Tuesday, 8 April 2025

ट्रम्प का आर्थिक आतंकवाद भारत के लिए स्वर्णिम अवसर हो सकता है


भारतीय दर्शन विश्व को परिवार मानता है जबकि पश्चिम के चिंतन पर  आर्थिक स्वार्थ सदैव हावी रहे। इसीलिए वहाँ  व्यापार की मानसिकता  प्रबल रही। जिसके चलते उन्होंने विश्व को बाजार का स्वरूप दे दिया। विश्व व्यापार संगठन और वैश्विक अर्थव्यवस्था इसी भावना से प्रेरित है। चाहे 19 वीं और 20 वीं सदी का उपनिवेशवाद हो या दूसरे महायुद्ध के पश्चात चला शीतयुद्ध , सभी के पीछे पश्चिमी जगत का आर्थिक स्वार्थ ही काम करता रहा। 21 वीं सदी के 25 वें साल में प्रवेश के बाद भी महाशक्तियों के तौर तरीकों में लेश मात्र भी बदलाव नहीं आया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दूसरे कार्यकाल में जिस तरह के आर्थिक आतंक से पूरी दुनिया को भयाक्रांत कर रहे हैं वह इसका ताजा प्रमाण है। आयातित वस्तुओं पर कर की दरों में बेतहाशा वृद्धि करने के पीछे उनका तर्क है कि अमेरिका जिन देशों को निर्यात करता है वे उस पर ज्यादा करारोपण करते हैं जबकि  अमेरिका में आयात होने वाली वस्तुओं पर लगने वाला कर कम है। इस आधार पर  ट्रम्प ने  आयातित वस्तुओं पर करों में बेतहाशा वृद्धि कर दी।  इसका असर दुनिया भर के शेयर बाजारों में आई बड़ी गिरावट के रूप में देखने मिल रहा है। रोचक बात ये है कि अमेरिका का व्यापार घाटा कम करने के लिए करों में की गई वृद्धि से आयातित वस्तुएँ महंगी हो गईं जिससे नाराज लोग सड़कों पर उतरकर ट्रम्प की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। जिस जनता ने उन्हें भारी मतों से जिताया था वही मात्र दो महीने के भीतर ही उनसे त्रस्त हो चली है किंतु ट्रम्प के मुताबिक़ ये स्थिति कड़वी दवा जैसी है जो लंबे समय तक लाभ पहुंचाएगी। अर्थशास्त्री  मान रहे हैं कि ट्रम्प  की नीतियों से दुनिया आर्थिक मंदी की गिरफ्त में आने जा रही है। यूरोपीय देश अमेरिका पर अपनी निर्भरता खत्म करने की दिशा में सोचने लगे हैं तो भारत और चीन जैसे देश  अन्य क्षेत्रों के बाजारों में संभावनाएं तलाशने में जुट गये हैं। अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात में कमी आने से भारत का परेशान होना स्वाभाविक है। गत दिवस शेयर बाजार के धड़ाम से गिरने के कारण निवेशकों को जबरदस्त नुकसान हुआ। ये गिरावट पूरे विश्व में देखी गई। यहाँ तक कि  ट्रम्प के अपने देश का शेयर बाजार भी हिचकोले खाने लगा । कोरोना, यूक्रेन - रूस युद्ध और इसरायल - हमास के बीच जंग ने पहले ही आर्थिक जगत में दहशत फैला रखी थी। ऊपर से ट्रम्प का सनकीपन दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत चरितार्थ कर रहा है। हालांकि  आज की दुनिया में  किसी देश का खुद में सीमित रहना मुश्किल भी है और अव्यवहारिक भी परंतु आपदा में अवसर तलाशने की क्षमता के बल पर भारत इस संकट से भी उसी तरह  सफल होकर बाहर आ जायेगा जैसा कोरोना महामारी के दौरान उसने कर दिखाया। हमारा विशाल  उपभोक्ता बाजार  सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकता है। उससे भी महत्वपूर्ण बात है आम भारतीय की संयमी  प्रवृत्ति। बढ़ते उपभोक्तावाद के बाद भी औसत भारतीय परिवार पश्चिमी देशों की विलासितापूर्ण जीवन शैली के विपरीत कम संसाधनों में भी जीवन यापन कर लेता है। घरेलू बचत भी भारतीय समाज की विशेषता है। यही वजह है कि भारत के शेयर बाजार पूरी तरह से विदेशी पूंजी पर निर्भर नहीं रहे। देश में निवेशकों का एक नया वर्ग तैयार हो चुका है। इसका ताजा प्रमाण है कल हुई गिरावट के बाद आज ही शेयर बाजार में आई उछाल। इन्हीं कारणों से अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि ट्रम्प के आर्थिक आतंकवाद से जूझने में भारत पूरी तरह सक्षम है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में उत्पादकों को मांग में कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यदि सरकार घरेलू उद्योगों को छूट देने के साथ ही उपभोक्ता की क्रय शक्ति बढ़ाने की दिशा में कदम उठाये तो देश मंदी से बचा रह सकता हैं। गत दिवस सरकार ने पेट्रोल - डीजल के दाम 2 रु. लीटर बढ़ाये किंतु उसका बोझ  पेट्रोलियम कंपनियों पर डालकर आम उपभोक्ता को राहत दे दी। इसी तरह की मेहरबानी जीएसटी की दरों में की जानी चाहिए।  मेक इन इंडिया को देश की पहिचान बनाने और आत्मनिर्भर भारत के  आत्मविश्वास को मज़बूत करने का यह स्वर्णिम अवसर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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