पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान दुनिया के दो देश तुर्किये और अज़रबैजान खुलकर पाकिस्तान के समर्थन में आए। तुर्किये ने तो उसको हथियार भी प्रदान किए। वहीं अज़रबैजान ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की तरफदारी की । उनके रवैये की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई जिसका प्रमाण वहां जाने वाले भारतीय पर्यटकों द्वारा यात्रा रद्द करने से मिला। देश के अनेक व्यापारिक संगठनों ने भी तुर्किये के साथ व्यापार बंद करने का फैसला कर डाला जहां से बड़ी मात्रा में संगमरमर और सेब जैसी चीजें आयात होती हैं। हालांकि आयात की तुलना में हमारा निर्यात कहीं अधिक है। वैसे सरकार ने किसी को भी तुर्किये की यात्रा अथवा व्यापारिक रिश्ते रखने से नहीं रोका किन्तु जब देश पर संकट आता है तब राष्ट्रभक्ति का ज्वार देशवासियों के मन में उठना स्वाभाविक है और जरूरी भी क्योंकि इसका असर दूरगामी होता है। वैसे अज़रबैजान की तो कोई खास हैसियत नहीं है । सोवियत संघ टूटने पर अस्तित्व में आए इस इस्लामिक देश के प्रति भारतीय पर्यटक तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। आजकल भारत के मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग में विदेश यात्रा का शौक जोरों पर है। थाईलैंड , मलेशिया , सिंगापुर , इंडोनेशिया, वियतनाम , श्रीलंका और दुबई उनके मनपसंद स्थान हैं जिनकी सैर यूरोप और अमेरिका की तुलना में सस्ती है । अज़रबैजान सस्ती यात्रा के केंद्र के तौर पर उभरा है। भारत के साथ कोई विवाद नहीं होने के बाद भी इसने पाकिस्तान का समर्थन क्यों किया यह अस्पष्ट है। इसलिए माना जा रहा है कि इस्लामिक होने के नाते वह पाकिस्तान के साथ है। दूसरी तरफ कभी इस्लामिक जगत का मुखिया रहे तुर्किये में यूरोप के प्रभाव से ईसाइयत आने से वह आधुनिक मिश्रित संस्कृति का उदाहरण बन गया। भारत से इसके रिश्ते बहुत अच्छे न सही किंतु शत्रुतापूर्ण भी नहीं रहे जिससे पर्यटक वहां जाते रहे हैं। व्यापारिक रिश्ते भी सामान्य कहे जा सकते हैं किंतु बीते कुछ सालों में इसका रवैया कट्टरपंथी हो गया जिससे उसने पाकिस्तान की हिमायत कर भारत से अदावत पाल ली। हालिया लड़ाई में तुर्किये में बने ड्रोनों का भारत के विरुद्ध खुलकर उपयोग हुआ और उसने खुले आम पाकिस्तान का समर्थन भी किया। इसी तरह अज़रबैजान भी पाकिस्तान के साथ नजर आया। ऐसे में भारतीय पर्यटकों द्वारा उक्त देशों की यात्रा न करने का फैसला स्वागतयोग्य है। साथ ही व्यापारिक संगठनों द्वारा तुर्किये के साथ व्यापार रोकने का फैसला भी देशहित में है। इससे उन दोनों को आर्थिक नुकसान के साथ ये एहसास भी होगा कि पाकिस्तान का समर्थन कर वे भारत की मित्रता खो बैठे। उनको सोचना चाहिए था कि सऊदी अरब, यू ए ई, कतर और ईरान जैसे इस्लामिक देशों तक ने पाकिस्तान के पक्ष में खड़े होने से परहेज करते हुए मध्यस्थता की पेशकश की। तुर्किये ये भी भूल गया कि उसके यहाँ आए भूकंप के समय भारत ने न सिर्फ राहत सामग्री अपितु बचाव दल भी भेजे जिनकी वहां जनता ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की। लेकिन उसने उस मानवीय भावना की कद्र के बजाय इस्लामिक धर्मांधता को प्राथमिकता दी। भारत के जिन सैलानियों और व्यापारियों ने देश पर आए संकट के समय तुर्किये और अज़रबैजान के पाकिस्तान समर्थक रवैये से नाराज होकर पर्यटन और व्यापार से हाथ खींचा वे अभिनंदन के पात्र हैं। लेकिन इनके अलावा जिस देश ने युद्धविराम की घोषणा होते ही पाकिस्तान के साथ खड़े रहने का ऐलान किया वह है चीन , जिसकी हमारे साथ पुरानी दुश्मनी है। हमारी हजारों वर्ग कि.मी जमीन दबाने के बाद भी वह अरुणाचल सहित लद्दाख के बड़े हिस्से पर दावा करते हुए उन्हें अपने नक्शे में दर्शाता है। पड़ोस में होने वाली हर भारत विरोधी गतिविधि में उसी का हाथ होता है। नेपाल , श्रीलंका , मालदीव और बांग्लादेश को हमसे दूर करने में चीन की मुख्य भूमिका रही है। पाकिस्तान को तो उसने अपना पालतू बना रखा है जिसके एवज में उसके कब्जे वाले कश्मीर का भी एक हिस्सा उसने बतौर सौगात ले लिया। असल में अमेरिका और ब्रिटेन के हाथ खींचने के बाद चीन ही पाकिस्तान का सरपरस्त है। हालिया लड़ाई में पाकिस्तान ने जिस युद्ध सामग्री का उपयोग किया उनमें काफी चीन निर्मित थीं। इसलिए युद्धविराम होते ही उसने पाकिस्तान को अपना मित्र बताते हुए उसके साथ खड़े रहने की वचनबद्धता दोहराई। ये देखते हुए भारत में जैसी भावनाएं तुर्किये और अज़रबैजान के विरुद्ध उत्पन्न हुईं वैसी ही चीन के प्रति भी होनी चाहिए , जो आर्थिक , सामरिक और कूटनीतिक सभी दृष्टियों से भारत का शत्रु है। दुर्भाग्य से पूरा भारत चीन में बनी वस्तुओं से भर गया है। जिन चीजों का भारत में उत्पादन हो रहा है उनमें से ज्यादातर का कच्चा सामान अथवा स्पेयर पार्ट चीन से ही आयात होते हैं। मेक इन इंडिया अभियान का अच्छा असर होने के बाद भी चीन हमारी अर्थव्यवस्था पर हावी है। भारत से काफी कारोबारी और पर्यटक वहां जाते हैं। ताजा विवाद में उसने जिस तरह खुलकर हमारे दुश्मन की हौसला अफजाई करते हुए उसे संरक्षण दिया उसके बाद अब चीन के बहिष्कार की भी मुहिम चलनी चाहिए। यद्यपि ये बेहद कठिन काम है किन्तु जब सवाल देश की सुरक्षा और सम्मान का हो तब थोड़ा नुकसान उठाने के लिए भी तैयार रहना होगा। ये देखते हुए तुर्किये और अज़रबैजान जैसा विरोध चीन का भी होना जरुरी है क्योंकि पाकिस्तान उसी के दम पर भारत से भिड़ने का दुस्साहस करता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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