सेना के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ बैठक के बाद रा.स्व.संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने उनके आवास पर गए तो बड़ी खबर बन गई। चूंकि संघ और सरकार के बीच संपर्क का काम भाजपा के संगठन मंत्री के जरिये होता है इसलिए संघ प्रमुख का उनके आवास पर जाना चौंकाने वाला था। राजनीतिक जगत में इस मुलाकात को सरकार पर संघ के नियंत्रण के रूप में भी प्रचारित किया गया। हिन्दू नव वर्ष के आयोजन में प्रधानमंत्री नागपुर गए तब कहा गया कि मातृ संगठन की नाराजगी दूर करने वे संघ मुख्यालय पहुंचे। वहीं डॉ. भागवत की उनसे ताजा मुलाकात के बाद कयास लगा कि पाकिस्तान के बारे में किसी निर्णय पर चर्चा हुई परंतु एक दिन बाद घोषणा हुई कि अगली जनगणना के साथ ही जातिगत गणना भी होगी। इसकी शुरुआत सितंबर माह से होगी और अंतिम नतीजे आने में एक साल लगेगा। इस निर्णय का अंदाज तो भाजपा के बड़े नेताओं तक को नहीं रहा होगा। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने संविधान और जातिगत जनगणना जैसे दो मुद्दों पर भाजपा को घेरा था। भाजपा की सीटें घट जाने से श्री गाँधी का हौसला बढ़ा और वे प्रधानमंत्री को चुनौती देते रहे कि जातीय जनगणना होकर रहेगी साथ ही आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक की जाएगी। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम ने लोकसभा चुनाव का तिलिस्म तोड़ दिया। जिस उ.प्र में अखिलेश यादव के पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) नारे ने भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया वह हालिया विधानसभा उपचुनावों में बुरी तरह विफल हो गया। इसी तरह हरियाणा और महाराष्ट्र ने भी कांग्रेस को जोरदार झटका देकर भाजपा की झोली भर दी। सबसे बड़ा उलटफेर हुआ दिल्ली में जहाँ भाजपा ने आम आदमी पार्टी को बुरी तरह हराकर पूरे राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल डाली। इन सबसे प्रधानमंत्री का हौसला मजबूत हुआ। चूंकि संघ ने उक्त तीनों राज्यों में व्यूहरचना की थी और आगे भी उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है , लिहाजा जातिगत जनगणना के फैसले के पहले श्री मोदी और संघ प्रमुख की भेंट उसी संदर्भ में हुई ये मान लेना गलत नहीं है। रही बात इसके राजनीतिक परिणामों की तो भले ही श्री गाँधी और अन्य विपक्षी नेता इसे अपनी जीत बताकर खुश हों किंतु एक बार फिर वे प्रधानमंत्री के चक्रव्यूह में फंस गए। अतीत में जब - जब भी कोई बड़ा राजनीतिक अथवा सामाजिक मुद्दा उछला उससे अंततः भाजपा ही लाभान्वित हुई। 1974 में गुजरात से शुरू हुए छात्र आंदोलन के परिणिती आपातकाल के रूप में हुई। 1977 के चुनाव में जनता सरकार बनी और जल्द चलती बनी किंतु जनसंघ के नये अवतार के रूप में खड़ी हुई भाजपा कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित हो गई। 1984 में इंदिरा जी की हत्या ने भले ही राजीव गाँधी को ऐतिहासिक बहुमत दिलवा दिया किंतु महज दो लोकसभा सीटों पर सिमट गई भाजपा पांच वर्ष के भीतर ही सबसे बड़ा विपक्षी दल बन गई। उसने राममंदिर आंदोलन के जरिये जो दांव चला , राजीव गाँधी ने उसे बेअसर करने मंदिर का शिलान्यास करवाया किंतु उसका लाभ मिला भाजपा को। इसकी काट के तौर पर पुराने समाजवादी , मंडल आयोग लेकर आये लेकिन आज लोकसभा में पिछड़ी जातियों के सर्वाधिक सांसद भाजपा के हैं। दलितों और आदिवासियों में भी उसकी जड़ें बेहद मजबूत हो चुकी हैं। सवर्ण जातियाँ तो उसकी मुख्य ताकत हैं ही। जिस सोशल इंजीनियरिंग को कभी लालू - मुलायम की खोज माना जाता था उसमें अब भाजपा को कहीं ज्यादा महारत हासिल है। इसका कारण पार्टी का विशाल संगठन और मुख्यधारा से जुड़े मुद्दों पर नीतिगत स्पष्टता है। 2014 में श्री मोदी के सत्ता में आने के बाद अनेक ऐसे निर्णय हुए जिनसे भाजपा की सैद्धांतिक प्रतिबद्धता साबित हो गई। जातिगत जनगणना को तुरुप का पत्ता मानकर चल रहे श्री गाँधी के पास इस बात का उत्तर नहीं है कि कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार अपने पिछले कार्यकाल में हुई जातिगत जनगणना के नतीजे सार्वजनिक क्यों नहीं कर सकी? वहीं बिहार में नीतीश कुमार सरकार ने इस बारे में बाजी मार ली। जहाँ तक इस फैसले के समय का प्रश्न है तो इसके पीछे बिहार के आगामी चुनाव ही हैं और श्री मोदी की हाल में हुई पटना यात्रा के दौरान इसकी जमीन तैयार हो गई थी। अब राहुल चाहे जितना शोर मचाएं किंतु उनका सारा परिश्रम पार्टी संगठन सुप्तावस्था में होने से व्यर्थ चला जाता है। जातिगत जनगणना का मुद्दा भी इसी तरह उनके हाथ से निकल गया। अब सवाल ये है कि मुस्लिम समाज की पिछड़ी जातियाँ भी सामने आ गईं तब लालू और अखिलेश जैसे नेता उनके साथ आरक्षण का बंटवारा कैसे करेंगे? उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री पसमांदा (ओबीसी) मुसलमानों के लिए लंबे समय से आवाज उठाते आये हैं। ये सब देखते हुए जातिगत जनगणना करवाने के फैसले से प्रधानमंत्री ने एक बार फिर विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस को निहत्था कर दिया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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