अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया भर में जो उथल - पुथल मचाई उसने आर्थिक महायुद्ध के हालात उत्पन्न कर दिये हैं। टैरिफ के नाम पर शुरू की गई मुहिम अब आक्रमण और प्रत्याक्रमण में बदलती जा रही है। शुरुआत में ये ट्रम्प का एक साधारण नीतिगत कदम माना जा रहा था किंतु जल्द ही इसे अन्य देशों की आर्थिक आजादी पर हमले का नाम दिया जाने लगा। अमेरिका के उत्पादक के बजाय आयातक देश बन जाने से उसकी अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर होने का खतरा तो लंबे समय से महसूस किया जा रहा था। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात ये रही कि उसकी अपनी कंपनियों ने सस्ते श्रमिकों के लालच में चीन सहित तमाम दक्षिण एशियाई देशों में अपनी उत्पादन इकाइयां स्थापित कीं जिनके बनाये सामान अपेक्षाकृत सस्ते होने से अमेरिकी बाजारों में छा गए। अन्य देशों से भी वहाँ आयात बढ़ा। सही बात ये है कि अमेरिका बड़ी चीजों और हथियारों के उत्पादन को महत्व देने लगा। इसके साथ ही उसने तकनीक के शोध पर ज्यादा ध्यान दिया जो उसकी असली ताकत है किंतु इस बीच छोटी - छोटी उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन के प्रति उसकी उदासीनता बढ़ने से इनका आयात बढ़ता गया। चूंकि ये अमेरिकी उत्पादों की तुलना में सस्ती थीं लिहाजा आम अमेरिकी ने इन्हें हाथों - हाथ लिया। ये स्थिति रातों - रात बनी हो ऐसा भी नहीं है। विश्व व्यापार संगठन के अस्तित्व में आने के बाद जब दुनिया खुले बाजार में बदल गई तब चीन जैसे जिस देश के साथ अमेरिका के रिश्ते सांप और नेवले जैसे थे वह उसका व्यापारिक साझेदार बन गया। माओ के दौर की साम्यवादी लौह दीवार को तोड़कर चीन ने अपने दरवाजे विदेशी पूंजी के लिए खोल दिये। इस कदम ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुए शीतयुद्ध को तिलांजलि देते हुए नई वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म दिया। शुरुआत में कहा जाता था कि आर्थिक उदारवाद अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए प्रारंभ किया गया था। भारत जैसे देश में आर्थिक गुलामी के खतरे के तौर पर इसका विरोध भी हुआ परंतु विदेशी पूंजी के आगमन ने उसको दबा दिया। इस नई व्यवस्था का सर्वाधिक लाभ चीन ने उठाया और देखते ही देखते वह अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों के लिए चुनौती बनने लगा। उसके सैन्य महाशक्ति बनने तक तो बात फिर भी ठीक थी क्योंकि चीन का भारत को छोड़ किसी अन्य देश से सीधा सैन्य तनाव नहीं है। ताईवान को लेकर जरूर अमेरिका और उसके बीच समय - समय पर तनाव होता है किंतु जंग की स्थिति नहीं बन सकी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा था। अमेरिकी अर्थतंत्र में चीनी घुसपैठ भी काफी गहराई तक जा पहुंची। इस बारे में रोचक बात ये है कि यूरोप के कुछ बड़े देश भी चीन की आर्थिक प्रगति और विश्व बाजार में उसकी धमक के आगे असहाय नजर आ रहे थे। वहीं अमेरिका पर कर्ज का बोझ दरअसल दुनिया का चौधरी बनने की होड़ के कारण बढ़ता जा रहा था। तकनीक के मामले में भी चीन और भारत ने जो प्रगति बीते कुछ दशकों में की उसके कारण अमेरिका का दबदबा कम होने लगा। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बतौर राष्ट्रपति बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका की साख और धाक दोनों में कमी आई। ट्रम्प ने चूंकि चुनाव उनके शासन को विफल साबित कर जीता था लिहाजा उनके लिए नई नीतियों के साथ शुरुआत करने की मजबूरी थी किंतु वे जिस तरह की जल्दबाजी दिखा गए उसने पूरे विश्व को परेशान कर दिया। भले ही बढ़े हुए टैरिफ को उन्होंने 90 दिनों के लिए लंबित कर लिया किंतु चीन के साथ उनकी रस्साकशी बच्चों के खेल का रूप ले बैठी है। जिस तरह दोनों देश एक दूसरे पर टैरिफ थोप रहे हैं उसमें नीतिगत गंभीरता की जगह नाक के सवाल ने ले ली। लेकिन इन दो महाशक्तियों की खींचातानी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को जबरदस्त अनुश्चितता में उलझा दिया है। एक तरफ तो मंदी का खतरा मंडरा रहा है वहीं दूसरी तरफ चीन द्वारा अपने उत्पादों की कीमत कम किये जाने से भारत जैसे देश में उसके सामानों की डंपिंग का भी खतरा पैदा हो गया है। दुर्भाग्य से रूस चूंकि यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए अमेरिका और चीन दोनों को रोकने वाला कोई नहीं बचा। लेकिन यदि वे इसी तरह एक दूसरे पर बाँहें चढ़ाते रहे तब आर्थिक विश्वयुद्ध की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। और यदि ऐसा हुआ तब दुनिया के अनेक छोटे देशों को आर्थिक तबाही का सामना करना पड़ सकता है जो विदेशी तकनीक और सामान के आयात पर निर्भर हैं। भारत के लिए भी बहुत ही संभलकर चलने की जरूरत है क्योंकि एक गलत कदम भी सारी उपलब्धियों पर भारी पड़ सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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