प्रधान न्यायाधीश पद से सेवानिवृत हुए न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने गत वर्ष 11 नवम्बर को पदभार ग्रहण किया था और छह माह से कम में ही वे भूतपूर्व हो गए। लेकिन जाते - जाते उन्होंने एक ऐसी घोषणा कर दी जो भविष्य में नैतिकता का मापदंड बन सकती है। श्री खन्ना ने विदाई भाषण में कहा कि वे इसके बाद कोई आधिकारिक पद ग्रहण नहीं करेंगे और तीसरी पारी खेलते हुए कानून से संबंधित कुछ कार्य करेंगे। यद्यपि उन्होंने इसे स्पष्ट नहीं किया। लेकिन इसका सीधा - सीधा अर्थ यही लगाया जा सकता है कि वे सरकार द्वारा प्रदत्त कोई पद नहीं लेंगे। उल्लेखनीय है अधिकतर सेवा निवृत्त न्यायाधीश मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का काम करते हैं जबकि कुछ आयोग या ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष पद को सुशोभित करते हैं वहीं कुछ को अन्य तरीकों से सरकार उपकृत करती है। एक - दो ने चुनावी राजनीति में भी हाथ आजमाए वहीं प्रधान न्यायाधीश रहे रंगनाथ मिश्र राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष बने जबकि रंजन गोगोई राज्यसभा में नामांकित हुए। अनेक राज्यों में लोकायुक्त पद पर पूर्व न्यायाधीश नियुक्त होते हैं। पूर्व न्यायाधीशों को दिये जाने वाले पदों को लेकर राजनीतिक और विधि क्षेत्रों में बहस चलती रहती है। चूंकि न्यायाधीशों का चयन कालेजियम प्रणाली से होता है इसलिए पारदर्शिता पर संदेह बना रहता है। परिवारवाद और राजनीतिक प्रतिबद्धता भी नियुक्ति को प्रभावित करती है ये कहना गलत नहीं है। कल सेवा निवृत्त श्री खन्ना के चाचा श्री एच. आर. खन्ना भी न्यायाधीश रहे जबकि उनके पूर्ववर्ती श्री चंद्रचूड़ के पिता सबसे लंबे समय तक प्रधान न्यायाधीश रहे। श्री खन्ना के उत्ताधिकारी प्रधान न्यायाधीश श्री भूषण रामकृष्ण गवई भी एक राजनीतिक परिवार से हैं। उनके भाई कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं जबकि पिता रामकृष्ण गवई रिपब्लिकन पार्टी के संस्थापक थे जो कांग्रेस के सहयोग से राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य रहने के अलावा राज्यपाल भी रहे। इसी वजह से वे राहुल गाँधी से संबंधित मामले की सुनवाई से दूर हो गए। श्री गवई का कार्यकाल भी मात्र सात माह का है। लेकिन उन्होंने कार्यकाल शुरू करते ही अपने पूर्ववर्ती से प्रेरित होकर सेवा निवृत्ति के उपरांत कोई पद नहीं लेने की घोषणा कर दी। उनके ऐसा करने से एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत हो सकती है। लेकिन सवाल ये है कि इस घोषणा का दायरा कितना होगा क्योंकि केंद्र और राज्यों में अनेक ऐसे पद हैं जिन पर सेवा निवृत्त न्यायाधीशों की ही नियुक्ति होती है। लोकपाल और लोकायुक्त सहित अनेक नियामक आयोग इसके उदाहरण हैं। इसी तरह विभिन्न जाँच आयोगों में पूर्व न्यायाधीशों को सुविधाएं एवं मानदेय मिलता है। लेकिन श्री खन्ना और श्री गवई ने जो घोषणा की उसके बाद कम से कम इस बात का दबाव तो बनेगा कि सेवा निवृत्ति के बाद न्यायाधीश राजनीतिक दृष्टि से उपकृत किये जाने वाला पद स्वीकार न करें। उल्लेखनीय है श्री गोगोई को राज्यसभा में नामांकित होने पर काफी उलाहने सुनने पड़े थे। हालांकि श्री गोगोई तो राष्ट्रपति द्वारा नामांकित हैं किंतु कांग्रेस अतीत में न्यायामूर्ति रहे हिदायतुल्ला, बहरुल इस्लाम और रंगनाथ मिश्र को पार्टी टिकिट पर राज्यसभा सदस्य बना चुकी थी। श्री मिश्र 1984 में दिल्ली के सिख विरोधी दंगों की जांच हेतु गठित आयोग के अध्यक्ष थे जिसने कांग्रेस को पूरी तरह बेकसूर बताया । कहते हैं उसी के आभार स्वरूप उन्हें कांग्रेस ने उच्च सदन भेजा। जबकि बाद में अदालत द्वारा सज्जन कुमार सहित कुछ कांग्रेस नेताओं को अपराध माना गया। ऐसे ही राम जन्मभूमि का ऐतिहासिक फैसला देने वाली सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यों की पीठ के श्री गोगोई सहित अन्य चार किसी न किसी पद पर हैं जिनमें कुलाधिपति, आयोग के अध्यक्ष और राज्यपाल जैसे ओहदे हैं। पांचवे श्री चंद्रचूड़ प्रधान न्यायाधीश पद से निवृत्त हुए। ये देखते हुए श्री खन्ना और श्री गवई ने जो ऐलान किया उसका स्वरूप क्या होगा ये कहना तो मुश्किल है किंतु किसी बड़ी यात्रा की शुरुआत छोटे से कदम से होती है। यदि थोड़े से ही न्यायाधीश इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तब न्यायपालिका और नैतिकता में बढ़ती दूरी कुछ तो कम की ही जा सकेगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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