Friday, 11 April 2025

नये वक़्फ़ कानून का विरोध करने वाले ही मुसलमानों के असली दुश्मन




वक़्फ़ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद राष्ट्रपति के  हस्ताक्षर होते ही कानून बन गया। अनेक मुस्लिम  संगठनों द्वारा इसका समर्थन किया गया किंतु  वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के प्रभाव में होंगे। हालांकि आम मुसलमान  पुराने और नये कानून के बारे में  उतना ही अनभिज्ञ है जितना अन्य लोग। इसका लाभ उठाकर के धार्मिक और राजनीतिक नेता ये भय फैलाने में जुट गए कि नया वक़्फ़ कानून लागू होते ही मस्जिदें, कब्रिस्तान एवं अन्य संपत्तियों को सरकार छीन लेगी। चूंकि मुसलमानों में शिक्षा का बेहद अभाव है इसलिए धार्मिक मामलों में वे जल्द ही बहकावे में आ जाते हैं।  मुल्ला - मौलवी तो इसका लाभ उठाते ही हैं किंतु मुस्लिम  मतों के दम पर नेतागिरी करने वाले राजनेता भी पीछे नहीं रहते। शाहबानो की तरह तीन तलाक़ को गैर कानूनी ठहराने की लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक मुस्लिम महिलाएं ही ले गईं थीं। फैसले के बाद देश भर में तीन तलाक़ को लेकर सैकड़ों मुकदमे दर्ज होने से साबित हुआ कि उक्त निर्णय को सीमित मात्रा में ही सही किंतु सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो गई ।  सी.ए.ए ( नागरिकता संशोधन कानून) के बारे में भी ये  दुष्प्रचार हुआ कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छिन जायेगी। दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन काफी चर्चित हुआ क्योंकि उसमें मुस्लिम महिलाएं ही धरने पर बैठी रहीं।  नागरिकता रजिस्टर के विरोध में भी मुस्लिम समुदाय को पहिचान पत्र नहीं दिखाने के लिए भड़काया गया जबकि  शासकीय  योजनाओं का लाभ लेने के लिए वे हर कागज दिखाने तैयार रहते हैं। सही बात ये है कि  सरकारी फैसलों को धर्म के विरुद्ध बताकर मुसलमानों को आंदोलित करने का खतरनाक खेल आजादी के बाद से चला आ रहा है। वक़्फ़ कानून को लेकर फैलाये गए भ्रम के कारण देश भर में मुसलमानों  को  आंदोलन के लिए उकसाया जा रहा है। कुछ मुस्लिम संगठन और राजनीतिक दल सर्वोच्च न्यायालय में कानून को रद्द करवाने की गुहार लगा चुके हैं। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में  वक़्फ़ कानून लागू नहीं करने का ऐलान कर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का नाटक भी किया। इसके पीछे आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव ही हैं। वहाँ मुस्लिम मतदाता तृणमूल के पीछे गोलबंद हैं इसलिए उनकी मजबूरी है ऐसा करना किंतु जिस तरह से वक़्फ़ संपत्तियों