वक़्फ़ कानून का मुस्लिम समुदाय पूरे देश में विरोध कर रहा है। हालांकि अनेक मौलवियों ने नये कानून का समर्थन किया। बोहरा मुस्लिमों का प्रतिनिधिमंडल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार जताने जा पहुंचा। यद्यपि ज्यादातर मुस्लिमों के मन में ये अवधारणा बिठा दी गई है कि नये कानून के बन जाने के बाद उनकी मस्जिदें और कब्रिस्तान सरकार छीन लेगी। वक़्फ़ की संपत्ति जिन राज्यों में सर्वाधिक है उनमें उ.प्र ,प. बंगाल , तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि वक़्फ़ कानून के विरुद्ध उक्त राज्यों में से 4 में शांतिपूर्ण आंदोलन हुए और अभी भी हो रहे हैं लेकिन ममता बैनर्जी शासित प. बंगाल में बांग्ला देश से सटे जिलों में हुए विरोध ने हिन्दू विरोध का रूप ले लिया। हूबहू बांग्ला देश की शैली में हिंदुओं के घरों में लूटपाट और आगजनी हुई, महिलाओं की अस्मत लूटने जैसे कुकृत्य तो हुए ही नृशंस हत्याएं भी की गईं। सैकड़ों परिवारों को अपना घर छोड़कर दूसरे शहरों में शरण लेनी पड़ी। इन घटनाओं के वीडियो देखकर तो लगता है 1947 के अगस्त महीने में देश को आजादी मिलने के समय बंगाल में मो. अली जिन्ना के आह्वान पर मुस्लिम जिहादियों ने जो कत्ले आम किया था ये उसी की पुनरावृत्ति है। सबसे दुखद ये है कि प. बंगाल सरकार ने आशंकाओं के बावजूद संवेदनशील मुस्लिम बहुल जिलों में पुलिस के पुख्ता इंतजाम नहीं किये दूसरे हिंदुओं के घर लूटने, जलाने, महिलाओं के साथ दुष्कर्म और हत्याएं करने वालों को खुली छूट दे डाली। उसी से नाराज उच्च न्यायालय ने तत्काल केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किये जाने का आदेश दिया। बतौर मुख्यमंत्री ममता का फर्ज था कि वे मुस्लिम गुंडों से प्रताड़ित हुए हिंदुओं के घावों पर मरहम लगातीं किंतु वे उल्टे भाजपा पर आरोप लगाने लगीं कि उसने बांग्ला देश से गुंडे बुलवाकर दंगे करवाए। साथ ही ये भी कि सीमा की सुरक्षा का दायित्व केंद्र सरकार का है। दंगे होने के बाद ममता का रवैया ऐसा था मानों वे किसी मुस्लिम देश की शासक हों। राज्य से आ रही खबरों से पूरा देश चिंतित है। उच्च न्यायालय के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी वक़्फ़ संबंधी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान उसके विरोध में हो रही हिंसा पर चिंता जताई किंतु ममता के माथे पर शिकन तक नहीं आई। बजाय मुस्लिम दंगाइयों के विरुद्ध कुछ बोलने के वे मुसलमानों के सामने ये कहते हुए गिड़गिड़ा रही हैं कि वक़्फ़ कानून केन्द्र सरकार ने बनाया तो उसका विरोध करें। उल्लेखनीय है कानून लागू होते ही मुख्यमंत्री ने ये ऐलान कर मुसलमानों को खुश करने का दाँव चला था कि वे प. बंगाल में इसे लागू नहीं करेंगी। बावजूद इसके जब मुर्शिदाबाद सहित कुछ जगहों पर मुस्लिम जिहादियों ने हिंदुओं पर अकारण कहर बरपाया तब ये स्पष्ट हो गया कि बीते महीनों में बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हुए उनसे प. बंगाल के मुसलमानों का हौसला बुलंद हो गया। आगामी वर्ष राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ममता की नजर हमेशा की तरह 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं पर है। चूंकि कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन उनके विरुद्ध है इसलिए मुख्यमंत्री को चिंता सता रही है कि कहीं मुस्लिमों मतों में बंटवारा न हो जाए। इसी डर से उन्होंने मुसलमानों को मनमानी की पूरी छूट दे डाली। एक साल बाद क्या होगा इसकी भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी है किंतु मुर्शिदाबाद के दंगों में जिस तरह से हिंदुओं के साथ अमानुषिक व्यवहार हुआ और ममता सरकार मूक दर्शक बनी रही उसकी प्रतिक्रिया पूरे राज्य के हिंदुओं में हुई है जो बांग्ला देश के हालातों से पहले से ही गुस्से में है। लोगों के मन में ये बात गहराई तक बैठती जा रही है कि मुसलमानों के थोक मतों के लालच में ममता बैनर्जी हिंदुओं को घर की मुर्गी मान बैठी हैं। समाज का पढ़ा - लिखा मध्यमवर्गीय हिन्दू तो उनसे पहले ही कट चुका है। इसका प्रमाण 2021 में मिल चुका था किंतु अब गरीब वर्ग में भी बंटेगे तो कटेंगे का नारा असर दिखाने लगा है। हिंदुओं में ये भय समा गया है कि इस बार भी ममता सत्ता में लौटीं तो पूरे राज्य में मुर्शिदाबाद जैसे हालात पैदा होते देर नहीं लगेगी। सुना है रास्वसंघ ने हरियाणा और दिल्ली जैसी मोर्चेबंदी प. बंगाल में भी शुरू कर दी है जिसके अंतर्गत हिन्दू मतदाताओं को जागरूक करते हुए मुस्लिम आतंक से बचने के लिए एकजुट किया जाएगा। साथ ही मतदान के दिन तृणमूल के गुंडों से निपटने की तैयारी भी हो रही है। राज्य से जो संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार ममता का हश्र भी अरविंद केजरीवाल जैसा हो सकता है जो कहते थे इस जनम में तो मोदी जी उनको नहीं हरा सकते। त्रिपुरा असम और उड़ीसा जीतने के बाद प. बंगाल में सरकार बनाना भाजपा की सर्वोच्च प्राथमिकता है क्योंकि इससे बांग्ला देश को भी माकूल संदेश जायेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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