Saturday, 26 April 2025

सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद राहुल को माफी मांगनी चाहिए


हालांकि शरद पवार और उद्धव ठाकरे के दबाव के बाद भले ही लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने स्वातंत्र्य वीर सावरकर के बारे में सार्वजनिक तौर  अपमानजनक बातें  कहना बंद कर दिया था किंतु उन टिप्पणियों को वापस नहीं लिया। सावरकर जी द्वारा अंडमान की सेलुलर जेल से ब्रिटिश सरकार को अपनी रिहाई के लिए लिखे गए पत्र को लेकर श्री गाँधी और उनकी देखासीखी तमाम कांग्रेस नेता  उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाते आये हैं। लंबे समय तक सावरकर जी का विरोध श्री गाँधी के भाषणों का प्रमुख अंश बना रहा।  उद्धव ठाकरे और उनके साथी इस पर आपत्ति व्यक्त करते रहे लेकिन वे नहीं माने। वो तो जब शरद पवार ने  सख्त लहजे में समझाया कि  सावरकर विरोध महाराष्ट्र में  नुकसान पहुंचा सकता है तब वह सिलसिला थमा । उनके बयान के विरुद्ध उ.प्र की एक अदालत में दायर मुकदमे में जारी समन के विरुद्ध श्री गाँधी सर्वोच्च न्यायालय गए तो उसने समन पर तो फ़िलहाल रोक लगा दी किंतु उनके अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के जरिये उन्हें इस बात के लिए फटकार लगाई कि जिन्होंने देश को आजादी दिलाई उनके साथ आप ऐसा व्यवहार करते हैं। साथ ही ये चेतावनी भी दी कि भविष्य में उनके ऐसे बयान पर वह खुद संज्ञान ले सकता है। राहुल द्वारा सावरकर जी को अंग्रेजों का वफादार बताये जाने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने श्री सिंघवी से पूछा कि क्या उनको पता है कि ब्रिटिश वायसराय को लिखे पत्रों में महात्मा गाँधी भी आपका वफादार सेवक जैसे शब्दों का उपयोग करते थे तब क्या उन्हें भी अंग्रेजों का सेवक माना जा सकता है। सर्वोच्च अदालत ने श्री गाँधी को ये भी याद दिलाया कि उनकी दादी स्व. इंदिरा गाँधी ने भी स्वाधीनता संग्राम में  सावरकर जी की प्रशंसा करते हुए पत्र लिखा था। श्री गाँधी द्वारा उनके बारे में की गई टिप्पणियों को अदालत ने गैर जिम्मेदाराना बताया। इस मामले में अलाहाबाद उच्च न्यायालय में श्री गाँधी के विरुद्ध दायर मामले में अंतिम निर्णय जो भी हो किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने सावरकर जी को देशभक्त मानकर उनके विरुद्ध टिप्पणी किये जाने पर स्वतः संज्ञान लेने और देश को आजादी दिलाने वालों के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की निंदा कर श्री गाँधी को नैतिक रूप से तो दोषी ठहरा ही दिया है। इस फटकार  के बावजूद भी  श्री गाँधी और उनके समर्थक क्या सावरकर जी के विरुद्ध दुष्प्रचार जारी रखेंगे या  सार्वजनिक क्षमा याचना करेंगे इसका उत्तर उनसे अपेक्षित है। गौरतलब है इंदिरा जी द्वारा प्रधानमंत्री रहते हुए 20 मई 1980 को  स्वातंत्र्य वीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक को संबोधित पत्र  में लिखा था कि वीर सावरकर का ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मजबूत प्रतिरोध हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काफी अहम है। श्रीमती गाँधी ने उन्हें  देश का महान सपूत भी बताया था।  उक्त पत्र का जिक्र पहले भी होता आया है किंतु राहुल ने सावरकर जी के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां जारी रखीं। अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनको स्वाधीनता सेनानियों का अपमान मानकर उसकी पुनरावृत्ति नहीं होने के प्रति चेतावनी दे डाली इसलिए यदि श्री गाँधी के मन में स्वाधीनता सेनानियों के प्रति लेशमात्र भी सम्मान है तो उन्हें सावरकर जी  के बारे में कही गई अनर्गल बातों के लिए सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। चूंकि सावरकर जी हिन्दूवादी थे इसलिए उनकी देशभक्ति पर सवाल खड़े करने वाले राहुल और उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले क्या राष्ट्रपिता गाँधी जी की देशभक्ति पर भी महज इसलिए संदेह जतायेंगे क्योंकि उन्होंने भी वायसराय को भेजे गए पत्रों के अंत में आपका वफादार सेवक जैसे शब्दों का प्रयोग किया था? श्री गाँधी के अधिवक्ता श्री सिंघवी ने जब ये सफाई देनी चाही कि उनका इरादा किसी को आहत करने का नहीं था तो न्यायालय ने पलटकर पूछा कि फिर उन्होंने ऐसी टिप्पणी क्यों की और वह भी महाराष्ट्र में जहाँ सावरकर जी की पूजा होती है। बहस के दौरान अदालत ने जो कुछ भी कहा वह श्री गाँधी और उनके साथ - साथ उनके समर्थकों के गाल पर जोरदार तमाचा है । इसमें दो मत नहीं है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सावरकर जी के प्रति राहुल की अपमानजनक टिप्पणियों ने भी कांग्रेस का सफाया करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पता नहीं कांग्रेस  और उसके नेतृत्व को ये बात कब समझ में आयेगी कि श्री गाँधी की अपरिपक्वता से पार्टी को बड़ा नुकसान होता है। इंडिया गठबंधन में आ रही टूटन के लिए भी उन्हीं को जिम्मेदार माना जाता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



No comments:

Post a Comment