कश्मीर घाटी में सबसे ज्यादा पर्यटक पहलगाम जाते हैं। इसे अमरनाथ यात्रा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। गत दिवस इसके पास चार सशस्त्र आतंकवादियों ने 26 सैलानियों को भून दिया। मृतकों में सभी पुरुष थे। प्रत्यक्षदर्शियों की जुबानी पुलिस की वर्दी में आये आतंकवादियों ने पर्यटकों को कलमा पढ़ने कहा और जो नहीं पढ़ सके उन्हें गोली मार दी। मारने से पहले लोगों से उनका धर्म भी पूछा। जहाँ उक्त घटना हुई वह वृक्षों से घिरा एकांत स्थल है। आतंकवादियों ने इसीलिए इस स्थान को चुना क्योंकि वहाँ से भाग निकलना आसान था और फिर वहाँ पुलिस अथवा अन्य सुरक्षा बल नहीं थे। पहलगाम में आतंकी घटनाएं पहले भी होती रही हैं। अमरनाथ यात्रा के शिविर पर भी एक बार हमला हुआ था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में आतंकवादी घटनाओं में कमी आने के कारण पहलगाम पर्यटकों के लिए काफी सुरक्षित समझा जाने लगा था। पर्यटकों की संख्या पिछले सभी रिकार्ड तोड़ रही थी। आगामी अमरनाथ यात्रा के प्रति भी उत्साह नजर आ रहा था। सीमा के नजदीकी इलाकों में तो सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ होती रहती है किन्तु पहलगाम में ऐसा हो जाना कई सवाल खड़े करता है। कश्मीर घाटी की भौगोलिक रचना ऐसी है कि सीमा पार से घुसपैठ को पूरी तरह खत्म कर पाना कठिन है। इसका कारण स्थानीय लोगों में घुसे पाकिस्तान समर्थक हैं। धारा 370 समाप्त होने के बाद लंबे समय तक वहाँ केंद्र का शासन रहा किन्तु गत वर्ष विधानसभा चुनाव संपन्न हुए और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार भी बन गई जिसके केन्द्र से कुछ नीतिगत मुद्दों को छोड़कर रिश्ते सामान्य बने हुए हैं। हालांकि घुसपैठ और छोटी - छोटी आतंकवादी घटनाएं होती रही हैं किन्तु ये जो वारदात हुई वह अप्रत्यक्ष तौर पर शत्रु देश का हमला है। जो जानकारी अब तक आई उसके मुताबिक तीन पाकिस्तानी और एक स्थानीय नागरिक ने मिलकर उक्त हत्याकांड किया। हमले का समय अनेक दृष्टियों से गौर तलब है। एक दिन पहले अमेरिका के उपराष्ट्रपति भारत आये और उनसे भेंट के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब रवाना हो गए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी अमेरिका प्रवास पर हैं। विश्व की अर्थव्यवस्था अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के कारण डगमगा चुकी थी किन्तु प्रारंभिक झटकों के बाद भारत के पैर मजबूती से टिकने लगे। विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों में अपना विश्वास जताया है। दूसरी तरफ पाकिस्तान के भीतरी हालात बेहद नाजुक हैं। इधर बांग्ला देश के नये हुक्मरान भी पाकिस्तान के नक्शे कदम पर चलते हुए चीन के पिछलग्गू बनकर हमारे दुश्मन बन बैठे हैं। उनकी हरकत का जवाब देने के लिए भारत ने उनके माल की आवाजाही के लिए अपनी धरती का उपयोग बंद कर दिया। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष ने भी गत सप्ताह बेहद भड़काऊ बयान दिया। सबसे बड़ी बात देश के भीतर वक़्फ़ कानून को लेकर मुस्लिम समाज का विरोध और सेकुलर जमात का उसके साथ खड़े होना है। सर्वोच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। आतंकवादियों ने हत्या करने के बाद महिलाओं से प्रधानमंत्री श्री मोदी के बारे में जो कहा उसका असली उद्देश्य भारत के मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध आक्रामक होने के लिए भड़काना था। यदि वे सीधे - सीधे हत्याएं कर भाग जाते तब बात अलग होती किन्तु पहले धर्म पूछना और कलमा पढ़ने बाध्य करने जैसी बातों से स्पष्ट हो गया कि उक्त घटना का संबंध देश की वर्तमान स्थितियों से है जो वक़्फ़ कानून पारित होने के बाद उत्पन्न हुईं। प. बंगाल के मुर्शिदाबाद के बाद पहलगाम की घटना के तार भले ही एक दूसरे से सीधे न जुड़े हों किन्तु दोनों के मकसद और उसके पीछे की मानसिकता इस्लामिक कट्टरवाद से प्रेरित और प्रोत्साहित है। लेकिन दुख और चिंता का विषय ये है कि इतने गंभीर मुद्दे पर भी एक वर्ग सरकार और सुरक्षा बलों को घेरने में लगा है। आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर की गई हत्याओं में राजनीति देखने के अलावा ये कहने में भी शर्म नहीं की जा रही कि ये सब आगामी चुनावों में लाभ लेने के लिए प्रायोजित किया गया है। ये बातें सीधे - सीधे तौर पर हमारी आंतरिक फूट को उजागर करती हैं जिसकी ताजा बानगी अमेरिका प्रवास में श्री गाँधी द्वारा की जा रही टिप्पणियां हैं। घटना के तत्काल बाद गृह मंत्री अमित शाह का श्रीनगर पहुंचना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सऊदी अरब का दौरा बीच में छोड़कर नई दिल्ली लौटने से ही लग जाता है कि सरकार कितनी गंभीर है। सुरक्षा बलों के लिए भी ये घटना बड़ी चुनौती है। इसका जवाब सैन्य मोर्चे पर दिया जाएगा या कूटनीतिक तरीके से ये फिलहाल कहना कठिन है किन्तु जिस तरह अमेरिका और रूस ने भारत का साथ देने की बात कही उससे अंदाज लगाया जा सकता है कि क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होगी। ऐसे क्षणों में पूरे देश को सरकार और सेना पर विश्वास रखना चाहिए क्योंकि शत्रु का मनोबल तोड़ने के लिए एकजुटता जरूरी है। चूंकि उक्त हमले में इटली और इसरायल के नागरिक की भी हत्या हुई है इसलिए इसके दूरगामी परिणाम की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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