Monday, 21 April 2025

अनुराग जैसों का विरोध सामूहिक रूप से होना चाहिए

हिन्दी फिल्मों में वास्तविकता के नाम पर अश्लील गालियों को प्रचलित करने वाले निर्देशक अनुराग कश्यप द्वारा ब्राह्मणों के बारे में की गई एक टिप्पणी ने पूरे देश में हलचल मचा दी। सोशल मीडिया के दौर में इस तरह की कोई भी बात पलक झपकते ही सर्वत्र फैल जाती है और वही इस मामले में भी हुआ। जवाब में दूसरे पक्ष से भी हमला शुरू हो गया और कश्यप की गिरफ्तारी की मांग भी उठने लगी। गीतकार और संवाद लेखक मनोज मुंतशिर ने भी अनुराग को तीखी भाषा में चेतावनी दे डाली। हालांकि बाकी फिल्मी बिरादरी  ब्राह्मणों के प्रति घटिया टिप्पणी करने वाले निर्देशक के बारे में बोलने से बचती दिखाई दी। ज्यादा दबाव बन जाने के बाद अनुराग ने माफी तो मांगी किंतु उसमें भी उनकी घटिया सोच उजागर हुई।  अनुराग द्वारा निर्देशित गैंग्स ऑफ वासेपुर बिहार के कोयला माफिया के बारे में थी। फिल्म अपने  कथानक और जबरदस्त अभिनय के कारण सफल रही किंतु इसने फिल्मी दुनिया को नई राह दिखा  दी। वेब सिरीज मिर्जापुर  इसका उदाहरण है जिनके जरिये अश्लीलता का प्रदर्शन भारतीय परिवारों के भीतर तक आ गया। अनुराग का पारिवारिक जीवन भी बिखराव से भरा रहा है। ऐसे लोग मानसिक विकृति से ग्रसित भी  हो जाते हैं। मनुवाद की आड़ में न सिर्फ ब्राह्मण अपितु अन्य उच्च जातियों के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां करना  आम होता जा रहा है। राजनेता तो जातीय ध्रुवीकरण के लिए ऐसा करते हैं किंतु  अनेक लेखक, पत्रकार एवं अन्य बुद्धिजीवी भी  हैं जिनकी रोजी - रोटी  सवर्णों को गालियाँ देकर ही चला करती है। सेकुलर जमात के लोगों में भी चूंकि सनातन विरोधी भावना कूट- कूटकर भरी हुई है इसलिए वे भी हिंदुओं के बीच फूट डालने  में आगे - आगे नजर आते हैं। अनुराग किसी राजनीतिक दल या अन्य संगठन से जुड़े हैं ये जानकारी तो नहीं है किंतु ब्राह्मण विरोधी घिनौनी टिप्पणी के चौतरफा विरोध के बाद जारी उनके  माफीनामे में कहीं नहीं लगता कि उन्हें अपनी निम्नस्तरीय बात पर तनिक भी ग्लानि हुई हो। आश्चर्य ये है कि ब्राह्मणों के प्रति  गन्दी टिप्पणी करने वाले अनुराग के विरुद्ध विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा किसी दलित या पिछड़ी जाति के अपमान को लेकर होता है। खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण साबित करने वाले  राहुल गाँधी भी चुप रहे और मायावती के दाहिने हाथ रहे सतीश चंद्र मिश्र भी। तेजस्वी और अखिलेश यादव की पार्टियों में भी अनेक ब्राह्मण नेता हैं किंतु उनकी भी बोलती बंद है। सही बात ये है कि ऐसी हरकतें  सनातन के अनुयायियों के बीच फूट डालने के निहित उद्देश्य से की जाती हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन  और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे द्वारा सनातन धर्म के बारे में जो आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं यदि उसका शतांश भी इस्लाम के बारे में कहा गया होता तो सिर तन से जुदा जैसी धमकियाँ गूंजने लग जातीं। कहने का आशय ये है कि हिंदुओं की सहिष्णुता का बेजा लाभ उठाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। विशेष रूप से सवर्ण जातियों के प्रति विद्वेष का भाव फैलाने का सुनियोजित प्रयास हो रहा है। जिसे राजनीतिक प्रश्रय मिलने से वातावरण दिन ब दिन विषैला होने लगा है। अनुराग कश्यप इतनी बड़ी हस्ती नहीं जो ब्राह्मण तो क्या किसी अन्य जाति की छवि धूमिल कर सके लेकिन उनकी संदर्भित टिप्पणी ने सामाजिक समरसता की जड़ों को कमजोर करने का गंदा काम किया है जिसके लिए उनकी निंदा हिंदुओं द्वारा सामूहिक स्तर पर होनी चाहिए।  वरना एक - एक कर सभी जातियों के विरुद्ध  अमर्यादित टिप्पणियां की जाती रहेगीं। उदाहरण के लिए राणा सांगा के बारे में सपा के एक सांसद द्वारा कही गई आपत्तिजनक बातों का करणी सेना द्वारा विरोध किया गया जिससे लगा उनका अपमान केवल राजपूतों तक सीमित है  जबकि राणा सांगा तो पूरे भारत के गौरव पुत्र थे। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जब स्टालिन और खरगे जी के साहेबजादों ने सनातन धर्म को कोरोना और डेंगू जैसे संबोधनों से नवाजा था तब ही  पूरा हिन्दू समाज एकजुट होकर विरोध करता तब शायद आगे किसी की हिम्मत नहीं होती , गुस्ताखी करने की। नीचता का जवाब नीचता से दिया जाना तो  शोभा नहीं देता किंतु इतना सहनशील हो जाना भी उचित नहीं कि कोई भी ऐरा - गैरा  अपमान करने का दुस्साहस करे और हम चुपचाप होकर बैठे रहें। ऐसे में अनुराग कश्यप जैसे लोगों के हौसले पस्त करने का दायित्व समूचे  हिन्दू समाज का है वरना ये सिलसिला  इसी तरह जारी रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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