Thursday, 3 April 2025

युद्ध विराम की पेशकश नक्सलियों का हौसला पस्त होने का संकेत है

न्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दावा है कि आगामी वर्ष तक देश नक्सलियों के आतंक से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा। मोदी सरकार बनने के बाद से ही नक्सल विरोधी मुहिम में तेजी आई और बड़ी संख्या में नक्सलियों को मौत के घाट उतारा जाता रहा । ताजा आंकड़ों के अनुसार  बीते एक वर्ष में 400 से ज्यादा नक्सली  मार गिराए गए जिनमें बड़े नक्सली नेता भी थे। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका नक्सलियों का पुराना गढ़ रहा है। यहाँ से उड़ीसा, झारखंड, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में उनकी आवाजाही होती रहती है। इसीलिए केंद्र सरकार ने बस्तर और निकटवर्ती इलाकों में नक्सल विरोधी अभियान को तेज किया जिसके अच्छे परिणाम भी देखने मिले। इसका कारण ये भी रहा कि सुरक्षा बलों को खुला हाथ दिया गया वरना नक्सलियों के प्रति हमदर्दी रखने वाले शासन - प्रशासन में बैठे तत्वों द्वारा सुरक्षा बलों के हाथ बांध दिये जाते थे। गृहमंत्री द्वारा लगातार  हालात का जायजा लेते रहने से भी सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ा। 2023 में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद केन्द्र और राज्य के बीच  बेहतर तालमेल का भी सकारात्मक परिणाम निकला। साथ ही बुद्धिजीवी बनकर समाज में घुसे हुए नक्सलियों के सफेदपोश समर्थकों का बीते कुछ सालों में पर्दाफाश होने से नक्सलियों की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई। प्रशासन में बैठे वामपंथी विचारधारा के लोग खुलकर सामने नहीं आते किंतु परदे के पीछे रहकर  वे नक्सली गतिविधियों को संरक्षण देने का कार्य करते रहे। पुलिस तक में नक्सलियों की घुसपैठ उजागर हो चुकी है। केंद्र सरकार ने ऐसे सभी तत्वों की घेराबंदी करते हुए नक्सलियों की जड़ों में मठा डालने की जो प्रतिबद्धता दिखाई उसके कारण ही पशुपति से तिरुपति तक नक्सली गलियारा बनाने का उनका इरादा विफल होने आ गया। यद्यपि बौखलाहट में उन्होंने अनेक हिंसक वारदातें कीं किंतु जल्द  जवाबी कारवाई होने से उनके हौसले पस्त होने लगे। इसी का परिणाम है कि श्री शाह के दो दिनों के दौरे पर छत्तीसगढ़ आने के पहले गत दिवस नक्सलियों के प्रमुख संगठन की ओर से युद्धविराम की पेशकश की गई। दरअसल हाल ही में अपने  कुछ दिग्गजों के मारे जाने के बाद नक्सली गिरोहों के सामने नेतृत्व का संकट आ गया है। सुरक्षा बलों से  जान बचाने के लिए बड़ी संख्या में नक्सली आत्म समर्पण के लिए बाध्य हुए जिनमें महिलाएं भी हैं। गौरतलब है कि जिन इलाकों में नक्सली  सक्रिय हैं उनमें से अधिकांश आदिवासी बहुल हैं । साथ ही उनमें खनिज भंडार हैं। खनन व्यवसायियों से जबरिया वसूली नक्सलियों की आय का स्रोत है। आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए आजादी के बाद से सरकारों ने बेतहाशा धन आवंटित किया किंतु वह  नौकरशाहों और राजनेताओं द्वारा किये गए भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। आदिवासियों का अन्य तरीकों से भी शोषण होता रहा। आरक्षण के नाम पर उन्हें लालीपॉप पकड़ाया गया किंतु उनके परंपरागत रोजगार के साधन छिनते चले गए। इन स्थितियों का लाभ लेकर नक्सलियों ने आदिवासियों से भावनात्मक रिश्ते कायम करते हुए उनके बीच पैठ बनाई और फिर दबाव बनाकर उनके इलाकों में वर्चस्व कायम करने के बाद आदिवासी युवक - युवतियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देकर हिंसा के रास्ते पर धकेलने का काम किया गया। उन इलाकों में फैले ईसाई मिशनरियों के साथ भी नक्सलियों के अच्छे ताल्लुकात बताये जाते हैं। इसीलिए शायद ही किसी ईसाई पादरी या नन को नक्सली हिंसा का शिकार होते देखा गया। चर्च को नुकसान पहुंचाने जैसी घटना भी नहीं सुनाई दी। वर्तमान केन्द्र सरकार ने जो इच्छाशक्ति दिखाई उसकी वजह से खूनी क्रांति के जरिये सत्ता हथियाने की नक्सली कार्ययोजना विफल होने के कगार पर आ गई है। अभी ये स्पष्ट नहीं है कि युद्ध विराम प्रस्ताव पर केन्द्र और संबंधित राज्य सरकारें क्या फैसला लेती हैं किंतु इससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि नक्सलियों का मनोबल टूटने लगा है।  इस लिहाज से श्री शाह का दो दिवसीय  छत्तीसगढ़ दौरा बेहद महत्वपूर्ण होगा। आगामी वर्ष तक नक्सली आतंक से देश को मुक्त कराने का लक्ष्य  यदि  प्राप्त  हो गया तो इससे आंतरिक सुरक्षा पर मंडरा रहा खतरा कम होने के साथ ही देश विरोधी तत्वों के मंसूबों पर पानी फिरते देर नहीं लगेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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