भारत और पाकिस्तान के सैन्य अभियानों के महानिदेशकों की बैठक से हासिल कुछ भी होने वाला नहीं है क्योंकि सेना के अधिकारी केवल सीमित मुद्दों पर ही बात कर सकते हैं। लेकिन जो नीतिगत मुद्दे हैं उन पर फैसला पाकिस्तान में भले ही सेना के मुखिया लेते हों किंतु भारत में ये सरकार के पास है और सेना ने इसे स्वीकारने में कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। बीते सप्ताह चली संक्षिप्त लड़ाई में भी सेना और सरकार का समन्वय सामने आया जब लड़ाई के पहले प्रधानमंत्री ने सेनाओं के सर्वोच्च अधिकारियों को सैन्य कार्रवाई का समय, तरीका और लक्ष्य तय करने का अधिकार सौंप दिया। उसके बाद सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत पाकिस्तान में आतंकवादियों के अड्डों पर हमले किये। लेकिन जिस बात ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया वह थी पत्रकारों को ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी देने हेतु का दायित्व विदेश सचिव के साथ थलसेना और वायुसेना की एक - एक महिला अधिकारी को सौंपना जिसने पूरे विश्व को संदेश दे दिया कि भारत में सेना और सरकार के बीच बेहतर समन्वय है । राजनीतिक नेतृत्व ने भी पर्दे के पीछे रहकर संकेत दिया कि जो जिसका काम है वही उसे करे। विदेश मंत्री ने पूरी दुनिया से कूटनीतिक संपर्क बनाये रखा जबकि रक्षा मंत्री सेनाध्यक्षों के जरिये जायजा लेते रहे। वहीं सुरक्षा सलाहकार प्रधानमंत्री के संपर्क में रहते हुए रणनीतिक तैयारियों में जुटे थे।युद्धविराम की जानकारी भी विदेश सचिव और दोनों महिला सैन्य अधिकारियों ने ही दी। उसके एक दिन बाद तीनों सेनाओं के वरिष्ट अधिकारियों द्वारा समूची सैन्य कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा पत्रकारों को देते हुए उन भ्रांतियों का निराकरण किया जो सोशल मीडिया पर फैलाई जाती रहीं। पूर्वाग्रहों से ग्रसित कुछ यू ट्यूबर्स का तो धंधा ही हर चीज में मीन - मेख निकालना रह गया है। पहलगाम हमले से युद्धविराम के बाद तक इस वर्ग ने सिवाय नकारात्मकता फैलाने के कुछ नहीं किया। आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर मारे जाने की बात को ये लोग झुठलाने में लगे रहे जबकि मृतकों की पत्नी और संबंधी चीख - चीखकर उसकी पुष्टि करते रहे। उसके बाद सरकार को पाकिस्तान पर हमले के लिए उकसाया जाता रहा। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर शुरू होते ही मानवीयता का रोना रोया जाने लगा। भारतीय सेना ने दुश्मन को कितना नुकसान पहुंचाया इसकी तारीफ के बजाय पहलगाम के कसूरवार मारे गए या नहीं ये पूछा जाने लगा। कुख्यात आतंकवादियों के परिवार का सफाया होने पर हमले में मारे गए भारतीय नागरिकों का मुद्दा छेड़कर सेना की सफलता का अवमूल्यन करने का प्रयास किया गया। शुक्रवार की रात भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जोरदार प्रहार करते हुए उसकी कमर तोड़ दी। अगले दिन जब अचानक युद्धविराम का ऐलान हुआ तब पूरा देश चौंक गया। सरकार समर्थकों को भी उसका औचित्य समझ में नहीं आया। विरोध करने वालों को इंदिरा जी याद आने लगीं। प्रधानमंत्री के अमेरिका के दबाव में आने के अलावा कश्मीर विवाद के अंतर्राष्ट्रीयकरण का आरोप भी उछलने लगा। लड़ाकू विमान राफेल के मार गिराए जाने की खबरें आने लगीं। लेकिन सेना के वरिष्ट अधिकारियों द्वारा समूचे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण देने के बाद स्पष्ट है कि पाकिस्तान को जबरदस्त क्षति हुई। 100 से अधिक आतंकवादी और सेना से जुड़े 40 लोगों की मौत हुई। तमाम सैन्य प्रतिष्ठान और आतंक के अड्डे तबाह हो गए। पाकिस्तान के परमाणु अस्त्र जिस स्थान पर रखे हैं उसके निकट तक भारतीय मिसाइलों ने धमाके किये। इसकी तुलना में हमारी मानवीय क्षति 25 के भीतर रही। नागरिक और सैन्य ठिकानों को भी मामूली नुकसान पहुंचा। पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों कि.मी तक भारत ने हमले किये जबकि पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइलें हवा में नष्ट करते हुए अपनी रक्षा प्रणाली की श्रेष्ठता प्रमाणित की। कश्मीर पर मध्यस्थता को सरकार ने खुले तौर पर अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि पाकिस्तान से बात होगी भी तो मुद्दा उसके कब्जे वाले कश्मीर के हिस्सा होगा न कि जम्मू - कश्मीर। वायुसेना ने भी स्पष्ट कर दिया कि जिस कारण से ऑपरेशन सिंदूर किया गया उनके दोबारा उत्पन्न होने पर दोबारा ऐसी ही कारवाई होगी। सिंधु नदी जल संधि के अलावा पाकिस्तानी नागरिकों को वीजा संबंधी फैसले भी जारी रहेंगे । सबसे बड़ी बात ये कि आतंकवादी हमले को युद्ध माना जायेगा। जहाँ तक सवाल युद्धविराम पर जल्दी राजी हो जाने का है तो उसकी वजह भी सामने आये बिना नहीं रहेगी। हो सकता है चीन द्वारा इस लड़ाई को रूस - यूक्रेन और इसराइल - हमास युद्ध की तरह लंबा खींचने में पाकिस्तान की मदद की आशंका के कारण भारत ने ये कदम उठाया जो अस्थायी भी हो सकता है। इस लड़ाई में भारत सैनिक, आर्थिक, कूटनीतिक और राजनीतिक तौर पर एक मजबूत, जिम्मेदार और परिपक्व देश के तौर पर उभरा है। सरकार और विपक्ष में भी बेहतर तालमेल रहा बावजूद इसके कि कुछ लोग दूध में नींबू निचोड़ने के काम में जुटे रहे। बेहतर यही होगा कि ऐसा वातावरण बनाये रखा जाए क्योंकि पाकिस्तान के अंदरूनी हालातों को देखते हुए वह सीमाओं को फिर अशांत कर सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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