राज्यसभा से वक़्फ़ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद अब राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही इसे कानून का दर्जा मिल जायेगा। इस विधेयक के विरोध में सड़कों पर उतरने की बात हो रही थीं। देश टूटने जैसी डींगें भी हाँकी गईं। लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच से ही विधेयक के पक्ष में भी आवाजें उठीं। अनेक मौलवियों ने वक़्फ़ के नाम पर हुए घोटालों का खुलासा करते हुए आरोप लगाया कि इससे जरूरतमंद मुसलमानों को कोई सहायता नहीं मिली। 2006 की सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुसलमानों की हालत हिन्दू दलितों से भी बदतर बताई गई थी । उसी के बाद 2013 में तत्कालीन डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने पुराने कानून में बदलाव करते हुए वक़्फ़ बोर्ड को बेहद ताकतवर बना दिया जिससे मुस्लिम समाज की स्थिति में सुधार हो सके। लेकिन बात जस की तस रही। निजी बातचीत में ज्यादातर मुसलमान मानते हैं कि आम मुसलमान को शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार उपलब्ध करवाने में वक़्फ़ बोर्ड पूरी तरह विफल रहे हैं। रेलवे और सेना के बाद वक़्फ़ बोर्ड देश का सबसे बड़ा भूस्वामी है जिसके पास लाखों एकड़ भूमि का स्वामित्व है। इतनी जमीन होने के बावजूद वक़्फ़ की कुल सालाना आय मात्र 200 करोड़ बताई जाती है जो सवाल खड़े करती है। सच्चर कमेटी ने कहा था कि इतनी भूमि का सही उपयोग होने पर उक्त रकम 12 हजार करोड़ सालाना हो सकती है। कमेटी ने वक़्फ़ प्रबंधन में सुधार के लिए अनेक सुझाव दिये किंतु मनमोहन सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जो संशोधन किया उसमें बजाय जिम्मेदार बनाने के वक़्फ़ को स्वच्छंद बना दिया। जिसके बल पर बीते 12 वर्ष में उसने अंधाधुंध कब्जे करते हुए सरकारी और गैर सरकारी जमीनें हथिया लीं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इस दौरान उसकी कार्य शैली ने भूमाफिया का रूप ले लिया। संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित संशोधन विधेयक में वक़्फ़ प्रबंधन को कानून और मुस्लिम समुदाय के प्रति जवाबदेह बनाने की व्यवस्था की गई है जिसका विरोध समझ से परे है । इतनी बड़ी जमीन जिस समुदाय के पास हो उसके द्वारा गरीबी और बेरोजगारी का रोना रोते हुए भेदभाव का आरोप लगाए जाने का कोई औचित्य नहीं है। और यदि वक़्फ़ बोर्ड में सब कुछ पाक - साफ है तब उसमें सरकारी प्रतिनिधि या गैर मुस्लिम के होने पर छाती पीटने की क्या जरूरत है? रही बात नये संशोधन के पीछे राजनीतिक मंतव्य की तो भले ही भाजपा हिंदुवादी है किंतु जो विपक्षी दल विधेयक के विरोध में आसमान सिर पर उठाये घूमते तरह उनकी रुचि भी मात्र मुस्लिम समाज के मतों में है न कि आम मुसलमान की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति सुधारने में। यदि वे उनके शुभचिंतक होते तो बजाय विधेयक का विरोध करने के वक़्फ़ बोर्डों में कुंडली मारकर बैठे मुस्लिमों से पूछते कि 2013 में अनाप - शनाप अधिकार मिलने के बाद सच्चर कमेटी द्वारा सुझाए गए कदम उठाकर मुसलमानों की बदहाली दूर करने के लिए क्या कदम उठाये गए? लेकिन बजाय इसके देश भर में प्रचार किया गया कि वक़्फ़ संशोधन मुसलमानों की मस्जिदें और कब्रिस्तान छीन लेगा। असलियत ये है कि वक़्फ़ के नाम पर किये गए कब्जे छिन जाने के डर से ये सब दुष्प्रचार किया गया। 2013 में हुए संशोधन के बाद देश भर में वक़्फ़ द्वारा निजी और सरकारी जमीनों पर जिस तरह अपना दावा करना शुरू किया उससे केवल हिन्दू ही नहीं अपितु ईसाई समुदाय भी भयाक्रांत है। केरल के चर्चों ने तो खुलकर वक़्फ़ के विरुद्ध आवाज उठाई। ये देखते हुए विपक्ष को चाहिए था कि विधेयक के विरोध की रस्म अदायगी करने के बजाय वक़्फ़ बोर्डों का संचालन कर रहे लोगों को समझाते कि वे वक़्फ़ की अकूत संपत्ति का उपयोग मुस्लिम समुदाय की भलाई के लिए करें जो वक़्फ़ का मूल उद्देश्य है। संसद के दोनों सदनों में जिस आसानी से उक्त विधेयक पारित हुआ उसे केन्द्र सरकार की बड़ी राजनीतिक सफलता कहा जाएगा। चन्द्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की पार्टियों द्वारा मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी की चिंता किये बिना विधेयक का खुलकर समर्थन करना अन्य विपक्षी दलों के लिए संकेत है कि वोट बैंक की घिसी- पिटी राजनीति से बाहर निकलकर देश के हित में सोचें। उक्त विधेयक का बेवजह विरोध करने वाले मुसलमानों के लिए भी सोचने का मुद्दा ये होना चाहिए कि वे अपने बच्चों का भविष्य संवारना चाहते हैं या फिर मौजूदा बदहाली में ही रहना उन्हें पसंद है? विधेयक तो पारित हो गया और कानून भी बनेगा। ऐसे में अब मुस्लिम समाज के समझदार तबके को चाहिए कि वह अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए समय के साथ चलने की बुद्धिमत्ता दिखाए। वक़्फ़ बोर्ड में बैठे लोगों पर मुस्लिम समाज के भीतर से ही ये दबाव बनना चाहिए कि उसके पास जो अपार संपत्ति है उसका लाभ कुछ लोगों तक सीमित न रहकर आम मुसलमान तक पहुंचे। मुसलमानों को ये बात भी ध्यान रखना होगी कि अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति यदि वक़्फ़ से वापिस ली जायेगी तो इससे न तो उन्हें कोई क्षति पहुंचेगी और न ही उनके धर्म को। वैसे भी उस संपत्ति से उन्हें कोई लाभ तो मिलता ही नहीं था।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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