में मुस्लिम समुदाय के तथाकथित रहनुमाओं द्वारा की गई लूटमार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें देखते हुए जल्द ही आम मुसलमान को समझ आ जाएगा कि जिस वक़्फ़ संपत्ति का इस्तेमाल उनके लिए होना चाहिये था उस पर ओवैसी जैसे लोगों के बड़े - बड़े संस्थान बने हैं जबकि उनका रत्ती भर भला नहीं हो पाता। ओवैसी खुद बैरिस्टर होने के नाते जानते हैं कि वक़्फ़ कानून अब एक हकीकत है जिसे वे चाहे फाड़कर फेकें या आग के हवाले करें किंतु वह लागू हो चुका है। इसी तरह  ममता का ये कहना कि वे इस कानून को लागू नहीं करेंगी ,मुसलमानों को धोखे में रखने जैसा है क्योंकि संसद द्वारा पारित कानून को बाधित करना संवैधानिक संकट पैदा करेगा। दरअसल मुस्लिम समाज  तुष्टीकरण के मायाजाल में फंसकर मुख्यधारा से कटता चला गया। उसके धार्मिक नेताओं ने भी उसे प्रगतिशील नहीं होने दिया। उनके बीच से जो राजनीतिक नेतृत्व निकला उसने भी अपना स्वार्थ तो सिद्ध किया किंतु समुदाय शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर पिछड़ता गया। आजादी के बाद आधी सदी तक मुस्लिम कांग्रेस के पिछलग्गू बनकर शोषित हुए और फिर विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने उनकी ठेकेदारी ले ली। लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे नेताओं ने भी उनके कंधे पर चढ़कर अपना और अपने परिवार का भला किया किंतु विरासत के लिए किसी मुस्लिम की बजाय अपने बेटों को ही चुना। दुर्भाग्य से मुस्लिम आज भी इस चालबाजी को समझ नहीं सके। वक़्फ़ कानून के विरोध के लिए उनको सड़कों पर उतरने के लिए उकसाने वाले ही उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं।  इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहता कि बेशुमार संपत्ति के बाद भी वक़्फ़ बोर्डों में कुंडली मारकर बैठे मुस्लिमों ने कौम की बेहतरी के लिए क्या किया? ये बात भी सामने आने लगी है कि बड़ी मात्रा में वक़्फ़ संपत्ति पर समुदाय के प्रभावशाली लोगों या उनके कृपापात्रों के अवैध कब्जे हैं जिसके बारे में कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। नये कानून के लागू होने के बाद वक़्फ़ संपत्ति का चूंकि विधिवत पंजीकरण किया जाएगा इसलिए उसका  गलत उपयोग करने वालों में घबराहट है और  वे अपने बचाव के लिए आम मुसलमान की धार्मिक भावनाएं भड़काने में जुट गए हैं। केन्द्र सरकार को चाहिए वह वक़्फ़ संपत्तियों में हुई गड़बड़ियों को जल्द उजागर कर दोषी तत्वों पर कार्रवाई करे जिससे मुसलमानों को ये पता लग सके कि जिन्हें वे अपना रहनुमा मानते आये हैं वे ही उनकी बदहाली के जिम्मेदार हैं। 


मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी


नये वक़्फ़ कानून का विरोध करने वाले ही मुसलमानों के असली दुश्मन


वक़्फ़ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद राष्ट्रपति के  हस्ताक्षर होते ही कानून बन गया। अनेक मुस्लिम  संगठनों द्वारा इसका समर्थन किया गया किंतु  वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के प्रभाव में होंगे। हालांकि आम मुसलमान  पुराने और नये कानून के बारे में  उतना ही अनभिज्ञ है जितना अन्य लोग। इसका लाभ उठाकर के धार्मिक और राजनीतिक नेता ये भय फैलाने में जुट गए कि नया वक़्फ़ कानून लागू होते ही मस्जिदें, कब्रिस्तान एवं अन्य संपत्तियों को सरकार छीन लेगी। चूंकि मुसलमानों में शिक्षा का बेहद अभाव है इसलिए धार्मिक मामलों में वे जल्द ही बहकावे में आ जाते हैं।  मुल्ला - मौलवी तो इसका लाभ उठाते ही हैं किंतु मुस्लिम  मतों के दम पर नेतागिरी करने वाले राजनेता भी पीछे नहीं रहते। शाहबानो की तरह तीन तलाक़ को गैर कानूनी ठहराने की लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक मुस्लिम महिलाएं ही ले गईं थीं। फैसले के बाद देश भर में तीन तलाक़ को लेकर सैकड़ों मुकदमे दर्ज होने से साबित हुआ कि उक्त निर्णय को सीमित मात्रा में ही सही किंतु सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो गई ।  सी.ए.ए ( नागरिकता संशोधन कानून) के बारे में भी ये  दुष्प्रचार हुआ कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छिन जायेगी। दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन काफी चर्चित हुआ क्योंकि उसमें मुस्लिम महिलाएं ही धरने पर बैठी रहीं।  नागरिकता रजिस्टर के विरोध में भी मुस्लिम समुदाय को पहिचान पत्र नहीं दिखाने के लिए भड़काया गया जबकि  शासकीय  योजनाओं का लाभ लेने के लिए वे हर कागज दिखाने तैयार रहते हैं। सही बात ये है कि  सरकारी फैसलों को धर्म के विरुद्ध बताकर मुसलमानों को आंदोलित करने का खतरनाक खेल आजादी के बाद से चला आ रहा है। वक़्फ़ कानून को लेकर फैलाये गए भ्रम के कारण देश भर में मुसलमानों  को  आंदोलन के लिए उकसाया जा रहा है। कुछ मुस्लिम संगठन और राजनीतिक दल सर्वोच्च न्यायालय में कानून को रद्द करवाने की गुहार लगा चुके हैं। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में  वक़्फ़ कानून लागू नहीं करने का ऐलान कर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का नाटक भी किया। इसके पीछे आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव ही हैं। वहाँ मुस्लिम मतदाता तृणमूल के पीछे गोलबंद हैं इसलिए उनकी मजबूरी है ऐसा करना किंतु जिस तरह से वक़्फ़ संपत्तियों में मुस्लिम समुदाय के तथाकथित रहनुमाओं द्वारा की गई लूटमार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें देखते हुए जल्द ही आम मुसलमान को समझ आ जाएगा कि जिस वक़्फ़ संपत्ति का इस्तेमाल उनके लिए होना चाहिये था उस पर ओवैसी जैसे लोगों के बड़े - बड़े संस्थान बने हैं जबकि उनका रत्ती भर भला नहीं हो पाता। ओवैसी खुद बैरिस्टर होने के नाते जानते हैं कि वक़्फ़ कानून अब एक हकीकत है जिसे वे चाहे फाड़कर फेकें या आग के हवाले करें किंतु वह लागू हो चुका है। इसी तरह  ममता का ये कहना कि वे इस कानून को लागू नहीं करेंगी ,मुसलमानों को धोखे में रखने जैसा है क्योंकि संसद द्वारा पारित कानून को बाधित करना संवैधानिक संकट पैदा करेगा। दरअसल मुस्लिम समाज  तुष्टीकरण के मायाजाल में फंसकर मुख्यधारा से कटता चला गया। उसके धार्मिक नेताओं ने भी उसे प्रगतिशील नहीं होने दिया। उनके बीच से जो राजनीतिक नेतृत्व निकला उसने भी अपना स्वार्थ तो सिद्ध किया किंतु समुदाय शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर पिछड़ता गया। आजादी के बाद आधी सदी तक मुस्लिम कांग्रेस के पिछलग्गू बनकर शोषित हुए और फिर विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने उनकी ठेकेदारी ले ली। लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे नेताओं ने भी उनके कंधे पर चढ़कर अपना और अपने परिवार का भला किया किंतु विरासत के लिए किसी मुस्लिम की बजाय अपने बेटों को ही चुना। दुर्भाग्य से मुस्लिम आज भी इस चालबाजी को समझ नहीं सके। वक़्फ़ कानून के विरोध के लिए उनको सड़कों पर उतरने के लिए उकसाने वाले ही उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं।  इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहता कि बेशुमार संपत्ति के बाद भी वक़्फ़ बोर्डों में कुंडली मारकर बैठे मुस्लिमों ने कौम की बेहतरी के लिए क्या किया? ये बात भी सामने आने लगी है कि बड़ी मात्रा में वक़्फ़ संपत्ति पर समुदाय के प्रभावशाली लोगों या उनके कृपापात्रों के अवैध कब्जे हैं जिसके बारे में कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। नये कानून के लागू होने के बाद वक़्फ़ संपत्ति का चूंकि विधिवत पंजीकरण किया जाएगा इसलिए उसका  गलत उपयोग करने वालों में घबराहट है और  वे अपने बचाव के लिए आम मुसलमान की धार्मिक भावनाएं भड़काने में जुट गए हैं। केन्द्र सरकार को चाहिए वह वक़्फ़ संपत्तियों में हुई गड़बड़ियों को जल्द उजागर कर दोषी तत्वों पर कार्रवाई करे जिससे मुसलमानों को ये पता लग सके कि जिन्हें वे अपना रहनुमा मानते आये हैं वे ही उनकी बदहाली के जिम्मेदार हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी




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