पहलगाम हत्याकांड के बाद कश्मीर घाटी में मौजूद पर्यटकों ने अपना कार्यक्रम बीच में ही रद्द कर सुरक्षित घर लौटने के लिए जब हवाई जहाज की टिकिट खरीदनी चाही तब उनसे चार - पाँच गुना किराया वसूला गया। उल्लेखनीय है नागर विमानन मंत्रालय ने हवाई कंपनियों को हिदायत दे रखी थी कि वे ऐसी स्थिति में यात्रियों की मजबूरी का लाभ उठाते हुए उनका शोषण न करें। लेकिन कुछ हवाई कंपनियां ऐसे अवसर पर भी मुनाफाखोरी करने की नीचता दिखाने से बाज नहीं आईं। जब समाचार माध्यमों एवं सोशल मीडिया पर उनकी लूटपाट का पर्दाफ़ाश हुआ तब जाकर वे मानवता दिखाने लगीं और किराये सामान्य कर दिये। लेकिन इसके लिए केंद्रीय नागर विमानन मंत्री राम मोहन नायडू को खुलकर सामने आना पड़ा। ताजा खबर ये है कि किराये सामान्य कर दिये गए हैं। इसके अलावा 30 अप्रैल तक टिकिट रद्द करवाने और यात्रा की तिथि बदलवाने जैसे कार्य भी निःशुल्क करने की सुविधा दी गई है। कतिपय हवाई कंपनियों द्वारा उक्त दर्दनाक हादसे के बाद यात्रियों से जबरन बढ़ा हुआ किराया वसूलने का जो घिनौना कार्य किया गया उसकी पूरे देश में रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई। हवाई कंपनियां वैसे भी उड़ान की तारीख निकट आते - आते टिकिट के दाम बढ़ाकर यात्रियों का शोषण करती आई हैं। सरकार और अदालतों द्वारा कई बार आपत्ति व्यक्त किये जाने के बाद भी वे ऐसा करने से बाज नहीं आ रहीं। इसे टिकिटों की कालाबाजारी कहना भी गलत नहीं होगा। किसी शहर से उड़ान शुरू होने के कुछ समय बाद हवाई कंपनी बिना कारण बताये सेवा बंद करने की घोषणा कर देती है। बाद में पता चलता है उसने वह उड़ान किसी अन्य मार्ग पर शुरू कर दी क्योंकि वहाँ अधिक कमाई की गुंजाइश है। चूंकि विमानन क्षेत्र में निजी कंपनियों का वर्चस्व है इसलिये उनसे घाटे में सेवा के संचालन की उम्मीद करना तो गलत है किन्तु किराये को लेकर अनिश्चितता एक हद के बाद स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। रेलवे की तर्ज पर तत्काल टिकिट के लिए अतिरिक्त शुल्क जैसी व्यवस्था हवाई टिकिट में भी रहे तो वह सहन की जा सकेगी किन्तु सामान्य से चार - पाँच गुना किराया वसूलना अमानवीय भी है और अनुचित भी। ये देखते हुए सरकार को चाहिए वह हवाई टिकिटों की खुलेआम कालाबाजारी को रोके । इसके लिए यदि कड़े नियम बनाने की आवश्यकता पड़े तो उसमें भी संकोच नहीं करना चाहिए। कश्मीर घाटी में अचानक बदली परिस्थितियों के बीच हवाई कंपनियों द्वारा जिस तरह से यात्रियों की जेब काटने दुस्साहस किया गया वह संकट के समय हमारे देश के चरित्र का एहसास करवाता है। होना तो ये चाहिए था कि बिना सरकार के दखल का इंतजार किये ही मुसीबत में फंसे यात्रियों को टिकिटों में रियायत देकर हवाई कंपनियां इंसानियत का परिचय देतीं। उनके ऐसा करने से अन्य सेवाओं को भी प्रेरणा मिलती। हालांकि जो खबरें आ रही हैं उनसे ये जानकर संतोष होता है कि घाटी में पर्यटन सेवाएं उपलब्ध करवाने वाले तमाम कारोबारी यात्रियों को बुकिंग रद्द करवाने पर पूरा पैसा लौटा रहे हैं। धर्मस्थलों में लोगों को ठहराने की व्यवस्थाएं भी निःशुल्क की गई। लेकिन कुछ हवाई कंपनियां जिस तरह आपदा में अवसर को गलत तरीके से भुनाने में जुटीं वह बेहद निम्नस्तरीय सोच का परिचायक था। भले ही चौतरफा थू - थू होने के बाद उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए हों किन्तु जिन हवाई कंपनियों ने दहशत में डूबे यात्रियों को लूटने मैं शर्म नहीं की उन्हें अधिक राशि लौटाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। यही नहीं तो उनको इस कालाबाजारी के लिए दंडित भी किया जाना जरूरी है जिससे दोबारा कोई ऐसा करने की हिम्मत न दिखा सके। ये कहना गलत नहीं होगा कि हमारे देश में उपभोक्ता के अधिकारों का संरक्षण करने की चिंता किसी को नहीं है। निजी क्षेत्र को छोड़ दें तो सरकारी क्षेत्र में भी सेवा शुल्क के रूप में अनाप - शनाप वसूली जारी है। बेहतर है इस बारे में सार्थक प्रयास हों। पहलगाम घटना के बाद हवाई कंपनियों ने जो शर्मनाक व्यवहार किया उसकी पुनरावृत्ति न हो इसका पुख्ता प्रबंध होना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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