Tuesday, 27 May 2025

बेहतर है पार्टी के प्रति वफ़ादारों को महत्व दें राहुल

हुल गाँधी भले ही कांग्रेस संगठन के किसी पद पर न हों किंतु पार्टी उन्हीं की मनमर्जी से चलती है। दिखाने के लिये भले ही मल्लिकार्जुन खरगे अध्यक्ष हैं किंतु निर्णय प्रक्रिया पर  राहुल का नियंत्रण रहता है। हालांकि  इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं क्योंकि वे प्रधानमंत्री पद हेतु  पार्टी का चेहरा हैं। भाजपा में भी जब तक अटल जी रहे तब तक उनके सामने सब बौने थे और आज वही  स्थिति  नरेंद्र मोदी की है। इसीलिए कांग्रेस में किसी भी नीतिगत निर्णय में श्री गाँधी की निर्णायक भूमिका रहती है।  अध्यक्ष चाहे उनकी माताजी सोनिया गाँधी रहीं या वे स्वयं, सारे फैसले उन्हें केंद्र में रखकर ही हुए । यही वजह है कि चुनावी असफलता के लिए उन्हें ही जिम्मेदार माना गया। 2004 में जब डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार बनी तब शुरू में तो उसका श्रेय सोनिया जी के खाते में गया किंतु धीरे - धीरे संगठन और सत्ता की लगाम राहुल के हाथों आती गई जिसका प्रमाण उनके द्वारा भरी पत्रकार वार्ता में मंत्रीमंडल द्वारा स्वीकृत विधेयक की प्रति फाड़कर फेंकना था।  2014 से कांग्रेस के पराभव का दौर शुरू हो गया तब उसकी जिम्मेदारी लेते हुए श्री गाँधी ने अध्यक्ष पद भले छोड़ दिया लेकिन किसी सक्षम नेता को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बजाय अनिश्चितता बनाये रखी और अंततः सोनिया जी को कामचलाऊ अध्यक्ष बनाकर कमान अपने पास  रखी। एक के बाद एक राज्य हारते जाने के कारण पार्टी में असंतोष व्याप्त हुआ और जी- 23 नामक समूह बना जिसमें तमाम नामचीन चेहरे थे। उन्होंने पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र की आवाज उठाई किंतु बजाय उस पर ध्यान देने के असंतुष्टों को किनारे लगाने की मुहिम चली। उसके कारण अनेक ऐसे चेहरे पार्टी से बाहर आ गए जो गाँधी परिवार के वफादार माने जाते थे। बीच - बीच में कांग्रेस को कुछ राज्यों की सत्ता हासिल हुई किंतु उसका कारण प्रादेशिक नेता और स्थानीय परिस्थितियाँ ही रहीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी की वापसी और ज्यादा ताकत के साथ हुई तब ये लगा कि कांग्रेस का रसातल में जाना तय है। लेकिन कुछ राज्यों में सफलता मिलने से पार्टी की उम्मीदें बनीं रहीं जिनके कारण उसने इंडिया नामक विपक्षी दलों का गठन किया जिसने राहुल को अपना अघोषित उम्मीदवार मान लिया।  लेकिन 2023 में तीन राज्यों के चुनावों में भाजपा ने जबरदस्त वापसी कर कांग्रेस की वजनदारी तो घटाई ही श्री गाँधी की क्षमता पर भी सवालिया निशान और गहरे कर दिये। हालांकि विगत  लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उछलकर 99 तक आ गई किंतु उससे बड़ी बात रही भाजपा का बहुमत से पिछड़ जाना जिसके लिए मुख्य रूप से उ.प्र और महाराष्ट्र जिम्मेदार रहे। लेकिन पूरा विपक्ष मिलकर भी श्री मोदी की वापसी न रोक सका। राहुल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तो बन गये किंतु इंडिया गठबंधन को एकजुट रखने में विफल साबित हुए। नतीजा हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के रूप में सामने आया। कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राहुल को एकला चलो की नीति याद आई और वे पार्टी संगठन को ताकतवर बनाने में जुट गए। गुजरात से इसकी शुरुआत के बाद अब म.प्र में उनके आने की खबर है।  श्री गाँधी इन दिनों गद्दारों की खोज कर रहे हैं जिनके बारे में संदेह है कि वे भाजपा से मिले हैं। म.प्र में उनका आगमन भी इसी उद्देश्य को लेकर होने वाला है। लेकिन लगभग 20 साल से पार्टी  के शीर्ष पर बैठे श्री गाँधी ये नहीं समझ सके कि कांग्रेस की असली समस्या गद्दार नहीं बल्कि पार्टी में योग्य और वफादारों की उपेक्षा है जो भले ही गाँधी परिवार की हाँ में हाँ न मिलाएं किंतु पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा हर परिस्थिति में कायम रही। जिन प्रांतों में कांग्रेस लगातार पराभव का शिकार होती जा रही है उनमें भी चाटुकार प्रवृत्ति के नेताओं को महत्व दिया गया। पंजाब, राजस्थान, उ.प्र, म.प्र , छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में समय रहते सही लोगों को अवसर नहीं देने का दुष्परिणाम पार्टी भोग चुकी है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की कलह सतह पर है। कुल मिलाकर कांग्रेस में गाँधी परिवार के अलावा किसी को शक्तिशाली बनाने से परहेज करने की नीति  ही उसके लिए घातक साबित हो रही है। श्री गाँधी को    अब पार्टी में दरबारी संस्कृति के लोगों की बजाय ऐसे युवाओं को बागडोर सौंपना चाहिए जिनका अपना जनाधार भी हो। वरना वह अपनी मौजूदा दुरावस्था से उबर नहीं सकेगी। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता कितनी खोखली थी ये उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में साबित हो चुका है। और ये भी कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने प्रभाव क्षेत्र में कांग्रेस को किसी भी हालत में आगे बढ़ने नहीं देंगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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