आजादी के बाद भाषावार प्रांतों की रचना के रूप में की गई भूल देश को कितनी महंगी पड़ी ये बताने की जरूरत नहीं है। इसकी वजह से भाषा को राज्यों की पहिचान के रूप में देखा जाने लगा। शुरुआत में ही विवाद शुरू हो गए। कुछ सीमावर्ती इलाकों पर एक एक से अधिक राज्यों के दावे आज तक उलझे पड़े हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बेलगाम का विवाद 78 वर्ष बाद भी नहीं सुलझ सका जबकि इसके लिए न जाने कितनी बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं जिनमें सार्वजनिक संपत्ति तो नष्ट हुई ही , अनेक लोगों की अमूल्य ज़िंदगी तक चली गई। भाषा विवाद को लेकर तमिलनाडु हमेशा केन्द्र से भिड़ने के लिए तैयार रहता है। नई शिक्षा नीति के अनुसार प्राथमिक शिक्षा के दौरान तीन भाषाओं को पढ़ाया जाना जरूरी है जिसमें दो भारतीय होना अनिवार्य हैं । उनमें से एक हिन्दी हो ऐसी केन्द्र की मंशा है किंतु अनिवार्य नहीं । नई नीति के अनुसार पांचवी कक्षा अर्थात प्राथमिक तक राज्य की मातृभाषा में पढ़ाई जरूरी है ताकि अंग्रेजी माध्यम का वर्चस्व कम किया जा सके । साथ ही विद्यार्थी दो अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी को भी वैकल्पिक के रूप में चुन सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन चूंकि हिन्दी के नाम से ही चिढ़ते हैं इसलिए वे केन्द्र के साथ भाषा युद्ध की धमकी देने पर आमादा हैं। हालांकि इसके पीछे बड़ा कारण आगामी वर्ष होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव हैं। जहाँ तक बात तमिलनाडु की है तो वहाँ की राजनीति हिन्दी और उत्तर भारत के विरोध पर ही चलती है। लेकिन महाराष्ट्र सरीखे राज्य में जिस प्रकार प्राथमिक शिक्षा में भारतीय भाषा के तौर पर हिन्दी की अनिवार्यता का विरोध किया जा रहा है वह चौंकाने वाला है। भले ही महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टियां मराठी के वर्चस्व को लेकर सदैव आवाज उठाती रहीं किंतु देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली मराठी और हिन्दी दोनों सगी न सही किंतु चचेरी बहनें जैसी तो हैं ही। दक्षिणी राज्यों में हिन्दी नहीं जानने वाले बहुत लोग होंगे किंतु महाराष्ट्र में हिन्दी न जानने वाले ढूढ़ने पर भी मुश्किल से मिलेंगे। ऐसे में हिन्दी पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी के बहाने उसके विरोध की राजनीति क्षेत्रीय भावनाएं भड़काने का प्रयास ही लगता है। जो लोग महाराष्ट्र में मराठी के वर्चस्व के लिए मरने - मारने पर आमादा हो जाते हैं वे भूल जाते हैं कि मुंबई के फिल्म उद्योग में बनने वाली सबसे ज्यादा फिल्में हिन्दी की ही होती हैं। विश्वविख्यात पार्श्व गायिका भारत रत्न लता मंगेशकर की लोकप्रियता हिन्दी में गाये उनके गीतों से ही थी। उनकी बहिन आशा भोंसले, किशोरकुमार मन्ना डे, कुमार शानू , श्रेया घोषाल और अलका याग्निक सहित अनेक गायक और संगीतकार गैर हिन्दी भाषी रहे किन्तु वे भी हिन्दी के जरिये ही पहिचान बना सके। चेन्नई में राजश्री , प्रसाद , एवीएम जैसे बड़े फिल्म निर्माताओं ने सफलतम हिन्दी फिल्में बनाकर खूब पैसे कमाए। अब तो दक्षिण भारत की भाषाओं में बनने वाली बड़े बजट की फिल्मों को हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में डब करना आम होता जा रहा है। क्या तमिलनाडु की हिन्दी विरोधी लॉबी ने कभी कमल हासन और रजनीकांत को हिन्दी फिल्मों में काम करने से रोका ? दक्षिण भारतीय अनेक अभिनेत्रियां हिन्दी फिल्मों में शीर्ष पर पहुंची जिनमें हेमा मालिनी, रेखा श्रीदेवी और जयाप्रदा के नाम उल्लेखनीय हैं। हेमा और जयाप्रदा तो उत्तरप्रदेश से लोकसभा का चुनाव भी जीतीं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं स्व. जयललिता भी हिन्दी विरोधी राजनीति करती रहीं किन्तु बतौर अभिनेत्री उन्होंने भी हिन्दी फिल्मों में काम किया। सही बात तो ये है कि महाराष्ट्र के फिल्म उद्योग की तो कल्पना ही बिना हिन्दी के नहीं की जा सकती। यद्यपि उसमें मराठी सहित प्रादेशिक भाषाओं की सैकड़ों फिल्में प्रतिवर्ष बनती हैं किन्तु यदि बॉलीवुड कहे जाने वाले इस उद्योग में हिन्दी फिल्मों का निर्माण बंद हो जाए तो इसकी चमक - दमक खत्म होते देर नहीं लगेगी। हिन्दी फिल्मों में कलात्मकता को बढ़ावा देने वाले स्व. वी. शांताराम मराठी भाषी थे। इसी तरह बंगाल से आकर बॉलीवुड में नाम कमाने वाले निर्देशकों में बिमल रॉय, हृषिकेश मुखर्जी, वासु भट्टाचार्य ने हिन्दी फिल्मों के जरिये ही शोहरत कमाई। ये सब देखते हुए महाराष्ट्र में हिन्दी का विरोध गले नहीं उतरता। महाराष्ट्र की राजनीति में चूंकि उद्धव ठाकरे लगातार हाशिए पर आते जा रहे हैं इसलिए वे मराठी भाषा जैसा भावनात्मक मुद्दा उठवा रहे हैं। सत्ताधारी गठबंधन भी ऐसे मुद्दों पर दबाव में आ जाता है। लेकिन ऐसे मामलों में केवल राजनीतिक स्वार्थों के आधार पर नहीं सोचना चाहिए क्योंकि तमिलनाडु और महाराष्ट्र के लाखों लोग उत्तर भारतीय राज्यों में न सिर्फ कार्यरत अपितु स्थायी रूप से बसे हुए हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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