Saturday, 5 April 2025

उद्धव ठाकरे ने पिता की पुण्यायी को नष्ट कर दिया

जनीतिक दलों की पहिचान या तो व्यक्ति विशेष  ( नेता ) से होती है या  विचारधारा से। उस दृष्टि से  वामपंथी दलों के अलावा भाजपा ही है जिनकी नीतियों में स्पष्टता है । दूसरी ओर  राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस की वैचारिक विशिष्टता लगातार नष्ट होती जा रही है। देश में ऐसे क्षेत्रीय दलों की भी भरमार है जो किसी व्यक्ति या परिवार के नाम से ही जाने जाते हैं। उनकी विचारधारा तात्कालिक लाभ के अनुसार बदलती रहती है। लेकिन  शिवसेना एक ऐसी पार्टी थी जो उसके संस्थापक स्व. बाला साहेब ठाकरे के साथ ही अपनी कट्टर हिंदुवादी विचारधारा के लिए विख्यात रही। कुछ मामलों में तो वे भाजपा से भी ज्यादा हिंदुत्ववादी थे। बाबरी ढाँचे के ढहाने का आरोप जब  लगा तो बजाय पीछे हटने के उन्होंने कहा कि उन्हें उन शिवसैनिकों पर गर्व है।  अपनी हिंदूवादी नीतियों के कारण ही उसका भाजपा से गठजोड़ हुआ जो लगभग दो दशक चला। महाराष्ट्र में  सरकार बनी तो शिवसेना का मुख्यमंत्री बना क्योंकि बाला साहेब ने ही  तय किया था कि जिसके विधायक ज्यादा उसका मुख्यमंत्री होगा। केन्द्र में जब वाजपेयी सरकार बनी तब शिवसेना भी  उसमें शामिल हुई। उसके वरिष्ट नेता मनोहर जोशी लोकसभा के अध्यक्ष भी बने। सब कुछ ठीक चल रहा था किंतु बाला साहेब की मृत्यु के बाद जब  बागडोर उद्धव के हाथ आई तो पार्टी कमजोर होना शुरू हो गई। वहीं दूसरी तरफ भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ता चला गया जिसकी वजह से 2014 में वह शिवसेना से आगे निकल गई और देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन इसके पहले दोनों के बीच काफी खींचतानी हुई क्योंकि उद्धव ठाकरे खुद उस कुर्सी पर बैठना चाहते थे। उनके पिता ने तो जीवन में कभी चुनाव नहीं  लड़ा और न ही परिवार से किसी को लड़ाया। लेकिन उनके बाद उद्धव और उनके पुत्र आदित्य में सत्ता के प्रति  प्रेम हिलोरें मारने लगा। 2019 का विधानसभा  चुनाव दोनों अलग - अलग लड़े क्योंकि सीटों के बंटवारे को लेकर गठबंधन टूट चुका था। चुनाव में  भाजपा को शिवसेना से दोगुनी सीटें मिलने के बाद भी वह बहुमत से पीछे रह गई। चूंकि  शिवसेना ही उसकी स्वाभाविक सहयोगी हो सकती थी लिहाजा उससे संपर्क किया गया किंतु उसने उद्धव को मुख्यमंत्री बनाने की ज़िद पकड़ ली। इस दौरान कुछ नाटकीय घटनाएं भी घटीं जिसके बाद शरद पवार के जाल में फंसकर उद्धव  , कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बन गए। उनके बेटे आदित्य भी मंत्रीमंडल में शामिल हुए। लेकिन 2022 में पार्टी में बगावत हो गई। एकनाथ शिंदे दर्जनों शिवसेना विधायकों के साथ पार्टी छोड़ गए। भाजपा ने भी अवसर का लाभ उठाते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर उद्धव को सत्ता से बेदखल कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री श्री फड़नवीस को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। कानूनी लड़ाई में शिंदे गुट भारी पड़ा जिससे शिवसेना उसके कब्जे में आ गई और उद्धव गुट शिवसेना यूबीटी कहलाई।  कुछ समय बाद शरद पवार के भतीजे अजीत ने दोबारा बगावत की और इस तरह एनसीपी भी दो फाड़ हो गई । हालांकि लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में एनडीए को बड़ा झटका लगा। जिससे ये आशंका  जागी कि कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में शिंदे सरकार की विदाई हो जाएगी किंतु फड़नवीस, शिंदे और अजीत की तिकड़ी कांग्रेस, उद्धव और शरद पवार पर भारी पड़ गई। एनडीए को ऐतिहासिक बहुमत मिला और भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने के नजदीक आ गई। श्री शिंदे के साथ मुख्यमंत्री पद को लेकर उसकी थोड़ी अनबन तो हुई  किंतु अंततः वे श्री फड़नवीस के साथ उपमुख्यमंत्री बनने राजी हो गये। चुनाव के दौरान उद्धव और उनकी पार्टी ने जिस प्रकार से मुस्लिम तुष्टीकरण की कोशिशें कीं उससे  परंपरागत मतदाता छिड़क गए । चुनाव बाद कई बार लगा कि उद्धव हिंदुत्व के नाम पर फिर से  भाजपा के करीब आयेंगे किंतु ऐसा नहीं हो सका। बाला साहेब की तेजस्विता के पूरी तरह उलट वे एकदम लुँज - पुंज होकर रह गए। जिस कांग्रेस और एनसीपी को स्व. ठाकरे हिंदुत्व विरोधी मानकर तिरस्कृत करते थे , उन्हीं के सामने उद्धव का दंडवत होना आश्चर्यचकित करने वाला है। वक़्फ़ संशोधन विधेयक पर उद्धव गुट के सांसदों ने विरोध में मतदान ही नहीं किया बल्कि जो भाषण संसद के दोनों सदनों में दिये उनके  बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि पार्टी पूरी तरह से बालासाहेब की नीतियों को त्यागकर वैचारिक भटकाव की स्थिति में पहुँच चुकी है। उद्धव की भाजपा से शत्रुता तो समझ में आती है किंतु वक़्फ़ जैसे मुद्दे पर उनकी नीति मूल छवि के पूर्णतः विरुद्ध  थी। जबकि महाविकास अगाढ़ी में उसकी सहयोगी एनसीपी राज्यसभा में मतदान के समय अनुपस्थित रही। उद्धव ठाकरे का स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं है। उनके पुत्र आदित्य की चमक और धमक भी लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में पार्टी का अपनी पहिचान से दूर हो जाना उसके भविष्य के लिए खतरनाक है। इसीलिए उसके सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने की अटकलें आये दिन लगती हैं। कभी - कभी तो लगता है संजय राउत जैसे सलाहकार उद्धव की राजनीति को समुद्र में डुबोकर ही मानेंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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