इन दिनों भारत के सात संसदीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का पर्दाफाश कर रहे हैं। उनमें विभिन्न दलों के सांसदों के अलावा अनुभवी गैर सांसद भी हैं। आजादी के बाद पहली बार इतनी सार्थक कूटनीतिक पहल भारत ने की जिसमें भाजपा विरोधी नेताओं को शामिल किये जाने पर भिन्न - भिन्न प्रतिक्रियाएं सुनाई दीं। सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस सांसद शशि थरूर को अमेरिका जाने वाले दल का नेता बनाये जाने की हो रही है। इसी तरह असदुद्दीन ओवैसी का नाम भी चौंकाने वाला रहा जो भाजपा के घोर विरोधी हैं। सनातन विरोधी द्रमुक सांसद कनिमोजी भी एक प्रतिनिधिमंडल की अगुआई कर रही हैं। हर दल में एक मुस्लिम सदस्य है भी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद और सलमान खुर्शीद के नाम पर भी आश्चर्य हुआ। बीते एक सप्ताह से ये दल विभिन्न देशों में पहलगाम के आतंकवादी हमले और ऑपरेशन सिंदूर से उत्पन्न हालात पर भारत का पक्ष रखते हुए पाकिस्तान के आतंक समर्थक चेहरे को अनावृत्त कर रहे हैं। इसीलिए इनकी भूमिका को देश सम्मान की निगाह से देख रहा है किंतु दूध में नींबू निचोड़ने की आदत से मजबूर तबके के पेट में दर्द उठने लगा है। शशि थरूर को नेता बनाये जाने पर तंज कसा गया कि भाजपा के पास काबिल लोग नहीं होने से कांग्रेस से लिया गया। जब श्री थरूर विदेशी धरती पर बोले कि वे सत्ता नहीं अपितु विपक्ष के सांसद हैं तब कहा गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को झटका दे दिया किंतु जब उन्होंने पाकिस्तान को बेनकाब करना शुरू किया तब उनके भाजपा में जाने के बारे में भी अटकलों का दौर शुरू हो गया। लेकिन विघ्नसंतोषी ये देखकर हैरत में आ गए कि गुलाम नबी और ओवैसी भी पाकिस्तानी दुष्प्रचार की धज्जियां उड़ाने में जुटे हुए हैं। इन दौरों पर गए विपक्षी सांसद तथा अन्य नेता भारत की विदेश नीति का गुणगान करते हुए आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के संकल्प का प्रतिपादन करते हुए देश की एकता का प्रमाण दे रहे हैं । और इधर देश के भीतर कांग्रेस विदेश नीति की विफलता का राग अलाप रही है। राहुल गाँधी तो आये दिन ऐसे सवाल पूछ रहे हैं जिनसे पाकिस्तानी दावों को बल मिलता है। लेकिन ये गर्व का विषय है कि एक दूसरे के घोर विरोधी नेता इन प्रतिनिधिमंडलों में अपनी दलीय विचारधारा और नीति से ऊपर उठकर देशहित और विदेश नीति के अनुसार ही बात कर रहे हैं। इसी क्रम में गत दिवस इंडोनेशिया गये प्रतिनिधिमंडल के सदस्य पूर्व विदेश राज्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ट नेता सलमान खुर्शीद ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने को उचित निर्णय बताते हुए कहा कि इससे वहाँ के हालात सुधरे हैं तथा निष्पक्ष चुनाव के बाद निर्वाचित लोकप्रिय सरकार का गठन हो सका। उन्होंने स्पष्ट किया कि 370 के रहते जम्मू कश्मीर के भारत से अलग होने का एहसास होता था जो उसके समाप्त होने से लुप्त हो गया और एक बड़ी समस्या का भी अंत हुआ। श्री खुर्शीद को भाजपा का मुखर विरोधी कहा जा सकता है। उन्होंने 370 हटाये जाने का विरोध भी किया था और गत वर्ष उनका ये बयान भी विवादों में घिर गया कि भारत में बांग्लादेश सरीखे हालात बन सकते हैं। लेकिन विदेशी धरती पर वे राष्ट्रीय हितों के लिहाज से बोले। जो विपक्षी नेता भारत सरकार की नीति और निर्णयों को विदेशी मंचों पर सही ठहराकर पाकिस्तान के हौसले पस्त कर रहे हैं उनको भाजपा से जोड़ना अपरिपक्वता है। ये लोग भूल जाते हैं कि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी को जब स्व. पी. वी नरसिम्हा राव ने पाकिस्तान के विरुद्ध मोर्चेबंदी करने जिनेवा गए भारतीय दल का नेता बनाया था और उन्होंने पाकिस्तान की व्यूहरचना को ध्वस्त कर दिया तब किसी ने उनके कांग्रेस के निकट होने की बात कहना तो दूर सोची तक नहीं। ऐसे में श्री थरूर और श्री खुर्शीद के बारे में अटकलें लगाना इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशन की गंभीरता को नुकसान पहुँचाना है। उल्टे जो विपक्षी सांसद विभिन्न देशों में पाकिस्तान की आतंकवादियों से सांठगांठ को उजागर कर रहे हैं उनकी प्रशंसा होनी चाहिए क्योंकि वे पक्ष या विपक्ष के नहीं समूचे देश के प्रतिनिधि हैं। स्मरणीय है 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद स्व. अटल जी ने तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकार किया तब लोग चौंके क्योंकि उनकी पार्टी जनसंघ पं. नेहरू द्वारा तिब्बत पर चीन के कब्जे को मान्यता देने का पुरजोर विरोध करती रही। तब अटल जी ने स्पष्ट किया कि वे भारत सरकार के विदेश मंत्री हैं और सरकार की नीति को ही सामने रखेंगे। उस दृष्टि से सातों दल ठीक वैसे ही कार्य कर रहे हैं जैसी उनसे अपेक्षा थी। जो लोग उनके बयानों को दलगत राजनीति के लिहाज से देखते हैं उनको राजनीति और राष्ट्रीय नीति का अंतर समझना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी