Saturday, 31 May 2025

थरूर और खुर्शीद देश के प्रतिनिधि बनकर विदेश गए हैं किसी दल के नहीं

इन दिनों भारत के सात  संसदीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का पर्दाफाश कर रहे हैं। उनमें विभिन्न दलों के सांसदों के अलावा अनुभवी गैर सांसद भी हैं। आजादी के बाद पहली बार इतनी सार्थक कूटनीतिक पहल भारत ने की जिसमें भाजपा विरोधी नेताओं को शामिल किये जाने पर भिन्न - भिन्न प्रतिक्रियाएं सुनाई दीं। सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस सांसद शशि थरूर को अमेरिका जाने वाले दल का नेता बनाये जाने की हो रही है। इसी तरह असदुद्दीन ओवैसी का नाम भी चौंकाने वाला रहा जो भाजपा के घोर विरोधी हैं।  सनातन विरोधी द्रमुक सांसद कनिमोजी भी एक प्रतिनिधिमंडल की अगुआई कर रही हैं। हर दल में एक मुस्लिम सदस्य है भी है। पूर्व  केंद्रीय मंत्री  गुलाम नबी आजाद और सलमान खुर्शीद के नाम पर भी आश्चर्य हुआ। बीते एक सप्ताह से ये दल विभिन्न देशों में पहलगाम के आतंकवादी हमले और ऑपरेशन सिंदूर से उत्पन्न हालात पर भारत का पक्ष रखते हुए पाकिस्तान के आतंक समर्थक चेहरे को अनावृत्त कर रहे हैं। इसीलिए इनकी भूमिका को  देश सम्मान की निगाह से देख रहा है किंतु दूध में नींबू निचोड़ने की आदत से मजबूर तबके के पेट में दर्द उठने लगा है। शशि थरूर को नेता बनाये जाने पर तंज कसा गया कि भाजपा के पास काबिल लोग नहीं होने से कांग्रेस से लिया गया। जब श्री थरूर  विदेशी धरती पर बोले कि वे सत्ता नहीं अपितु विपक्ष के सांसद हैं तब कहा गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को झटका दे दिया किंतु जब उन्होंने  पाकिस्तान को बेनकाब करना शुरू किया तब  उनके भाजपा में जाने के बारे में भी अटकलों का दौर शुरू हो गया। लेकिन विघ्नसंतोषी ये देखकर हैरत में आ गए कि गुलाम नबी और ओवैसी भी पाकिस्तानी दुष्प्रचार की धज्जियां उड़ाने में जुटे हुए हैं। इन दौरों पर गए विपक्षी सांसद तथा अन्य नेता भारत की विदेश नीति का गुणगान करते हुए आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के संकल्प  का प्रतिपादन करते हुए देश की एकता का प्रमाण दे रहे हैं । और इधर देश के भीतर कांग्रेस विदेश नीति की विफलता का राग अलाप रही है। राहुल गाँधी तो आये दिन ऐसे सवाल पूछ रहे हैं जिनसे पाकिस्तानी दावों को बल मिलता है। लेकिन ये गर्व का विषय है कि एक दूसरे के घोर विरोधी नेता इन प्रतिनिधिमंडलों में अपनी दलीय विचारधारा और नीति से ऊपर उठकर  देशहित और विदेश नीति के अनुसार ही बात कर रहे हैं। इसी क्रम में गत दिवस इंडोनेशिया गये प्रतिनिधिमंडल के सदस्य  पूर्व विदेश राज्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ट नेता सलमान खुर्शीद ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने को उचित निर्णय बताते हुए कहा कि इससे वहाँ के हालात सुधरे हैं तथा निष्पक्ष चुनाव के बाद निर्वाचित लोकप्रिय सरकार का गठन हो सका। उन्होंने स्पष्ट किया कि 370 के रहते जम्मू कश्मीर के भारत से अलग होने का एहसास होता था जो उसके समाप्त होने से लुप्त हो गया और एक बड़ी समस्या का भी अंत हुआ। श्री खुर्शीद को भाजपा का मुखर विरोधी कहा जा सकता है। उन्होंने 370 हटाये जाने का विरोध भी किया  था और गत वर्ष उनका ये बयान भी  विवादों में घिर  गया कि भारत में बांग्लादेश सरीखे हालात बन सकते हैं। लेकिन विदेशी धरती पर वे  राष्ट्रीय हितों के लिहाज से बोले। जो विपक्षी नेता भारत सरकार की नीति और निर्णयों को विदेशी मंचों पर सही ठहराकर पाकिस्तान के हौसले पस्त कर रहे हैं उनको भाजपा से जोड़ना अपरिपक्वता है। ये लोग भूल जाते हैं कि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी को जब स्व. पी. वी नरसिम्हा राव ने पाकिस्तान के विरुद्ध मोर्चेबंदी करने जिनेवा गए भारतीय दल का नेता बनाया था और उन्होंने  पाकिस्तान की व्यूहरचना को ध्वस्त कर दिया  तब  किसी ने उनके कांग्रेस के निकट होने की बात कहना तो दूर सोची तक नहीं। ऐसे में श्री थरूर और श्री खुर्शीद के बारे में अटकलें लगाना इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशन की गंभीरता को नुकसान पहुँचाना है। उल्टे जो विपक्षी सांसद  विभिन्न देशों में पाकिस्तान की आतंकवादियों से सांठगांठ को उजागर कर रहे हैं उनकी  प्रशंसा होनी चाहिए क्योंकि  वे पक्ष या विपक्ष के नहीं समूचे देश के प्रतिनिधि हैं। स्मरणीय है 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद स्व. अटल जी ने तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकार किया तब लोग चौंके क्योंकि उनकी पार्टी जनसंघ  पं. नेहरू द्वारा तिब्बत पर चीन के कब्जे को मान्यता देने का पुरजोर विरोध करती रही। तब अटल जी ने स्पष्ट किया कि वे भारत सरकार के विदेश मंत्री हैं और सरकार की नीति को ही सामने रखेंगे। उस दृष्टि से सातों दल ठीक वैसे ही कार्य कर रहे हैं जैसी उनसे अपेक्षा थी। जो लोग उनके बयानों को दलगत राजनीति के लिहाज से देखते हैं उनको  राजनीति और राष्ट्रीय नीति का अंतर समझना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 30 May 2025

बंगाल के मुस्लिम बहुल जिले कश्मीर बनने की ओर: हिंदू आबादी असुरक्षित


प. बंगाल के दौरे में  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिवस मुर्शिदाबाद में हुए सांप्रदायिक उपद्रव की चर्चा की। उस दौरान वहाँ के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हुआ अत्याचार राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया था। उच्च और सर्वोच्च न्यायालय तक को कहना पड़ा कि वे चुपचाप नहीं रह सकते। साथ ही उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बल दंगा प्रभावित क्षेत्रों में तैनात करने का आदेश दिया क्योंकि राज्य की पुलिस मुस्लिम दंगाइयों को नियंत्रित करने में न केवल विफल रही बल्कि कहीं - कहीं तो  उसने उपद्रवियों को खुली छूट दी। मुर्शिदाबाद का जनसंख्या संतुलन पूरी तरह से इकतरफा हो चुका है। निकटवर्ती मालदा के भी यही हाल हैं। इन इलाकों में मुस्लिम आबादी इस हद तक बढ़ी कि लगता है बांग्लादेश में खड़े हों। और ये सही भी है क्योंकि 1971 से बांग्लादेशी घुसपैठियों कारण पूर्वोत्तर राज्यों में मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ी जिनमें  असम और प. बंगाल मुख्य हैं।  प. बंगाल में तो कुल 30 फीसदी आबादी मुसलमानों की हो चुकी है और इसीलिए  सत्ता की चाबी उनके हाथ में है। उदाहरण के लिए मुर्शिदाबाद जिले की बहरामपुर लोकसभा सीट से पिछ्ली लोकसभा में  कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी कई चुनावों से लगातार जीतते आ रहे थे किंतु 2024 में ममता बैनर्जी ने विशुद्ध सांप्रदायिक दाँव चलते हुए  एक मुस्लिम उम्मीदवार  उतार दिया और वह भी गुजरात के क्रिकेटर युसुफ पठान को। पठान इस क्षेत्र के लिए पूरी तरह अपरिचित थे जबकि अधीर रंजन जमीनी नेता माने जाते थे । लेकिन ज्योंही तृणमूल ने उनके मुकाबले एक बाहरी  मुस्लिम उम्मीदवार उतारा चौधरी साहेब का जनाधार धराशायी हो गया और  वे बुरी तरह हार गए। बहरामपुर मुस्लिम बहुल होते हुए भी गैर मुस्लिम अधीर रंजन को चुनता रहा क्योंकि वे बतौर कांग्रेसी हिंदुवादी भाजपा के विरोधी माने जाते थे। लेकिन ज्योंही उनके सामने मुस्लिम उम्मीदवार आया उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि एक झटके में खत्म हो गई। ये स्थिति प. बंगाल के अलावा असम, बिहार , उ.प्र और केरल सहित देश के अनेक हिस्सों में उत्पन्न हो चुकी है। जाति और धर्म के आधार पर चुनावी समीकरण बनना - बिगड़ना  राजनीति में सामान्य बात है। लेकिन प. बंगाल के मुस्लिम बाहुल्य  जिले राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी  संवेदनशील हो उठे हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि जिस तरह कश्मीर घाटी में रहने वालों पर सदैव ये आरोप लगता है कि वे पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों को सहयोग और संरक्षण प्रदान करते हैं वही हाल प. बंगाल के उन मुस्लिम बहुल इलाकों का है जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। कश्मीर घाटी में आने वाले घुसपैठिये  वेशभूषा, खानपान , बोली और  रहन - सहन में चूंकि स्थानीय वाशिंदों जैसे होते हैं इसलिए उनको अलग से पहचान पाना कठिन हो जाता है। बिलकुल यही स्थिति प. बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा तथा असम के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की है जिनमें अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशी आसानी से स्थानीय लोगों में घुल - मिल जाते हैं। वैसे तो ये सिलसिला आजादी के बाद ही शुरू हो गया था । पूर्वोत्तर राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा की अनदेखी और अलगाववादी संगठनों की गतिविधियां भी इसमें सहायक हुईं किंतु 1970 में बांग्लादेश के अंदरूनी हालात बिगड़ने के बाद आये घुसपैठिये शरणार्थी की हैसियत पाने के बाद यहीं बस गए। उनको वापस भेजने की बात स्वयं  इंदिरा गाँधी ने कही थी किंतु वोट बैंक की राजनीति ने देश हित को ठेंगा दिखा दिया। ममता बैनर्जी की पूर्ववर्ती वामपंथी सरकारों ने भी यही पाप किया था जो चीन समर्थक मानी जाती थीं। लेकिन गत वर्ष बांग्लादेश में  भारत विरोधी सत्ता विराजमान होने  के बाद  हिंदुओं पर जिस तरह के अमानुषिक अत्याचार हुए उन्हीं की हूबहू नकल मुर्शिदाबाद में देखने मिली। हिंदुओं के घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूटपाट, आगजनी और महिलाओं के साथ बलात्कार के रूप में आतंक का नंगानाच करते हुए उन्हें इलाका छोड़ने को बाध्य किया गया। पूरे घटनाक्रम के वीडियो सार्वजनिक हो चुके हैं । लेकिन राहुल गाँधी मणिपुर और कश्मीर घाटी के लोगों का दर्द जानने तो गए किंतु आज तक मुर्शिदाबाद का नाम तक नहीं लिया। अखिलेश, तेजस्वी, केजरीवाल, ओवैसी, उद्धव, पवार, स्टालिन और वामपंथी नेताओं को भी वहाँ आने की फुर्सत नहीं मिली क्योंकि मारने वाले मुस्लिम थे।  प. बंगाल में हालात जिस तरह बिगड़े उनको देखते हुए केंद्र सरकार को प्रभावी कदम उठाना होंगे। ममता बैनर्जी तो मुस्लिम प्रेम में अंधी हो चुकी हैं इसलिए उनसे कोई अपेक्षा व्यर्थ है। इस बारे में ये आशंका गलत नहीं है कि यदि मौजूदा स्थिति बनी रही तो प. बंगाल के सीमावर्ती जिले भी कश्मीर घाटी जैसे हो जायेंगे जहाँ हिंदुओं का रहना असंभव होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 May 2025

ट्रम्प की मूर्खता से अमेरिका की चौधराहट खतरे में

मेरिका के पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन का मुख्य सलाहकार जॉर्ज सोरोस  था जिनकी   छवि तो सटोरिया, निवेशक और सामाजिक कार्यकर्ता क थी किंतु असलियत में वह एक षडयंत्रकारी  था  जिसकी रुचि विश्व राजनीति में हलचल पैदा करने में थी। चूंकि बाइडेन में वह क्षमता नहीं थी जो अमेरिका के राष्ट्रपति से अपेक्षित है इसलिए वे  सोरोस के चंगुल में फंसते गए। यूक्रेन , गाजा और बांग्लादेश आज जिस  हालात से गुजर रहे हैं उनके लिए बाइडेन को ही कसूरवार माना जाता है। लेकिन परदे के पीछे पूरा कुचक्र सोरोस ने ही रचा था। भारत के लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने के लिए भी उसने  व्यूहरचना की । हिंडनबर्ग नामक संस्थान द्वारा उद्योगपति गौतम अडानी के विरुद्ध रिपोर्ट प्रकाशित कर भारतीय शेयर बाजार को तहस - नहस करने का जाल बुना ताकि विदेशी निवेशक भारत से बिदकने लगें। लेकिन वह गुब्बारा फूट गया। बाइडेन के हटते ही हिंडनबर्ग ने बोरिया बिस्तर समेट लिया । नरेंद्र  मोदी को सत्ता से हटाने के लिए बाइडेन और सोरोस ने काफी प्रयास किये लेकिन  श्री मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की शुरुआत में बाइडेन समर्थित कमला हैरिस मजबूत नजर आ रही थीं किंतु धीरे - धीरे डोनाल्ड ट्रम्प ने रफ्तार पकड़ी और अमेरिकी राष्ट्रवाद का मुद्दा उछालकर बाजी अपने पक्ष में कर ली। रोचक बात ये रही कि ट्रम्प के पक्ष में अमेरिका के चर्चित धनकुबेर एलन मस्क खुलकर खड़े हो गए। चुनाव जीतते ही अपनी प्रशासनिक जमावट के लिए ट्रम्प ने जिस तरह से मस्क को खुला हाथ दिया  उसकी पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी। महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उनकी निर्णायक भूमिका रही। इसके कारण कहा जाने लगा कि जिस तरह बाइडेन को सोरोस ने अपने चंगुल में फंसा रखा था ठीक वैसे ही ट्रम्प पर मस्क का शिकंजा कस चुका है। जब अमेरिका ने विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध शुरू किया तब उसे भी मस्क के दिमाग की उपज बताया गया। भारत में टेस्ला वाहनों के आयात पर कम शुल्क लगाए जाने के लिए ट्रम्प ने भारत पर जो दबाव बनाया उसके पीछे भी मस्क को उपकृत करना ही था। लेकिन धीरे - धीरे ट्रम्प ने जिस सनकीपने का प्रदर्शन किया उसकी वजह से पूरी दुनिया में वे हंसी का पात्र बनने लगे। युक्रेन - रूस का युद्ध रुकवाने के उनके दावे फुस्स हो गए। जब यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की  मिलने गए तब ट्रम्प ने उनको अपमानित कर बाहर जाने कह दिया क्योंकि उन्होंने इकतरफा युद्धविराम करने से मना कर दिया। तब लगा था वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ हैं किंतु हाल ही में उन्होंने उनके बारे में भी हल्की टिप्पणियां कर डालीं। चीन पर अनाप शनाप टैरिफ थोपने के बाद वे राष्ट्रपति जिनपिंग को दोस्त बताने लगे और चीन से   समझौते में टैरिफ 145 से घटाकर 30 प्रतिशत पर ले आये। इसी तरह वे श्री मोदी से अपनी निकटता का ढोल पीटते हैं किंतु भारत पर भी बढ़े हुए टैरिफ थोपने की धौंस देने से बाज नहीं आते। हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य टकराव में ट्रम्प ने जिस तरह का जोकरपना दिखाया उससे अमेरिका के राष्ट्रपति पद की गरिमा तार - तार हो गई। युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटने के बारे में उन्होंने बदल - बदलकर जो बयान दिये उससे उनकी तो किरकिरी हुई ही अमेरिका की भी साख गिरी। अपने पड़ोसी कैनेडा को वे अमेरिका का राज्य बनने धमका रहे हैं। ग्रीनलैंड हथियाने के उनके इरादे से पूरा यूरोप दहशत में है। दरअसल विश्व की अर्थव्यवस्था को हिलाने के फेर में वे अपने देश की माली हालत खराब कर रहे हैं। एपल फोन बनाने वाली कंपनी को भारत के बजाय अमेरिका में उत्पादन करने की सलाह के साथ वे धमकी दे बैठे कि भारत में बने फोन पर अमेरिका 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगा देगा। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस बुलाकर उनके साथ जो व्यवहार ट्रम्प ने किया वह राजनायिक शिष्टाचार का तो खुला उल्लंघन था ही , मेजबानी के लिहाज से भी बेहूदगी थी।  इन हरकतों से पूरी दुनिया में उनकी थू - थू होने के साथ ही अमेरिका की छवि को भी क्षति पहुंची है। उसके परंपरागत मित्र भी किनारा करते जा रहे हैं। यूरोप ने अपनी सैन्य और आर्थिक सुरक्षा के लिए अमेरिका पर अपनी निर्भरता खत्म करने के लिए कदम बढ़ा दिये हैं। अब ताजा खबर ये है कि एलन मस्क ने भी ट्रम्प का साथ छोड़ने का ऐलान कर दिया है। वे उनके नीतिगत निर्णयों से असहज अनुभव करने लगे हैं। ऐसा लगता है ज्यादा होशियारी दिखाने के फेर में ट्रम्प मूर्खता पर मूर्खता करते गए जिनकी वजह से अमेरिका दुनिया में अलग - थलग पड़ता जा रहा है। घरेलू मोर्चे पर भी वे लगातार आलोचनाओं का शिकार हो रहे हैं। उनकी सनक हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय पर भी भारी पड़ रही है। वीजा नीतियों के कारण अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की धड़कनें तेज हैं। भले ही वे दावा करें कि उनकी आर्थिक नीतियाँ और कूटनीतिक निर्णय अमेरिका और उसकी जनता के हित में हैं किंतु उनका दुष्परिणाम दुनिया के इस चौधरी की चौधराहट खत्म होने के रूप में सामने आ रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 28 May 2025

कोरोना पहले से कम खतरनाक किंतु असावधानी घातक हो सकती है


देश में कोरोना का आगमन हो चुका है। इक्का - दुक्का मामलों से शुरू होकर संख्या एक हजार के करीब पहुँच रही है। कुछ मौतें भी हो चुकी हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक इस बार भी  इसका संक्रमण दक्षिण एशिया के देशों से ही आया है लेकिन ये नया वैरिएंट  उतना खतरनाक नहीं है जितना 2020 और 2021 के दौरान देखने मिला था। हालांकि उसके बाद वाले वर्षों में भी दुनिया के अनेक देशों में कोरोना के शिकार लोग मिलते रहे किंतु महामारी के उस भयावह दौर की तुलना में वह समुद्र में एक बूंद जैसा था। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि कोरोना वायरस न समाप्त हुआ और न होगा लेकिन वह कमजोर होता जाएगा और इसीलिये 2021 के बाद उसका प्रकोप और विस्तार पूर्वापेक्षा कम हो गया। अभी कोरोना का जो  संक्रमण आया उससे पीड़ित मरीज कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो रहे हैं और तकलीफ भी काफी साधारण है। सर्दी, खाँसी और बुखार जैसे सामान्य लक्षण ही कोरोना के संकेत हैं। हालांकि जिन लोगों को पहले टीके ( वैक्सीन) लग चुके थे उनको कोरोना होने पर भी वे जल्द स्वस्थ हो गए। लेकिन टीका लगवाने वाले व्यक्ति को ये खुशफहमी दिल से निकाल फेंकना चाहिए कि उसके पास ऐसा रक्षा कवच है जिसके कारण वह कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। अब तक जितने भी लोग  कोरोना से संक्रमित हुए उनमें से ज्यादातर लोग टीका लगवा चुके थे। फ़ायदा ये हुआ कि उन पर  इलाज का असर उन लोगों की तुलना में अधिक हुआ जिन्होंने  टीका नहीं लगवाया था। ऐसे में भले ही बीमारी का आक्रमण पहले जैसा शक्तिशाली न हो किंतु सावधानी हटी ,दुर्घटना घटी वाला सूत्र इस मामले में भी पूर्णरूपेण  लागू होता है। इसलिए इसके पहले कि कोरोना दोबारा महामारी का रूप ले, लोगों में। बचाव के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना आवश्यक है। बीमार होने के बाद इलाज करवाना तो मजबूरी होती है किंतु यदि पहले से ही सावधानी रखें तो बचाव भी सम्भव है, विशेष रूप से जब बीमारी संक्रामक और विश्वव्यापी हो तब तो सतर्कता और भी जरूरी है। हालांकि एक बात अच्छी है कि कोरोना के  लक्षण और उसके उपचार के प्रति ज्यादातर लोग अवगत हैं। पिछली दोनों लहरों के बाद बीमारी के बारे में चिकित्सा विज्ञान में काफी शोध हो चुके हैं जिसकी वजह से  कारगर दवाइयों का भी उत्पादन होने  लगा है। टीके भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। बावजूद इसके कभी - कभी वायरस की चालाकी के सामने इंसान असहाय होकर रह जाता है क्योंकि वह तेजी से रूप बदलने में माहिर होता है। इसलिए जरूरी है कि भले ही कोरोना के नये वेरिएंट को पहले जितना खतरनाक न माना जा रहा हो लेकिन उसे हल्के में लेना जानलेवा हो सकता है। इस बारे में ध्यान रखना होगा कि कोरोना की पहली लहर का सफलतापूर्वक सामना करने के कारण देश में जो बेफिक्री आई उसका दुष्परिणाम दूसरी लहर में कई गुना ज्यादा मौतों के रूप में सामने आया। ये देखते हुए पिछली गलतियों से सबक लेकर हरसंभव सावधानी बरतने की जरूरत है। लोगों में भय फैलाने की बजाय उनमें कोरोना से बचाव हेतु सामान्य सावधानियों का पालन करने के प्रति दायित्व बोध जागृत करने की आवश्यकता है। ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय विदेश यात्रा पर जाते हैं। इसी तरह अन्य देशों के काफी नागरिक भारत आते हैं। इसलिए  संक्रमण का खतरा बना रहेगा । सरकार के अलावा विभिन्न राजनीतिक दलों और समाजसेवी संगठनों को चाहिए वे लोगों को कोरोना से बचने के लिए सावधानी के लिए प्रेरित करने आगे आएं। जनता को भी ये जान लेना चाहिए कि एक व्यक्ति के संक्रमित होने से उसका पूरा परिवार ही नहीं अपितु संपर्क में आने वाले हर किसी को कोरोना अपनी चपेट में ले सकता है। लिहाजा भीड़ भरी जगहों पर मास्क का उपयोग एक आदत बना लेना चाहिए। इसके अलावा  हाथ मिलाने जैसे अभिवादन के तौर - तरीकों के स्थान पर भारतीय संस्कृति में प्रचलित नमस्कार की आदत डाली जाए। अकारण भीड़ वाले क्षेत्रों में जाने से परहेज करना भी जरूरी है। खान - पान की शुद्धता भी संक्रमण से बचाने में सहायक होती है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि पिछली बार कोरोना चिकित्सकों और आम जनता दोनों के लिए अपरिचित था किंतु इस बार उसकी पदचाप स्पष्ट  महसूस की जा सकती है । इसलिए  सरकार की चेतावनी का इंतजार किये बिना ही सतर्क होना  जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 27 May 2025

बेहतर है पार्टी के प्रति वफ़ादारों को महत्व दें राहुल

हुल गाँधी भले ही कांग्रेस संगठन के किसी पद पर न हों किंतु पार्टी उन्हीं की मनमर्जी से चलती है। दिखाने के लिये भले ही मल्लिकार्जुन खरगे अध्यक्ष हैं किंतु निर्णय प्रक्रिया पर  राहुल का नियंत्रण रहता है। हालांकि  इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं क्योंकि वे प्रधानमंत्री पद हेतु  पार्टी का चेहरा हैं। भाजपा में भी जब तक अटल जी रहे तब तक उनके सामने सब बौने थे और आज वही  स्थिति  नरेंद्र मोदी की है। इसीलिए कांग्रेस में किसी भी नीतिगत निर्णय में श्री गाँधी की निर्णायक भूमिका रहती है।  अध्यक्ष चाहे उनकी माताजी सोनिया गाँधी रहीं या वे स्वयं, सारे फैसले उन्हें केंद्र में रखकर ही हुए । यही वजह है कि चुनावी असफलता के लिए उन्हें ही जिम्मेदार माना गया। 2004 में जब डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार बनी तब शुरू में तो उसका श्रेय सोनिया जी के खाते में गया किंतु धीरे - धीरे संगठन और सत्ता की लगाम राहुल के हाथों आती गई जिसका प्रमाण उनके द्वारा भरी पत्रकार वार्ता में मंत्रीमंडल द्वारा स्वीकृत विधेयक की प्रति फाड़कर फेंकना था।  2014 से कांग्रेस के पराभव का दौर शुरू हो गया तब उसकी जिम्मेदारी लेते हुए श्री गाँधी ने अध्यक्ष पद भले छोड़ दिया लेकिन किसी सक्षम नेता को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बजाय अनिश्चितता बनाये रखी और अंततः सोनिया जी को कामचलाऊ अध्यक्ष बनाकर कमान अपने पास  रखी। एक के बाद एक राज्य हारते जाने के कारण पार्टी में असंतोष व्याप्त हुआ और जी- 23 नामक समूह बना जिसमें तमाम नामचीन चेहरे थे। उन्होंने पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र की आवाज उठाई किंतु बजाय उस पर ध्यान देने के असंतुष्टों को किनारे लगाने की मुहिम चली। उसके कारण अनेक ऐसे चेहरे पार्टी से बाहर आ गए जो गाँधी परिवार के वफादार माने जाते थे। बीच - बीच में कांग्रेस को कुछ राज्यों की सत्ता हासिल हुई किंतु उसका कारण प्रादेशिक नेता और स्थानीय परिस्थितियाँ ही रहीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी की वापसी और ज्यादा ताकत के साथ हुई तब ये लगा कि कांग्रेस का रसातल में जाना तय है। लेकिन कुछ राज्यों में सफलता मिलने से पार्टी की उम्मीदें बनीं रहीं जिनके कारण उसने इंडिया नामक विपक्षी दलों का गठन किया जिसने राहुल को अपना अघोषित उम्मीदवार मान लिया।  लेकिन 2023 में तीन राज्यों के चुनावों में भाजपा ने जबरदस्त वापसी कर कांग्रेस की वजनदारी तो घटाई ही श्री गाँधी की क्षमता पर भी सवालिया निशान और गहरे कर दिये। हालांकि विगत  लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उछलकर 99 तक आ गई किंतु उससे बड़ी बात रही भाजपा का बहुमत से पिछड़ जाना जिसके लिए मुख्य रूप से उ.प्र और महाराष्ट्र जिम्मेदार रहे। लेकिन पूरा विपक्ष मिलकर भी श्री मोदी की वापसी न रोक सका। राहुल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तो बन गये किंतु इंडिया गठबंधन को एकजुट रखने में विफल साबित हुए। नतीजा हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के रूप में सामने आया। कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राहुल को एकला चलो की नीति याद आई और वे पार्टी संगठन को ताकतवर बनाने में जुट गए। गुजरात से इसकी शुरुआत के बाद अब म.प्र में उनके आने की खबर है।  श्री गाँधी इन दिनों गद्दारों की खोज कर रहे हैं जिनके बारे में संदेह है कि वे भाजपा से मिले हैं। म.प्र में उनका आगमन भी इसी उद्देश्य को लेकर होने वाला है। लेकिन लगभग 20 साल से पार्टी  के शीर्ष पर बैठे श्री गाँधी ये नहीं समझ सके कि कांग्रेस की असली समस्या गद्दार नहीं बल्कि पार्टी में योग्य और वफादारों की उपेक्षा है जो भले ही गाँधी परिवार की हाँ में हाँ न मिलाएं किंतु पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा हर परिस्थिति में कायम रही। जिन प्रांतों में कांग्रेस लगातार पराभव का शिकार होती जा रही है उनमें भी चाटुकार प्रवृत्ति के नेताओं को महत्व दिया गया। पंजाब, राजस्थान, उ.प्र, म.प्र , छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में समय रहते सही लोगों को अवसर नहीं देने का दुष्परिणाम पार्टी भोग चुकी है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की कलह सतह पर है। कुल मिलाकर कांग्रेस में गाँधी परिवार के अलावा किसी को शक्तिशाली बनाने से परहेज करने की नीति  ही उसके लिए घातक साबित हो रही है। श्री गाँधी को    अब पार्टी में दरबारी संस्कृति के लोगों की बजाय ऐसे युवाओं को बागडोर सौंपना चाहिए जिनका अपना जनाधार भी हो। वरना वह अपनी मौजूदा दुरावस्था से उबर नहीं सकेगी। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता कितनी खोखली थी ये उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में साबित हो चुका है। और ये भी कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने प्रभाव क्षेत्र में कांग्रेस को किसी भी हालत में आगे बढ़ने नहीं देंगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 26 May 2025

वैश्विक स्तर के पर्यटन स्थल अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दे सकते हैं

नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राज्यों को सुझाव दिया कि वे कम से कम एक वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल विकसित करें । ऐसा होने पर विदेशी पर्यटक आकर्षित होंगे तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को संबल मिलेगा। कुछ वर्ष पूर्व  प्रधानमंत्री ने घरेलू पर्यटकों को  भारत दर्शन हेतु प्रेरित किया था। ये संयोग ही है कि नीति आयोग की उक्त बैठक के साथ ही ये जानकारी भी आ गई कि भारत , जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया। अब उससे आगे जर्मनी, चीन और अमेरिका ही हैं ।  वार्षिक विकास दर जिस  गति से बढ़ रही है उसे देखते हुए  जल्द ही हम जर्मनी से आगे निकलकर तीसरे स्थान पर आ जाएंगे जो बड़ी उपलब्धि होगी। प्रधानमंत्री ने नीति आयोग में आर्थिक नीतियों से जुड़ी चर्चा  करने के साथ हर राज्य में एक वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल विकसित करने की जो बात कही वह चौंकाने वाली हो सकती है किंतु उसके निहितार्थ को समझने पर उसका महत्व स्पष्ट हो जाता है। मसलन जब गुजरात में दुनिया की सबसे ऊँची  सरदार पटेल की मूर्ति स्थापित की गई तब उसे पैसे की बर्बादी बताते हुए उतना धन अन्य विकास कार्यों में लगाए जाने बात भी उठी। लेकिन ज्योंही वह मूर्ति स्थापित हुई , देखते - देखते वह पूरा इलाका विकसित होने लगा। अब वहाँ  हजारों सैलानी प्रतिदिन आते हैं। जिससे प्रतिमा पर व्यय की गई राशि से अधिक सरकार के पास लौट आई है। साथ ही उस उपेक्षित क्षेत्र के निवासियों को अकल्पनीय आर्थिक लाभ सैलानियों से होने लगा है। उसके बाद प्रधानमंत्री की पहल पर बनारस के ऐतिहासिक विश्वनाथ मन्दिर परिसर का सौंदर्यीकरण जब हुआ तब  बनारस में ही उसका पुरजोर विरोध हुआ। लेकिन जब वह  नये स्वरूप में सामने आया तो पर्यटकों की संख्या में कल्पनातीत वृद्धि हुई जिससे स्थानीय  अर्थव्यवस्था में भी जबरदस्त उछाल आया। उसके बाद अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर भी विघ्नसंतोषी तत्वों ने अनर्गल प्रलाप किया। लेकिन  निर्माण के एक वर्ष बाद ही अयोध्या  वैश्विक आकर्षण का केंद्र बन गयी। प्रयागराज में संपन्न महाकुंभ के दौरान जितने श्रृद्धालु आये उनमें से ज्यादातर ने अयोध्या और बनारस के साथ ही चित्रकूट की यात्रा भी की। मोटे अनुमान के  अनुसार महाकुंभ को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने के कारण  विदेशी पर्यटकों के अलावा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बसे भारतवंशी हिन्दू भी लाखों की संख्या में आये।  इससे  हर व्यवसाय को जबरदस्त कमाई हुई जिसका लाभ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को स्वाभाविक रूप से मिला। म.प्र में उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर परिसर का भी बनारस के विश्वनाथ मंदिर जैसा विकास किये जाने का सुपरिणाम वहाँ आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि के तौर पर देखने मिल रहा है। निकटवर्ती ओंकारेश्वर भी ऐसे ही परिणाम दे रहा है। इस सबसे उत्साहित होकर वृंदावन के प्रसिद्ध बिहारी  जी के मंदिर और गुवाहाटी की  कामाख्या शक्तिपीठ को भी विकसित करने का कार्य शुरू हुआ है।  प्रधानमंत्री की सोच ये है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता पूरे विश्व में अनोखी है। इसलिए प्रत्येक राज्य यदि अपने यहाँ कोई बड़ा पर्यटन केंद्र विकसित करे तो उसमें वहाँ की झलक होगी। बीते दो - तीन दशक में भारत में मध्यमवर्गीय परिवारों में भी पर्यटन के प्रति ललक पैदा हुई है। धार्मिक यात्राओं की तो परंपरा सदियों पुरानी है किंतु उसका स्वरूप बदला है। सड़कों के साथ ही अन्य सुविधाओं के विकास के कारण उत्तराखंड की चार धाम यात्रा उस पिछड़े राज्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान दे रही है।  राजस्थान के अलावा जिन राज्यों में पहाड़ी पर्यटन स्थल हैं वहाँ पर्यटकों का आना होता है किंतु आज भी ऐसे अनेक अछूते स्थान हैं जिनमें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों तो सैलानियों की आवाजाही में वृद्धि हो सकती है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में आदि कैलाश नामक स्थान पर जाकर उसका प्रचार किया जहाँ से छोटे कैलाश नामक पर्वत के दर्शन होते हैं। उसके बाद से ही वह स्थल तेजी से लोकप्रिय हो गया। कहने  का आशय ये है कि पर्यटन आधुनिक अर्थव्यवस्था में काफी महत्वपूर्ण हो गया है। विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के अलावा  उन भारतीय पर्यटकों को विदेश जाने से रोकने के लिए भी जरूरी है कि भारत के पर्यटन उद्योग को वैश्विक स्तर पर विकसित किया जाए। आज भी भारत दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र है किंतु आवश्यक सुविधाओं और पेशेवर कार्यशैली के अभाव में जितने सैलानी  आने चाहिए उतने नहीं आते। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद पर्यटन उद्योग को वैश्विक स्वरूप देना भी समय की मांग है क्योंकि इससे आर्थिक प्रगति को मजबूत आधार मिलता है। मालदीव, मॉरीशस, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और दुबई इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। और अब तो सऊदी अरब भी इस बारे में सोचने लगा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 May 2025

न्यायमूर्ति श्री ओक की टिप्पणी पर गंभीरता से विचार जरूरी


किसी और ने ये कहा होता तब शायद उस पर ध्यान नहीं जाता किंतु गत दिवस सेवा निवृत्त हुए  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अभय. एस. ओक ने विदाई भाषण में जो टिप्पणियां कीं वे न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और छवि को लेकर जारी विमर्श में एक नया आयाम जोड़ सकती है। उन्होंने  प्रधान न्यायाधीश की उपस्थिति में कहा  कि सर्वोच्च न्यायालय से  ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से उच्च न्यायालयों में काम होता है क्योंकि वे कमेटियों के जरिए कार्य करते हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय प्रधान न्यायाधीश केंद्रित है। उन्होंने मामलों में ऑटो लिस्टिंग की जरूरत पर बल देते हुए स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय  में एक निश्चित रोस्टर होता है। इसमें प्रधान न्यायाधीश  को भी विवेकाधिकार नहीं मिलता। इसलिए जब तक हम मानवीय हस्तक्षेप को  कम कम नहीं कर देते, तब तक हम बेहतर लिस्टिंग नहीं कर सकते। न्यायामूर्ति श्री ओक की उक्त टिप्पणी  सर्वोच्च न्यायालय के  उन तमाम न्यायाधीशों की पीड़ा की अभिव्यक्ति है जो इस बात से नाराज रहते हैं कि  कि कौन सा मामला किस न्यायाधीश को सौंपा जाए ये प्रधान न्यायाधीश की मर्जी पर निर्भर है। जनवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के 4 वरिष्ट न्यायाधीशों ने उसी  परिसर में पत्रकार वार्ता के जरिये तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर प्रशासनिक अनियमितताओं के जो आरोप लगाए थे उनके मूल में भी वही भाव थे जो श्री ओक द्वारा विदाई समारोह में व्यक्त किये। उनका ये कथन भी बेहद तीखा था कि सर्वोच्च न्यायालय उम्मीदों को पूरा नहीं कर सका।  श्री ओक ने जाते - जाते अपनी कर्तव्यपरायणता का परिचय देते हुए आखिरी कार्यदिवस पर  11 फैसले लिखे।एक दिन पहले ही उनकी माँ का निधन हुआ था जिनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के बाद वे दिल्ली लौट आये। हालांकि एक बात ये खटकती है कि उच्च पदों पर विराजमान महानुभाव अपने कार्यकाल के दौरान तो प्रचलित व्यवस्था के साथ जुड़कर काम करते रहते हैं और सेवानिवृत्त होने वाले दिन या उसके बाद वे उस उसके विरोध में मुँह खोलते हैं । आजकल भूतपूर्व होने के बाद किताबें लिखकर चर्चा में आने का चलन भी है। ये बात सही है कि पद पर रहते हुए उससे जुड़ी सेवा शर्तों की मर्यादा का पालन करना पड़ता है लेकिन किसी भी विवेकशील व्यक्ति से सदैव अपेक्षा रहती है कि वह सेवाकाल में भी गलत  बातों का विरोध करने का साहस दिखाये ।  पद से हटने के बाद ऐसी बातों को सम्बन्धित व्यक्ति के मन में असंतोष अथवा कुंठा से जोड़कर देखा जाता है। फिर भी  श्री ओक ने  विदाई भाषण में  सर्वोच्च न्यायालय के बारे में जो कुछ भी कहा  और सुझाव दिये वे निश्चित रूप से विचारणीय हैं। न्यायापालिका के बारे  में ये चर्चा आम है कि सुनवाई हेतु प्रकरणों के आवंटन में पक्षपात होता है। इसे न्यायपालिका में व्याप्त गुटबाजी के रूप में भी देखा जाता है।  सामान्य तौर पर  न्यायपालिका में व्याप्त बुराइयों की जो चर्चा होती है वह अपनी जगह है किंतु जब सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा प्रधान न्यायाधीश के सामने ही ये कहा जाए कि देश की सबसे बड़ी अदालत में शक्तियों का केंद्रीकरण उसके सबसे बड़े ओहदेदार के पास है तो ये बड़ी बात है। वैसे  न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार के आरोप अब चौंकाते नहीं हैं। किसी अधिकारी या राजनेता पर मामला दर्ज करने के लिए कुछ घंटों का समय देने और फिर लगाई गई धाराओं को कमजोर बताने वाली न्यायपालिका उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के  यहाँ करोड़ों रूपये नगद जप्त होने के बाद भी अब तक पुख्ता कारवाई नहीं कर पाई। इसीलिए न्यायमूर्ति श्री ओक का ये कहना उचित प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने आपको उम्मीदों पर खरा साबित नहीं कर सका। देखना ये है कि  मामलों के आवंटन में प्रधान न्यायाधीश की मनमर्जी का जो मुद्दा श्री ओक ने जाते - जाते छेड़ दिया उस पर प्रधान न्यायाधीश श्री गवई क्या कदम उठाते हैं या फिर रात गई, बात गई की तर्ज पर इस विषय को भी उन प्रकरणों की तरह ठंडे बस्तों में डाल दिया जाएगा जो दशकों से लंबित पड़े हुए है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 May 2025

बांग्लादेश भी पाकिस्तान की तरह बर्बादी के कगार पर



पाकिस्तान के हालात गंभीर हैं। बलूचिस्तान में  विद्रोही सेना पर भारी पड़ रहे हैं। सिंध  तो दशकों से अलगाव की मांग कर रहा है।  लेकिन पश्चिमी सीमा पर  खैबर पख्तूनवा इलाके में अलग देश के लिए संघर्ष नई समस्या है।   विभाजन के समय  स्व. खान अब्दुल गफ्फार खान ने पृथक पख्तूनिस्तान की मांग की थी । बलूचिस्तान ने भी अलग देश माँगा था किंतु ब्रिटिश सरकार ने दोनों मांगों को ठुकरा दिया। पाकिस्तान की सत्ता पर ज्यादातर पंजाब प्रांत के नेताओं का कब्जा रहा। सेना के उच्च पदों पर भी पंजाबी ही  रहे। उस क्षेत्रीय असंतुलन  की परिणिती बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनवा  और सिंध में  बगावत के रूप में हो रही है। दरअसल पाकिस्तान ने 1971 में  बांग्लादेश बनने से कोई सबक नहीं सीखा। इसलिए वह दोबारा खंडित होने के कगार पर है तो इसके लिए उसकी जन्मजात भारत विरोधी सोच ही जिम्मेदार है। बजाय विकास के उसने अनाप - शनाप धन भारत से लड़ने के लिए सेना पर खर्च किया। जब सीधे तौर पर नहीं जीत पाया तब आतंकवाद की शक्ल में छद्म युद्ध शुरू किया जो  उसी के गले का फँदा बन गया क्योंकि जैसा सेना , सत्ताधीशों पर दबाव बनाती है वही आतंकवादियों के मुखिया करने लगे । पाकिस्तान के हुक्मरान जिस  तरह सेना की अनुचित मांगों के सामने नत मस्तक रहा करते हैं वही स्थिति आतंकवादी संगठनों के नेताओं ने बना रखी है। उनको ठिकाने बनाने हेतु जगह देने के अलावा आर्थिक संसाधन भी उपलब्ध करवाये जाते हैं। सेना उनके लिए प्रशिक्षण और हथियारों की व्यवस्था कर उन्हें जम्मू - कश्मीर में गड़बड़ी फैलाने हेतु भेजती है। एक माह पूर्व पहलगाम में हुआ हमला ताजा उदाहरण है किंतु इसका जो करारा जवाब भारत ने दिया उसने पाकिस्तान की कमर तोड़कर रख दी। आर्थिक दृष्टि से कंगाली से गुजर रहे इस देश के सामने अपनी अखंडता की रक्षा करने की जो समस्या आ खड़ी हुई उसके लिए वह स्वयं दोषी है जो कभी अमेरिका और ब्रिटेन के उकसावे में भारत विरोधी नीतियों में उलझकर तबाह होता रहा और अब चीन उसे भारत से भिड़वा रहा है।  इस देश का दुर्भाग्य ही है कि उसे उन्हीं हालातों से आज भी रूबरू होना पड़ रहा है जो मो. अली जिन्ना ने 1947 के पहले मुस्लिमों का अलग देश बनवाने उत्पन्न किये थे। लेकिन 25 साल पूरे होने के पहले ही पूर्वी पाकिस्तान नामक  हिस्सा  अलग होकर बांग्लादेश बन गया। वह शुरुआत में तो सही रास्ते पर चलता दिखा किंतु चार साल के भीतर ही उसके राष्ट्रपिता शेख मुजीब की हत्या कर सेना प्रमुख जिया उर रहमान ने सत्ता हथियाकर साबित कर दिया कि भारत विरोध का भाव इस देश के खून में भी समाया है। मुजीब को सत्ता में लाने में भारत का बड़ा हाथ था इसलिए वे हमारे साथ मधुर संबंधों के पक्षधर रहे किंतु सत्ता संभालते ही जिया ने पाकिस्तान  जैसी भारत विरोधी मानसिकता को अपना लिया। धीरे - धीरे   हिंदुओं पर अत्याचार होने लगे और उनके धर्मस्थलों को तोड़ने का सिलसिला  चल पड़ा । हिंदुओं की जनसंख्या में लगातार  कमी आना  ये जताता है कि बांग्लादेश पाकिस्तान से होने के बाद भी  हिन्दू विरोधी भावना से बाहर नहीं आ सका। मुजीब की बेटी शेख हसीना के शासन में हालांकि  दोनों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक संबंध सुधरने के अलावा अन्य विवादों का भी हल हुआ किंतु बीते साल वहाँ हसीना सरकार के विरुद्ध  छात्र आंदोलन ने हिंसक  रूप ले लिया जिसके कारण उनको देश छोड़कर भारत आना पड़ा और सेना की मदद से बनी अंतरिम सरकार का मुखिया अमेरिका में बैठे नोबल पुरस्कार से सम्मानित   मो. युनुस को बना दिया गया जो वामपंथी सोच के माने जाते हैं। उनको जल्द चुनाव करवाकर नई सरकार को सत्ता सौंपना था किंतु  वे चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को घेरने का षडयंत्र बनाने लगे। जिस पाकिस्तान के अत्याचार के कारण ये देश बना आज वह उसी के साथ खड़ा नजर आ रहा है। खबर तो यहाँ तक भी है कि दोनों को दोबारा एक करने के लिए चीन कोशिश में है। लेकिन भारत विरोधी मुहिम में युनुस असली समस्या से मुँह चुराते गए। इसकी वजह से  अर्थव्यवस्था की तेज गति रुक गई। उत्पादन घटने से बेरोजगारी बढ़ने लगी और  तब जिन छात्रों ने हसीना की सत्ता को उखाड़ फेंका वही युनुस के खिलाफ सड़कों पर उतर आये। उनके साथ ही सेना प्रमुख ने भी युनुस को धमकी दे दी कि वे दिसम्बर तक चुनाव करवाकर चुनी हुई सरकार के हवाले सत्ता कर दें। अन्यथा सेना उन्हें हटाकर खुद देश की कमान संभाल लेगी। सेनाध्यक्ष की चेतावनी के बाद युनुस ने त्यागपत्र की पेशकश की है। उधर बीएनपी नामक पार्टी भी चुनाव के लिए दबाव बना रही है। छात्र संगठन और सेना की दोहरी धमकी के  बाद युनुस घिर गए हैं। जिन हालातों में उन्होंने सत्ता संभाली थी आज स्थिति उससे कई गुना खराब हो चुकी है। भारत ने जो प्रतिबन्ध बांग्लादेश पर लगाए उनसे  जबरदस्त नुकसान हो रहा है किंतु उसके बाद भी युनुस का भारत विरोधी रवैया जारी है। ये देखते हुए लगता है यह देश भी पाकिस्तान की तरह से ही बर्बादी और बदहाली की ओर बढ़ता जा रहा है। बड़ी बात नहीं सेना युनुस को बेदखल करते हुए सत्ता पर काबिज हो जाए। ऐसी स्थिति में वहाँ पाकिस्तान जैसे ही गृहयुद्ध के आसार बने बिना नहीं रहेंगे। भारत को इससे सतर्क रहना होगा क्योंकि इसके कारण शरणार्थियों का सैलाब भारत आ सकता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 May 2025

नक्सलवाद का सफाया देश हित में


छत्तीसगढ़ के अबू झामड़ क्षेत्र  में सुरक्षा बलों ने गत दिवस हुई मुठभेड़ में 30 नक्सली मार गिराए जिनमें 1 करोड़ का इनामी नक्सली नेता बसवराज भी शामिल था। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार इस वर्ष अभी तक लगभग 200 नक्सलवादी मौत के घाट उतारे जा चुके हैं। केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद एक तरफ जहाँ सीमाओं की सुरक्षा पर काफी ध्यान देते हुए सेना को आधुनिकतम अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित किया गया वहीं चीन के समर्थन से गृहयुद्ध के जरिये भारत में खूनी क्रांति के जरिये लोकतंत्र के स्थान पर एकदलीय साम्यवादी शासन व्यवस्था स्थापित करने के लिए प्रयासरत नक्सलवादियों के सफ़ाये के लिए भी निर्णायक कार्रवाई की पुख्ता तैयारी की गई। शुरुआत में तो इसका असर उतना नहीं दिखा लेकिन धीरे - धीरे नक्सलियों की घेराबंदी में सुरक्षा बलों को सफलता मिलने लगी। चूंकि उनका जाल बिहार, झारखंड, म.प्र, आंध्र, उड़ीसा, प. बंगाल, तेलंगाना, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में फैला हुआ है इसलिए उनकी जड़ें काटना आसान नहीं था। छत्तीसगढ़  नक्सलियों की मनपसंद जगह है क्योंकि इस राज्य से कई राज्यों की सीमाएं मिलने से नक्सली किसी भी बड़ी वारदात के बाद दूसरे राज्य में जाकर छिप जाते थे। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि उक्त सभी राज्यों में आदिवासी जनसंख्या काफी है जो ज्यादातर वनाच्छादित क्षेत्रों में निवास करती है। उन भोले - भाले आदिवासियों को बहला - फुसलाकर अपने जाल में फंसाकर ये उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलग करते हुए उनके मन में व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना भरकर हिंसा के रास्ते पर धकेल देते जिसमें लौटने की गुंजाइश नहीं रहती। इन नक्सलियों को चीन से शस्त्र और आर्थिक संसाधन के साथ ही प्रशिक्षण आदि की सुविधा मिलती रही। लेकिन देश के भीतर भी उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले कम नहीं हैं जिन्हें नक्सलियों द्वारा की गईं नृशंस हत्या तो शोषण के विरुद्ध उठाई आवाज प्रतीत होती है किंतु जब इनके विरुद्ध कोई कार्रवाई होती है तब उसे मानव अधिकारों का उल्लंघन प्रचारित कर छाती पीटी जाती है। ये वर्ग, शिक्षा, साहित्य, कला, संस्कृति के अलावा समाचार माध्यमों में घुसा हुआ है जिसे शहरी नक्सली कहा जाने लगा है। इन शहरी नक्सलियों द्वारा जंगलों में फैले सशस्त्र माओवादियों का बौद्धिक अभिवावक भी कहा जा सकता है जो समाज में वामपंथी विचारधारा के महिमामंडन में जुटा रहता है। इन शहरी नक्सलियों पर किसी भी तरह की कार्रवाई शुरू होते ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का हल्ला मचाया  जाने लगता है जिसमें कतिपय बुद्धिजीवी और यू  ट्यूबर पत्रकार शामिल रहते हैं। मोदी सरकार के आने के बाद नक्सलियों के सफ़ाये का जो संकल्प लिया गया उसको रुकवाने के लिए तरह - तरह के प्रयास हुए किंतु गृह मंत्री अमित शाह की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने तमाम आलोचनाओं और अवरोधों से विचलित हुए बिना अभियान जारी रखा जिसके सुपरिणाम लगातार आ रहे हैं। श्री शाह काफी दिनों पूरे आत्मविश्वास से कहते आ रहे हैं कि मार्च 2026 तक नक्सलियों को समूल नष्ट कर दिया जाएगा। पहले उनके इस आशावाद को कोरा प्रोपेगंडा माना जाता था किंतु उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपनी आवाजाही बनाये रखते हुए सुरक्षा बलों और सरकार के बीच बेहतर समन्वय कायम किया। राज्य सरकारों के साथ भी केन्द्र ने अच्छा तालमेल बनाया। साथ ही उन राजनीतिक ताकतों का पर्दाफ़ाश भी किया जो अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए नक्सलियों का इस्तेमाल किया करते थे। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि जो आदिवासी इलाके नक्सलियों के प्रभावक्षेत्र में थे वे विकास की दौड़ में पिछड़ गए क्योंकि उनके आतंक के कारण सड़क, बिजली , शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं हो पाया। अनेक घटनाएं ऐसी हुईं जिनमें विकास कार्यों में लगे मजदूरों तक पर नक्सली आतंक का कहर बरसा। सरकारी अमले की बेरहमी से हत्या की भी सैकड़ों घटनाएं हो चुकी हैं। खनिज संपदा संपन्न क्षेत्रों में अवैध वसूली भी नक्सलियों की कार्य पद्धति का मुख्य स्रोत रहा है। धीरे - धीरे नक्सली पेशेवर अपराधी में बदलते गए। लेकिन उनकी देश विरोधी नीतियां असहनीय हो चली थीं। ऐसे में वे आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए थे। केन्द्र सरकार ने उनके सफाये के लिए जो ठोस कदम उठाये वे पूरी तरह देश हित में हैं। नक्सलवाद देश की अखंडता के लिए बड़ा खतरा बन गया था इसलिए उसका सफाया पूरी तरह आवश्यक है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 21 May 2025

राहुल और कांग्रेस ने छवि सुधारने का मौका गँवा दिया



पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में पाकिस्तान में आतंकवादियों के अनेक अड्डे ध्वस्त करने के अलावा सैन्य प्रतिष्ठानों पर मिसाइलें दागकर अपनी ताकत दिखा दी। उससे घबराकर पाकिस्तान ने युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा जिसे मंजूर कर लिया गया क्योंकि पहलगाम हत्याकांड की सजा उसको मिल गई थी। उसके बाद  केंद्र सरकार ने उसके आतंकवादी चेहरे को अनावृत करने के लिए कूटनीतिक  घेराबंदी करने हेतु  सांसदों के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में भेजने का ऐलान किया । हालांकि पहलगाम हमले के बाद से ही  कुछ राजनीतिक दलों ने सरकार विरोधी मोर्चा खोल दिया था और अभी तक उनकी कोशिशें जारी हैं। पाकिस्तान द्वारा भारत के लड़ाकू विमान गिराए जाने के दुष्प्रचार को सही मानते हुए कांग्रेस नेता राहुल गाँधी आरोप लगा रहे हैं कि पाकिस्तान ने हमारे अनेक रफाल लड़ाकू विमान मार गिराए । दरअसल इसके पीछे रफाल सौदे  के  विवाद को  ताजा करने की मंशा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी ऑपरेशन सिंदूर को छिटपुट बताकर भारतीय सैन्य कौशल का अपमान  किया। वहीं युद्धविराम के बारे में भी सेना और सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी पर  संशय किया जाता रहा।  इसके बाद भी सरकार ने जब सांसदों के प्रतिनिधिमण्डल विभिन्न देशों में भेजने का फैसला किया तब उसमें सभी प्रमुख दलों के सांसदों को शामिल किये जाने के साथ ही क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान रखा । पहलगाम  हमले के बाद पाकिस्तान पर कार्रवाई  के लिए समूचे विपक्ष ने सरकार को समर्थन देकर जिस दायित्वबोध का परिचय दिया उसका सम्मान करते हुए इन प्रतिनिधिमंडलों को आकार दिया गया। लेकिन पहले कांग्रेस और फिर तृणमूल कांग्रेस ने विरोध के लिए विरोध करने की नीति अपनाई। कांग्रेस को आपत्ति है कि उसके द्वारा दिये नामों में शशि थरूर का नाम नहीं होने के बाद भी उनको एक प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाया गया। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के सांसद क्रिकेटर युसुफ पठान को प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया किंतु पार्टी के दबाव में उन्होंने इंकार कर दिया  और उनकी जगह ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी को भेजा जा रहा है। सभी सात दलों में मुस्लिम सांसदों के अलावा  गुलाम नबी आजाद , सलमान खुर्शीद , एम.जे.अकबर और आनंद शर्मा जैसे पूर्व सांसद भी हैं जिन्हें  अनुभव के कारण चुना गया। ईसाई और सिख प्रतिनिधियों के होने से यह भारत की सर्व धर्म समभाव की नीति का प्रतिबिंब है वहीं राष्ट्रीय के साथ ही क्षेत्रीय दलों के सांसद होने से राष्ट्रीय एकता भी परिलक्षित होती है। असदुद्दीन ओवैसी के साथ मुस्लिम लीग के सदस्य को प्रतिनिधिमंडल में शामिल करना इस मिशन की पारदर्शिता का प्रतीक है। लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता और राहुल गाँधी के बेहद करीबी जयराम रमेश इन प्रतिनिधिमंडलों को उन सवालों से  ध्यान भटकाने का प्रयास बता रहे हैं जो श्री मोदी से पूछे जा रहे हैं। उधर उद्धव ठाकरे के खासमखास संजय राउत ने  प्रतिनिधिमंडलों को बारात नाम देकर उन्हें भेजे जाने पर प्रश्न उठाया।  लेकिन  शरद पवार ने उनको लताड़ते हुए  घटिया सोच से बचने की नसीहत देते हुए याद दिलाया कि शिवसेना ( उद्धव) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल की गई हैं। श्री पवार की बेटी सुप्रिया  भी एक दल की नेता बनाई गईं हैं।  वरिष्ट कांग्रेस नेता  सलमान खुर्शीद ने ये कहते हुए कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी कि जो युद्धविराम हुआ वह भारत और पाकिस्तान दोनों का आपसी फैसला था जिसमें किसी तीसरे के हस्तक्षेप की बात गलत है। मोदी सरकार के सबसे कटु आलोचक असदुद्दीन ओवैसी तथा उमर अब्दुल्ला सहित अन्य दलों ने भी राजनीतिक विरोध को राष्ट्रीय संकट के समय दरकिनार कर दिया किंतु कांग्रेस अपनी कुंठा से उबर नहीं पा रही जबकि ये मौका था जब पार्टी और राहुल दोनों अपनी छवि सुधार सकते थे। प्रतिनिधिमंडल में श्री थरूर के चयन  पर नाराज होते समय कांग्रेस ये  भूल गई कि वे विदेशी मामलों की संसदीय सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं। मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी बताने वाले अनेक मुस्लिम सांसद और नेताओं ने सहर्ष प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बनना स्वीकार किया सिवाय युसुफ पठान के । भारत  के इस कूटनीतिक दाँव से पाकिस्तान हतप्रभ है। उसके कुछ सांसद और राजनीतिक विश्लेषक ये कहते आ रहे हैं कि भारत में मोदी सरकार का बहुत विरोध है। इसके लिए वे अनेक नेताओं और व्यक्तियों के बयानों का हवाला देना नहीं भूलते किंतु इन सात प्रतिनिधिमंडलों के जरिये भारत सरकार ने उस पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया। आम आदमी पार्टी और सीपीएम जैसे दलों के सांसद भी विदेश जा रही टीमों का हिस्सा हैं। रही बात किसी दल से पूछकर उसके सांसद का चयन की तो अटल जी को जिनेवा जाने वाले प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाने से पहले स्व.पी.वी.नरसिम्हा राव ने क्या भाजपा से औपचारिक स्वीकृति ली थी? 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 20 May 2025

शरणार्थियों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी स्वागतयोग्य

बांग्ला देशी, रोहिंग्या और पाकिस्तान से आकर अवैध रूप से बसे लोगों को उनके देश वापस भेजने के किसी भी प्रस्ताव का विरोध घुसपैठियों से अधिक हमारे देश  के कतिपय राजनीतिक दलों द्वारा किया जाता है । ममता बैनर्जी तो घुसपैठियों को निकाल बाहर करने की बात उठते ही आग बबूला हो जाती हैं। गत दिवस  इस वर्ग को बिना नाम लिए लताड़ते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने श्रीलंका के एक नागरिक द्वारा  भारत में शरण दिये जाने की याचिका पर साफ शब्दों में कहा कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है जो यहाँ हर किसी को शरण दे। इसके पूर्व  मद्रास उच्च न्यायालय ने 2018  उसे 7 वर्ष की सजा सुनाते हुए आदेश दिया था कि वह देश छोड़ दे। साथ ही ये टिप्पणी  की थी कि क्या भारत दुनिया भर से आये शरणार्थियों की आव - भगत करेगा। उक्त श्रीलंकाई ने सर्वोच्च न्यायालय में श्रीलंका जाने के आदेश के विरुद्ध प्रस्तुत  याचिका में कहा कि उसकी पत्नी और बच्चा भारत में है। चूंकि वह श्रीलंका में  लिट्टे नामक आतँकवादी संगठन से जुड़ा रहा इसलिए उसे वहाँ लौटते ही गिरफ्तार कर किया जाएगा? सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कह दिया कि वह दूसरे देश में चला जाए क्योंकि भारत में बसने का अधिकार केवल यहाँ के मूल निवासियों को है। उल्लेखनीय है रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत से निकाले जाने के विरोध में प्रस्तुत याचिका पर भी न्यायालय ऐसी ही टिप्पणी कर चुका है। दुर्भाग्य से देश में एक वर्ग विशेष ऐसा है जो मानवीयता के नाम पर घुसपैठियों को वापस भेजने का विरोध करता आया है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला तो रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को अपने राज्य के सीमावर्ती इलाकों से हटाये जाने का विरोध करने से भी बाज नहीं आये। आज स्थिति ये है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या करोड़ों में जा पहुंची है जो अवैध तरीकों से आधार कार्ड जैसी जरूरतों को पूरा करने के बाद सभी सरकारी सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले नेता इनको संरक्षण प्रदान करते हैं जिससे बिहार, असम और प. बंगाल सहित देश के अनेक हिस्सों में जनसंख्या संतुलन गड़बड़ा चुका है और इन क्षेत्रों में सिवाय मुस्लिमों के दूसरा कोई चुनाव नहीं जीत सकता। इस कारण ये इलाके घुसपैठियों के आश्रय स्थल बन चुके हैं। नागरिकता संशोधन और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का देश के तमाम राजनीतिक दलों ने जिस प्रकार विरोध किया उसके पीछे दरअसल घुसपैठियों को संरक्षण देने की मानसिकता ही थी। गत माह पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार के बाद जब भारत सरकार द्वारा सभी पाकिस्तानी नागरिकों को  देश छोड़ने का आदेश देते हुए उनके वीजा रद्द किये तब ये खुलासा हुआ कि लाखों महिलाएं और पुरुष भारत में वीजा समाप्त होने के बाद भी अवैध तरीके से रह रहे थे। हजारों महिलाओं  ने ये कहते हुए अपना दुखड़ा रोया कि उनके पति पाकिस्तान में हैं जबकि वे बच्चों सहित भारत में। इसी तरह कुछ पत्नियाँ भी पाकिस्तानी होने के बावजूद भारत में पति के साथ बसर कर रही थीं। सरकारी फरमान जारी होते ही मानवीयता के ठेकेदारों ने छाती पीटना शुरू कर दिया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणियों ने सरकार के रुख को सही साबित कर दिया। भारत एक विशाल देश है जो अपने अतिथि सत्कार और मानवीय दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। विदेशी आक्रान्ताओं तक ने इस देश  में आकर अपनी जड़ें जमा लीं। इस्लाम और ईसाइयत दोनों ने विदेशी सत्ता के रूप में यहाँ पाँव जमाये जबकि पारसी यहाँ जान बचाकर आये। लेकिन आजादी के बाद भी पड़ोसी देशों से अवैध आवक होती रही। विशेष रूप से सीमावर्ती राज्यों में ये समस्या बढ़ती चली गई। 1970 में पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थियों के जत्थे आने शुरू हुए जिसके कारण युद्ध की स्थिति निर्मित हुई और बांग्लादेश के रूप में नया देश अस्तित्व में आया। 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्म समर्पण किया जिनको शिमला समझौते के बाद वापस लौटा दिया गया किंतु 1 करोड़ से ज्यादा जो शरणार्थी आये उनमें से इक्का - दुक्का छोड़ वापस नहीं लौटा। इसके बाद श्रीलंका में चले गृहयुद्ध के दौरान हजारों तमिल भाषी श्रीलंकाई नागरिक समुद्री मार्ग से तमिलनाडु में आ गए जिन्हें  करुणानिधि जैसे नेताओं ने अवैध रूप से बसा लिया। म्यांमार से जब रोहिंग्या मुस्लिमों को खदेड़ा गया तब वे भी भागकर भारत में घुस आये। अब ये समस्या विकराल हो चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने धर्मशाला शब्द का जो उपयोग किया वह पूरी तरह सही है। भारत सरकार को चाहिये वह इस बारे में कठोर होकर कार्रवाई करे। शरणार्थियों को मानवीय आधार पर पनाह देना अलग बात है किंतु वे यहाँ आकर मालिकाना हक जताने लगें ये देशहित में नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में ये बात स्मरणीय है कि धर्मशाला में भी किसी को दो - चार दिन से अधिक ठहरने की अनुमति नहीं मिलती। अपने देश में तो शरणार्थी पीढ़ियों से बसे हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 19 May 2025

सड़कों की तरह ही चिकित्सा क्रांति की जरूरत

प्र सरकार ने अपने कर्मचारियों को 20 लाख रु. तक की नगदी रहित चिकित्सा सुविधा प्रदान करने का जो निर्णय लिया वह समयोचित आवश्यकता है। सेवा निवृत हो चुके लोगों के लिए यह राशि 5 लाख रु. रखी गई है। इसी तरह बिना भर्ती हुए करवाये गए इलाज के लिए 20 हजार रु. की एकमुश्त राशि सालाना दिये जाने का प्रावधान भी किया गया है। मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव शासकीय अमले को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर काफी सम्वेदनशील हैं। उनका ये कहना पूरी तरह न्यायोचित है कि कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, पदोन्नति सहित उन्हें दी जाने सुविधाओं सम्बन्धी निर्णय लंबित रखा जाना उनके प्रति अन्याय है। उनकी इस टिप्पणी का आशय ये भी निकाला जा सकता है कि राजनेताओं को तो हर सुविधा समय पर प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध हो जाती परंतु कर्मचारी को अपने वाजिब अधिकार के लिए भी लंबा इंतजार करते हुए भटकना भी पड़ता है। और बातें  तो छोड़ दें किंतु जहाँ तक चिकित्सा खर्च का प्रश्न है तो केंद्र सरकार के कर्मचारियों को सी.जी.एच.एस के अंतर्गत सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में नगदी रहित इलाज की सुविधा है किंतु प्रदेश सरकार के कर्मचारियों को चिकित्सा व्यय के भुगतान के लिए उसी सरकारी भर्राशाही से जूझना पड़ता है जिसके वे भी हिस्से हैं। ये वास्तविकता है कि उन्हें अपने चिकित्सा बिलों का भुगतान हासिल करने के लिए भी घूस देनी पड़ती है। केवल कर्मचारी ही नहीं बल्कि अधिकारी वर्ग को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ता है। आई.ए.एस और आई.पी.एस वर्ग चूंकि आज भी ब्रिटिश काल वाले विशेषाधिकारों का सुख भोग रहा है इसलिए उनकी ज्यादातर जरूरतें प्राथमिकता के आधार पर पूरी हो जाती हैं। एक साधारण कर्मचारी या उसके आश्रित परिजन यदि गंभीर रूप से बीमार हो जाएं तब उन्हें स्थानीय स्तर पर ही इलाज करवाना पड़ता है क्योंकि बाहर किसी बड़े अस्पताल में इलाज के लिए यदि उसके पास पर्याप्त धनराशि न हो तब शासन से उसकी स्वीकृति प्राप्त करना कितना कठिन है ये सर्वविदित है। लेकिन कोई मंत्री, सांसद, विधायक, बड़ा प्रशासनिक अधिकारी उसकी जगह हो तो आनन फानन में एयर एंबुलेंस के जरिये उन्हें दिल्ली - मुंबई के किसी नामी - गिरामी अस्पताल में इलाज हेतु भेज दिया जाता है। और यदि कहीं किसी न्यायाधीश का स्वास्थ्य खराब हो तो फिर इंतजाम और भी शीघ्रता से किया जाता है। उस लिहाज से म.प्र के मुख्यमंत्री डाॅ. यादव की सरकार शासकीय कर्मचारियों को नगदी रहित इलाज की जो सुविधा प्रदान करने जा रही है वह बेहद सकारात्मक कदम है। ये बात सर्वविदित है कि आजकल इलाज बहुत महंगा है। बड़े - बुजुर्गों को तो छोड़ भी  दें किंतु छोटे - छोटे बच्चों का साधारण इलाज तक बेहद खर्चीला हो गया है।  सूचीबद्ध अस्पतालों में बिना भुगतान किये बिना 20 लाख रु. के इलाज की सुविधा मिलने से उक्त समस्याओं से काफी हद तक राहत मिल जायेगी। मुख्यमंत्री डाॅ. यादव ने सरकारी अमले की बेहतरी के बारे में हाल में जो कदम उठाये वे पूरी तरह से उचित हैं। लेकिन नगदी रहित इलाज सुविधा देने के बाद ये  सतर्कता रखनी होगी कि निजी अस्पतालों द्वारा आयुष्मान योजना और सी.जी.एच.एस जैसी सरकारी योजनाओं में किया  जाने वाला फर्जीवाड़ा न दोहराया जा सके। हालांकि ऐसा करना सामान्य रूप से असंभव प्रतीत होता है क्योंकि शासन की कोई भी योजना कितनी ही अच्छी हो किंतु उसमें भ्रष्टाचार नामक बीमारी घुस ही जाती है। इसलिए म.प्र के सरकारी सरकारी कर्मचारियों को 20 लाख तक के नगदी रहित इलाज की सुविधा भी उससे मुक्त रहेगी इसमें संदेह ही है ।  इसलिए सरकार को इस बारे में सतर्क रहना होगा। इसी के साथ ये बात भी विचारणीय है कि सरकार के जिला अस्पतालों और मेडीकल कालेजों के चिकित्सालयों को इतना उन्नत किया जाए जिससे कि शासकीय अधिकारी और कर्मचारी अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में करवाएं। दिल्ली में स्थित एम्स और विभिन्न राज्यों में खोली गईं उसकी शाखाओं में उच्चस्तरीय व्यवस्थाओं के कारण साधारण जन ही नहीं अधिकारी और नेतागण भी अपना इलाज करवाना पसंद करते हैं। दिल्ली के एम्स में तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक इलाज हेतु भर्ती होते हैं। हालांकि रातों - रात सर्वसुविधासंपन्न अस्पताल खड़ा करना आसान नहीं होता । इसके साथ ही ये समस्या भी है कि सरकारी चिकित्सा सेवाएं चिकित्सकों की कमी से जूझ रही हैं। इसके कारण प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करने में भी शासकीय तंत्र विफल दिखता है। युवा चिकित्सक निजी अस्पतालों से जुड़ना या प्रायवेट प्रैक्टिस करना पसंद करते हैं। शायद इसीलिए सरकार  निजी अस्पतालों में इलाज की सुविधा प्रदान कर रही है। लेकिन दीर्घकालीन सोच यही होनी चाहिए कि सड़क क्रांति की तरह से ही चिकित्सा क्रांति भी हो क्योंकि आबादी के अनुपात में  चिकित्सा सुविधाएं बहुत कम हैं। ये देखते हुए प्रदेश में चिकित्सा क्रांति का सूत्रपात होना समय की मांग है। बेहतर होगा मुख्यमंत्री इस दिशा में भी प्रयास करें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 17 May 2025

सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल : राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण




पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा  किये गए नरसंहार के बाद पूरे देश में गुस्से की लहर देखने मिली। उसके बाद आयोजित  सर्वदलीय बैठक में सभी दलों ने  पाकिस्तान पर समुचित कार्रवाई करने के लिए सरकार पूरे समर्थन का आश्वासन दिया । जब ऑपरेशन सिंदूर के जरिये भारत ने पाकिस्तान में आतंकवादियों के अड्डों को मिसाइलें दागकर ध्वस्त किया तब भी सभी पार्टियों ने सरकार के कदम का स्वागत करते हुए ये संदेश दिया कि  देश संकट में हो तब आपसी मतभेदों को भूलकर सब एकजुट हो जाते हैं। यद्यपि जब युद्धविराम की घोषणा हुई तो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तरह - तरह के तंज कसते हुए बांग्ला देश के निर्माण में स्व. इंदिरा गाँधी की भूमिका की प्रशंसा होने लगी। युद्धविराम के पीछे  सरकार का तर्क ये था कि उसका उद्देश्य पहलगाम की घटना के बाद आतंकवादियों की कमर तोड़ना था। इसीलिए भारतीय सेना के किसी भी अंग ने सीमा नहीं लांघी। धीरे - धीरे  युद्धविराम के  पक्ष में वातावरण  बनने लगा जिसकी बानगी कांग्रेस के  वरिष्ट नेता  पी. चिदंबरम और शशि थरूर के लेख और बयानों से मिली। प्रमुख उद्योगपतियों ने भी युद्ध के लम्बा नहीं खिंचने पर राहत की सांस ली क्योंकि उसकी आशंका में  विदेशी निवेशकों के छिटकने का डर पैदा हो गया।  युद्धविराम होते ही भारत के पूंजी बाजार के प्रति आकर्षण और बढ़ने लगा। इसका एक कारण  हमारी सेनाओं के युद्ध कौशल के साथ ही स्वदेशी अस्त्र- शस्त्रों विशेष रूप से मिसाइलों और प्रतिरक्षा प्रणाली को मिली सफलता के साथ ही केंद्र सरकार का ये ऐलान भी है कि  ऑपरेशन सिंदूर स्थगित किया गया है, खत्म नहीं। पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान पर लगाए गए सभी प्रतिबंध जारी रखने की घोषणा कर दी गई जिसमें सिंधु नदी जल संधि पर लगी रोक भी है। भारत चूंकि  पाकिस्तान को पूरी तरह घेरने की दीर्घकालीन रणनीति बना रहा है इसलिए अन्य देशों को अपना पक्ष समझाने की जरूरत है। खबर है , इसके लिए सांसदों के  प्रतिनिधि मंडल कुछ देशों में भेजे जाएंगे जिनमें भाजपा के अलावा कांग्रेस और अन्य कुछ दलों का प्रतिनिधित्व भी होगा। उल्लेखनीय है स्व. पी .वी  नरसिम्हा राव के शासन काल में जिनेवा के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पाकिस्तान ने कश्मीर का मुद्दा उठाने की चाल चली। इसकी भनक लगते ही स्व. राव ने विपक्ष के कद्दावर नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाकर भेजा जिन्होंने वहाँ भारत का पक्ष मजबूती से  रखा जिससे पाकिस्तान की कोशिशें बेकार चली गईं। केंद्र सरकार ने उसी परिपाटी को दोहराते हुए पाकिस्तान के साथ मौजूदा विवाद के बारे में भारत के रुख से विश्व समुदाय को परिचित करवाने सांसदों के 7 प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में भेजने का निर्णय किया। हालांकि इसमें श्री थरूर का नाम होने से विवाद की स्थिति बन गई है क्योंकि कांग्रेस का कहना है उसने जो चार नाम दिये थे उनमें श्री थरूर शामिल नहीं थे किंतु उन्होंने  प्रतिनिधिमंडल में शामिल किये जाने पर खुशी जताते हुए देशहित में सेवाएं देने के लिए सदैव तैयार रहने की बात कही। ऐसा लगता है बीते कुछ समय से केंद्र सरकार की नीतियों का समर्थन करने की वजह से वे कांग्रेस आलाकमान की नजरों में संदिग्ध हो गए हैं। हालांकि मोदी सरकार की प्रशंसा तो श्री चिदंबरम द्वारा भी की गई। गत दिवस सलमान खुर्शीद की पुस्तक के विमोचन पर उन्होंने भाजपा की संगठनात्मक क्षमता की भी मुक्तकंठ से सराहना कर पार्टी नेतृत्व को चौंका दिया। आगामी वर्ष तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होंगे।  श्री चिदंबरम और थरूर क्रमशः उक्त दोनों राज्यों से आते हैं। यद्यपि केंद्र सरकार ने बजाय श्री चिदंबरम के तमिलनाडु से द्रमुक सांसद और मुख्यमंत्री स्टालिन की बहन कनिमोझी को विदेश जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में रखा। श्री थरूर चूंकि संरासंघ से जुड़े रहे इसलिए उन्हें विदेशी मामलों में महारत हासिल है। कांग्रेस उनके नाम पर क्यों सहमत नहीं है ये उसका आंतरिक मामला है लेकिन केंद्र सरकार ने विभिन्न दलों के सांसदों का जो प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया वह भारत की एकता, मजबूती और लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है। एक तरफ जहाँ पाकिस्तान में गृहयुद्ध की स्थिति है तथा सरकार तथा विपक्ष में टकराव है तब भारत द्वारा सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विदेश भेजने से उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव और बढ़ेगा। चूंकि ऑपरेशन सिंदूर को जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई जा रही है लिहाजा पहलगाम हमले के बाद राजनीतिक मतभेदों को स्थगित रखने की जो समझदारी विभिन्न दलों द्वारा प्रदर्शित की गई वह जारी रहना चाहिये। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 16 May 2025

तुर्किये और अज़रबैजान जैसा बहिष्कार चीन का भी हो



पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान दुनिया के दो देश तुर्किये और अज़रबैजान खुलकर पाकिस्तान के समर्थन  में आए। तुर्किये ने तो उसको  हथियार भी प्रदान किए। वहीं अज़रबैजान ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की तरफदारी की । उनके रवैये की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई जिसका प्रमाण वहां जाने वाले भारतीय पर्यटकों द्वारा यात्रा रद्द करने से मिला। देश के अनेक व्यापारिक संगठनों ने भी तुर्किये के साथ व्यापार बंद करने का फैसला कर डाला जहां से बड़ी मात्रा में संगमरमर और सेब  जैसी चीजें आयात होती हैं। हालांकि  आयात की तुलना में हमारा निर्यात कहीं अधिक है। वैसे सरकार ने किसी को भी तुर्किये की यात्रा  अथवा व्यापारिक रिश्ते रखने से नहीं  रोका किन्तु जब देश पर संकट आता है तब राष्ट्रभक्ति का ज्वार देशवासियों के मन में उठना स्वाभाविक  है और जरूरी भी क्योंकि इसका असर दूरगामी होता है। वैसे अज़रबैजान की तो कोई खास हैसियत नहीं है । सोवियत संघ टूटने  पर अस्तित्व में आए इस  इस्लामिक देश के प्रति भारतीय पर्यटक तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। आजकल भारत के मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग में विदेश यात्रा का शौक जोरों पर है। थाईलैंड , मलेशिया , सिंगापुर , इंडोनेशिया, वियतनाम , श्रीलंका और दुबई उनके मनपसंद स्थान हैं जिनकी सैर यूरोप और अमेरिका की तुलना में  सस्ती है । अज़रबैजान सस्ती यात्रा के केंद्र के तौर पर उभरा है। भारत के साथ कोई विवाद नहीं होने के बाद भी इसने पाकिस्तान का समर्थन क्यों किया यह अस्पष्ट  है। इसलिए माना जा रहा है कि इस्लामिक होने के नाते वह पाकिस्तान के साथ है। दूसरी तरफ  कभी इस्लामिक जगत का मुखिया रहे तुर्किये में  यूरोप के प्रभाव से  ईसाइयत आने से वह आधुनिक मिश्रित संस्कृति का उदाहरण बन गया। भारत से इसके रिश्ते बहुत अच्छे न सही किंतु शत्रुतापूर्ण भी नहीं रहे जिससे  पर्यटक वहां जाते रहे हैं। व्यापारिक रिश्ते भी सामान्य कहे जा सकते हैं किंतु बीते कुछ सालों में इसका रवैया कट्टरपंथी हो गया जिससे उसने पाकिस्तान की हिमायत कर भारत से अदावत पाल ली। हालिया लड़ाई में तुर्किये में बने ड्रोनों का भारत के विरुद्ध खुलकर उपयोग हुआ और उसने खुले आम पाकिस्तान का समर्थन भी किया। इसी तरह अज़रबैजान भी पाकिस्तान के साथ नजर आया। ऐसे में भारतीय पर्यटकों द्वारा उक्त देशों की यात्रा न करने का फैसला स्वागतयोग्य है। साथ  ही व्यापारिक संगठनों द्वारा तुर्किये के साथ व्यापार रोकने का फैसला भी देशहित में है।  इससे उन दोनों को आर्थिक नुकसान के  साथ ये एहसास भी होगा कि पाकिस्तान का समर्थन  कर वे भारत की मित्रता खो बैठे। उनको सोचना चाहिए था कि सऊदी अरब, यू ए ई, कतर और ईरान जैसे इस्लामिक देशों तक ने पाकिस्तान के पक्ष में खड़े होने से परहेज करते हुए मध्यस्थता की पेशकश की। तुर्किये ये भी भूल गया कि उसके यहाँ आए भूकंप के समय भारत ने न सिर्फ राहत सामग्री अपितु बचाव दल भी भेजे जिनकी वहां जनता ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की। लेकिन उसने उस मानवीय भावना की कद्र के बजाय इस्लामिक धर्मांधता को प्राथमिकता दी। भारत के जिन सैलानियों और व्यापारियों ने देश पर आए संकट के समय तुर्किये और अज़रबैजान के पाकिस्तान समर्थक रवैये से नाराज होकर पर्यटन और व्यापार से हाथ खींचा वे अभिनंदन के पात्र हैं। लेकिन इनके अलावा जिस देश ने युद्धविराम की घोषणा होते ही पाकिस्तान के साथ खड़े रहने का ऐलान किया वह है चीन , जिसकी हमारे साथ पुरानी दुश्मनी है। हमारी हजारों वर्ग कि.मी जमीन दबाने के बाद भी वह अरुणाचल सहित लद्दाख के बड़े हिस्से पर दावा करते हुए उन्हें अपने नक्शे में दर्शाता है।  पड़ोस में होने वाली हर भारत विरोधी गतिविधि में उसी का हाथ होता है। नेपाल , श्रीलंका , मालदीव और बांग्लादेश को हमसे दूर करने में चीन की मुख्य भूमिका रही है। पाकिस्तान को तो उसने अपना पालतू बना रखा है जिसके एवज में उसके कब्जे वाले कश्मीर का भी एक हिस्सा उसने  बतौर सौगात ले लिया। असल में अमेरिका और ब्रिटेन के हाथ खींचने के बाद चीन ही पाकिस्तान का सरपरस्त है। हालिया लड़ाई में पाकिस्तान ने जिस युद्ध सामग्री का उपयोग किया उनमें काफी चीन निर्मित थीं।  इसलिए  युद्धविराम होते ही  उसने पाकिस्तान को अपना मित्र बताते हुए उसके साथ खड़े रहने की वचनबद्धता दोहराई। ये देखते हुए भारत में जैसी भावनाएं तुर्किये और अज़रबैजान के विरुद्ध उत्पन्न हुईं वैसी ही चीन के प्रति भी होनी चाहिए , जो आर्थिक , सामरिक और कूटनीतिक सभी दृष्टियों से भारत का शत्रु है। दुर्भाग्य से पूरा भारत चीन में बनी वस्तुओं से भर गया है। जिन चीजों का भारत में उत्पादन हो रहा है उनमें से ज्यादातर का कच्चा सामान अथवा स्पेयर पार्ट  चीन से ही आयात होते हैं। मेक इन इंडिया अभियान का अच्छा असर होने के बाद भी चीन हमारी अर्थव्यवस्था पर हावी है। भारत से काफी कारोबारी और पर्यटक वहां जाते हैं।  ताजा विवाद में उसने जिस तरह खुलकर  हमारे दुश्मन की हौसला अफजाई करते हुए उसे संरक्षण दिया उसके बाद अब चीन के  बहिष्कार की भी मुहिम चलनी चाहिए। यद्यपि ये बेहद कठिन काम है किन्तु जब सवाल देश की सुरक्षा और सम्मान का हो तब थोड़ा नुकसान उठाने के लिए भी तैयार रहना होगा। ये देखते हुए तुर्किये और अज़रबैजान जैसा विरोध चीन का भी होना जरुरी है क्योंकि पाकिस्तान उसी के दम पर भारत से भिड़ने का दुस्साहस करता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

बदजुबान मंत्री को हटाने से बाकी नेताओं को नसीहत मिलेगी


म.प्र सरकार के मंत्री विजय शाह द्वारा सेना की महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में की गई टिप्पणी के बाद माफी मांग ली गई किंतु उच्च न्यायालय के सख्त आदेश के कारण उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ी। उनकी  स्तरहीन टिप्पणी से  अनुशासन और संस्कारों पर जोर  देने वाली भाजपा  में भोपाल से  दिल्ली तक ख़लबली है। विवादास्पद टिप्पणियों के लिए कुख्यात शाह को समझाया जा रहा है कि  त्यागपत्र दे दें किंतु वे धमकी दे रहे हैं कि  वे आदिवासियों का अलग संगठन बना लेंगे। उनके समर्थन में राज्य और केंद्र के एक -  एक मंत्री का कूदना ये संकेत है कि लड़ाई को आदिवासी अस्मिता से जोड़ने का प्रयास हो रहा है।  हरसूद विधानसभा सीट से लगातार आठ बार जीतने वाले शाह को आदिवासी समुदाय से होने के कारण  मंत्री बनाया जाता है । उनके बयान सरकार पार्टी के लिए सिरदर्द पैदा करते रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी के बारे में की गई  टिप्पणी पर भी उन्हें मंत्री पद गंवाना पड़ा था। पार्टी नेतृत्व उनके बारे में  फैसला लेने के पहले  राजनीतिक नफे - नुकसान का आकलन कर रहा है। विपक्षी दल कांग्रेस ने भी अपना मोर्चा खोल दिया है । दरअसल भाजपा की चिंता ये है कि वह एक तरफ तो ऑपरेशन सिंदूर की सफलता  प्रचारित करने के लिए तिरंगा यात्रा निकाल रही है वहीं दूसरी तरफ  राज्य सरकार के एक मंत्री ऑपरेशन की प्रतीक बनीं महिला सैन्य अधिकारी के बारे में  अभद्र टिप्पणी कर बैठे जिसमें उसके धर्म का जिक्र था। उनका आशय जो भी रहा किंतु  लहजा और शब्दावली में शालीनता का अभाव था। भाजपा के भीतरी सूत्रों के मुताबिक या तो उनको बर्खास्त कर राजनीतिक विरोध ठंडा करने का प्रयास किया जाएगा या फिर उन पर  प्राथमिकी पर  कानूनी कार्रवाई का इंतजार करते हुए फिलहाल किसी बड़े कदम से बचने का विकल्प चुना जाएगा। दरअसल पार्टी नेतृत्व  मंत्री पद से हटाए जाने के बाद शाह के संभावित राजनीतिक कदम का पूर्वानुमान लगा रही है।  वैसे भी पार्टी के पास प्रभावशाली आदिवासी नेताओं का अभाव है जिसका लाभ शाह को मिलता रहा है । वैसे पार्टी उनकी माफी के बाद मामला समाप्त कर देती किंतु कई पेच एक साथ फँस गये । एक तो बयान सैन्य अधिकारी को लेकर था , उस पर भी वह महिला है और मुस्लिम । केंद्र सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी देने विदेश सचिव के साथ दो महिला सैन्य अधिकारियों को दायित्व सौंपकर पहलगाम के आतंकी हमले में मारे गए पुरुषों की विधवाओं की भावनाओं को सम्मान किया वहीं दूसरी तरफ धार्मिक आधार पर किसी भी प्रकार के मतभेद की आशंका को भी दरकिनार कर दिया। इस निर्णय की सर्वत्र प्रशंसा हुई तथा सोफिया कुरैशी के साथ नजर आईं विंग कमांडर व्योमिका सिंह रातों - रात  भारतीय महिलाओं विशेषकर युवतियों के बीच  महानायिका के तौर पर स्थापित हो गईं। ऐसे में म.प्र के कैबिनेट मंत्री  की टिप्पणी ने कड़वाहट घोल दी। ये विवाद ठंडा हो पाता उसके पहले ही  वरिष्ट सपा सांसद डॉ. रामगोपाल यादव ने व्योमिका सिंह की जाति को लेकर जो टिप्पणी की वह भी अप्रासंगिक , अनावश्यक और घोर आपत्तिजनक है। अब उन पर क्या कार्रवाई होती है ये देखने वाली बात होगी किंतु देश की रक्षा से जुड़े मसलों और व्यक्तियों के बारे में  जिम्मेदार पदों पर आसीन लोग यदि स्तरहीन टिप्पणियां करें तो इससे उनकी घिनौनी मानसिकता ही उजागर होती है। विडंबना ये है कि ऐसे लोगों को निकाल बाहर करने में राजनीतिक दल डरते हैं क्योंकि वे दो - चार सीटों के नुकसान की वजह बन सकते हैं।  दलित समुदाय से जुड़े कांग्रेस नेता उदित राज को तो ऑपरेशन सिंदूर शब्द ही नागवार गुजरा क्योंकि उसका संबंध हिन्दू महिलाओं से है । इस तरह की बातें करने वाले न तो अपनी जाति या समुदाय के हितचिंतक होते हैं और न ही धर्म के । उनका उद्देश्य दरअसल केवल  अपने राजनीतिक प्रभुत्व को बनाए रखना होता है। ऐसे नेताओं को ढोने में  क्षेत्रीय पार्टियों की मजबूरी तो समझ में आने लायक है किन्तु भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां जब ऐसे बदजुबान नेताओं को सिर पर बिठाती हैं तब आश्चर्य के साथ दुःख भी होता है । वहीं इन नेताओं को मिलने वाली अहमियत दूसरों को भी  प्रोत्साहित करती है। ये देखते हुए भाजपा को चाहिए वह अदालत का इंतजार किए बिना  शाह को मंत्री पद से हटाने का साहसिक फैसला ले।  उनके द्वारा नया संगठन बनाए जाने जैसी धमकी का भी कोई महत्व नहीं है क्योंकि म.प्र में मुख्यधारा से अलग होने के बाद स्व. वीरेंद्र कुमार सखलेचा , स्व. अर्जुन सिंह और उमाश्री भारती भी कुछ नहीं कर पाये। विजय शाह उनसे बड़े नेता नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 May 2025

जाते - जाते न्यायाधीशों को नसीहत दे गए न्यायमूर्ति संजीव खन्ना

प्रधान न्यायाधीश पद से सेवानिवृत हुए न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने गत वर्ष 11 नवम्बर  को पदभार ग्रहण किया था और छह माह से कम में ही वे  भूतपूर्व हो गए। लेकिन जाते - जाते उन्होंने एक ऐसी घोषणा कर दी जो भविष्य में नैतिकता का मापदंड बन सकती है। श्री खन्ना ने विदाई भाषण में कहा कि वे इसके बाद कोई आधिकारिक पद ग्रहण नहीं करेंगे और तीसरी पारी खेलते हुए कानून से संबंधित कुछ कार्य करेंगे। यद्यपि उन्होंने इसे स्पष्ट नहीं किया। लेकिन इसका सीधा - सीधा अर्थ यही लगाया जा सकता है कि वे सरकार द्वारा प्रदत्त कोई पद नहीं लेंगे। उल्लेखनीय है अधिकतर सेवा निवृत्त न्यायाधीश मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का काम करते  हैं जबकि कुछ आयोग या ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष पद को सुशोभित करते हैं वहीं कुछ को अन्य तरीकों से सरकार उपकृत करती है। एक - दो  ने चुनावी राजनीति में भी हाथ आजमाए वहीं प्रधान न्यायाधीश रहे  रंगनाथ मिश्र राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष बने जबकि  रंजन गोगोई राज्यसभा में नामांकित हुए। अनेक राज्यों में लोकायुक्त पद पर पूर्व  न्यायाधीश  नियुक्त होते हैं। पूर्व न्यायाधीशों को दिये जाने वाले पदों को लेकर राजनीतिक और विधि क्षेत्रों में बहस चलती रहती है। चूंकि न्यायाधीशों का चयन  कालेजियम प्रणाली से होता है इसलिए  पारदर्शिता पर संदेह बना रहता  है। परिवारवाद और राजनीतिक प्रतिबद्धता भी  नियुक्ति को प्रभावित करती है ये कहना गलत नहीं है। कल सेवा निवृत्त श्री खन्ना के चाचा श्री एच. आर. खन्ना भी न्यायाधीश रहे जबकि उनके पूर्ववर्ती श्री चंद्रचूड़ के पिता सबसे लंबे समय तक प्रधान न्यायाधीश रहे।  श्री खन्ना के उत्ताधिकारी  प्रधान न्यायाधीश श्री भूषण रामकृष्ण गवई भी एक राजनीतिक परिवार से  हैं। उनके भाई कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं जबकि पिता रामकृष्ण गवई रिपब्लिकन पार्टी  के संस्थापक थे जो कांग्रेस के सहयोग से राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य रहने के अलावा  राज्यपाल भी रहे। इसी वजह से वे राहुल गाँधी से संबंधित मामले की सुनवाई से दूर हो गए। श्री गवई का कार्यकाल भी मात्र  सात माह का है। लेकिन उन्होंने कार्यकाल शुरू करते ही अपने पूर्ववर्ती से प्रेरित होकर  सेवा निवृत्ति के उपरांत कोई पद नहीं लेने की घोषणा कर दी। उनके ऐसा करने से एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत हो सकती है। लेकिन सवाल ये है कि इस घोषणा  का दायरा कितना होगा क्योंकि केंद्र और राज्यों में अनेक ऐसे पद हैं जिन पर सेवा निवृत्त न्यायाधीशों की ही नियुक्ति होती है। लोकपाल और लोकायुक्त सहित अनेक नियामक आयोग इसके उदाहरण हैं। इसी तरह विभिन्न जाँच आयोगों में पूर्व न्यायाधीशों को सुविधाएं एवं मानदेय मिलता है। लेकिन श्री खन्ना और श्री गवई ने जो घोषणा की उसके बाद कम से कम इस बात का दबाव तो बनेगा कि सेवा निवृत्ति के बाद न्यायाधीश राजनीतिक दृष्टि से उपकृत किये जाने वाला पद स्वीकार न करें। उल्लेखनीय है श्री गोगोई को राज्यसभा में नामांकित होने पर काफी उलाहने सुनने पड़े थे। हालांकि श्री गोगोई तो राष्ट्रपति द्वारा नामांकित हैं किंतु कांग्रेस  अतीत में न्यायामूर्ति रहे हिदायतुल्ला, बहरुल इस्लाम और रंगनाथ मिश्र को पार्टी टिकिट पर राज्यसभा  सदस्य बना चुकी थी। श्री मिश्र 1984 में दिल्ली के  सिख विरोधी दंगों की जांच हेतु गठित आयोग के अध्यक्ष थे जिसने कांग्रेस को पूरी तरह बेकसूर बताया । कहते हैं उसी के  आभार स्वरूप उन्हें कांग्रेस ने उच्च सदन भेजा। जबकि बाद में अदालत द्वारा  सज्जन कुमार सहित कुछ कांग्रेस नेताओं को अपराध माना गया।  ऐसे ही राम जन्मभूमि का ऐतिहासिक फैसला देने वाली सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यों की पीठ के श्री गोगोई सहित अन्य चार  किसी न किसी पद पर हैं जिनमें कुलाधिपति, आयोग के अध्यक्ष और राज्यपाल जैसे ओहदे हैं। पांचवे श्री चंद्रचूड़ प्रधान न्यायाधीश पद से निवृत्त हुए। ये देखते हुए श्री खन्ना और श्री गवई ने जो ऐलान किया उसका स्वरूप क्या होगा ये कहना तो मुश्किल है किंतु किसी बड़ी यात्रा की शुरुआत छोटे से कदम से होती है। यदि थोड़े से ही न्यायाधीश इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तब न्यायपालिका और नैतिकता में बढ़ती दूरी कुछ तो कम की ही जा सकेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 May 2025

बेहद संतुलित और उत्साहवर्धक संदेश


भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ  बड़े से बड़े पद पर आसीन व्यक्ति की भी आलोचना की जा सकती है। यहाँ तक कि संवैधानिक प्रमुख  राष्ट्रपति भी इससे बच नहीं सकते। सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की भी  समीक्षात्मक आलोचना स्वीकार्य है। रही बात प्रधानमंत्री या सरकार में बैठे अन्य नेताओं की तो राजनीतिक शख्सियत होने के कारण वे आये दिन कठघरे में खड़े किये जाते हैं। गत रात्रि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश के नाम दिये गए संदेश के साथ भी यही हुआ जो किसी भी कोण से अस्वाभविक नहीं था। पहलगाम में पाकिस्तान की शह प्राप्त आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार के बाद ही  परंपरागत मोदी विरोधी लॉबी सक्रिय हो उठी थी। जब तक भारत ने पाकिस्तान पर कार्रवाई नहीं की  तब तक प्रधानमंत्री को उसके लिए उकसाया गया। लेकिन जब ऑपरेशन सिंदूर प्रारंभ हुआ तथा पूरा देश सेना और सरकार के साथ एकजुट खड़ा हो गया तब युद्ध के औचित्य और निरपराध लोगों के मारे जाने को लेकर रुदाली गैंग सक्रिय हो गई। भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान पर किये गए हमले से वहाँ जो तबाही हुई उसे नजरंदाज  करते हुए भारत में हुई क्षति को लेकर सरकार को घेरने का सुनियोजित अभियान चल पड़ा। यही जमात युद्धविराम के बारे में मनगढंत किस्से प्रसारित करते हुए प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाने लगी। कल रात श्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश  देते हुए पहलगाम की घटना से युद्धविराम तक की सभी बातों पर देश की नीति स्पष्ट कर दी। सबसे बड़ी बात उन्होंने कही कि भारतीय हमले के कारण पूरी तरह भयाक्रांत होकर पाकिस्तान ने खुद होकर लड़ाई रोकने संपर्क किया था। प्रधानमंत्री ने भारतीय सेनाओं के पराक्रम और मारक क्षमता का उल्लेख करते हुए पूरे विश्व को बता दिया कि भारत में निर्मित रक्षा उपकरणों की तकनीकी श्रेष्ठता इस लड़ाई में प्रमाणित हो गई जबकि पाकिस्तान का आक्रमण हमारी सुरक्षा व्यवस्था के सामने बेअसर साबित हुआ। युद्धविराम को लेकर निराशा फैलाने वालों का नाम लिए बिना श्री मोदी ने साफ कर दिया कि ऑपरेशन सिंदूर स्थगित हुआ है , समाप्त नहीं। और आतंकवादियों के विरुद्ध भारत की आक्रामकता जारी रहेगी। पानी और खून एक साथ नहीं  बह सकते जैसी उनकी टिप्पणी सिंधु नदी जल संधि का स्थगन जारी रहने का ऐलान था। पाकिस्तान से बातचीत पर प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा कि टेरर (आतंकवाद) और टाक ( बातचीत) एक साथ नहीं चल सकते। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की पेशकश को तो भारत सरकार ने पहले ही खारिज कर दिया था। लेकिन अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने भारतीय नीति को दोहराते हुए कह दिया कि पाकिस्तान से बात होगी तो आतंकवाद और पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी।  उन्होंने आतंक के साथ व्यापार होने को भी अव्यावहरिक बताया। श्री मोदी ने न सिर्फ पाकिस्तान अपितु विश्व बिरादरी को भी संदेश दे दिया कि युद्धविराम का आशय भारत के रुख में नरमी नहीं है। चूंकि हमारा लक्ष्य आतंकवादियों के अड्डे थे इसलिए प्रारंभिक सैन्य कारवाई वहीं तक सीमित रही किंतु जब पाकिस्तान ने भारत के नागरिक एवं सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया तब हमारी सेना ने दुश्मन के सैन्य केंद्रों तथा हवाई अड्डों के साथ ही आयुध भंडारों पर जबरदस्त हमले कर उस iके हौसले पस्त कर दिये। पाकिस्तान द्वारा बार - बार परमाणु अस्त्रों की धौंस दिखाने के बारे में श्री मोदी ने खुलकर कहा कि इस ब्लेकमेलिंग से भारत को डराना संभव नहीं है। ज़ाहिर है भाषण का यह अंश डोनाल्ड ट्रम्प सहित उन राष्ट्रप्रमुखों को इशारा था जो इस लड़ाई को परमाणु युद्ध में बदल जाने के नाम पर रुकवाने का श्रेय लूटने लालायित हैं। यद्यपि आलोचकों को प्रधानमंत्री के भाषण में कमियां नजर आ रही हैं किंतु पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एवं अन्य नेताओं द्वारा किये गए झूठे दावों और डींगों के विपरीत प्रधानमंत्री का भाषण बेहद सधा हुआ था जिसमें  भारत की नीति, नीयत और दृढ़ता स्पष्ट तौर पर नजर आई। उनके विरोधियों को ऐतराज है कि उन्होंने ट्रम्प का नाम नहीं लिया जो आये दिन बड़बोलापन दिखा रहे हैं किंतु श्री मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के विपरीत बजाय किसी विदेशी नेता का महिमामंडन करने के स्पष्ट कर दिया कि युद्धविराम पाकिस्तान के निवेदन पर किया गया। हालांकि उन्होंने ये जरूर कहा कि भारतीय सैन्य कार्रवाई से घबराकर वह  दुनिया भर में युद्ध रुकवाने गिड़गिड़ाया। प्रधानमंत्री ने देश और दुनिया को बड़े ही सरल और साफ लहजे में बता दिया कि ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के विरुद्ध जंग होने से आगे भी जारी रहेगी और भारत अपनी रक्षा करते हुए शत्रु की कमर तोड़ने में सक्षम है। वर्तमान वैश्विक परिथितियों के मद्देनजर श्री मोदी द्वारा गत रात्रि प्रसारित संदेश बहुत ही संतुलित एवं उत्साहवर्धक था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 May 2025

ऐसा ही वातावरण बनाए रखें क्योंकि सीमा कभी भी अशांत हो सकती है

भारत और पाकिस्तान के सैन्य अभियानों के महानिदेशकों की बैठक से हासिल  कुछ भी होने वाला नहीं है क्योंकि सेना के अधिकारी केवल सीमित मुद्दों पर ही बात कर सकते हैं। लेकिन जो नीतिगत मुद्दे हैं उन पर फैसला पाकिस्तान में भले ही सेना के मुखिया लेते हों किंतु भारत में ये सरकार के पास है और सेना ने इसे स्वीकारने में कभी  हिचकिचाहट नहीं दिखाई। बीते सप्ताह चली संक्षिप्त लड़ाई में भी सेना और सरकार का समन्वय   सामने आया जब लड़ाई के पहले प्रधानमंत्री ने  सेनाओं के सर्वोच्च अधिकारियों  को सैन्य कार्रवाई का समय, तरीका और लक्ष्य तय करने का अधिकार सौंप दिया। उसके बाद  सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत  पाकिस्तान में आतंकवादियों के अड्डों पर हमले किये। लेकिन जिस बात ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया वह थी पत्रकारों को ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी देने हेतु  का दायित्व विदेश सचिव के साथ थलसेना और वायुसेना की एक - एक महिला अधिकारी को सौंपना जिसने  पूरे विश्व को  संदेश दे दिया कि भारत में सेना और  सरकार के बीच बेहतर समन्वय है ।  राजनीतिक नेतृत्व ने भी पर्दे के पीछे रहकर संकेत दिया कि जो जिसका काम है वही उसे करे। विदेश मंत्री ने पूरी दुनिया से कूटनीतिक संपर्क बनाये रखा जबकि रक्षा मंत्री सेनाध्यक्षों के जरिये  जायजा लेते रहे। वहीं  सुरक्षा सलाहकार प्रधानमंत्री के संपर्क में रहते हुए रणनीतिक तैयारियों में जुटे थे।युद्धविराम  की जानकारी भी विदेश सचिव और दोनों महिला सैन्य अधिकारियों ने ही दी। उसके एक दिन बाद तीनों सेनाओं के वरिष्ट अधिकारियों द्वारा समूची सैन्य कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा पत्रकारों को देते हुए उन भ्रांतियों का निराकरण किया जो सोशल मीडिया पर फैलाई जाती रहीं। पूर्वाग्रहों से ग्रसित कुछ यू ट्यूबर्स का तो धंधा ही हर चीज में मीन - मेख निकालना रह गया है। पहलगाम हमले से  युद्धविराम के बाद तक इस वर्ग ने सिवाय नकारात्मकता फैलाने के कुछ नहीं किया। आतंकवादियों द्वारा धर्म  पूछकर  मारे जाने की बात को ये लोग झुठलाने में लगे रहे जबकि मृतकों की पत्नी और संबंधी चीख - चीखकर उसकी पुष्टि करते रहे। उसके बाद सरकार को पाकिस्तान पर हमले के लिए उकसाया जाता रहा। लेकिन  ऑपरेशन सिंदूर शुरू होते  ही मानवीयता का रोना रोया जाने लगा। भारतीय सेना ने दुश्मन को कितना नुकसान पहुंचाया इसकी तारीफ  के बजाय पहलगाम के  कसूरवार मारे गए या नहीं ये पूछा  जाने लगा।  कुख्यात आतंकवादियों के परिवार का सफाया होने पर  हमले में मारे गए भारतीय नागरिकों का मुद्दा छेड़कर सेना की सफलता का अवमूल्यन करने का प्रयास किया गया। शुक्रवार की रात भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जोरदार प्रहार करते हुए उसकी कमर तोड़ दी। अगले दिन जब अचानक युद्धविराम का ऐलान हुआ तब पूरा देश चौंक गया। सरकार  समर्थकों को भी उसका औचित्य समझ में नहीं आया। विरोध करने वालों को इंदिरा जी याद आने लगीं। प्रधानमंत्री के अमेरिका के दबाव में आने के अलावा कश्मीर विवाद के अंतर्राष्ट्रीयकरण का आरोप भी उछलने लगा। लड़ाकू विमान राफेल के मार गिराए जाने की खबरें  आने लगीं। लेकिन सेना के वरिष्ट अधिकारियों द्वारा समूचे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण देने के बाद  स्पष्ट है कि  पाकिस्तान को जबरदस्त क्षति हुई। 100 से अधिक आतंकवादी और सेना से जुड़े 40 लोगों की मौत हुई। तमाम सैन्य प्रतिष्ठान और आतंक के अड्डे तबाह हो गए। पाकिस्तान के परमाणु अस्त्र जिस स्थान पर रखे हैं उसके निकट तक भारतीय मिसाइलों ने धमाके किये। इसकी तुलना में हमारी मानवीय क्षति 25 के भीतर रही। नागरिक और सैन्य ठिकानों को भी मामूली नुकसान पहुंचा। पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों कि.मी तक भारत ने हमले किये जबकि पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइलें हवा में नष्ट करते हुए अपनी रक्षा प्रणाली की श्रेष्ठता प्रमाणित की। कश्मीर पर मध्यस्थता को सरकार ने खुले तौर पर अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि पाकिस्तान से बात होगी भी तो मुद्दा उसके कब्जे वाले कश्मीर के हिस्सा होगा न कि जम्मू - कश्मीर। वायुसेना ने भी स्पष्ट कर दिया कि जिस कारण से ऑपरेशन सिंदूर किया गया उनके दोबारा उत्पन्न होने पर दोबारा ऐसी ही कारवाई होगी। सिंधु नदी जल संधि के अलावा पाकिस्तानी नागरिकों को वीजा संबंधी फैसले भी जारी रहेंगे । सबसे बड़ी बात ये कि आतंकवादी हमले को युद्ध माना जायेगा। जहाँ तक सवाल युद्धविराम पर जल्दी राजी हो जाने का है तो उसकी वजह भी सामने आये बिना नहीं रहेगी। हो सकता है चीन द्वारा इस लड़ाई को रूस - यूक्रेन और इसराइल - हमास युद्ध की तरह लंबा खींचने में पाकिस्तान की मदद की आशंका के कारण भारत ने ये कदम उठाया जो अस्थायी भी हो सकता है। इस लड़ाई में भारत सैनिक, आर्थिक, कूटनीतिक और राजनीतिक तौर पर एक मजबूत, जिम्मेदार और परिपक्व देश के तौर पर उभरा है। सरकार और विपक्ष में भी बेहतर तालमेल रहा बावजूद इसके कि कुछ लोग दूध में नींबू निचोड़ने के काम में जुटे रहे। बेहतर यही होगा कि ऐसा वातावरण बनाये रखा जाए क्योंकि पाकिस्तान के अंदरूनी हालातों को देखते हुए वह सीमाओं को फिर अशांत कर सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Sunday, 11 May 2025

कल की बैठक पर टिका है युद्धविराम का भविष्य


    हालांकि सोमवार को होने वाली DGMO की बैठक के बाद ही तय हो सकेगा कि भारत और पाकिस्तान के बीच अचानक हुए युद्धविराम का हश्र क्या होगा क्योंकि भारत का दावा है कि पाकिस्तान के अनुरोध पर उसने लड़ाई रोककर बातचीत करने पर सहमति प्रदान की किंतु उसने कुछ घंटों बाद ही सीमा पर गोलाबारी शुरू कर दी और उससे भी बड़ी बात प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश के नाम दी गई तकरीर में न सिर्फ भारत पर युद्धविराम तोड़ने का ठीकरा फोड़ दिया बल्कि  अंतिम फैसले तक लड़ते रहने की डींग भी हाँकी। उन्होंने ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि पाकिस्तान ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को तहस - नहस करते हुए उसे झुकने मजबूर कर दिया। उनका भाषण और चीन द्वारा पाकिस्तान के साथ खड़े होने का आश्वासन लगभग आगे पीछे आये। ये भी कहा जा रहा है कि युद्धविराम को तोड़ने के लिए  चीन ने उकसाया और भारत विरोधी बयान देने के लिए भी। आज पाकिस्तान के सभी प्रमुख अखबारों ने युद्धविराम को विजय पर्व की तरह पेश करते हुए लिखा कि युद्ध और शांति दोनों में सफल। वहाँ की जनता भी भारत द्वारा युद्धविराम के लिए रजामंदी देने को पाकिस्तान की जीत मानकर जश्न मना रही है।

      हालांकि भारत में भी हर कोई इस बात से तो गौरवान्वित है कि हमारे सैन्य बलों ने बेमिसाल प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। ये दावा भी किया जा रहा है कि शुक्रवार की रात भारतीय आक्रमण ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया जिसके बाद वह अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाया जिसने दोनों पक्षों से संपर्क कर फिलहाल तो जंग रुकवा दी।

    हालांकि भारत के विदेश सचिव और सेना की दो महिला अधिकारियों ने अपनी पत्रकार वार्ता में बहुत ही गरिमामय तरीके से भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान को पहुंचाई गई क्षति के बारे में विस्तार से बताते हुए उसके दुष्प्रचार को गलत बताया और युद्धविराम के लिए उसकी तरफ से आये प्रस्ताव को स्वीकार करने की जानकारी दी। साथ ही ये भी बताया कि  सिंधु नदी जल संधि जो निर्णय लिए गए थे वे जारी रहेंगे तथा किसी भी आतंकवादी वारदात को युद्ध के तौर पर देखा जाएगा। लेकिन जब कुछ घंटों के बाद पाकिस्तान ने सीमा पर गोलाबारी शुरू कर दी तब आम जनता को लगा कि शायद भारत युद्धविराम को तोड़कर  शुक्रवार की रात वाले हमले को दोहराएगा।

     लेकिन कुछ घंटों बाद ही सब शांत हो गया जिसका कारण शायद पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव होगा किंतु युद्ध के हर चरण में भारी पड़ने के बाद भी भारत द्वारा मैदान ए जंग से हटकर बातचीत की मेज पर आने के लिए तैयार होने का औचित्य देश के आम और खास जनमानस को समझ में नहीं आ रहा। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उच्चस्तरीय बैठक की जिसमें संभवतः कल होने वाली DGMO  स्तर की बातचीत की रणनीति तय की गई होगी। किंतु पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कल रात अपने देशवासियों को जिस बड़बोले  अंदाज में संबोधित किया वह कोई नई बात नहीं है । वहाँ के नेता इसी तरह की बातें करने के लिए प्रसिद्ध हैं किंतु भारत सरकार की ओर से किसी भी नेता मसलन रक्षा या विदेश मंत्री द्वारा  सामने आकर जानकारी नहीं देने से लोग हैरान हैं। गृह मंत्री अमित शाह भी मौन पर हैं। प्रधानमंत्री का न बोलना चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि कल होने वाली वार्ता के पहले वह गैरजरूरी होगा।

   बावजूद इसके भारत सरकार को ये साफ करना चाहिए कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा कल रात दिये गये बयान के बाद भी उसके साथ किस मुद्दे पर बातचीत की जाएगी क्योंकि उसने आतंकवादियों को पनाह देने और पहलगाम हादसे में हाथ होने के आरोप को हमेशा की तरह ठुकरा दिया है।

     यद्यपि रक्षा और कूटनीतिक मामलों में पहले से सब कुछ बताना सरकार के लिए संभव नहीं होता किंतु देशवासियों की अपेक्षा है कि कल की बैठक में भारत को विजेता की तरह पेश आना चाहिए तथा शांति के लिए मिलकर काम करने, रेल बस सुविधा बहाल करने, नागरिकों की आवाजाही शुरू करने के साथ ही सांस्कृतिक आदान - प्रदान जैसी घिसी- पिटी बातों से किनारा करते हुए आतंकवादियों के विरुद्ध कारवाई पर जोर देना चाहिए।

  पाकिस्तान ने युद्धविराम  की गंभीरता को तो कुछ घंटों में ही खत्म कर अपने इरादे जता दिये अब हमारी बारी है उसे ये समझाने की हम भी युद्ध विराम तोड़ने में सक्षम हैं। उसे ये संदेश देना भी जरूरी है कि हमने इसरायल से हथियार और युद्ध की तकनीक ही नहीं अपितु शत्रु की कमर तो़ड़ने की मानसिकता भी हासिल कर ली है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 10 May 2025

जो जहाँ पर है वतन के काम पर है


पाकिस्तान के साथ जंग का आज चौथा दिन है। दोनों तरफ से आक्रमण और प्रत्याक्रमण का सिलसिला अनवरत जारी है। कल दिन में लगा था कि  कुछ ढिलाई आई किंतु रात  फिर धमाकों में गुजरी। यद्यपि अनेक  संवाददाता जान जोखिम में डालकर सीमा के नजदीकी इलाकों से खबरें भेज रहे हैं लेकिन अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि सही स्थिति क्या है ? जो संकेत भारतीय सेना और सरकार के जिम्मेदार लोगों से मिल रहे हैं उनसे इतना जरूर कहा जा सकता है कि हमारा मनोबल काफी ऊंचा है तथा  पाकिस्तान हमारी रणनीति में ही फंसा नजर आ रहा है। उसके हमले जिस तरह से बेअसर हो रहे हैं उससे वहाँ फौज और सरकार दोनों में बौखलाहट है। भारत द्वारा समाचार माध्यमों को जानकारी देने का दायित्व विदेश सचिव के साथ ही थल और वायुसेना की दो युवा महिला अधिकारियों को सौंपा जाना दर्शाता है कि उसका आत्मविश्वास कितना प्रबल है। दूसरी तरफ पाकिस्तान में मंत्री  बेसिर - पैर के बयान देकर हँसी के पात्र बन रहे हैं।  भारत में विपक्ष ने सरकार की नीति - रीति से मतभेदों के बावजूद आलोचना से परहेज करते हुए एकता का प्रदर्शन किया जबकि  पाकिस्तान की संसद में विपक्ष प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के विरुद्ध खुलकर बोल रहा है। एक सांसद ने तो उनको गीदड़ तक कह डाला। वहीं एक ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जेल से बाहर निकालने की मांग करते हुए कह दिया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला वही कर सकते हैं। पाकिस्तानी फौज के कुछ अधिकारी अभी भी धमकी वाली भाषा बोल रहे हैं जबकि भारत ने शुरुआती संयम के बावजूद जब  दुश्मन ने रिहायशी और सैन्य ठिकानों पर गोले दागे तब जाकर  पाकिस्तान के सैन्य केंद्रों सहित अन्य लक्ष्यों पर हमले किये जिनसे शत्रु को काफी क्षति पहुँची है। सेना से जुड़े मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान की प्रतिरक्षा प्रणाली तहस - नहस हो जाने से भारतीय मिसाइलें अपने कार्य को पूरी सफलता के साथ कर पा रही हैं। ये बात सही है  कि अभी तक दोनों देशों की थलसेनाएं अपनी सीमाओं में ही है। यद्यपि घुसपैठियों को भेजने की हरकत अभी भी उस तरफ से की जा रही है किंतु वे या तो सुरक्षा बलों के हत्थे चढ़ रहे हैं या फिर मारे जा रहे हैं। अभी तक भारत की तरफ से हवा - हवाई दावे नहीं किये गए क्योंकि विधिवत युद्ध घोषित नहीं हुआ। लेकिन पाकिस्तान जिस तरह के आसमानी दावे कर रहा है उन पर उसी के नागरिक विश्वास नहीं कर रहे। ये वहाँ के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के प्रति विश्वास के अभाव का प्रमाण है। वैसे हमारे देश में अभी भी कुछ लोगों ने अपना रवैया नहीं बदला जो  सोशल मीडिया के जरिये सरकार और सेना पर अविश्वास करते हुए युद्ध के विरोध में माहौल बनाने में जुटे हुए हैं। ये वही तबका है जो पहलगाम की घटना के बाद प्रधानमंत्री को युद्ध प्रारंभ करने के लिए ललकार  रहा था किंतु  जंग शुरू होते ही  इस बात का मातम मनाने बैठ गया कि दोनों तरफ से मरने वाले  इंसान हैं। पाकिस्तान के साथ बातचीत कर रिश्ते सुधारने की वकालत करने वाले इन्हीं लोगों ने पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में पाकिस्तान का हाथ होने के मामले में भी सवाल उठाकर अपनी ही सरकार के विरुद्ध अविश्वास उत्पन्न करने जैसा घिनौना काम किया। इनके बयानों को आधार बनाकर पाकिस्तान की संसद तक में भारत को झूठा साबित करने का प्रयास हुआ। बेहतर हो सोशल मीडिया सहित अन्य मंचों पर इन तत्वों का बहिष्कार हो। जिन लोगों के मन में सेना और सरकार की प्रतिबद्धता और निर्णय क्षमता में विश्वास है उनको भी चाहिए कि वे अति उत्साह से बचते हुए अनधिकृत जानकारी को प्रसारित करने से बचें। टीवी चैनलों में खबरें परोस देने के मामले में जो आपाधापी है उससे प्रभावित हुए बिना केवल सेना और सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी को ही प्रामाणिक मानकर न खुद उत्तेजित और भ्रमित हों और न ही दूसरों को करें। केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों में छुट्टियां रद्द करने का जो निर्णय लिया उससे जाहिर है देश निर्णायक लड़ाई लड़ते हुए अपने दूरगामी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कमर कस चुका है। ऐसा करने का एक कारण सेना सहित युद्ध से किसी भी रूप में जुड़े वर्ग को यह एहसास कराना भी है कि संकट की इस घड़ी में पूरा देश कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़ा है। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का सफल नेतृत्व करने वाले प्रधानमंत्री स्व. विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि किसी भी देश का चरित्र  युद्ध के दौरान उसके नागरिकों के आचरण से उजागर होता है। वर्तमान स्थिति हमारे लिए अपने चरित्र को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का बेहतरीन अवसर है।
स्व. राजेंद्र अनुरागी की ये पंक्तियाँ आज फिर प्रासंगिक हो उठी हैं:-
आज पूरा देश मेरा लाम पर है,
जो जहाँ पर है वतन के काम पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 May 2025

सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर भारत भारी पड़ रहा


भले ही भारत ने अभी तक विधिवत युद्ध  की घोषणा नहीं की लेकिन  हालात युद्ध के ही हैं। भारत द्वारा आतंकवादियों के अड्डों पर हमला किये जाने के बाद पाकिस्तान ने हमारे नागरिक इलाकों के साथ ही सैन्य ठिकानों पर गोलाबारी के अलावा ड्रोन से हमला  किया  जिसे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली ने हवा में ही मार गराया। जवाब में भारतीय सेना ने लाहौर, इस्लामाबाद, बहावलपुर और रावलपिंडी पर मिसाइलें दागकर दुश्मन के घर में दहशत फैला दी। साथ ही करांची बंदरगाह को नौसेना ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। हालांकि पाकिस्तान , जम्मू से गुजरात तक  भारत के सीमावर्ती इलाकों में हमलों की लगातार कोशिशें कर रहा है किंतु उसकी कोशिशें बदहवासी का संकेत देती हैं। दूसरी ओर भारत ने पहलगाम हमले के बाद  दो सप्ताह तक सैन्य मोर्चे पर पूरी तैयारी करने के बाद ही पाकिस्तान में आतंकवादी अड्डों को तबाह किया। पाकिस्तान को  ये लगता था कि ज्यादा से ज्यादा भारत छोटी - मोटी सर्जिकल स्ट्राइक करने के बाद ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन उसके अनुमान गलत साबित हुए।  पहलगाम हादसे के तत्काल बाद भारत चाहता तो पाकिस्तान पर चढ़ाई कर देता किंतु उसने केवल सैन्य तैयारियां ही नहीं कीं अपितु कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रियता दिखाते हुए विश्व जनमत को अपने पक्ष में करने में सफलता हासिल की। भारत ने इस लड़ाई को आतंकवाद के विरुद्ध केंद्रित रखने की जो प्रतिबद्धता वैश्विक मंचों पर व्यक्त की उसके कारण इक्का - दुक्का को छोड़कर दुनिया के तमाम बड़े देश या तो भारत की तरफदारी कर रहे हैं या चुप बैठे हैं। सबसे बड़ी बात अमेरिका, रूस, फ्रांस , ब्रिटेन जैसी सामरिक और आर्थिक शक्तियों द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का समर्थन करते हुए भारतीय नीति का औचित्य साबित कर दिया। सं.रा.संघ ने भी पाकिस्तान की शिकायत को विचार योग्य नहीं समझा जो भारत की बड़ी कूटनीतिक  जीत कही जा सकती है। इस युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होगा इस बारे में कोई भी भविष्यवाणी अथवा दावा करना तो विवेक सम्मत नहीं होगा किंतु इतना अवश्य है कि भारत ने बीते तीन दिनों में सैन्य और कूटनीतिक मोर्चे पर अपनी जो कुशलता साबित की वह दुश्मन  का मनोबल तोड़ने के लिए पर्याप्त है। उसकी ओर से की जा रही कार्रवाई पूरी तरह से अनियोजित लग रही है। पहलगाम की घटना के बाद भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के कारण पाकिस्तान ने खैबर पख्तून  सीमा और बलूचिस्तान में मौजूद  अपने सैन्यबलों को भारत से सटी सीमा पर तैनात तो किया किंतु लंबा युद्ध लड़ने में उसकी अक्षमता उजागर होने से उसका मनोबल गिरा हुआ है। खस्ता आर्थिक स्थिति और वैश्विक मंचों पर खराब छवि  की वजह से  परंपरागत सहयोगी भी उसका साथ देने के बजाय लीपापोती कर रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात है मुस्लिम देशों का तटस्थ बने रहना। तुर्किये के अलावा कोई भी बड़ा मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान के साथ खड़ा होने की पहल नहीं कर रहा। सऊदी अरब जैसा इस्लाम का संरक्षक समझे जाना वाला देश जिसने पाकिस्तान को करोड़ों डॉलर का कर्ज देकर  सहारा दिया , इस विवाद से निर्लिप्त बना हुआ है। लंबे समय तक पाकिस्तान भारत के साथ अपने झगड़े को इस्लाम और हिन्दू धर्म से जोड़कर इस्लामिक देशों का भावनात्मक दोहन करता रहा। लेकिन बीते कुछ सालों के भीतर भारत अपनी कुशल कूटनीति से प्रमुख मुस्लिम देशों के मन में  ये बात स्थापित करने में काफी हद तक सफल हो गया कि पाकिस्तान मानवता का दुश्मन है और उसके द्वारा आतंकवादियों को प्रश्रय, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिये जाने से दुनिया भर में मुसलमान और  आतंकवाद समानार्थी बन गए। चीन जैसा उसका अंध समर्थक भी अभी तक तेल की धार देख रहा है क्योंकि वह खुद इस्लामिक अतिवाद को कुचलने में लगा है। पाकिस्तान में उसके जो प्रकल्प चल रहे हैं उनके विरोध में स्थानीय जनता का विरोधी रवैया उसके लिए सिरदर्द बना हुआ है  जिनमें चीन के करोड़ों डॉलर फंसे हुए हैं। कुल मिलाकर भारत ने बड़ी ही कुशलता से पाकिस्तान को हर मोर्चे पर घेर रखा है। गौरतलब है आज की दुनिया में जंग केवल हथियारों से जीतना संभव नहीं होता। यदि ऐसा होता तो रूस अभी तक यूक्रेन को घुटनाटेक करवा देता और चीन ने ताईवान पर कब्जा कर लिया होता। आशय ये है कि जब तक विश्व जनमत किसी देश के साथ नहीं होता तब तक ऐसे मुकाबले में पूर्ण विजय हासिल करना कठिन होता है। पाकिस्तान ने अब तक जो कुछ भी किया उससे उसकी कमजोरी जाहिर हो चुकी है। वहीं भारत अत्यंत धैर्य के साथ सामरिक और कूटनीतिक मोर्चे पर प्रभावशाली प्रदर्शन कर रहा है। ऐसे समय देशवाशियों का दायित्व है कि वे संयम और अनुशासन का परिचय देते हुए न अफवाहों पर भरोसा करें और न ही उन्हें फैलाने का माध्यम बनें। सोशल मीडिया पर भी अनावश्यक सामग्री परोसने से बचना चाहिए। युद्ध में उत्साह बुनियादी जरूरत है किंतु बतौर नागरिक जिम्मेदारी भरा आचरण भी उतना ही आवश्यक है। सेना और सरकार अपना काम पूरी तन्मयता से कर रही हैं। हमें उनमें अपना विश्वास व्यक्त करते हुए दुनिया को ये बताना चाहिए कि संकट के इस समय पूरा देश एकजुट है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 8 May 2025

मुनीर पाकिस्तान को युद्ध में फंसाकर सत्ता हथियाने की फिराक में


भारत द्वारा पाकिस्तान  स्थित आतंकवादियों के अड्डों पर ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत किये गए हमलों के बाद पाकिस्तान ने भी जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाके में  बमबारी करते हुए 15 नागरिकों को  मार दिया। उल्लेखनीय है ऑपरेशन सिंदूर में केवल आतंकवादियों के अड्डों को ही निशाना बनाया गया तथा सैन्य ठिकानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। लेकिन पाकिस्तान द्वारा लगातार गोलाबारी करते हुए युद्धविराम का उल्लंघन किया जा रहा है जो भारत को युद्ध में घसीटने की चाल है। स्मरणीय है भारत युद्ध की स्थिति को टालता आ रहा था क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम नुकसानदेह होते हैं। और फिर आज के जमाने की जंग तकनीक आधारित होने से काफी खर्चीली हो गई है। उदाहरण के लिए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना के विमानों ने पाकिस्तान की सीमा में प्रविष्ट हुए बिना ही मिसाइलों और ड्रोन की मदद से आतंकवादियों के प्रशिक्षण और आश्रय स्थलों को खंडहरों में बदल डाला । इस ऑपरेशन को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बदले तक ही सीमित माना जा सकता है किंतु पाकिस्तान ने बौखलाहट में पुंछ क्षेत्र में नागरिकों को निशाना बनाकर भारत को युद्ध के लिए ललकारने का जो दुस्साहस किया वह उसे बहुत महंगा पड़ेगा ये तय है। दरअसल उसके साथ दिक्कत ये है कि वह सेना और आतंकवाद रूपी दो पाटों के बीच फंसा हुआ है। कहने को तो वह लोकतांत्रिक देश है किंतु उससे जुड़ी सोच और सिद्धांतों का पालन नहीं करने की वजह से वहाँ राजनीतिक अस्थिरता ने अपने पैर मजबूती से जमा लिए। अस्तित्व में आने के कुछ सालों बाद से ही पाकिस्तान में नेताओं की हत्या और फ़ौज द्वारा तख्ता पलट का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज भी जारी है। अपने विरोधी को जेल भेजना आम बात है। सत्ता से हटने या हटाये जाने के बाद पूर्व सत्ताधारी या तो कैदखाने में होता है या फिर देश के बाहर जाकर शरण लेने बाध्य किया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान इस समय जेल में हैं। उनके साथ जिस तरह का अमानुषिक व्यवहार हो रहा है वह किसी भी देश के लिए शर्मनाक है। पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ देश से बाहर रहते हुए दुनिया से रुखसत हो गए। इसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री शाहबाज के भाई और दो बार निर्वाचित प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ का हश्र भी किसी से छिपा नहीं है।  हालांकि मुस्लिम देशों में सत्ता पलट का ये खेल बहुत आम है किंतु पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना ने देश को लोकतांत्रिक बनाने का जो सपना देखा था वह बहुत जल्दी मिट्टी में मिल गया। वहाँ के जितने भी सत्ताधीश हुए उन्होंने  मुल्क की बेहतरी के बजाय  कुर्सी बचाये रखने के लिए भारत विरोधी रुख अपनाया। सेना के जनरल भी अपनी  राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भारत विरोधी रवैया अपनाकर सरकार पर दबाव बनाते रहे। ये कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार जनता की मर्जी के बजाय सेनाध्यक्षों की दया पर निर्भर रहती है। वर्तमान प्रधानमंत्री शाहबाज भी इसी स्थिति में जी रहे हैं। उनके बड़े भाई नवाज शरीफ ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के प्रयास किये थे किंतु उनको सत्ता गंवानी पड़ी। शाहबाज राजनीतिक तौर पर वैसे भी उतने मजबूत नहीं हैं इसीलिए फौजी जनरल मुनीर खुद को प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर मानते हैं। पहलगाम में आतंकी हमले के पहले दिये उनके एक भाषण में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जिस प्रकार की जन्मजात नफ़रत की बात की गई उसकी काफी चर्चा हुई। कहा जाता है पहलगाम की घटना का वह पूर्व संकेत थी क्योंकि उसके पहले आतंकवादियों ने कभी भी धर्म पूछकर लोगों को नहीं मारा था। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिये उस हत्याकांड का बदला ही लिया किंतु जनरल मुनीर पूरी तरह से जंग छेड़ना चाहते हैं क्योंकि हर युद्ध के बाद पाकिस्तान में तख्ता पलट की परंपरा रही है। जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार वहाँ की चुनी हुई सरकार पूरी तरह सेना की मुट्ठी में आ चुकी है। जनरल मुनीर सत्ता हथियाने के लिए पाकिस्तान को युद्ध में झोंकना चाह रहे हैं। यदि पहलगाम की घटना के बाद पाकिस्तान आतंकवाद पर नकेल कसने की पहल करता तब शायद उस पर ये मुसीबत नहीं आती। लेकिन उसने भारत के अंधविरोध में आतंकवादियों के रूप में जिन नागों को दूध पिलाया वे ही उसकी बर्बादी का सबब बन रहे हैं। उसका ये कहना कि वह खुद आतंकवाद से जूझ रहा है सिवाय झूठ के और कुछ नहीं है। ऐसे में जनरल मुनीर का युद्धोन्माद पाकिस्तान के लिए एक और विभाजन का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि भारत भी इस बार उसे कड़ी सजा देने के लिए तैयार दिख रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 May 2025

भारतीय सेना ने वह कर दिखाया जिसका पूरे देश को इंतजार था

 अप्रैल को पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए नृशंस हत्याकांड के कारण पूरा देश गुस्से में उबल रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया जाएगा जिसे वह भूल नहीं सकेगा। सर्वदलीय बैठक में सभी नेताओं ने सरकार के  किसी भी कदम के समर्थन  का आश्वासन दिया जिसके बाद प्रधानमंत्री ने सेना प्रमुखों को ये अधिकार दे दिया कि वे अपना लक्ष्य, तरीका और समय तय करते हुए आतंकवादियों की कमर तोड़ें। हालांकि श्री मोदी के उक्त फैसले पर उनके विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया कि वे अपनी जिम्मेदारी सेना पर डालकर दूर हो गए। सोशल मीडिया में भी पाकिस्तान में घुसकर मारने का दबाव बनाया जाने लगा। प्रधानमंत्री सहित भाजपा नेताओं द्वारा 26/11 हमले के बाद दिये बयानों के वीडियो दिखाकर उनका मजाक उड़ाते हुए 56 इंची सीने के दावे पर भी तंज कसे जाने लगे। सिंधु नदी जल संधि और पाकिस्तानी नागरिकों को देश छोड़ने संबंधी निर्णयों को युद्ध से बचने का तरीका बताने का अभियान भी देखने मिला।  कुछ लोग ये कहने से भी  नहीं चूके कि चीन के डर से भारत सरकार पाकिस्तान पर हमला करने का साहस नहीं कर पा रही। पाकिस्तान भी परमाणु बमों का हवाला देकर धमकाने की जुर्रत कर  रहा था। हालांकि भारत की ओर से जवाबी कारवाई   का डर उसके सिर पर सवार था। सीमा पर उसने सैन्य तैयारियां भी करना शुरू कर दिया। इन सबके बीच देश में एक वर्ग निराशावाद फैलाने में जुटा था। उ.प्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भारतीय वायुसेना के सबसे आधुनिक लडाकू विमान रफाल को खिलौना बताते हुए उसका उपहास किया। कुछ विपक्षी नेताओं के बयानों को पाकिस्तान ने अपनी बेगुनाही के प्रमाण तौर पर भी पेश किया। वहाँ की संसद में भी उनका उल्लेख करते हुए कहा गया कि भारत में पूरा देश सरकार के साथ नहीं है। जैसे - जैसे दिन बीत रहे थे सरकार पर सवाल दागने वालों के हौसले बुलंद होने लगे। यहाँ तक दावा किया गया कि सरकार ने ही पहलगाम हत्याकांड करवाया। आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर पर्यटकों की हत्या किये जाने की बात को झुठलाने के भी खूब जतन हुए। लेकिन इन सबसे विचलित हुए बिना सरकार और सेना ने तैयारी जारी रखी। सबसे बड़ी बात ये हुई कि विश्व जनमत को भारत के पक्ष में मोड़ने में सफलता मिली जो बड़ी उपलब्धि थी। यहाँ तक कि प्रमुख मुस्लिम देश तक आतंकवाद से लड़ने में भारत के पक्ष में नजर आये। और जब ये सुनिश्चित हो गया कि पलटवार के समुचित इंतजाम हो चुके हैं तब गत मध्यरात्रि के बाद वायुसेना ने पाकिस्तान के भीतर स्थित आतंकवादियों के 9 बड़े अड्डों को निशाना बनाकर  ध्वस्त कर दिया। इस कारवाई में पाक के कब्जे वाला कश्मीर भी शामिल था। पाकिस्तान द्वारा भी हमले के  वीडियो प्रसारित किये गए  हैं। इसके बाद  भारत  में  पिछली सर्जिकल स्ट्राइकों का सबूत मांगने वाला तबका मुँह छिपाये घूम रहा है। सेना ने साफ कर दिया कि उसने पाकिस्तान के किसी सैन्य ठिकाने पर हमला नहीं किया और केवल आतंकवादियों के अड्डों को ही निशाना बनाया गया।  दो दिन पहले  सं.राष्ट्र.संघ सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत को घेरने के प्रयास में पाकिस्तान खुद फंस गया जब सदस्य देशों ने उसके यहाँ आतंकवादी अड्डे होने का आरोप लगाकर कठघरे में खड़ा कर दिया। ऐसा लगता है भारत सरकार इसी का इंतजार कर रही थी। दिल्ली में बीते दो - तीन दिनों में उच्च स्तरीय बैठकों का दौर जिस प्रकार चला उससे ये संकेत तो मिल ही गए थे कि कुछ न कुछ होने वाला है और आखिरकार ऑपरेशन सिंदूर नामक  अभियान के जरिये पहलगाम हत्याकांड का बदला ले लिया गया। इस हमले में पाकिस्तान को कितना नुकसान हुआ इसका विवरण आता जा रहा है। आतंकी सरगना मसूद अजहर के परिवार का सफाया होने की पुष्टि तो खुद उसी ने की है। नष्ट हुए आतंकवादियों के अड्डों की तस्वीरें साबित कर रही हैं कि भारतीय वायुसेना ने बहुत ही कुशलता से अपने लक्ष्य को भेदा। इस कार्रवाई के बाद दोनों देशों की सीमा पर भी गोलाबारी की खबरें आई हैं। ये अभियान लंबे युद्ध में तब्दील होगा , ये पाकिस्तान के जवाब पर निर्भर है। यद्यपि सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक उसके पास पर्याप्त सैन्य संसाधन नहीं हैं और  आर्थिक स्थिति भी दयनीय है।बलूचिस्तान के साथ ही अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर भी वह फंसा हुआ है। ये देखते हुए वह ऑपरेशन सिंदूर का जवाब किस तरह से देता है इस पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं । यद्यपि युद्ध से दोनों पक्षों को नुकसान होगा किंतु पाकिस्तान जैसे देश को सबक सिखाना जरूरी हो गया था। भारत बेशक पूर्ण युद्ध को टाले परंतु ज़हरीले सांप का फन कुचलना समय की मांग  है। भारतीय सेना की कारवाई से जैसा  उत्साह और संतोष का भाव जागा है वह देशवासियों  के मन में सरकार और सेना के प्रति विश्वास का प्रमाण है। साथ ही जो आत्मविश्वास सर्वत्र परिलक्षित हो रहा है वही किसी शक्तिशाली देश की पहिचान है। रास्वसंघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में कहा था कि शक्तिशाली हैं तो शक्ति का प्रदर्शन भी होना चाहिए। भारतीय सेना ने वह कर दिखाया जिसके लिए हर देशभक्त उसके प्रति श्रद्धावनत है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 May 2025

अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार भरोसे लायक नहीं


जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने  विधानसभा में पहलगाम की घटना पर भावुक होते हुए कहा कि मृतक  पर्यटकों की सुरक्षित वापसी नहीं हो पाने के लिए वे खुद को भी जिम्मेदार मानते हैं।  सिंधु नदी जल संधि निलंबित किये जाने का भी समर्थन किया। आजकल उमर और उनकी पार्टी पूर्ण राज्य के दर्जे जैसी माँग उठाने से परहेज कर रही है। पहलगाम की घटना से कोई वास्ता न होने की बात साबित करने के लिए घाटी में बंद भी रखा गया। पर्यटकों को आश्वस्त किया गया कि वे निडर होकर कश्मीर आएं उनकी सुरक्षा और सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा। पहलगाम हादसे के बाद इस तरह के समाचार भी प्रायोजित किये गए कि स्थानीय लोगों ने पर्यटकों की हरसंभव सहायता की। इस कथित सौजन्यता का कारण कश्मीर घाटी से पर्यटकों के  लौटने के साथ ही आने वाले सैलानियों द्वारा बुकिंग रद्द करने से घाटी के होटल, हाउसबोट, टैक्सी, शिकारा, घोड़े - खच्चर वाले और गाइड अपनी रोजी - रोटी के लिए चिंतित हो उठे। उल्लेखनीय है धारा 370 हटाये जाने के बाद से  पर्यटकों की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि हुई जिससे वहाँ  अर्थव्यवस्था को पंख लग गए। ऐसे में पहलगाम हत्याकांड से उनके व्यवसाय के चौपट होने का खतरा पैदा हो गया क्योंकि अपनी जान जोखिम में डालकर शायद ही कोई सैर - सपाटे पर आना चाहेगा। तुष्टीकरण करने वाले नेताओं और उनके प्रचारतंत्र ने कश्मीरियों की मेहमान नवाजी और इंसानी भावनाओं का जमकर ढिंढोरा  पीटकर साबित करना चाहा कि आतंकवाद से आम कश्मीरी का कोई संबंध नहीं है। ये इसलिए किया गया क्योंकि पहलगाम में  जिस जगह आतंकियों ने हत्याकांड किया वहाँ के कई निजी प्रतिष्ठान उस दिन बंद थे । घटना के फ़ौरन बाद खाद्य सामग्री बेचने वाले अनेक खोमचे वाले फरार हो गए। जाँच एजेंसियों का ध्यान भटकाने के लिए ये हवा उड़ाई गई कि आतंकवादी बाहर से आये और कश्मीरियों का उनसे कोई संबंध नहीं था। लेकिन हाल ही में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुल्ला ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि  इतनी बड़ी आतंकवादी आतंकवादी घटना बिना स्थानीय सहयोग के संभव नहीं थी। उन्होंने  कहा कि निश्चित रूप से आतंकवादी बाहर से आये किंतु उन्हें वहाँ तक ले जाने वाले स्थानीय लोग ही थे। इस बयान ने उन समस्त शिगूफेबाजों के मुँह बंद कर दिये जो कश्मीरियों को दूध का धुला साबित करने में दिन - रात एक किये हुए थे। फारुख के बयान पर तीखी  प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि डाॅ. अब्दुल्ला के बयान ने आम कश्मीरी को मुसीबत में डाल दिया है क्योंकि अब जांच एजेंसियां कश्मीर के नागरिकों को संदेह के नाम पर पकड़ेंगी। और उनकी बात सच भी निकली क्योंकि पहलगाम हत्याकांड के मुख्य आरोपियों को संरक्षण और सहयोग देने वाले संदेहास्पद तमाम लोगों को गिरफ्तार किया गया । महबूबा ने दोबारा फारुख के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके बयान से देश के बाकी हिस्सों में कश्मीरी मुसीबत में आ गए। उन्होंने पहलगाम की आतंकी घटना में पाकिस्तान का हाथ होने के सवाल को ये कहते हुए घुमा दिया कि जाँच के चलते किसी को दोषी मान लेना गलत है। उक्त बातों से साबित हो जाता है कि घाटी के राजनीतिक नेता देश को गुमराह करने की परंपरा का ही निर्वहन कर रहे हैं। भले ही वे चुनाव प्रक्रिया का पालन करते हों किंतु भारत के प्रति उनकी निष्ठा जितनी पहले संदिग्ध रही उतनी ही आज भी है। काफी पहले दिया फारुख का वह बयान काफी चर्चित हुआ था कि धारा 370 नहीं हट सकती चाहे नरेंद्र मोदी 10 बार प्रधानमंत्री बन जाएं। महबूबा ने यहाँ तक धमकी दी थी कि 370 हटाये जाने की स्थिति में घाटी में कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं मिलेगा। उमर ने भी मुख्यमंत्री बनते ही 370 की वापसी का मुद्दा उठाने की डींग हाँकी थी। आजादी के पहले से ही कश्मीर घाटी के नेताओं का दोगलापन सामने आता रहा किंतु उनकी हरकतों को जानते हुए भी उन्हें गले लगाने की मूर्खता की गई। धारा 370 जैसे अस्थायी प्रावधान को लगभग 70 साल तक क्यों ढोया गया जबकि उसकी वजह से देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के साथ ही राष्ट्रीय एकता के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो गया। यदि ये धारा न होती तब वहाँ अलगाववाद के बीज ही नहीं पनपते। अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार  सत्ता की राजनीति के चलते भारत के प्रति दिखावटी नरमी भले ही दिखाता रहा किंतु इनके मन कभी भी साफ नहीं रहे। हालांकि मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति ने इन्हें सदैव जोड़ने का प्रयास किया किंतु इनकी तासीर नहीं बदली और भारत में रहकर भी ये पाकिस्तान की हिमायत करने से बाज नहीं आये। कश्मीर घाटी को हिन्दू विहीन कर वहाँ के लोगों में कश्मीरियत के नाम पर भारत से अलग पहिचान बनाने का भाव भरने में इन परिवारों की मुख्य भूमिका रही है और वही ये अब भी निभा रहे हैं। ये तो अच्छा है केन्द्र सरकार ने इनके घमंड को काफी हद तक तोड़ दिया। बेहतर है विपक्षी पार्टियां भी अब्दुल्ला और मुफ्ती नामक परिवारों को किनारे करें क्योंकि ये कश्मीर को समस्याग्रस्त बनाये रखकर ही अपनी अहमियत बनाये रखते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी