पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए हत्याकांड के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान पर पर अनेक प्रतिबंध लगा दिये। उसके जो नागरिक यहाँ वैध तरीके से आये हुए थे उन्हें 48 घंटे में लौटने के फरमान के साथ नये वीजा देने पर भी रोक लगा दी गई है। फिल्म उद्योग में कार्यरत पाकिस्तानी अभिनेताओं और अन्य कलाकारों को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। दोनों देशों के बीच क्रिकेट संबंध पहले से ही नहीं हैं। हाल ही में संपन्न विश्व कप का आयोजक यद्यपि पाकिस्तान था किंतु भारत ने वहाँ खेलने से मना कर दिया तो उसके सभी मैच दुबई में हुए। यहाँ तक कि फाइनल मुकाबला भी वहीं हुआ। इसके कारण पाकिस्तान में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का खूब मजाक उड़ा जिसने अपने स्टेडियमों को विश्व कप के लिए सजाने - संवारने में काफी धनराशि खर्च की। लेकिन पाकिस्तान के कलाकार हमारे फिल्म उद्योग से जुड़े रहे। अनेक टीवी कार्यक्रमों में भी उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है। इनमें वहाँ के क्रिकेटर भी शामिल होते हैं। ये बात स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि कला और खेल से जुड़े पाकिस्तानी विशुद्ध पेशेवर अंदाज में पेश आने के कारण विवादग्रस्त बात करने से बचते हैं । लेकिन जो समाचारों से जुड़े टीवी चैनल हैं वे अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए पाकिस्तानी पत्रकारों, पूर्व फौजी अधिकारियों सहित ऐसे लोगों को पैनल का हिस्सा बना लेते हैं जिनके रहने से माहौल बेहद गर्म हो जाता है। दोनों पक्ष एक दूसरे पर तीखे हमले करते हुए अपने देश की तरफदारी करने में पीछे नहीं रहते। आरोप - प्रत्यारोप की बाढ़ आ जाती है। चुनौतियाँ और धमकियाँ भी सुनने मिलती हैं। पाकिस्तान के पक्षधर उसके परमाणु शक्ति संपन्न होने का दंभ भरते हैं तो बहस में शामिल भारतीय भी पाकिस्तान का नामो - निशां मिटाने का हौसला दिखाने से बाज नहीं आते। पहलगाम की घटना के बाद जब भारत सरकार ने सिंधु जल संधि निलंबित करने का फैसला किया तो उसके बाद हुई बहसों में इसे लेकर भी तर्क - वितर्क से बात कुतर्कों तक जा पहुंची। ये सब देखते हुए ये प्रश्न सहज रूप से उठता है कि टीवी चैनलों द्वारा पाकिस्तानियों को बुलाकर भारत के विरुद्ध बोलने का अवसर देना कौन सी बुद्धिमत्ता है ? शत्रु देश के लोगों से अपमानजनक बातें और धमकियाँ सुनने और फिर कृत्रिम उत्तेजना का प्रदर्शन करते हुए उन्हें जवाब देने का औचित्य समझ से परे है। हालांकि जिस बहस में केवल भारतीय होते हैं उनमें भी तथ्यों से अधिक व्यर्थ की बातों का समावेश होता है। लेकिन बात घर के भीतर ही रहती है किंतु जब पाकिस्तानी लोग सीमा के पार से शामिल होते हैं तब उनके द्वारा भारतीय नीतियों और निर्णयों की आलोचना उनके मुल्क वालों को पसंद आती हैं। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तानी चैनलों पर बैठने वाले अपने देश की आलोचना नहीं करते किंतु उसे सुनकर हमें कोई लाभ नहीं होता क्योंकि ज्योंही इस्लाम का जिक्र उठता है हर पाकिस्तानी भारत के विरोध में मुँह चलाने लगता है। ये देखते हुए जिस प्रकार भारत सरकार ने पाकिस्तानी कलाकारों और नागरिकों के यहाँ आने पर रोक लगाई वैसे ही भारतीय समाचार टीवी चैनलों को भी कहा जाए कि वे अपने कार्यक्रमों में पाकिस्तानी मेहमानों को बिठाकर भारत को गालियाँ और धमकियाँ देने का अवसर देना बंद करें। हो सकता है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह की रोक का विरोध हो किंतु जब पाकिस्तान के आम और खास सभी भारत के विरुद्ध ज़हर उगलने पर आमादा हों तब उन्हें वैसा करने हेतु मंच और मौका देना अपने देशवासियों का मनोबल गिराने में सहायक बनना है। उल्लेखनीय है भारत में एक तबका है जो देश के भीतर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच गंगा - जमुनी रिश्तों की माला जपता रहता है जबकि इसकी संभावना दूरदराज तक नजर नहीं आती। इसी तरह कुछ लोग अभी भी उसी खुशफहमी में जी रहे हैं कि समान सांस्कृतिक विरासत के कारण आम भारतीय और पाकिस्तानी के बीच भावनात्मक एकता उत्पन्न की जा सकेगी। इसलिए बेहतर होगा पाकिस्तानियों का बहिष्कार व्यापक स्तर पर किया जाए। वैसे भी जितनी उदारता से भारत में पाकिस्तान के कलाकारों का स्वागत और सम्मान होता है उसका दसवां हिस्सा भी सीमा के उस पार महसूस नहीं होता। भारत में धारा 370 हटाये जाने के विरोधियों में गैर मुस्लिमों की संख्या बहुत बड़ी है। वक़्फ़ विधेयक के विरोध में लोकसभा में जितने मत गिरे वे सदन में मुस्लिम सदस्यों से 10 गुना ज्यादा थे। लेकिन पाकिस्तान में हिन्दू विरोधी किसी भी नीति को लगभग 100 फीसदी मुस्लिम समर्थन प्रदान करते हैं। इसलिए समय की मांग है पाकिस्तान का बहिष्कार पूरी तरह से हो और समाचार चैनल भी इसमें योगदान दें ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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