Thursday, 10 April 2025

बेहतर है कांग्रेस 2034 की तैयारी करे


अहमदाबाद में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न हो गया। इसमें  संगठन को मजबूत बनाने के साथ ही कमजोरियों पर भी मंथन हुआ। राहुल गाँधी ने स्वीकार किया कि पिछड़ी जातियाँ  कांग्रेस से छिटक गईं। उनकी यह टिप्पणी सपा और राजद जैसे दलों के लिये  संकेत है जो पिछड़ी जातियों  के दम पर अपना  अस्तित्व बनाये हुए हैं। उल्लेखनीय है बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ  कांग्रेस, लालू  यादव की  पिछलग्गू बनी रही। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के बाद श्री गाँधी ने क्षेत्रीय दलों से दूरी बनाना शुरू कर दिया। महाराष्ट्र में तो वे  कुछ न कर सके किंतु हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन नहीं किया। अब तक की खबरों के मुताबिक कांग्रेस और लालू की पार्टी के बीच सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा। दिल्ली के चुनाव में तृणमूल और सपा  ने खुलकर आम आदमी पार्टी का प्रचार किया। इंडिया गठबंधन के बारे में भी  घटक दलों के जो बयान आये उनमें राहुल के प्रति अनिच्छा झलक रही थीं। ममता बैनर्जी ने तो  गठबंधन का नेतृत्व करने की पेशकश तक कर डाली जिसे शिवसेना,  आम आदमी पार्टी और सपा ने तो समर्थन दिया ही , लालू ने भी उसका स्वागत कर दिया।   लोकसभा में श्री गाँधी के रवैये से भी गठबंधन के साथी नाराज बताये जाते हैं। हरियाणा , महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनावी नतीजों ने कांग्रेस की स्थिति और कमजोर कर दी। उ.प्र विधानसभा के 10 उपचुनावों में सपा के साथ  तालमेल नहीं होने से कांग्रेस ने मैदान छोड़ दिया। भाजपा ने 7 सीटों पर जीत हासिल कर ली।  अखिलेश इसके लिए कांग्रेस को कसूरवार मानते हैं जो उपचुनावों के दौरान  पूरी तरह उदासीन रही। इस प्रकार इंडिया गठबंधन धीरे - धीरे निष्क्रिय होता गया। इसके पीछे एक तरफ जहाँ कांग्रेस की एकला चलो नीति है वहीं दूसरी तरफ अन्य घटक दलों का भी उससे छिटकना है। दरअसल राहुल को लग रहा है कि क्षेत्रीय दलों के पीछे चलने की बजाय अपना जनाधार बढ़ाया जाए। उ.प्र और बिहार में पिछड़ी जातियों के नेता बनकर लालू और उनके बेटे जहाँ  मुकाबले में हैं वहीं उ.प्र में अखिलेश ने यादव - मुस्लिम गठजोड़ के बलबूते अपनी हैसियत बना रखी है। राहुल जानते हैं उक्त दोनों राज्यों में कांग्रेस के पास मजबूत प्रादेशिक नेतृत्व ही नहीं है। इसीलिये वे  क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की सोच रहे हैं । लेकिन सवाल ये है कि कांग्रेस  ,बिहार में राजद से अलग होकर लड़ती है तब क्या वह यादव मतों में सेंध लगा पायेगी जो लालू के पीछे चट्टान बनकर खड़े हैं। यही स्थिति उ.प्र में भी है जहाँ अखिलेश को हिलाना उसके लिए आसान नहीं है। दिल्ली में अकेले लड़कर कांग्रेस भले ही इस बात पर खुश हो कि आम आदमी पार्टी की हार से  अरविंद केजरीवाल की अकड़ खत्म हो गई किंतु राहुल के मैदान में उतरने के बावजूद वह तीसरी बार भी शून्य पर ही सिमटी रही। अहमदाबाद अधिवेशन में भाजपा की शैली में संगठन को मजबूत बनाने और चुनाव हेतु अपनी मशीनरी को चुस्त बनाने जैसे संकल्प  लिए गए । संघ और भाजपा से लड़ने का हौसला भी दिखाया गया। वक़्फ़ संशोधन के बाद मोदी सरकार की नजर ईसाई संस्थानों की जमीनों पर है जैसी शिगूफेबाजी भी की गई। लेकिन अधिवेशन के पहले  श्री गाँधी के बौद्धिक सलाहकार सैम पित्रौदा ने पार्टी नेतृत्व पर तंज कस दिया कि निर्णय तो बड़े - बड़े होते हैं परंतु उन्हें जमीन पर नहीं उतारा जाता। उनकी बात काफी हद तक सच है क्योंकि कांग्रेस में संगठन के बजाय व्यक्ति निष्ठा का बोलबाला है। आला कमान और जमीनी स्तर पर काम करने वालों के बीच संवाद हीनता है। संगठन के पदों पर बड़े नेताओं के कृपापात्र बैठते हैं। राहुल गाँधी बोलते तो बहुत कुछ हैं किंतु उसे धरातल पर उतारने में विफल रहे हैं।  लोकसभा में वक़्फ़ संशोधन विधेयक पर नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उन्हें मुख्य भूमिका में होना था किंतु वे गैर जरूरी मुद्दों में उलझे रहे। उनको पिछड़ी जातियों की कमी अब जाकर समझ आई जबकि तेजस्वी और अखिलेश से मुकाबले के लिए भाजपा ने गैर यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ मिला कर सोशल इंजीनियरिंग का शानदार प्रदर्शन किया। किसी पार्टी का अधिवेशन उसकी भावी दिशा तय करता है। गुजरात में इस आयोजन के जरिये कांग्रेस ने भाजपा के इस गढ़ को जीतने का जो इरादा जताया उसका कारगर होना उतना आसान नहीं है। उसे याद रखना चाहिए कि दो वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी पार्टी ने अधिवेशन किया था किंतु कुछ माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में  उसके हाथ से सत्ता खिसक गई।  बेहतर हो कांग्रेस 2034 के लोकसभा चुनाव को लक्ष्य बनाकर तैयारी करे क्योंकि उसकी वर्तमान स्थिति पूरी तरह दिशाहीन   है। अनेक राज्यों में तो वह अस्तित्व के लिए तरस रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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