तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों को लम्बे समय तक दबाये रखने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ का निर्णय निश्चित रूप से ऐतिहासिक है। उसने स्पष्ट रूप से राज्यपाल को तीन विकल्प दिये हैं। पहला विधेयक पर स्वीकृति प्रदान करना, दूसरा उसे विधानसभा को पुनर्विचार हेतु लौटाना और राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के लिए सुरक्षित रखना। इसके लिए उसके पास अधिकतम तीन माह का समय होगा। लेकिन लौटाया गया विधेयक यदि दोबारा जस का तस विधानसभा से पारित होकर आता है तब वे उसे अनुमोदित करने बाध्य होंगे। न्यायालय ने राज्यपाल के पॉकेट वीटो पर ऐतराज जताते हुए साफ किया कि वे निर्वाचित विधायिका और मंत्रीपरिषद के निर्णयों को रोकने का अधिकार नहीं रखते। फैसले में ये भी कहा गया है कि जिस विधेयक को राज्यपाल स्वीकृत करते हैं उसमें शीघ्रातिशीघ्र का सिद्धांत पालन होना चाहिये। कुल मिलाकर इस फैसले ने राज्यपालों को राज्य सरकार के सामने असहाय बनाकर रख दिया। संवैधानिक प्रमुख होने के नाते उनका दायित्व है कि राज्य का शासन संविधान सम्मत चले। संघीय व्यवस्था में इस तरह के पद की इसीलिये आवश्यकता है , अन्यथा राज्यों के स्वेच्छाचारी होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच खींचतानी उन्हीं राज्यों में देखी जाती है जहाँ केंद्र में सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के विरोधी दल की सरकार हो। हालांकि कुछ अपवाद भी हैं उदाहरण के लिए उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक 24 साल मुख्यमंत्री रहे। उस दौरान केंद्र में कई सरकारें बनीं परंतु उनके सबके साथ अच्छे रिश्ते रहे। राज्यपाल के साथ उनकी अनबन शायद ही किसी ने सुनी हो। लेकिन वर्तमान में प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की गैर भाजपा सरकारों की राज्यपाल से आये दिन टकराहट सुनाई देती है। दिल्ली के उप राज्यपाल और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच की रस्साकशी पूरे देश ने देखी। ये सिलसिला आजादी के बाद से ही चला आ रहा है। जब केंद्र में कांग्रेस का इकतरफा राज था तब राज्यपाल की सिफारिश पर राज्य सरकार को बर्खास्त कर देना आम बात थी। आजादी के बाद केरल में नंबूदरीपाद की वामपंथी सरकार को महज इसलिए बर्खास्त कर दिया गया था क्योंकि वह नेहरू जी को नापसंद थी। अब तक धारा 356 के जरिये 100 राज्य सरकारें अकारण गिराई गईं। सबसे अधिक 50 बार ऐसा इंदिरा जी के शासनकाल में हुआ। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने बोम्मई मामले में सरकार बर्खास्त करने के इस तरीके पर लगाम लगाते हुए कहा कि उसके बहुमत का फैसला विधानसभा में होना चाहिए। उ.प्र के राज्यपाल रहते हुए रोमेश भंडारी और बिहार में बूटा सिंह के कारनामों ने भी राज्यपाल के पद को कलंकित किया। सरकार बर्खास्त करने का चलन तो रुक गया किंतु केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल और अन्य दलों की राज्य सरकारों के बीच खींचतान रुकने का नाम नहीं ले रही। जाहिर है इसके पीछे दलीय स्वार्थ ही प्रमुख होता है। ये भी सही है कि भारतीय राजनीति मतभेद की बजाय मनभेद में बदल चुकी है। राज्य सरकार और केंद्र के बीच वैचारिक मतभेद अस्वाभविक नहीं है किंतु प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल और जम्मू कश्मीर जैसे राज्य जब केंद्रीय कानूनों के प्रति असहमति जतायें, सीबीआई जैसी एजेंसी को आने से रोकें, घुसपैठियों को रोकने में रुकावट बनें तब राज्यपाल का सख्त होना देशहित में है। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अनेक बयान सीधे - सीधे संघीय ढांचे को कमजोर करने वाले थे। ऐसे में राज्यपाल का पद बेहद महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विधेयक पर स्वीकृति अथवा अस्वीकृति संबंधी जो समय सीमा निर्धारित की वह पूरी तरह सही है। क्योंकि राज्यपाल का केंद्र के एजेंट के तौर पर काम करना संसदीय लोकतंत्र के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है । लेकिन न्यायालय के संदर्भित निर्णय के परिप्रेक्ष्य में यदि राज्य सरकार संवैधानिक व्यवस्थाओं की अवहेलना करने का दुस्साहस करने लगे तब राज्यपाल मूक दर्शक बनकर बैठा रहे ये भी अच्छा नहीं रहेगा। ममता बैनर्जी, स्टालिन और विजयन जैसे मुख्यमंत्री जिस भाषा में बोलते हैं उसमें टकराव रोकना मुश्किल होगा क्योंकि राज्यपाल का काम केवल विधेयक पर हस्ताक्षर करना मात्र नहीं है। यद्यपि उसे दलीय राजनीति से ऊपर होना ही चाहिये, लेकिन जब तक राजनीति से रिटायर किये जाने वाले राज्यपाल बनाये जाते रहेंगे तब तक ये विसंगति बनी रहेगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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