म.प्र के दमोह जिला मुख्यालय के मिशन अस्पताल में फर्जी हृदय रोग विशेषज्ञ द्वारा जिन 15 मरीजों की शल्य चिकित्सा की गई उनमें से 7 की मृत्यु हो गई। शिकायत जिला प्रशासन तक पहुंची जिसने उसे गंभीरता से नहीं लिया। 2 जनवरी से 20 फरवरी तक नरेंद्र यादव , डॉ. एनजोन केम बनकर इलाज करता रहा। इस दौरान हुईं मौतों के बाद यदि जिला प्रशासन समय रहते जाग जाता तो मिशन अस्पताल की धोखाधड़ी और फर्जी चिकित्सक का पर्दाफाश हो जाता। उल्लेखनीय है बुंदेलखंड के दमोह जिले में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां काफी पुरानी हैं। यहाँ मिशन संचालित शिक्षण संस्थान , चर्च और अस्पताल के जरिये ईसाइयत का प्रचार - प्रसार होता रहा। शिक्षा और चिकित्सा के अलावा चर्च के संरक्षण में सेवा प्रकल्पों के माध्यम से वंचित वर्ग को ईसाई बनाने का अभियान आजादी के बाद से बेधड़क चलता आया है। चूंकि इनके विद्यालयों में ज्यादातर नेताओं और नौकरशाहों की संतानें पढ़ती हैं इसलिए इनको राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त होता रहा। ये बात भी सही है कि दमोह जैसे अनेक पिछड़े क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाये जाने वाले अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाएँ सरकारी चिकित्सालयों से बेहतर होती हैं। इसलिए भी इनकी धर्म प्रचार सम्बन्धी गतिविधियों पर ध्यान नहीं जाता। जबलपुर के पड़ोस में स्थित आदिवासी बहुल मंडला जिले का कटरा मिशन अस्पताल इसका उदाहरण है। चूंकि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित चिकित्सालयों तथा शिक्षण संस्थानों को विदेशी सहायता भी मिलती है इसलिए वे सरकारी संस्थानों से गुणवत्ता में बेहतर होते हैं। दमोह का मिशन अस्पताल इसका उदाहरण है। लेकिन उनका सेवाभाव लोगों को ईसाई बनाने पर केंद्रित है लिहाजा उनकी कार्यशैली गोपनीय रहती है। दमोह में जिस फर्जी चिकित्सक से लोगों की हृदय रोग संबंधी चिकित्सा करवाई गई उसकी डिग्री की जांच न किये जाने के लिए अस्पताल का प्रबंधन अपराधिक उदासीनता का दोषी है। 7 लोगों की मौत होने के बाद हल्ला मचा और राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा फैली तब जिला प्रशासन हरकत में आया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की दो सदस्यीय जाँच टीम आज दमोह आकर मामले की तह में जायेगी। ये देखते हुए गत दिवस मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाई। आरोपी चिकित्सक फरार है। अब जानकारी आ रही है कि वह तेलंगाना में भी इसी तरह का अपराध कर चुका है । ऐसे में सवाल उठता है कि एक बाहरी चिकित्सक की शैक्षणिक योग्यता और अनिवार्य पेशेवर औपचारिकताओं के पूर्ण हुए बिना मिशन अस्पताल के संचालकों ने उसे किस आधार पर सेवा में रखा? सफाई में कहा जा रहा है कि किसी एजेंसी के माध्यम से 1 जनवरी को उक्त चिकित्सक को नियुक्त किया गया। इसलिए उसकी डिग्री की जांच करने की जरूरत नहीं समझी गई। जब 7 मरीजों की मौत से अस्पताल कटघरे में खड़ा हुआ तब फरवरी में वह बिना बताये भाग गया। उसके बारे में ये प्रचारित किया गया कि वह लंदन से आया है। लेकिन सबसे गंभीर बात है कि नरेंद्र यादव द्वारा हृदय रोग विशेषज्ञ बनकर 15 एंजियोप्लास्टी की गईं जिनमें से 7 की मौत होने पर मामला मुख्य चिकित्सा अधिकारी के संज्ञान में लाया गया जिन्होंने उसे गंभीरता से नहीं लिया तब मानवाधिकार आयोग तक शिकायत पहुंचाई गई । उसके सक्रिय होने के बाद प्रशासन में खलबली मची वरना मिशनरी के प्रभाव और दबाव में प्रकरण को रफा - दफा कर दिया जाता। इस अस्पताल के संचालक अजय लाल पहले भी विवादों में फंस चुके हैं। उनके द्वारा संचालित अनाथालय भी धर्मांतरण के आरोपों के बाद बंद हो चुका है। कुल मिलाकर मामला ईसाई मिशनरियों की गोपनीय कार्यशैली के कारण और उलझता जा रहा है जिसमें जिला प्रशासन और मुख्य चिकित्सा अधिकारी की लापरवाही की भी जाँच होनी चाहिए। आरोपी चिकित्सक के अचानक फरार हो जाने से संदेह और बढ़ता जा रहा है। मानव अधिकार आयोग को इस मामले में गहराई तक जाकर जांच करना चाहिए । चौंकाने वाली बात ये है कि प्रदेश में लंबे समय से भाजपा का शासन होने के बावजूद ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों पर अपेक्षित नियंत्रण नहीं हो पा रहा। उनके द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों की मनमानी यथावत जारी है। ब्रिटिश सत्ता द्वारा ईसाई संस्थाओं को दी गईं बेशकीमती जमीनों की बंदरबांट भी सामने आने लगी है। जबलपुर में एक बिशप के विरुद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज होने के बाद मिशनरियों में चल रहे अवैध कारोबार उजागर हुए हैं। लेकिन इस बारे में ये बात ध्यान देने योग्य है कि समाज का प्रभावशाली वर्ग , राजनेता और अफसरशाही ईसाई मिशनरियों के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पा रहे जिसके कारण सर्वविदित हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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