे करीब है। आज भी हमारी सेना में नेपाली भर्ती किये जाते हैं वहीं भारत में लाखों नेपाली परिवार पीढ़ियों से कार्यरत हैं। ऐसे में हम वहाँ होने वाली किसी भी राजनीतिक हलचल को नजरंदाज नहीं कर सकते।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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